RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 12 आण्विक जीवविज्ञान

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Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 12 आण्विक जीवविज्ञान

RBSE Class 11 Biology Chapter 12 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
डी.एन.ए. का द्विसूत्री मॉडल प्रतिपादित करने वाले वैज्ञानिक थे –
(अ) खुराना एवं निरेनबर्ग
(ब) वाटसन व क्रिक
(स) बीडल व टेटम
(द) मॉर्गन एवं ब्रिजेज

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से एक रज्जुकी डी.एन.ए. पाया जाता है –
(अ) जीवाणु में
(ब) TMV में
(स) φ x 174 में
(द) साल्मोनेला में

प्रश्न 3.
वह प्रक्रिया जिसमें डी.एन.ए. के समकक्ष एम.आर.एन.ए. बनता है कहलाती है –
(अ) ट्रांसक्रिप्शन
(ब) ट्रांसलेशन
(स) ट्रांसडक्शन
(द) टर्मिनेलाइजेशन

प्रश्न 4.
कोडोन क्या है ?
(अ) mRNA में उपस्थित दो क्षारकों का क्रम
(ब) rRNA में उपस्थित तीन क्षारकों का क्रम
(स) mRNA में उपस्थित तीन क्षारकों का क्रम
(द) tRNA में उपस्थित दो क्षारकों का क्रम

प्रश्न 5.
सिन्ट्रान जीन की है –
(अ) संरचनात्मक इकाई
(ब) पुनर्योजन इकाई
(स) अनुपूरक इकाई
(द) उत्परिवर्तन इकाई

प्रश्न 6.
आर.एन.ए. पॉलीमेरेज का कार्य है –
(अ) rRNA संश्लेषण
(ब) Hn – RNA संश्लेषण
(स) tRNA संश्लेषण
(द) उपरोक्त सभी
उत्तरमाला:
1. (ब), 2. (स), 3. (अ), 4. (स), 5. (अ), 6. (द)

RBSE Class 11 Biology Chapter 12 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डी.एन.ए. मुख्य रूप से जीवों में कहा पाया जाता है ?
उत्तर:
डी.एन.ए. मुख्य रूप से केन्द्रक (Nucleus) में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्यूरीन की नाइट्रोजन क्षारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्यूरीन की नाइट्रोजन क्षारकों के नाम निम्न हैंएडीनीन (Adene – A) व ग्वानीन (Guanine-G)।

प्रश्न 3.
डी.एन.ए. के दो प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
डी.एन.ए. के दो प्रकार निम्न हैं –

  1. A – DNA
  2. B – DNA

प्रश्न 4.
आर.एन.ए. के थाइमीन के स्थान पर कौनसी नाइट्रोजन क्षारक पाई जाती है ?
उत्तर:
आर.एन.ए. में थाइमीन के स्थान यूरेसील (Uracil) पाई जाती है।

प्रश्न 5.
रिकॉन क्या है ?
उत्तर:
यह डी.एन.ए. का वह सूक्ष्म खण्ड है जो जीन की पुनर्योजन (Rcombination) इकाई है।

प्रश्न 6.
त्रिक कोड क्या है ?
उत्तर:
प्रत्येक अमीनो अम्ल के लिए तीन नाइट्रोजन क्षारकों के एक अनुक्रमे को ही त्रिक कोड कहते हैं।

प्रश्न 7.
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में आर.एन.ए. पॉलीमेरेज कहाँ पाया जाता है ?
उत्तर:
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में आर.एन.ए. पॉलीमेरेज केन्द्रक (Nucleus) में पाया जाता है।

प्रश्न 8.
प्रोटीन संश्लेषण को आरम्भिक कूट क्या है ?
उत्तर:
प्रोटीन संश्लेषण का आरम्भिक कूट “AUG” है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 12 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डी.एन.ए. किन मुख्य रासायनिक पदार्थों का बना होता है ?
उत्तर:
डी.एन.ए. निम्न मुख्य रासायनिक पदार्थों का बना होता है –

  1. पेन्टोज शर्करा – डिऑक्सीराइबोज
  2. फास्फेट – फास्फोरिक अम्ल
  3. नाइट्रोजन क्षारक – प्यूरीन्स व पिरिमिडिन्स

प्यूरीन्स दो प्रकार की होती है-एडीनीन व ग्वानीन पिरिमिडिन्स भी दो प्रकार की होती है – साटोसीन व ग्वानीन।

प्रश्न 2.
Z – DNA के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
Z – DNA:
इसकी दोनों श्रृंखलाएँ वामावर्त कुण्डलित (Anti-clockwise coiled or left handed) होती है। इसका निर्माण क्षारकों तथा डिऑक्सीराइबोज शर्करा के बीच ग्लाइकोसाइडिक बंध बनने के कारण होती है। इसकी द्विकुंडलनी टेढ़ी-मेढी (Zip – zag) होती है। इसके प्रत्येक कुण्डलन में 12 न्यूक्लिओटाइड युग्म होते हैं व चूड़ी अन्तराल 69 A होता है। इस प्रकार DNA मुख्य रूप से जीनोम के उन स्थलों पर पाया जाता है जो कोशिका कार्यिकी नियंत्रण से सम्बन्धित है। Z – DNA की खोज अलेक्जेण्डर रिचे व सहयोगियों ने की थी। इस प्रकार के DNA की द्विकुण्डलिनी टेढ़ी-मेढ़ी होने के कारण ही इसे Z – DNA नाम दिया गया। Z – DNA लारग्रन्थि गुणसूत्र (Salivary gland chromosome) में उपस्थित होता है।

प्रश्न 3.
जीन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
जीन (Gene)
जीन एक सजीव कोशिका के जीवन चक्र की प्रत्येक क्रिया को नियंत्रित एवं निर्देशित करने वाली आनुवंशिक सूक्ष्मतम इकाई है। सिमार बेन्जर की आधुनिक अवधारणा के अनुसार जीन को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया –

  1. सिस्ट्रान (Cistron): डी.एन.ए. का सबसे बड़ा खण्ड है जो जीन की संरचनात्मक इकाई है। जो लक्षण निर्धारण के लिए उत्पाद बनाता है।
  2. रिकॉन (Recón): यह डी.एन.ए. का वह सूक्ष्मतम खण्ड है जो जीन की पुनर्योजन (Recombination) इकाई है।
  3. म्यूटॉन (Muton): डी.एन.ए. का वह सूक्ष्मतम खण्ड जिसमें उत्परिवर्तन (Mutation) की क्षमता होती है।
  4. रेप्लिकॉन (Replicon): DNA का वह सूक्ष्मतम भाग जो प्रतिकृतिकरण के लिए उत्तरदायी होता है।
  5. कॉम्पलान (Complan): DNA का वह सूक्ष्मतम भाग जो अनुपूरण (Complementation) के लिए उत्तरदायी होता है।
  6. ओपेरॉन (Operon): DNA के वे खण्ड जो विशिष्ट क्रियात्मक इकाई के रूप में कार्य करते हैं जो कि संरचनात्मक जीन व ऑपरेटर जीन दोनों द्वारा संयुक्त रूप से होता है।

प्रश्न 4.
पूरक जीन्स क्या होते हैं ?
उत्तर:
पूरक जीन (Supplementary Genes): दो भिन्नभिन्न प्रभावी जीन एक-दूसरे की अनुपस्थिति में अपने विशिष्ट लक्षणप्ररूप को प्रकट करती है। किन्तु दोनों एक साथ होने पर अन्योन्य क्रिया द्वारा एक नये लक्षण प्ररूप को उत्पन्न करने में एक-दूसरे की पूरक होती हैं, तो ऐसी जीन पूरक जीन कहलाती है। यदि दोनों अप्रभावी रूप में उपस्थित हों तो भी एक नया लक्षण प्रकट होता है।

प्रश्न 5.
आनुवंशिक कूट को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
आनुवंशिक कूट: न्यूक्लिओटाइडों की संख्या व अनुक्रम जो एक अमीनो अम्ल का विशिष्टीकरण करता है, एक कोडोन या कूट कहलाता है। समस्त कोडोन का समूह 20 अमीनो अम्लों का विशिष्टीकरण करता है इसे आनुवंशिक कूट (Genetic Code) कहते हैं।

प्रश्न 6.
जीन अभिव्यक्ति के एक दिशीय संचरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
एक दिशीय संचरण (Uni Directional Flow) इसके अनुसार प्रोटीन संश्लेषण के अन्तर्गत आनुवंशिक सूचनाओं का सम्प्रेषण केवल एक दिशा में होता है। सर्वप्रथम ये सूचनाएँ अनुलेखन (Transcription) की प्रक्रिया में m – RNA को DNA द्वारा स्थानान्तरित होती हैं। इसके बाद विभिन्न प्रकार आर.एन.ए. के माध्यम से m – RNA द्वारा आनुवंशिक सूचनाओं का प्रोटीन की भाषा में अनुलिपिकरण या अनुवाद (Translation) करता है। इस विचारधारा को सेन्ट्रल डोग्मा (Central dogma) कहते हैं।
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प्रश्न 7.
यूकैरियोटिक कोशिका में पाये जाने वाले पालीमेरेज व उनके स्थल बताइये।
उत्तर:
यूकैरियोटिक कोशिका में तीन प्रकार के पॉलीमरेज एन्जाइम पाये जाते हैं, इनके नाम, स्थल एवं RNA संश्लेषण में योगदान निम्न हैं,

स्थल (Site)एन्जाइम (Enzyme)आर.एन.ए. संश्लेषण
1. केन्द्रक (Nucleus)RNA पॉलीमेरेज Ir – RNA के संश्लेषण में योगदान
2. केन्द्रीय द्रव्य (Nucleoplasm)RNA पॉलीमेरेज IIविषमांगी आर.एन.ए. (Hn – RNA) के संश्लेषण में कार्यशील होता है। साथ ही Hn – RNA से यह m – RNA बनाता है। अतः  इसे m – RNA का पूर्ववर्ती (Precursor) भी कहते हैं।
3. केन्द्रकीय द्रव्य (Nucleoplasm)RNA पॉलीमेरेज III5 S RNA एवं 1 – RNA के संश्लेषण में कार्यशील होता है।

प्रश्न 8.
अमीनो अम्लों का सक्रियण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अमीनो अम्ल का सक्रियण (Activation of amino acids):
कोशिका द्रव्य में सभी 20 प्रकार के अमीनो अम्ल निष्क्रिय अवस्था में पड़े रहते हैं परन्तु t.RNA से जुड़ने से पूर्व अमीनो अम्ल Mg++ तथा अमीनोएसिल t.RNA सिन्थेटेज (aminoacyl ~ t.RNA synthetase) एन्जाइम की उपस्थिति में ATP के साथ संयोग करके सक्रिय हो जाते हैं। सक्रिय अमीनो अम्लों को अमीनोएसिले एडिनिलेट (aminoacyl ~ adenylate) कहते हैं।
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अब अमीनो एसिल t.RNA सिन्थेटेज एन्जाइम के नियन्त्रण में अमीनो एसिल एडिनिलेट t.RNA अणुओं से जुड़ जाते हैं। इस प्रकार अमीनो एसिल t.RNA कॉम्पलेक्स (amino acyl ~ t.RNA कॉम्पलेक्स) बनता है।RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 12 आण्विक जीवविज्ञान

RBSE Class 11 Biology Chapter 12 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डी.एन.ए. आनुवंशिक पदार्थ है, समझाइये।
उत्तर:
डी.एन.ए. एक आनुवंशिक पदार्थ के रूप में –
विभिन्न आण्विक जीव वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि DNA एक आनुवंशिक पदार्थ (Hereditory material) है। इसके पक्ष में निम्न प्रमाण दिये गये –

1. जीवाणु रूपान्तरण या ग्रिफिथ प्रयोग (Bacterial Transformation or Griffth’s Experiment):
वर्ष 1928 में फ्रेडरिक ग्रिफिथ ने डिप्लोकोकस नीमोनी (Dieltococcus pneumoniae) जीवाणु पर प्रयोग किये। यह जीवाणु स्तनधारियों में निमोनिया उत्पन्न करता है। इन्होंने इस जीवाणु के दो विभेदों (Strains) का पता लगाया।

(अ) उग्र विभेद (Virulent strain-S III):
इस विभेद वाले जीवाणु चिकनी भित्ति (Smooth walled) के होते हैं। इनका बाहरी खोल (Capsule) पॉलीसैकेराइड का बना होता है। ये जीवाणु निमोनिया रोग उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। इस कारण इन्हें उग्र विभेद (Virulent strain) कहते हैं।

(ब) अनुग्र विभेद (Non-virulent strain – R II):
इस विभेद के जीवाणु खुरदरी भित्ति (Rough walled) के होते हैं तथा इन पर पॉलीसैकेराइड का खोल भी नहीं होता है। इस कारण इन जीवाणुओं का आकार भी अनियमित होता है। इन जीवाणुओं में निमोनिया रोग उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती है। इसी कारण इन्हें अनुग्र विभेद (Nonvirulent strain) कहते हैं। चूहों पर इन विभेदों द्वारा निम्न प्रकार से प्रयोग किये गये जब अनुग्र विभेद या R II के जीवाणुओं को चूहों में प्रवेश कराया जाता है तो चूहों में निमोनिया रोग नहीं होता व चूहे जीवित रहते हैं।
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  1. जब उग्र विभेद या S III के जीवाणुओं को चूहे में प्रवेश कराया जाता है तो इनमें निमोनिया रोग हो जाता है व चूहे। मर जाते हैं।
  2. जब उग्र विभेद (Virulent strain) या S III को लगभग 60°C ताप पर गर्म किया जाता है और इसके बाद चूहों में प्रवेश कराया जाता है तो चूहे नहीं मरते हैं।
  3. जब अनुग्र प्रभेद-R II की जीवित कोशिकाओं को ताप द्वारा नष्ट कर दिये गये उग्र प्रभेद – S III की कोशिकाओं के साथ इंजेक्शन द्वारा चूहे के शरीर में प्रविष्ट कराया गया तो यह पाया गया कि चूहे की न्यूमोनिया रोग से मृत्यु हो जाती है। चूहे के रक्त परीक्षण में पाया गया कि इसमें R II तथा S III दोनों प्रकार के जीवाणु थे।
  4. गर्म किये हुये (Heat Killed) S III में जीवाणुओं की। सभी कोशिकायें मृत थीं और यह माना गया कि विभेद S III की मृत कोशिकाओं में कुछ ऐसा पदार्थ था जिससे अनुग्र विभेद R II की कुछ कोशिकाएँ, उग्र विभेद (S III) में रूपान्तरित हो गई। यद्यपि ग्रिफिथ यह नहीं जानते थे कि कौन सा कारक इसे उग्र विभेद में परिवर्तित करता है। अतः जीवाणुओं के एक विभेद से दूसरे विभेद में रूपान्तरण को ग्रिफिथ प्रभाव (Griffith’s effect) या जीवाणु रूपान्तरण (Bacterial transformation) कहते हैं।

ऐवरी, मैकलिऑड एवं मैक्कार्टी ( 1933-44) के प्रयोग (Experiment of Avery, MacLeod and McCarty):
इन्होंने ग्रिफिथ के प्रयोगों को जीवे (in vivo; चूहों में ) में न करके पात्रे (int vitro; काँच के पात्रों में) में दुहराया और रूपान्तरण कारक पदार्थ की पहिचान की।

  1. इन्होंने संवर्धन माध्यम (Culture medium) में स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी के अनुग्र जीवाणु (R II) का संवर्धन तैयार किया तथा उग्र विभेद (S III) के जीवाणुओं के सार (extract) में से कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन्स, DNA तथा RNA को अलग किया।
  2. इन्होंने अनुग्र प्रभेद-R II को संवर्धित किया तथा उसके संवर्धन माध्यम में पृथक् किये गये उपरोक्त रासायनिक घटकों को एक-एक करके अलग-अलग डाला तो उन्होंने यह पाया कि DNA घटक में ही यह क्षमता थी कि वह R प्रकार की कोशिकाओं (केप्स्यूल रहित) को S – प्रकार की (केप्स्यूल युक्त) कोशिकाओं में बदल सके रूपान्तरित S कोशिकाएँ सभी लक्षणों में S III उग्र प्रभेद के समान थीं, क्योंकि उनमें DNA भाग S III प्रभेद द्वारा प्राप्त किया गया। था (चित्र 12.2)। इन प्रयोगों से स्पष्ट हो गया कि DNA ही आनुवंशिक सामग्री है न कि प्रोटीन।
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  3. इन वैज्ञानिकों ने प्रयोग के परिणाम को पुष्ट करने के लिये इस बात का भी पता लगाया कि प्रोटीन का विघटन (पाचन) करने वाले एन्जाइम (प्रोटिऐज; Protease) व RNA का पाचन करने वाले एन्जाइम (Ribonuclease) इस रूपान्तरण को प्रभावित नहीं करते हैं। अतः रूपान्तरित पदार्थ प्रोटीन व RNA नहीं होता है।
  4. प्रयोग में देखा कि रूपान्तरण प्रक्रि या डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिऐज (Deoxyribonuclease) से पाचन के पश्चात् बन्द हो जाती है। अतः इससे स्पष्ट है कि DNA ही रूपान्तरण हेतु जिम्मेदार है।

नोट: ध्यान में प्रोटीऐ ज, राइबो न्यूक्लिऐ ज तथा डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिऐङ एन्जाइम क्रमशः प्रोटीन, RNA व DNA का पाचन या विघटन करने वाले एन्जाइम होते हैं।

ए.डी. हर्षे (A.D. Hershey) तथा एम.जे. चेज (M.J. Chase) ने सन् 1952 में विषाणु T2 भोजी (बेक्टिरियोफेज; Bacteriophage) पर प्रयोग करके यह परिणाम निकाला कि DNA आनुवंशिक पदार्थ है, क्योंकि इस क्रिया में संक्रमण करने वाले भोजी का केवल DNA अंश ही परपोषी जीवाणु कोशिका में प्रवेश करता है। वही आनुवंशिक सूचनाओं का वहन करता है जिससे नई भोजी सन्तानें बनती हैं।
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इन वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में रेडियोएक्टिव सल्फर S35 तथा रेडियोएक्टिव फॉस्फोरस P32 युक्त माध्यम पर उगाकर जीवाणुभोजी DNA को रेडियोएक्टिव बना दिया, क्योंकि जीवाणुभोजी कणों के प्रोटीन में फॉस्फोरस नहीं होता है, किन्तु DNA में फॉस्फोरस होता है इसलिए केवल DNA ही रेडियोएक्टिव फॉस्फोरस द्वारा अंकित होता है। इसी प्रकार जीवाणुभोजी प्रोटीन में ही सल्फर पाया जाता है। जिसे उन्होंने रेडियोएक्टिव सल्फर (S35) द्वारा अंकित कर दिया। इस प्रकार के विभेदी अंकन द्वारा जीवाणुभोजी के DNA व प्रोटीन घटकों को बिना किसी रासायनिक परीक्षण के सरलता से अलग-अलग पहचानना सम्भव हो पाया।

हर्षे व चेज ने इन अंकित जीवाणुभोजी कणों से अलगअलग जीवाणु कोशिकाओं को संक्रमित कराया तो, उन्होंने पाया कि केवल रेडियोएक्टिव (P32) ही जीवाणवीय कोशिकाओं के साथ सम्बद्ध था, किन्तु रेडियोएक्टिव S35 का नहीं था, इन प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ कि जीवाणुवीय कोशिका में केवल DNA ही प्रवेश करता है न कि प्रोटीन। प्रोटीन आवरण परपोषी के बाहर ही रह जाता है तथा DNA ही प्रवेश ही करने के बाद अपने समान नये जीवाणुभोजी कणों का संश्लेषण करता है। हर्षे तथा चेज के इस प्रयोग द्वारा और अधिक स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो गया कि DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है।

प्रश्न 2.
डी.एन.ए. की संरचना के वॉटसन एवं क्रिक मॉडल का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जे.डी. वॉटसन एवं एफ.एच.सी. क्रिक (.D. Watson and FH.S. Crick-1953): सन् 1953 में वॉटसन व क्रिक (Watson and Crick) ने DNA अणु को संरचना के लिए द्वि कुण्डलीय प्रारूप (Double helical model) प्रस्तावित किया। इसके लिए सन् 1962 में वाटसन व क्रिक को नोबल पुरस्कार द्वारा सम्मानित भी किया गया। उस प्रारूप (model) द्वारा DNA की संरचना को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझाया गया है –

  1. DNA का निर्माण पॉलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखला द्वारा होता है। इस श्रृंखला में चार प्रकार की न्यूक्लिओटाइड्स का क्रम DNA अणु की प्राथमिक संरचना (Primary structure) बनाता है। प्रत्येक DNA अणु में ऐसी दो पॉलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखलाएँ पाई जाती है, जो एकदूसरे की पूरक (Complementary) होती है।
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  2. ये श्रृंखलाएँ समानान्तर (Parallel) होती हैं किन्तु इनमें विपरीत ध्रुवता (Polarity) पाई जाती है अतः एक श्रृंखला का C – 31 सिरा दूसरी श्रृंखला के C – 51 सिरे के सामने होता है। एक श्रृंखला चढ़ती हुई (asCending) तथा इसकी उतरती हुई (descending) दिखाई देती है। दोनों श्रृंखलाओं में अणुओं का क्रम विपरीत दिशा में होता है। यदि एक पॉली न्यूक्लिओटाइड श्रृंखला में फास्फोडाइस्टर बंध 31 – 51 दिशा में तो दूसरी पूरक श्रृंखला में 51 – 31 दिशा में फास्फोडाइस्टर बंध होंगे।
  3. DNA अणु को बनाने वाली दोनों पूरक श्रृंखलाएँ एक ही अक्ष के चारों ओर दक्षिणावर्ती (right-handed) कुण्डलन दर्शाती है, जिनमें प्रत्येक कुण्डलन लगभग 34.4A की दूरी पर स्थित होती है। DNA अणु की यह संरचना द्वितीय संरचना (Secondary structure) कहलाती है।
  4. द्विक् कुण्डलन (Double helix) में न्यूक्लिओटाइड्स के फास्फेट्स बाहर की तरफ पाये जाते हैं तथा क्षारक अन्दर की ओर होते हैं। न्यूक्लिओटाइफ कुणा (helix) की अक्ष से 90° कोण पर व्यवस्थित होती है।
  5. दोनों श्रृंखलाएँ आपस में हाइड्रोजन बंध (Hydrogen bonds) द्वारा जुड़ी रहती हैं। हाइड्रोजन बंध क्षारक युग्मों के मध्य पाये जाते हैं।
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  6. क्षारकों (bases) के मध्य युग्मन (pairing) विशिष्ट होता है, क्योंकि दोनों विपरीत श्रृंखलाओं के शर्करा अणुओं के बीच निश्चित दूरी (10 to 11Å) होती है। इस दूरी में हमेशा 1 प्यूरीन क्षारक, 1 पिरिमिडन क्षारक आपस में जुड़कर स्थापित हो सकते हैं। एडीनीन थाइमीन के साथ (A = T), साइटोसीन ग्वानीन के साथ (C ≡ G) अथवा थाइमीन एडीनीन के साथ (T = A) व ग्वानीन साइटोसीन के साथ (G ≡ C) जुड़ते हैं। A तथा T दो H बन्धों द्वारा व C तथा ; तीन HI बंधों द्वारा जुड़े रहते हैं। इस प्रकार दोनों शृंखलाओं में क्षारकों का क्रम एक-दूसरे का पूरक होता है।
    इरविन चारगॉफ (Erwin Chargaff) (1950) द्वारा DNA के मात्रात्मक (Quantitative) विश्लेषण तैयार किये गये तथा क्षार तुल्यता नियम (Base equiratence) दिया A = T तथा G = C की प्रारम्भिक मोलर सान्द्रता
    या \frac { A+G }{ C+T } = 1 तथा \frac { A+T }{ G+C } एक स्पीशीज के लिए स्थिरांक होता है। डिऑक्सीराइबोज शर्करा फास्फेट समआण्विक अनुपात में पाये जाते हैं। कुण्डल (Helix) के प्रत्येक चक्कर (Turn) में 10 क्षार युग्म (Base pair) पाये जाते हैं। क्षारीय युग्मकों के बीच 3.4Å का स्थान होता है। कुण्डलन (Helix) का व्यास 20 Å (19.8 Å) होता है तथा DNA अणु 360° घड़ी की दिशा में दक्षिणावृत (Clockwise) पाया जाता है।

प्रश्न 3.
डी.एन.ए. की प्रतिकृति की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
डी.एन.ए. की प्रतिकृति (DNA – Replication):
DNA में अपनी प्रतिलिपि (Copy) या प्रतिकृति बनाने का गुण पाया जाता है। यह क्रिया प्रतिलिपीकरण (replication) कहलाती है। इस क्रिया को DNA द्विगुणन (duplication) भी कह सकते हैं। इस क्रिया के दौरान पूर्व में उपस्थित DNA अणु से नये DNA अणु का संश्लेषण होता है। DNA अपने स्वयं के समान ही संरचनात्मक प्रतिलिपि उत्पन्न करने या संश्लेषण करने की क्रिया में भाग लेता है। यह क्रिया दो।

समसूत्री (माइटोटिक) चक्र के मध्य उपस्थित अन्तरावस्था (interphase) के दौरान सम्पन्न होती है। यह अर्धसंरक्षी विधि (semi – conservative) से होती है। अर्थात् पैतृक DNA से बनने वाले पुत्री DNA में एक लड़ पुरानी (पैतृक) तथा एक लड़ नयी होती है। मरम्मत किये जाने वाले प्रतिकृतिकरण में यह असंरक्षी (non – Conservative) प्रकार की होती है। DNA प्रतिकृतिकरण को निम्न चरणों द्वारा समझाया जा सकता है –

(1) DNA अणु की पुनरावृत्ति के समय न्यूक्लिओटाइड्स के क्षारकों के बीच से हाइड्रोजन बन्ध (hydrogen bonds) वियोजित (dissociate) होते हैं। अतः पॉलीन्यूक्लिओटाइड की दोनों श्रृंखलाएँ पृथक् हो जाती है।

(2) पृथक् हुई दोनों श्रृंखलाएँ एक-दूसरे की पूरक (complementary) होती हैं। पूरक से यहाँ आशय यह है कि यदि एक श्रृंखला में एक स्थान पर एडीनीन क्षारक पाया जाता है तो दूसरी श्रृंखला में यहाँ इस स्थान पर इसके अनुपूरक भाग पर आधारित व्यापक होगा।

(3) इस प्रकार पृथक् हुई दोनों श्रृंखलाएँ जब खुलती (uncoil) हैं तो दोनों श्रृंखलाएँ एक-दूसरे की पूरक प्रतीत होती हैं। दोनों ही श्रृंखलाएँ नयी श्रृंखला बनाने हेतु फर्मे या साँचे अथवा टेम्पलेट (template) का कार्य करती हैं।

(4) इन दोनों फर्मों के अतिरिक्त लगभग 20 प्रकार के एन्जाइम एवं कोशिका पूल में उपस्थित न्यूक्लिओटाइड्स (A, G, C, T) इस क्रिया में भाग लेते हैं। DNA प्रतिकृति बनाने की क्रिया में उपयोगी एन्जाइम व कारक DNA रेप्लीकेज तन्त्र (DNA replicate system) या रेप्लिसोम (replisome) कहलाते हैं।

(5) वाटसन – क्रिक के अनुसार DNA अणु में दोनों श्रृंखलाएँ परस्पर कुण्डली बनाते हुए उपस्थित होती हैं। प्रतिकृति निर्माण हेतु इस सर्पिल या कुण्डली का खुलना आवश्यक है जिसके बिना फर्म के विभिन्न बिन्दु या स्थल पढ़े नहीं जा सकते।

(6) एन्जाइम हेलीकेज (helicase) या अकुण्डलन एन्जाइम हैलीकेज DNA के दोहरे सर्पिल में एक छोटे से भाग को खोलता है। अतः एक प्रतिकृति द्विशाख (replication fork) बन जाता है। इस क्रिया हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो ATP के रूप में उपयोग में लायी जाती है। प्रति एक नाइट्रोजनी क्षारक युग्म को खोलने के लिए 2 ATP के अणुओं का उपयोग होता है। इन क्षारक युग्म स्थलों पर विशेष आकर्षण बल होता है जिसके द्वारा पुनः सर्पिल बन सकता है। अतः खुले हुए दिशाख भाग पर दोनों श्रृंखलाओं को पुन: सर्पिल बनाने से रोकने हेतु कुछ DNA बन्धक प्रोटीन (DNA binding protein) DBP श्रृंखलाओं से जुड़ जाते हैं।

प्रतिकृति द्विशाख (replication fork) दो प्रकार के होते हैं। Tahlasitet (undirectional) 7211 farceira (bidirectional) DNA अणु जो प्रतिकृति निर्माण के समय एक दिशा में खुलते हैं एक दिशीय कहलाते हैं जबकि दोनों दिशाओं से खुलने वाले अर्थात् एक DNA अणु में एक स्थल पर दोनों ओर एक-एक प्रतिकृति द्विशाख बनता है, द्विदशीय प्रतिकृति द्विशाख कहलाते हैं।
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DNA बन्धक प्रोटीन (binding protein) को अनवाइन्डेज। (unwindase) भी कहते हैं। T, फेग में यह 32 जीन का उत्पाद पाया। गया है। इसके अणु का अणुभार 35000 डाल्टन होता है तथा प्रतिकृति द्विशाख को खुला रखने के लिए 100 – 200 अणुओं की आवश्यकता होती है। जैसे ही प्रतिकृति द्विशाख के अग्रगामी व पश्यगामी रज्जुकों पर न्यूक्लिओटाइड जुड़ते जाते हैं। DNA बन्धक प्रोटीन अणु इस बिन्दु से मुक्त हो जाते हैं ताकि अन्य स्थलों पर इनका प्रयोग किया जा सके।

(7) जिस बिन्दु पर यह प्रतिकृति बनना आरम्भ होती है, प्रारम्भिक बिन्दु (initiation point) कहलाता है। DNA की द्विकुण्डली खुलने पर दो रज्जुक या श्रृंखलाएँ प्राप्त होती है इनमें से एक में 3′ सिरा द्विशाख (fork) से दूर होता है। अग्रग श्रृंखला या अग्रग रज्जुक (leading strand) कहलाता है तथा दूसरी श्रृंखला में 3′ सिरा द्विशाख के निकट होता है, पश्चगामी श्रृंखला या पश्यगामी रज्जक (lagging strand) कहलाता है।

(8) DNA संश्लेषण या नये न्यूक्लिओटाइड के फर्म के अनुसार जुड़ने का कार्य उस समय तक आरम्भ नहीं होता जब तक RNA प्राइमर (primer) टेम्पलेट सूत्र के प्रारम्भिक बिन्दु पर आकार जुड़ नहीं जाता है। RNA प्राइमर लगभग 100 नाइट्रोजन क्षारकों की श्रृंखला होती है। इस RNA प्राइमर के संश्लेषण के लिए एक विशिष्ट RNA पॉलिमरेज (RNA polymerase) या RNA प्राइमर सहायक की आवश्यकता होती है।

(9) अतः DNA टेम्पलेट के प्रारम्भन बिन्दु पर RNA प्राइमर के जुड़ने के बाद पैतृक DNA श्रृंखला के द्विशाख के 3′ सिरे पर नयी न्यूक्लिओटाइड इकाइयाँ DNA पॉलिमरेस (polymerase) एन्जाइम की उपस्थिति में जुड़ने लगती है। इस प्रकार नयी श्रृंखला 5′ सिरे से प्रारम्भ होकर 3′ सिरे की ओर बढ़ती है। न्यूक्लिओटाइड इकाइयाँ 5′ → 3′ दिशा में जुड़ती हुई नये DNA रज्जुक या संतति DNA अथवा नवसंश्लेषित DNA का रज्जुक बनाती है। DNA की दोनों श्रृंखलाओं में दोनों टेम्पलेट का 5 सिरा विपरीत दिशा में स्थित होता है। अतः DNA पुनरावृत्ति की दिशा भी दोनों श्रृंखलाओं में 5′ → 3′ की ओर अर्थात् विपरीत दिशा में होती है।

(10) नयी DNA श्रृंखला में न्यूक्लिओटाइड इकाइयाँ 5′ → 3′ दिशा में DNA पॉलिमरेज III एन्जाइम की उपस्थिति में संलग्न होती हैं। DNA पालिमरेज III सब्सट्रेट (substrate) के रूप में डी-ऑक्सी राइबो न्यूक्लिओडाइट ट्राई फास्फेट ATP, dGTP dTTP व dCTP का उपयोग करता है। ये बहुलीकरण की इकाइयाँ होती हैं। DNA टेम्पलेट पर एक-एक इकाई के संलग्न होने से प्रत्येक इकाई से दो फास्फेट अणु मुक्त होते हैं एवं ऊर्जा उपयोग में आती है।
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(11) DNA के संश्लेषण में DNA अणु के दोनों श्रृंखलाओं की प्रतिकृति अलग-अलग प्रकार की होती है। अग्रगामी रज्जुक (leading strand) टेम्पलेट 3′ → 5′ में संश्लेषण संतत (continuous) प्रकार का होता है जबकि पश्चगामी रज्जुक (lagging stand) टेम्पलेट 5′ → 3′ में टुकड़ों-टुकड़ों या खण्डों में होता है। यह खोज जापानी वैज्ञानिक रीजी ओकाज़ाकी (Reiji Okazaki, 1968) ने की। इनके सम्मान में इन खण्डों को ओकाज़ाकी खण्ड (Okazaki fragments) कहते हैं। इन्हें DNA संश्लेषण हेतु RNA प्राइमर की आवश्यकता होती है। कुछ प्रयोगों में ओकाजाकी खण्ड लगभग 200 न्यूक्लिओटाइड लम्बे पाये जाते हैं।

(12) इस प्रकार प्राप्त अनेक ओकाजाकी खण्ड DNA लाइगेज (ligase) एन्जाइम द्वारा जोड़ दिये जाते हैं तथा अग्रगामी व पश्चगामी रज्जुक टेम्पलेट से तैयार नयी DNA श्रृंखलाएँ सर्पिल बनाकर पूर्ण DNA अणु बना लेती है। ओकाजाकी खण्डों के जुड़ने पर RNA प्राइमर विभिन्न प्रारम्भन बिन्दुओं से DNA पालिमरेज – I की उपस्थिति में हय लिये जाते हैं तथा अन्तराल (gap) डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिओटाइड्स के द्वारा भर दिया जाता है।

(13) DNA द्विशाख की खुली श्रृंखलाओं पर जैसे-जैसे न्यूक्लिओटाइड जुड़ते जाते हैं नयी श्रृंखलाएँ बनकर सर्पिल बनाती जाती है। प्रतिकृ ति द्वि शाख के आगे DNA टोपोआइसोमरेज  (topoisomerase) एन्जाइम कई प्रकार के पाये जाते हैं। ये DNA वलय को एक स्थलाकृति से दूसरी प्रकार की स्थलाकृति (topological form) में परिवर्तित करते हैं। टोपोआइसोमरेज DNA गाइरेज (gyrase) DNA के कुण्डलन (coxing), व्यावर्तन (twisting) को गति देता है। जबकि टोपोआइसोमरेज हेलीकेज (helicase) कुण्डलिनी के अकुण्डलन। (unwinding) को उत्प्रेरित करता है।
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प्रश्न 4.
आर.एन.ए. का रासायनिक संगठन एवं भौतिक संरचना बताइये।
उत्तर:
RNA कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) तथा केन्द्रिका (Nucleolus) में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह मुक्त अवस्था में राइबोसोम्स में पाया जाता है। यह माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट में भी पाया जाता है। कुछ पादप वायरस (TMV) में RNA आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करता है।

रासायनिक संगठन (Chemical Composition):
रासायनिक विश्लेषण के आधार पर आर.एन.ए. मुख्य रूप से तीन घटकों या यौगिकों से मिलकर बना होता है –

  1. शर्करा (Sugar) : राइबोज
  2. फास्फेट (Phosphate) : H3PO4 के रूप में
  3. नाइट्रोजन क्षार (Nitrogen base) नाइट्रोजन क्षार दो प्रकार के होते हैं –
    (a) प्यूरीन
    (b) पिरिमिडीन
    (a) प्यूरीन को पुनः एडीनीन तथा ग्वानीन में विभाजित किया गया है।
    (b) पिरामिडीन को सायटोसिन तथा यूरेसिल में विभाजित किया गया है।
  4. RNA की संरचना में न्यूक्लियोटाइड्स की एक पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला होती है। RNA में न्यूक्लियोटाइड के स्थान पर राइबोटाइड (Ribotide) कहते हैं।
  5. प्रत्येक राइबोटाइड तीन प्रकार के अणुओं से मिलकर बना होता है। जिसमें पेन्टोज प्रकार की शर्करा फॉस्फेट अणुओं तथा नाइट्रोजन क्षारकों के साथ सम्बद्ध होकर न्यूक्लियोटाइड या राइबोटाइड अणु बनाते हैं। इस प्रकार अनेक राइबोटाइड मिलकर एक पॉलीराइबोटाइड (Polyribotide) की श्रृंखला बनाते हैं।
  6. प्रत्येक राइबोटाइड की संरचना के दो भाग कर सकते हैं-एक राइबोसाइड (Riboside) तथा दूसरा फॉस्फेट अर्थात् राइबोटाइड का निर्माण राइबोसाइड के फॉस्फोरिलीकरण के द्वारा होता है। राइबोसाइड अणु में चार प्रकार के नाइट्रोजन क्षारक-एडीनोसिन (A), ग्वानोसीन (G), साइटीडिन (C) व यूरेडिन (U) होते हैं। राइबोस शर्करा के अणु के साथ जुड़ने से राइबोसाइड अणु बनता है।
  7. इस प्रकार RNA – पॉलीराइबोटाइड श्रृंखला में केवल चार प्रकार के राइबोटाइड इकाइयाँ होती हैं-AMP, GMP, CMP तथा UMP.
  8. डी.एन.ए. की तरह फॉस्फेट व शर्करा अणुओं के मध्य एस्टर बंध बनता है।

आर.एन.ए. की भौतिक संरचना (Physical Structure of RNA):
RNA अशाखित पालीन्यूक्लियोटाइड की एकल स्ट्रेण्डयुक्त संरचना है किन्तु यह प्रायः पीछे की ओर मुड़कर स्वयं ही हैलिक्स निर्मित करता है। देखिये नीचे चित्र में। कुण्डलित भाग को RNA को द्वितीयक (Secondary) व अकुण्डलित भाग को प्राथमिक (Primary) संरचना कहते हैं।
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RNA का अणु बनते समय एडिनीन (A) यूरेसील (U) के साथ साइटोसीन (C) ग्वानीन (G) के साथ क्रमशः द्विबन्ध (double bond) व त्रिबन्ध (Triple bond) से जुड़े होते हैं। अकुण्डलित क्षेत्र में पूरक क्षारक नहीं होती है। अतः आर.एन.ए. अणु में DNA के समान प्यूरीन्स व पिरामिडिन्स की मात्रा समान नहीं होती है।

प्रश्न 5.
आर.एन.ए. के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आर एन ए के प्रकार (Types of RNA)
RNA को कार्य के आधार पर सामान्यतया दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है –

  1. आनुवंशिक आर.एन.ए. (Genetic RNA)
  2. अआनुवंशिक आर.एन.ए. (Non-genetic RNA)

1. आनुवंशिक आर.एन.ए. (Genetic RNA):
यह कारनेट द्वारा स्थापित है। अधिकांश पादप विषाणुओं में कुछ जन्तु विषाणुओं तथा अनेक जीवाणुभोजी (Bacteriophase) में DNA नहीं होता है तथा RNA आनुवंशिक पदार्थ का कार्य करता है। यह RNA एक रज्जु (Strand) वाला या फिर दो रज्जुवाला (double strand) होता है। इस प्रकार के RNA को आनुवंशिक RNA (Genetic RNA) कहते हैं। द्विरज्जुकी RNA में नाइट्रोजनी क्षारक DNA के समान ही जोड़ों में पाये जाते हैं।
विभिन्न वाइरसों का आनुवंशिक आर.एन.ए. (Genetic RNA of Different Viruses)

वाइरस का प्रकारवाइरस का नामआरएनए प्रकार
1. पादप वाइरस (Plant Viruses)TMV (टोबैको मोजेक वाइरस)
घाव अर्बुद (Wound tumour)
एकरज्जुकी (SS)
द्विरज्जुकी (DS)
2. जन्तु वाइरस (Animal Viruses)इनफ्लूएंजा वाइरस
पोलियो माइलाइटिस
रियो वाइरस
एक-रज्जुकी (SS)
एक-रज्जुकी (SS)
द्वि-रज्जुकी (DS)
3. जीवाणुभोजी (Bacteriophages)MS 2
F2
F 17
एक-रज्जुकी (SS)
एक-रज्जुकी (SS)
एक-रज्जुकी (SS)

2. अआनुवंशिक आर.एन.ए. (Non-genetic RNA):
उन सभी जीवों में जिनमें DNA आनुवंशिक पदार्थ होता है उनमें अलग-अलग प्रकार के RNA मिलते हैं जिन्हें अआनुवंशिक RNA (Non-genetic RNA) कहते हैं। इनका संश्लेषण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से DNA टेम्पलेट (सांचा) द्वारा ही होता है। यह सदैव एक रज्जुकी (Single strand, SS) होता है एवं अआनुवंशिक आर.एन.ए. का मुख्य कार्य कोशिका में प्रोटीन संश्लेषण करने का होता है। कार्य के आधार पर सामान्यतया अआनुवंशिक आर.एन.ए. (Non – genetic RNA) तीन प्रकार के होते हैं।

  1. संदेशवाहक आर.एन.ए. (Messenger RNA, m – RNA)
  2. राइबोसोमल आर.एन.ए. (Ribosomal RNA, r – RNA)
  3. स्थानान्तरण आर.एन.ए. (Transfer RNA, T – RNA)

सभी प्रकार के आर.एन.ए. को फ्लो चार्ट द्वारा निम्नांकित अनुक्रम में विभेदित किया जा सकता है –
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विभिन्न प्रकार के अआनुवांशिक आर.एन.ए. का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित क्रम में है –

(i) संदेशवाहक आर.एन.ए. (Messenger RNA):
इसे सूचनावाहक RNA (Information RNA) या दूत RNA या अस्थायी RNA (Unstable RNA) या टेम्पलेट (Template RNA) या पूरक RNA (Complementary RNA) भी कहा जाता है। संक्षिप्त रूप से इसे m – RNA कहते हैं।
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इसकी सर्वप्रथम खोज हक्सले (Huxley 1965) के द्वारा जीवाणुओं एवं वाइरसों में की गई थी। इसका प्रमुख कार्य गुणसूत्रों DNA से प्रोटीन संश्लेषण के लिए कोशिकाद्रव्य में आनुवंशिक सूचनाओं का सम्प्रेषण करना है। इसलिए जेकब एवं मोनाड (Jacob and Monod 1961) ने इसे दूत या संदेशवाहक आर एन ए (Messenger RNA) नाम दिया। इसकी मात्रा कोशिकीय RNA की 5 से 10 प्रति प्राप्त भाग होती है जो कि तीनों
आर एन ए प्रकारों में सबसे कम है। इसका जीवनकाल छोटा होता है।

(ii) राइबोसोमल आर एन ए (Ribosomal RNA or r-RNA):
कुरलेण्ड (Kurland 1960) के अनुसार राइबोसोम्स में पाया जाने वाला आर.एन.ए. r – RNA या राइबोसोमल आर.एन.ए. कहलाता है। इसकी मात्रा कोशिकीय आर.एन.ए. में सर्वाधिक अर्थात् 80 प्रतिशत तक होती है, इस प्रकार तीनों प्रकार के RNA’s में यह सबसे ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। राइबोसोमल आर.एन.ए. को अघुलनशील RNA (Insoluble RNA) भी कहते हैं। राइबोसोम्स में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटक है क्योंकि एक राइबोसोम में 50 से 65 प्रतिशत हिस्सा r – RNA का एवं शेष भाग प्रोटीन्स का बना होता है।

यह सर्वाधिक स्थायी व दीर्घजीवी RNA संरचना होती है। इस प्रकार राइबोसोम्स को न्यूक्लियोप्रोटीन अणु संरचना के रूप में परिलक्षित किया जा सकता है। इसमें m – RNA की तुलना में r – DNA में क्षार भिन्न होते हैं। इसमें ग्वानीन व साइटोसीन अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। यह प्रोटीन संश्लेषण स्थल का कार्य करता है। इनका निर्माण केन्द्रक में होता है।

(iii) स्थानान्तरण-RNA (Transfer RNA – t – RNA):
इस प्रकार के RNA का निर्माण केन्द्रक के भीतर DNA से अनुलेखन (Transcription) द्वारा होता है तथा फिर ये केन्द्रक से बाहर कोशिका द्रव्य में आ जाते हैं। t.RNA कोशिका द्रव्य में उपस्थित अमीनो-अम्ल के अणुओं को पकड़कर राइबोसोम तक ले जाते हैं तथा राइबोसोम पर स्थित m.RNA पर निश्चित स्थान से जुड़कर अमीनो-अम्ल अणुओं को पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में निर्धारित क्रम में फिट करते हैं।

इस कार्य को पूर्ण होने पर t.RNA पुनः कोशिका द्रव्य में लौट आते हैं। ये इसी प्रकार का कार्य बार-बार करते रहते हैं। इसी कारण t.RNA को उपयोजक RNA (Adaptor RNA = a.RNA) भी कहते हैं। अमीनो-अम्ल का स्थानान्तरण करने के कारण इन्हें स्थानान्तरण RNA कहते हैं। कोशिका में कुल RNA में से 16-18% भाग स्थानान्तरण RNA का होता है। t.RNA जल में घुलनशील होते हैं, इस कारण इन्हें विलेय या घुलनशील RNA (Soluble RNA = S.RNA) भी कहते हैं। कोशिकाद्रव्य में 20 प्रकार के अमीनो अम्लों के लिए 60 प्रकार के t-RNA पाये जाते हैं।
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राबर्ट हॉल (Robert-Holley 1965) ने यीस्ट (Yeast) कोशिका के t-RNA का विश्लेषण कर एक मॉडल प्रस्तुत किया जिसे क्लोवर लीफ मॉडल (Cloverleaf model) कहते हैं। इस अणु की आकृति मेथी के पत्ते के समान होती है । इस मॉडल के अनुसार t-RNA की चार भुजाएँ होती हैं जो दो विरोधी दिशाओं में स्थिर रहती हैं –

  1. ग्राही भुजा (Acceptor arm)
  2. एन्टीकोडोन (Anticodon)
  3. T ψ C भुजा
  4. डाइ – टाइड्रोयूरीडिन भुजा (Di – hydrouridine or DHU arm)

प्रश्न 6.
आनुवंशिक कूट पर निबन्थ लिखिए।
उत्तर:
आनुवंशिक कूट की परिभाषा (Definition of Genetic Code):
प्रोटीन निर्माण हेतु सूचना DNA में पाये जाने वाले क्षारकों के विशिष्ट क्रम में निहित होती है जिसे आनुवंशिक कूट (Genetic Code) कहते हैं। DNA से यह सूचना ट्रांसक्रिप्शन (Transcription) की क्रिया द्वारा m – RNA में उपस्थित क्षारकों में विशिष्ट अनुक्रम द्वारा ग्रहण कर ली जाती है जिसे कोडोन (Codon) कहते हैं। यह अनुक्रम ही पोलीपेप्पटाइड श्रृंखला में उपस्थित अमीनो अम्लो के क्रम को निर्धारित करता है अथवा ट्रांसलेशन (Translation) की क्रिया द्वारा किसी विशिष्ट प्रोटीन का निर्माण करता है।

t – RNA में उपस्थित उस तीन क्षारक समूह को जो m – RNA में उपस्थित कोडोन का पूरक हो उसे एन्टीकोडोन (Anticodon) कहते आनुवंशिक कूट की खोज (Discovery of Genetic Code) निरेनबर्ग, मैथाई एवं एम. डब्ल्यू. (Nirenberg, Mathaei and M.W.) ने प्रायोगिक रूप से सिद्ध किया कि तीन नाइट्रोजन क्षारों के क्रम द्वारा एक अमीनो अम्ल का निर्धारण होता है जिसे त्रिकोड (Triple-code) के रूप में जाना जाता है। हरगोविन्द खुराना व राबर्ट होले को आनुवंशिक कोड पर कार्य करने के लिए सन् 1968 में नोबल पुरस्कार दिया गया।

कूट के प्रकार (Types of Codes):
m-RNA के न्यूक्लियोटाइड्स में चार प्रकार के क्षारक (bases) होते हैं (A, G, U व C)। ये चारों अक्षर ही आनुवंशिक शब्दकोश (dictionary) की पूर्ण वर्णमाला है। इन अक्षरों के क्रम के आधार पर ही प्रोटीन में अमीनो अम्ल का क्रम होता है। इन अक्षरों का विशिष्ट संयोजन कोडोन (Codon) कहलाता है। आनुवंशिक कूट की विशेषताएँ (Characteristics of Genetic Code)

1. आनुवंशिक कुट त्रिक कूट होती है (The Code is triplet):
जैसा कि पूर्व में भी बताया जा चुका है कि 20 अमीनों अम्लों को कोडित करने के लिए एकक (Singlet) व द्विक (doublet) कूट अपर्याप्त होते हैं, अतः त्रिक कूट ही 20 अमीनों अम्लों को कोडित कर सकता है जो mRNA के तीन नाइट्रोजन क्षारकों के विशिष्ट अनुक्रम (Codon) का बना होता है। इस प्रकार के क्षारकों के अलग अलग अनुक्रमों द्वारा निर्मित त्रिक कूट से 64 कोडोन्स सम्भावित होते हैं। जिसमें से 44 कोडोन्स अतिरिक्त होते हैं। यदि आनुवंशिक कूट चतुष्ट कूट मानी जाये तो
4 x 4 x 4 x 4 x 4 = 256 कोडोन्स प्राप्त होंगे। यह संख्या बहुत अधिक अथवा अनावश्यक है।
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आनुवंशिक संकेत ( कूट) तथा सांकेतिक शब्दावली
त्रिक कोड 4 x 4 x 4 = 64 शब्द
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2. आनुवंशिक कूट में असंदिग्धता (Non – ambiguity in the Genetic Code):
कोशिका में आनुवंशिक कूट की उपस्थिति असंदिग्ध है क्योंकि एक विशिष्ट कोडोन (Codon) सदैव एक ही अमीनो अम्ल को कोडित करता है। एक कोडोन को दो अलग अमीनो अम्लों को कोडित नहीं कर सकता है। परन्तु कुछ कोडोन जैसे GUG साधारणतया अमीनो अम्ल वेलीन (Valine) को कोडित करता है, लेकिन समारम्भन (initiation) की स्थिति में यह मिथामोनीन (Methionine) अमीनो अम्ल को कोड करता है।

3. अनतिव्यापी कूट (Non – overlapping Code):
अनतिव्यापी से तात्पर्य है कि किसी विशिष्ट प्रोटीन हेतु एक ही अक्षर का दो विभिन्न कोडोनों में प्रयोग नहीं किया जा सकता। चित्र में दर्शाया गया है कि 6 क्षारकों के द्वारा 4 अमीनो अम्लों के लिये कूट लेखन करना अनतिव्यापी कूट में ही सम्भव है परन्तु वास्तविकता में 6 क्षारक एक समय में अधिक से अधिक दो अमीनो अम्लों के लिये ही पर्याप्त होते हैं।

4. कोमारहित कूट (Commaless Code):
दो संलग्न कोडोनों के बीच बिन्दुगर्त (Punctuation) या कोमा (Comma) नहीं होता है। ये निरन्तर होते हैं। जब श्रृंखला समाप्त होती है उस स्थान पर समापन। कूट आ जाता है। समापन कूट किसी भी अमीनो अम्ल को कोडित नहीं करते हैं। ये कूट – UAA, UAG व UGA होते हैं। इन्हें समापन कोडोन (termination codon) कहते हैं।
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5. आनुवंशिक कूट की सार्वत्रिकता (Universality of Genetic Code):
यह सिद्ध हो चुका है कि जीवाणुओं से लेकर मानव तक सभी जीवधारियों में एक प्रकार का आनुवंशिक कूट पाया जाता है। उदाहरण UUU, फेनिल एलानिन जीवाणु चूहों व मानव। किन्तु माइटोकॉन्ड्रिया तथा सीलियायुक्त प्रोटोजोआ इसके लिए अपवाद है।

6. आनुवंशिक कूट में अपह्रास (Degenerocy in Genetic Code):
केवल दो ही अमीनो अम्ल (ट्रिप्टोफेन व मीथिओनिन) ऐसे हैं जिनके लिये केवल एक-एक कोडोन होता है। अन्य सभी अमीनो अम्लों हेतु दो या दो से अधिक त्रिक् कोडोन होते हैं। इस प्रकार की प्रणाली को अपह्लासित प्रणाली (degenerate system) व ऐसे आनुवंशिक कूट को अपह्लासित कूट (degenerate code) कहते हैं। यह प्रणाली जीवों को हानिकारक उत्परिवर्तनों से सुरक्षा प्रदान करती है।

7. आरम्भन कोडोन तथा समापन कोडोन (Initiation and termination coden):
64 कोडोनों में से एक समारम्भ या आरम्भन कोडोन-AUG होता है और तीन समापन कोडोन – UAA, UAG, UGA होते हैं। ये कोडोन क्रमशः पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला को प्रारम्भ करने और समाप्त करने से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार शेष बचे 61 कोडोन अमीनो अम्लों का कोड करते हैं।

प्रश्न 7.
प्रोटीन संश्लेषण में अनुवादन (Translation) को समझाइए।
उत्तर:
वह क्रिया विधि जिसके अन्तर्गत m – RNA का त्रिकक्षारक अनुक्रम (Triplet base Sequence), अमीनो अम्ल (AA) के विशिष्ट अनुक्रम को एक पालीपेप्टाइड श्रृंखला में विन्यासित करने के लिए निर्देशित करता है, अनुलिपिकरण या अनुवाद (Translation) कहलाता है। यह प्रक्रिया राइबोसोम पर सम्पन्न होती है। अनुलिपिकरण की प्रक्रिया अनुलेखन (Transcription) की तुलना में अपेक्षाकृत जटिल प्रकार की होती है एवं पदों में सम्पन्न होती है।

1. अमीनो अम्लों का सक्रियण (Activation of Amino Acids):
कोशिका द्रव्य में सभी 20 प्रकार के अमीनो अम्ल निष्क्रिय अवस्था में पड़े रहते हैं परन्तु t – RNA से जुड़ने से पूर्व अमीनो अम्ल Mg++ तथा अमीनो एसिल t – RNA सिन्थेटेज (aminoacyl – tRNA, synthetase) एन्जाइम की उपस्थिति में ATP के साथ संयोग करके सक्रिय हो जाते हैं। सक्रिय अमीनो अम्लों को अमीनोएसिल एडिनिलेट (amminoacyl – adenylate) कहते हैं।
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अब एमीनो एसिल t – RNA सिन्येरेज एंजाइम के नियंत्रण में एसिल एडिनिलेट t – RNA अणुओं से जुड़ जाते हैं। इस प्रकार अमीनो एसिल t – RNA काम्प्लेक्स (aminoacyl-tRNA काम्प्लेक्स) बनता
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2. अमीनो अम्लों का t – RNA का स्थानान्तरण (Transfer of Amino Acids to t – RNA):
अनुलिपिकरण के इस चरण में सक्रिय अमीनो अम्ल (AA) के अणु ऐसे t-RNA अणुओं पर स्थानान्तरित हो जाते हैं जिनका कि अणुभार कम होता है। ये निम्न अणुभार वाले t – RNA अणु कोशिका द्रव्य में स्वतंत्र द्रव्य में स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं। प्रत्येक अमीनो अम्ल (AA) के लिए विशेष (Specific) t-RNA अणु मौजूद होते हैं। सक्रिय अमीनो अम्ल (AA) के t – RNA का स्थानान्तरण से AMP एवं सक्रियकारी एन्जाइम भी अलग हो जाते हैं। यह प्रक्रिया निम्न प्रकार होती है –
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t – RNA – अमीनो एसाइल काम्पलेक्स + AMP + एंजाइम इस प्रकार मुक्त एंजाइम पुनः सक्रिय होकर दूसरे एमीनो अम्ल अणु को t – RNA के साथ संयुक्त कर सकता है। अतः इस क्रिया हेतु एन्जाइम अमीनो एसाइल सिन्थेटेज एवं Mg++ आयनों की उपस्थिति आवश्यक है। m-RNA एक विशिष्ट स्थल पर t – RNA जुड़ा रहता है। mRNA के कोडोन सन्देशों का अनुवाद या अनुलिपिकरण करने के लिए t – RNA के अणुओं में एन्टीकोडोन (Anticodon) उपस्थित होते हैं। अतः t – RNA को ग्राहक या अडेप्टर (Adapter) अणु भी कहते हैं।

3. पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का निर्माण (Formation of Polypeptide Chain):
पॉली पेप्टाइड श्रृंखला सदैव एक विशिष्ट अमीनो अम्ल मिथियोनीन के द्वारा प्रारम्भ (Initiate) होती है। इन अमीनो अम्लों को प्रारम्भिक कोडोन (Codon) AUG’ के द्वारा कोडित किया जाता है। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पालिपेप्टाइड श्रृंखला का निर्माण निम्न तीन पदों में सम्पन्न होता है –

(i) पालीपेप्टाइड श्रृंखला का प्रारंभन (Initiation of Polypeptide Chain):
यहाँ पालीपेप्टाइड श्रृंखला का प्रारंभन Mett-RNA नामक न्यूक्लिक अम्ल के द्वारा होता है। यहाँ भी प्रोटीन संश्लेषण में 40 S राइबोसोम उपइकाई GTP के साथ शिथिलतापूर्वक सम्बद्ध होकर एवं तीन प्रोटीन कारकों क्रमश: IF – 1, IF – 2 एवं IF – 3 के साथ मिलकर पालिपेप्टाइड श्रृंखला के निर्माण में भाग लेती है। इसके अतिरिक्त अमीनो एसाइल t – RNA (AA – t – RNA) ग्राही स्थल से जुड़ता। है, जबकि दाता स्थल (Donar site) से पेप्टाइड श्रृंखला को बढ़ाने वाला t – RNA जुड़ता है।
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(ii) पालीपेप्टाइड श्रृंखला का दीर्धीकरण (Elongation of Polypeptide Chain):
यूकैरियोटिक कोशिका में 70 S – m – RNA F – met – t – RNA संकुल बन जाने के बाद पालिपेप्टाइड श्रृंखला को निरन्तर सुदीर्घाकृत करने का कार्य सक्रिय अमीनो अम्लों (AA) के जुड़ाव द्वारा होता है। इस AA के निरन्तर जुड़ने की प्रक्रिया निम्न प्रकार से सम्पन्न होती है –

(अ) जब दाता या पेप्टीडल स्थल P (P – site) से F – met – tRNA का जुड़ाव होता है तब ऊर्जा की जरूरत होती है, यह आवश्यक ऊर्जा GTP के अणु से प्राप्त होती है।

(ब) पूरी तरह सक्रिय किन्तु रिक्त पड़े 70S के A स्थल पर दूसरा अमीनो एसाइल t – RNA जुड़ता है एवं सम्मिश्र (Complex) बनाता है। इस प्रक्रिया के दौरान ही कोशिका द्रव्यीय राइबोसोमल प्रोटीन जिसे दीर्धीकरण कारक T (EF – T) भी कहते हैं वह भी अमीनो एसाइल t-RNA से जुड़ जाती है। यह दीर्चीकरण कारक (EF-T) दो उप इकाइयों क्रमश (1) Ef – R – T5 एवं (2) Ef-Tu द्वारा निर्मित होता है।
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(स) दीर्धीकरण कारक T (Elongation Factor Ef – T):
अब GTP के साथ जुड़कर एक विशिष्ट संकुल EF – TU – GTP बनाता है एवं EF – TS को विमुक्त (Relese) कर देता है। तत्पश्चात् यह संकुल (Complex) अमीनो एसाइल t – RNA के साथ जुड़कर EFTU – GTP अमीनो एसाइल बनाता है जो कि राइबोसोम के A स्थल (सक्रिय एवं रिक्त) पर जुड़ जाता है। इसी बीच GTP का जल अपघटन (Hydrolysis) हो जाता है तथा अकार्बनिक फास्फेट (Pi) एवं GDP का निर्माण होता है यह क्रिया एन्जाइम ट्रांसलोकिज की उपस्थिति में सम्पन्न होती है।

(द) अब इस प्रकार GDP (गुआनोसीन डाइफास्फेट), EFTU – GDP संकुल के रूप में राइबोसोम से अलग हो जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा सक्रिय अमीनो अम्ल (AA) बिल्कुल सटीक (Accurate) तौर पर सही स्थल (Site) पर जुड़ता है।

(य) राइबोसोम इसके बाद m-RNA को 5 – 3 दिशा पर विस्थापित या अलग हो जाता है तथा इस mRNA पर उपस्थित प्रारम्भ बिन्दु (Initiation Points) पूर्णतया स्वतंत्र हो जाता है, जो कि अन्य राइबोसोम के साथ जुड़ने को तत्पर रहता है। इस प्रकार एक m – RNA के साथ कालान्तर में अनेक राइबोसोम जुड़ते रहते हैं व परिणामस्वरूप एक पॉल राइबोसोम संकुल (Polyribosome Complex) बन जाता है। वैसे प्रत्येक राइबोसोम पर एक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला बनती रहते है लेकिन विभिन्न राइबोसोम पर इनका परिमाप (size) एवं आकृति अलग-अलग होती है।

(iii) पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का समापन (Termination 02 Polypeptide Chain):
जब कोशिका में प्रोटीनो का संश्लेषण पर्याप्त मात्रा में हो जाता है तो इस कोशिका में इसे रोकने के लिए विशेष संकेर देने वाले कोडोन निर्मित होते हैं। इसके लिए श्रृंखला समापने के संकेत को समझने वाला Rr भी निर्मित होता है। mRNA के अन्तिम सिरे पर पेप्टीडल t – RNA सहित टर्मिनल कोडोन UAA, UAG एवं UGA के पहुँच जाने के पश्चात् पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का समापन हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि श्रृंखला का निर्माण पूरा हो गया है।

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