RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 पुष्पक्रम

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 20 पुष्पक्रम

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 20 पुष्पक्रम

RBSE Class 11 Biology Chapter 20 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 20 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
असीमाक्षी पुष्पक्रम के पुष्पी अक्ष की वृद्धि होती है –
(क) सीमित
(ख) सतत
(ग) अनियमित
(घ) रुक रुक कर

प्रश्न 2.
यौगिक असीमाक्ष पाया जाता है –
(क) शहतूत
(ख) गेहूँ
(ग) अमलतास
(घ) राई

प्रश्न 3.
ऐसा पुष्पक्रम जिसमें पुष्प अवृंत तथा एकलिंगी होते हैं –
(क) केटकिन
(ख) स्पाइक
(ग) पेनिकल
(घ) रेसीमोस रेसीम

प्रश्न 4.
कोलोकेसिया (अरबी) उदाहरण हैं –
(क) स्पेडिक्स
(ख) स्पाइक
(ग) नतकणिश
(घ) स्पाइकलेट

प्रश्न 5.
समशिख (कॉरिम्ब) पुष्पक्रम निम्न में से किसमें पाया जाता है –
(क) धनिया
(ख) सौंफ
(ग) मेथी
(घ) आइबेरिस

उत्तरमाला:
1. (ख), 2. (ग), 3. (क), 4. (क), 5. (घ)

RBSE Class 11 Biology Chapter 20 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पुष्पछत्र पुष्पक्रम किस पादप में पाया जाता है ?
उत्तर:
धनियाँ, सौंफ, जीरा इत्यादि में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
मुण्डक में कितने प्रकार के पुष्पक पाये जाते हैं ? उदाहरण भी दीजिये।
उत्तर:
दो प्रकार के बिम्ब पुष्पक (disc florets) तथा अर पुष्पक (ray florets)। उदाहरण – सूर्यमुखी।

प्रश्न 3.
एकल ससीमाक्ष की प्ररोह पर कौनसी दो स्थितियाँ संभव है?
उत्तर:
दो स्थितियाँ होती हैं –

  1. कुण्डलनी ससीमाक्ष (Helicoid cyme) तथा
  2. वृश्चिकी ससीमाक्ष (scorpioid cyme)।

प्रश्न 4.
असीमाक्षी व ससीमाक्षी पुष्पक्रमों में क्या मूलभूत अन्तर है ?
उत्तर:
पुष्पावली वृन्त शीर्ष पुष्प में समाप्त न होकर निरन्तर वृद्धि करता है व पुष्प अग्राभिसारी क्रम में लगते हैं, इसे असीमाक्ष कहते हैं किन्तु शीर्ष पर पुष्प लगने पर वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है व पुष्प नीचे तलाभिसारी क्रम में लगते हैं, इसे ससीमाक्ष पुष्पक्रम कहते हैं।

प्रश्न 5.
वृश्चिक व कुंडलिनी में विभेद कीजिए।
उत्तर:
कुंडलिनी में पुष्पावली वृन्त से सभी शाखाएँ एक ही तरफ विकसित होती हैं किन्तु वृश्चिक में पुष्पावली वृन्त पर पुष्प एक बार दायीं और फिर बायीं ओर निकलते हैं अर्थात् सीढ़ीनुमा क्रम में होते हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 20 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एकशाखी ससीमाक्ष पुष्पक्रम कितने प्रकार का होता है ? प्रत्येक का उदाहरण भी दीजिये।
उत्तर:
एकशाखी ससीमाक्ष पुष्पक्रम में पुष्पावली वृन्त अंतस्थ पुष्प में समाप्त हो जाता है और नीचे की ओर एक स्थान पर एक ही पार्श्व शाखा निकलती है, जो पुष्पावली वृन्त के समान अन्तस्थ पुष्प में समाप्त होती है। पुष्पावली वृन्त पर जब सभी पार्श्व शाखाएँ एक ही तरफ होती हैं। तो इसे कुण्डलिनी ससीमाक्ष कहते हैं। उदाहरण – होलीओट्रोपियम्।
पुष्पावली – वृन्त पर जब एक पाश्र्व शाखा एक तरफ और उससे अगली पाश्र्व शाखा पहली वाली से विपरीत दिशा में हो तो इस प्रकार के पुष्पक्रम को वृश्चिकी ससीमाक्ष कहते हैं। उदाहरण – बिगोनिया।

प्रश्न 2.
द्विशाखी वे बहुशाखी ससीमाक्ष में क्या अन्तर है ? प्रत्येक का उदाहरण भी दीजिये।
उत्तर:
दोनों ही ससीमाक्ष पुष्पक्रम हैं अर्थात् पुष्पावली वृन्त अन्तस्थ पुष्प में समाप्त हो जाता है। इसके नीचे एक ही तल पर दो पार्श्व पुष्प एक-दूसरे के सम्मुख निकलते हैं तो यह द्विशाखी होता है किन्तु जब एक ही तल पर दो से अधिक पार्श्व पुष्प निकलते हों तो इसे बहुशाखी ससीमाक्ष कहते हैं। द्विशाखी ससीमाक्ष जिप्सोफिला, डाएन्थस व हारसिंगार में पाया जाता है, तो बहुशाखी आक में मिलता है।

प्रश्न 3.
नतकणिश ( केटकिन) व स्पेडिक्स में उदाहरण सहित विभेद कीजिए।
उत्तर:
नतकणिश व स्पेडिक्स में अन्तर –

स्पेडिक्स (Spadix)नतकणिश (Catkin)
1. पुष्पावली वृन्त मोटा व मांसल होता है।1. मोटा व मांसल न होकर पतला, लम्बा व लटका हुआ होता है।
2. पुष्प एक या अनेक विशेष रंगीन सहपत्रों अर्थात् स्पेथ से ढके होते हैं।2. पुष्प ढके नहीं होते व न ही स्पेथ होता है।
3. पुष्प अवृन्ती, उभयलिंगाश्रयी होते हैं।3. अवृन्ती व एकलिंगाश्रयी होते हैं।
4. मांसल अक्ष पर नर पुष्प ऊपर तथा मादा पुष्प नीचे होते हैं। उदाहरण – केला।4. अक्ष पर नर या मादा पुष्प होते हैं। उदाहरण – शहतूत।

प्रश्न 4.
समशिख व पुष्पछत्र में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समशिख एवं पुष्पछत्र में अन्तर –

समशिख (Corymb)पुष्पछत्र (Umbel)
1. पुष्पाक्ष (Floral axis) छोटा होता है।1. पुष्पाक्ष निरुद्ध (Suppressed) होता है।
2. पुष्पाक्ष से पुष्प अलग-अलग स्थानों से निकलते हैं।2. पुष्पाक्ष के एक स्थान से सभी पुष्प निकलते प्रतीत होते हैं।
3. नीचे वाले पुष्पों के वृन्त लम्बे व ऊपर वालों के छोटे होते हैं जिससे सभी पुष्प ऊपर से एक तल में दिखाई देते हैं। उदाहरण – कैडिटफ्ट।3. सभी पुष्पों के वृन्त समान लम्बाई के होते हैं तथा बराबर दिखाई देते हैं। उदाहरण – ब्राह्मीबूटी।

प्रश्न 5.
हाइपेन्थोडियम व सायथियम में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium)सायथियम (Cyathium)
1. पुष्पासन मांसल छोटा, नाशपती दार, अधिक संकरे मुखवाला, खोखले प्यालेनुमा संरचना होती है।1. सभी पुष्पों के सहपत्र मिलकर एक प्यालेनुमा संरचना बनाते हैं जिसे  सहपत्रचक्र (involucre) कहते हैं।
2. मकरन्द ग्रन्थि नहीं होती है।2. मकरन्द ग्रन्थि होती है।
3. प्याले के केन्द्र में एक लम्बा वृतयुक्त मादा पुष्प बाहर निकला होता है, इसके चारों ओर अनेक एकलिंगी नर पुष्प (वृत युक्त एक पुंकेसर ही नर पुष्प होता है।) होते हैं।3. प्याले में एकलिंगी पुष्प होते हैं। पुष्प छोटे जो छिद्र के पास होते हैं वे नर पुष्प तथा आधार की ओर मादा पुष्प होते हैं।
4. पुष्प सवृन्ति होते हैं।4. अवृन्ति होते हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 20 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पुष्पक्रम की परिभाषा दीजिये। असीमाक्ष व ससीमाक्ष प्रकार के पुष्पक्रमों पर विस्तृत प्रकाश डालिये।
उत्तर:
पादप में पुष्पों के क्रम या व्यवस्था को पुष्पक्रम कहते हैं। पुष्प जिस अक्ष पर व्यवस्थित होते हैं उसे पुष्पावली वृन्त (pedundi) कहते हैं।

असीमाक्ष पुष्पक्रम:
पुष्पावलीवृन्त की वृद्धि असीमित होती है। पुष्पावलीवृन्त शीर्षस्थ पुष्प में समाप्त न होकर निरन्तर वृद्धि करता रहता है तथा इस पर अनेक पुष्प अग्राभिसारी अनुक्रम (acropetal succession) में विन्यासित रहते हैं अर्थात् तरुण पुष्प कलिकायें पुष्पावलीवृन्त के शीर्षक के समीप तथा पुराने पुष्प आधार के पास होते हैं। असीमाक्ष पुष्पक्रम के विभिन्न प्रकारों का अध्ययन निम्न तीन शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है –

  1. पुष्पक्रम जिनमें पुष्पावलीवुत लम्बा होता है।
  2. पुष्पक्रम जिनमें पुष्पावलीवृंत अपेक्षाकृत छोटा होता है।
  3. पुष्पक्रम जिनमें पुष्पावलीवुत चपटा या तश्तरीनुमा (अवतल या उत्तल) होता है।

1. असीमाक्ष पुष्पक्रम जिनमें पुष्पावलीवुत लम्बा होता है। (Racemose inflorescence with elongated peduncle):

  • असीमाक्ष (Raceme): पुष्पक्रम में पुष्पावलीवृन्त लम्बा व इस पर अनेक सवृन्त पुष्प अग्राभिसारी क्रम में व्यवस्थित होते हैं, उदाहरण – मूली, सरसों, अमलतास, गुलमोहर।
  • यौगिक असीमाक्ष (Compound raceme or Panicle): जब असीमाक्ष पुष्पक्रम शाखित होता है तब प्रत्येक शाखा में एक असीमाक्ष पुष्पक्रम होता है। उदाहरण – गुलमोहर (Delnox regia), युक्का (yucca)।
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  • कणिश या शूकी (Spike): लम्बी पुष्पावलीवृन्त पर अनेक वृन्तहीन (sessile) पुष्प अग्राभिसारी क्रम में व्यवस्थित होते हैं, उदाहरण – चौलाई (Amaranthus), लटजीरा (Achyrathus), एडहे टोडा (Adhatoda) पालक, काली मिर्च (Piper longum)।
  • कणिशिका या अनुशूकी (Spikelet): जब पुष्पावलीवृन्त शाखित हो तथा प्रत्येक शाखा पर स्पाइक (कणिश या शूकी) के समान पुष्पक्रम हो तो इस प्रकार की छोटी शाखा को स्पाइकिका या कणिशिका या अनुशूकी (spikelet) कहते हैं। उदाहरण – गेहूँ, जौ, घास।

इसके प्रत्येक कणिशिका के अक्ष को रैकिला (rachilla) कहते हैं। तथा इस पर तीन शल्क होते हैं जिन्हें (glume) कहते हैं। इनमें से नीचे के दो बंध्यतुष (sterile glume) तथा तीसरा तुष फलद या प्रमेयिका (fertile glume or lemma) होता है। फलद से तात्पर्य है कि इसके कक्ष में पुष्प लगता है अतः इसे पुष्पीय तुष (flowering glume) भी कहते हैं। पुष्पीय तुष के ठीक विपरीत एक द्विशिरीय युक्त रचना शल्किका (palea) कहते हैं जो कि सहपत्रिका (bracteole) का रूपान्तरण है। शल्किका व पुष्पीय तुष पुष्प को घेरे रहते हैं। इस प्रकार के सम्पूर्ण स्पाइकिका युक्त अनुक्रम वाले पुष्पक्रम को कणिशिका युक्त कणिश या स्पाइकिका युक्त स्पाइक (spike of spikelets) कहते हैं।
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  • मंजरी या नतकणिश (Catkin): यह भी एक प्रकार से कणिश या शूकी पुष्पक्रम है। इसमें पुष्पावली वृन्त दुर्बल या कोमल, लम्बा (कुंछ पौधों में गूदेदार) व लटका हुआ होता है। पुष्पावली वृंत पर अनेक वृत्तहीन, एकलिंगी पुष्प पास-पास में लगे रहते हैं। सम्पूर्ण पुष्पक्रम एक रचना के रूप में दिखाई देते हैं। इसमें पुष्प अलग-अलग न गिरकर (झड़कर) सम्पूर्ण पुष्पक्रम एक साथ गिरता है। उदाहरण – शहतूत (MoruS indica), भोजपत्र (Betula) इत्यादि।
  • स्पेडिक्स (Spadix): यह शूकी का रूपान्तरण है। पुष्पावली वृत्त लम्बा, मोटा व मांसलदार होता है। इस पर अनेक वृत्तहीन, एकलिंगी पुष्प सघन रूप से लगे होते हैं। मुख्य अक्ष के ऊपरी भाग में नर पुष्प तथा नीचे के भाग में मादा पुष्प शिकीछद विन्यासित होते हैं। दोनों प्रकार के पुष्पों के बीच का भाग खाली रहता है, जिस पर छोटे बंध्य रोम होते हैं।
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    सम्पूर्ण पुष्प एक बड़ी रंगीन या हरे रंग की सहपत्र (bract) से ढका होता है जिसे शूकीछद (spathe) कहते हैं। शूकीछद पुष्पों की रक्षा करने के साथ-साथ परागण हेतु कीटों को आकर्षित करता है, उदाहरण अरबी (Colocasia), केला (Musa), मक्का (Zea mays)।

2. असीमाक्ष पुष्पक्रम जिनमें पुष्पावलीवृन्त अपेक्षाकृत छोटा होता (Racemose inflorescence with comparatively short peduncle):

  • समशिख (Corymb): पुष्पावलीवृन्त छोटा होता है। नीचे लगे पुष्पों का वृत्त ऊपर वाले पुष्पों की तुलना में अधिक लम्बा होता है। इस कारण सभी पुष्प लगभग एक ही तल पर आ जाते हैं, उदाहरणकैन्डीटफ्ट (Iberis amara)।
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  • पुष्पछत्र (Umbel): पुष्पावलीवृन्त छोटा परन्तु इसके शीर्ष पर से अनेक सवृन्ती पुष्प निकलते हैं। इनके पुष्पवृन्त की लम्बाई लगभग समान होती है जिस कारण सभी पुष्प एक ही तल में रहते हैं। इनमें प्रत्येक पुष्पों के उद्गम स्थान पर सहपत्र (bract) का एक चक्र होता है जो सहपत्रचक्र (involucre) बनाते हैं। पुष्पछत्र के केन्द्र में स्थित तरुण पुष्प होते हैं तथा परिधि की ओर खिले हुए व्यवस्थित रहते हैं। उदाहरण ब्राह्मीबूंटी (Centelle asiatica), धनियाँ, सोंफ, जीरा इत्यादि।

3. असीमाक्ष पुष्पक्रम जिनमें पुष्पावलीवूत्त चपटा या तश्तरीनुमा अवतल या उत्तल होता है (Racemose inflorescence with flat or disc like concave or convex peduncle):

(i) मुंडक या केपिटुलम (Head or Capitulum): पुष्पावली वृन्त की लम्बाई की वृद्धि अवरुद्ध होकर यह चपटा, तश्तरीनुमा अवतल या उत्तल हो जाता है तथा इस पर अनेक छोटे पुष्प सघन रूप से व्यवस्थित रहते हैं। इन छोटे पुष्पों को पुष्पक (florets) कहते हैं। व्यवस्था में तरुण पुष्प केन्द्र में तथा परिधि की ओर खिले पुष्प होते हैं। इस व्यवस्था को अभिकेन्द्रीयक्रम (centripetal order) कहते हैं। केन्द्रीय पुष्पों को बिम्ब पुष्पक (disc florets) तथा परिधि वालों को अर पुष्पक (ray florets) कहते हैं।

बिम्ब पुष्पक नलिकाकार तथा परिधि पुष्पक जीभिकाकार (ligulate) होते हैं। एक ही पुष्पक्रम में द्विलिंगी, एकलिंगी व बंध्य किस्म के पुष्पक पाये जाते हैं। सभी पुष्पक अनेक सहपत्रों से परिबद्ध रहते हैं। मुंडक में अनेक छोटे पुष्पक सघन व्यवस्थित रहकर कीटों को आकर्षित करते हैं व एक ही कीट सभी पुष्पकों को परागित कर सकता है अतः इस प्रकार के पुष्पक्रम को सबसे विकसित प्रकार का पुष्पक्रम माना जाता है। उदाहरण सूर्यमुखी कुल (कम्पोजिटी या एस्टेरेसी) के पादप जैसे सूर्यमुखी।
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सीमाक्ष पुष्पक्रम:
पुष्पावलीवुत एक शीर्षस्थ पुष्प में समाप्त होता है जिससे इसकी वृद्धि अवरुद्ध होकर छोटा होता है। पुष्प तलाभिसारी क्रम (basipetal succession) में व्यवस्थित होते हैं। इसमें नीचे के पुष्प तरुण तथा ऊपर के पुष्प खिले होते हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं –

  1. एक शाखी
  2. द्विशाखी तथा
  3. बहुशाखी ससीमाक्षे

1. एकंशाखी ससीमाक्ष (Uniparous or monochasial cymose):
पुष्पावली वृंत के शीर्ष पर एक पुष्प होता है तथा नीचे एक स्थान से एक ही पार्श्व शाखा विकसित होती है जिसके शीर्ष पर भी एक पुष्प होता है। यदि पुष्पावली वृन्त से सभी शाखायें एक ही तरफ विकसित हो तो इसे कुण्डलनी ससीमाक्ष (Helicoid cyme) कहते हैं। उदाहरण – हीलियोट्रोपियम (Heliotropium)। यदि पुष्पावली वृन्त पर शाखा एक बार दायीं ओर फिर बायीं. और निकलती रहे अर्थात् सीढ़ीनुमा क्रम में हो तो इस पुष्पक्रम को वृश्चिकी ससीमाक्ष (Scorpioid cyme) कहते हैं, उदाहरण बिगोनिया (Begonia), हेमीलिया (Hamelia)।

2. द्विशाखी सीमाक्ष (Biparous or dichasial cymose):
पुष्पावली वृन्त के शीर्ष पर पुष्प होता है। इसके नीचे एक ही तल से दो पाश्र्व शाखायें एक दूसरे के विपरीत निकलती हैं जिनके शीर्ष पर भी पुष्प होता है। यही क्रम इन पाश्र्व शाखाओं पर मिलता है, उदाहरण – डाएन्थम (Diaunthus), जिप्सोफिला (Gypsophylla), इक्जोरा (Ixora) आदि।

3. बहुशाखी ससीमाक्ष (Multiparous or polychasial cymose):
पुष्पावली वृन्त का अंत एक शीर्षस्थ पुष्प में होता है तथा नीचे एक ही तल से अनेक शाखायें विकसित होती हैं। प्रत्येक पाश्र्व शाखा के शीर्ष पर एक पुष्प होता है। यही क्रम अन्य शाखाओं पर भी होता है, उदाहरण – बोहरेविया (Boehraavia), आक (Calotropis)।
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प्रश्न 2.
विशेष प्रकार के पुष्पक्रमों को चित्र व उदाहरणों के माध्यम से समझाइये।
उत्तर:
1. साएथियम (Cyathium):
इस प्रकार का पुष्पक्रम मुख्यतः यूफोर्बियेसी कुल (Euphorbiaccae family) में पाया जाता है। सम्पूर्ण पुष्पक्रम एक पुष्प के समान प्रदर्शित होता है। इसके प्रत्येक पुष्प सहपत्रयुक्त (bracteate) होते हैं। समस्त सहपत्र मिलकर एक प्यालेनुमा संरचना बनाते हैं जिसे सहपत्रचक्र (involucre) कहते हैं। सहपत्रचक्र के बाहर किनारे पर एक मकरन्द ग्रन्थि (nectar gland) होती है जिससे मकरन्द स्रावित होता है।

सहपत्रचक्र के अन्दर केन्द्र में लम्बा वृन्त युक्त एक मादा पुष्प स्थित होता है। मादा पुष्प अत्यधिक ह्रासित (reduced) होता है। इसमें पुष्पवृत्त की वृद्धि होने के फलस्वरूप यह प्यालेनुमा संरचना से बाहर निकल आता है। मादा पुष्प त्रिअण्डपी (tricarpellary), संयुक्ताअण्डपी (syncarpous), त्रिकोष्ठीय (trilocular), अक्षीय बीजाण्डन्यास (axile placentation), जायांगध्र (hypogynous), जायांग वाला होता है। इसमें वर्तिका की संख्या अण्डपों के बराबर या प्रत्येक वर्तिका शाखित होकर दो वर्तिकाग्र पालियाँ (stigmatic lobes) बनाती हैं।
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मादा पुष्प के चारों ओर अनेक नर पुष्पों का समूह होता है। प्रत्येक नर पुष्प के आधार पर एक शल्की सहपत्र (scaly bract) होता है। नर पुष्प में भी वृन्त होता है, वृन्त व पुंकेसर के जुड़ाव स्थान पर जोड़ स्पष्ट दिखाई देता है। नर पुष्प भी ह्रांसित होता है क्योंकि केवल पुंकेसर के अतिरिक्त पुष्प के अन्य चक्र अनुपस्थित होते हैं। पुंकेसर में पुतन्तु (filament), परागकोष (anther lobe) तथा योजी (connective) होता है।

सायथियम में नर व मादा पुष्प तलाभिसारी क्रम (basipetal order) में व्यवस्थित रहते हैं अर्थात् मादा पुष्प सर्वप्रथम परिपक्व होता है तथा नर पुष्प बाद में परिपक्व होते हैं। इसी प्रकार केन्द्र में स्थित नर पुष्प सर्वप्रथम परिपक्व होते हैं तथा परिधि की ओर स्थिति नर पुष्प क्रमशः बाद में परिपक्व होते हैं। अतः साएथियम पुष्पक्रम वस्तुतः ससीमाक्ष (cymose) पुष्पक्रम का रूपान्तरण है। उदाहरण यूफोर्बिया (Euphorbia)।

2. कूटचक्र (Verticillaster):
यह द्विशाखी ससीमाक्ष (biparous cymose) पुष्पक्रम का संघनित रूप है तथा तुलसी कुल (Labiateae = Lamiaccae) के पादपों में पाया जाता है। इसमें स्तम्भ पर पत्तियाँ सम्मुख (opposite) विन्यासित होती हैं तथा प्रत्येक पत्ती के कक्ष से एक पुष्पक्रम निकलता है। अतः इन पत्तियों को सहपत्र कहा जा सकता है। पुष्पक्रम में प्रथम अक्ष के अन्तस्थ स्थिति पर पुष्प लगता है। पुष्पक्रम में प्रारम्भ में द्विशाखी ससीमाक्ष परन्तु बाद में एकशाखी वृश्चिकी (Uniparous scorpioid) पुष्पों के लगने की प्रवृत्ति होती, है। पुष्पक्रम में सभी पुष्प अवृन्ती, छोटे तथा सन्निकट होते हैं, उदाहरण – पोदीना, तुलसी।
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3. हाइपैन्थोडियम (Hypanthodium):
यह पुष्पक्रम फाइकस (Ficus) जाति जैसे बरगद, अंजीर, पीपल व गूलर इत्यादि में पाया जाता है। हाइपैन्थोडियम में पुष्पासन (thalamus) मांसल, मोटा, नाशपती, दार, अत्यधिक संकरे मुखवाला, खोखले प्यालेनुमा संरचना वाला होता है। ऊपरी भाग में स्थित छोटा छिद्र शल्कों द्वारा ढका रहता है। पुष्प छोटे व एकलिंगी होते हैं जो खोखले प्याले की भीतरी सतह पर लगते हैं। छिद्र के समीप वाले नर पुष्प होते हैं तथा आधार की ओर मादा पुष्प लगते हैं। सभी पुष्प अवृन्ती होते हैं, यह पुष्पक्रम वस्तुतः मुण्डक (capitulum) का रूपान्तरण है।
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मुख्य अक्ष पर पुष्पों का विन्यास पुष्पक्रम कहलाता है। पुष्पक्रम निम्न प्रकार के होते हैं –

असीमाक्षी (Recemose):
इस प्रकार के पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष सदैव वृद्धि अवस्था में रहता है तथा पुष्प में समाप्त नहीं होता है। पुराने पुष्प अक्ष में नीचे की तरफ तथा नयी कलिकायें अक्ष के शीर्ष पर पाई जाती हैं। इस प्रकार के क्रम को अग्राभिसारी क्रम कहते हैं। असीमाक्षी पुष्पक्रम के प्रकार निम्न हैं –

  1. असीमाक्ष (Receme)
  2. स्पाइक (Spike)
  3. समशिख (Corymb)
  4. छत्रक (Umbel)
  5. कैटकिन (Catkin)
  6. स्पेडिक्स (Spadix)
  7. मुण्डक (Capitulum)

ससीमाक्षी (Cymose):
इस प्रकार के पुष्पक्रम का मुख्य अक्ष पुष्प में समाप्त होता है। इसमें पुराने पुष्प ऊपर की तरफ तथा नई कलियाँ नीचे की तरफ लगी होती हैं। इस प्रकार के क्रम को तलाभिसारी क्रम कहते हैं। यह पुष्पक्रम निम्न प्रकार के होते हैं –

  1. एकल (Solitary) एकलशाखी ससीमाक्ष (Unichasial cyme)
  2. कुंडलिनी रूप एकलशाखी (Heliciod unichasial)
  3. वृश्चिकी एकलशाखी (Scorpioid unichasial)
  4. द्विशाखी ससीमाक्ष (Dichasial or Biparous cyme)
  5. बहुशाखी (Polychasial)

विशेष प्रकार के पुष्पक म (Special Type of Inflorescence): ये निम्न प्रकार के होते हैं –

  1. सायथियम (Cyathium)
  2. कूट चक क (Verticillaster)
  3. हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium)
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