RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 मूल-बाह्य आकारिकी

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 मूल-बाह्य आकारिकी

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology  Chapter 17 मूल-बाह्य आकारिकी

RBSE Class 11 Biology  Chapter 17 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology  Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मूल पादप के किस भाग से विकसित होती है –
(अ) प्रांकुर से
(ब) मूलांकुर से
(स) बीजपत्रों से
(द) बीजचोल से

प्रश्न 2.
मूलांकुर के अतिरिक्त पादप के अन्य किसी भाग से विकसित होने वाली मूल को कहते हैं –
(अ) मूसला मूल
(ब) झकड़ी मूल
(स) पाश्र्व मूल
(द) अपस्थानिक मूल

प्रश्न 3.
मूलशीर्ष के किस क्षेत्र में मूलरोम पाये जाते हैं –
(अ) स्थायी क्षेत्र
(ब) विभज्योजक क्षेत्र
(स) परिपक्वन क्षेत्र
(द) दीर्घाकरण क्षेत्र

प्रश्न 4.
गाजर की जड़ की आकृति है –
(अ) शंकुरूपी
(ब) कंदिल
(स) कुंभी रूपी
(द) तर्क रूपी

प्रश्न 5.
पाश्र्व मूल की उत्पत्ति होती है –
(अ) परिरंभ से
(ब) बाह्यत्वचा से
(स) एधा से
(द) जाइलम बंडल से

प्रश्न 6.
निम्न में से कौन सा पादप भाग मूल का उदाहरण नहीं है –
(अ) मूली
(ब) अरवी
(स) शकरकंद
(द) डहेलिया कंद

प्रश्न 7.
बरगद में पायी जाती हैं –
(अ) अवस्तम्भ मूलें
(ब) जटा मूलें।
(स) कवक मूलें
(द) परजीवी मूलें

प्रश्न 8.
मक्का में जड़े विकसित होती हैं –
(अ) स्तम्भ की आधारीय पर्वसंधियों से
(ब) पत्तियों से
(स) पुष्पक्रम से
(द) स्तम्भ शीर्ष से

प्रश्न 9.
आर्द्रताग्राही मूलें पायी जाती हैं –
(अ) मैंग्रोव पादपों में
(ब) अधिपादपों में
(स) जलीय पादपों में
(द) मरुभिद पादपों में

प्रश्न 10.
परजीवी मूलें पायी जाती हैं –
(अ) मक्का में
(ब) आलू में
(स) अमरबेल में
(द) चीड़ में

उत्तरमाला:
1. (ब), 2. (द), 3. (स), 4. (अ), 5. (अ), 6. (ब), 7. (अ), 8. (अ), 9. (ब), 10. (स)

RBSE Class 11 Biology  Chapter 17 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
श्वसन मूलें किस प्रकार के पादपों में पायी जाती हैं ?
उत्तर:
जलीय पौधे जैसे जूसीया में तथा दलदली पादप राइजोफोरा में पायी जाती है।

प्रश्न 2.
अधिपादपों में आर्द्रताग्राही जड़े क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
अधिपादप घने जंगलों व नमी के क्षेत्रों में पाये जाते हैं। तथा ये ऊँचाई पर अन्य वृक्षों की शाखाओं पर उगे होते हैं। इनकी मूलों का भूमि से सम्पर्क नहीं रहता तथा जड़े हवा में लटकती रहती है, अतः वायु की नमी को अवशोषित करने हेतु इनकी जड़े आर्द्रताग्राही प्रवृत्ति की होती है, उदाहरण-वान्ड़ा।

प्रश्न 3.
मूलगोप का क्या कार्य है ?
उत्तर:
इसका मुख्य कार्य जड़ों के वृद्धिशील बिन्दु को सुरक्षा प्रदान करना है तथा मूल शीर्ष को संरक्षित रखता है। भूमि में प्रवेश करते समय घर्षण से नष्ट हुई कोशिकाओं के स्थान पर नई कोशिकायें बनाता है।

RBSE Class 11 Biology  Chapter 17 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मूल कितने प्रकार की होती हैं ? उनके नाम लिखिये।
उत्तर:
मूल दो प्रकार की होती हैं-मूसला एवं झकड़ा मूल।

  1. मूसला मूल (Tap root): इस प्रकार की मूल में मूलांकुर वृद्धि करके प्राथमिक मूल बनाता है। प्राथमिक मूल से द्वितीयक, तृतीयक इत्यादि जड़े निकलती हैं। इन सबको मिलाकर मूसला मूल तंत्र कहते हैं।
    उदाहरण-द्विबीजपत्री पादपों की मूल।
  2. झकझ मूल (Fibrous root): इनमें प्राथमिक मूल अल्पजीवी होती है तथा इनके स्थान पर अनेक पतली जड़े तने के आधार से परिवर्धित होती हैं। ये जड़े मिलकर झकड़ा जड़ तंत्र बनाती हैं।
    उदाहरण – एकबीजपत्री पादपों की मूल।

प्रश्न 2.
मूल के प्रमुख कार्य क्या हैं ?
उत्तर:
मूल के निम्न कार्य होते हैं –

  1. स्थिरीकरण: मूल पादप को भूमि में स्थिर रखती है। प्राथमिक जड़ एवं शाखाएँ भूमि के अन्दर फैलकर मिट्टी में मजबूती से स्थिर रहती है।
  2. अवशोषण: मूल एवं मूलरोम द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण होता है।
  3. संवहन: मूल में उपस्थित जाइलम अवशोषित जल एवं खनिज लवणों का संवहन तने एवं शाखाओं को करते हैं।
  4. खाद्य संग्रह: कुछ मूल खाद्य संग्रह कर फूल जाती हैं। ये खाद्य प्रतिकूल परिस्थितियों में पौधे की सहायता करते हैं।
  5. विशिष्ट कार्य: कुछ पौधों में उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त निम्नलिखित विशिष्ट कार्य किये जाते हैं –
    • वायु में आर्द्रता को अवशोषित करना, उदाहरण – आर्किड्स।
    • पौधे को अतिरिक्त संबल प्रदान करना, उदाहरण – मक्का, बरगद, गन्ना।
    • आरोहण में सहायता करना, उदाहरण – मनीप्लान्ट।
    • श्वसन, उदाहरण – जूसीया, राइजोफोरा में न्यूमेटोफोर।
    • प्रकाश – संश्लेषण, उदाहरण – सिंघाड़ा, टिनोस्पोरा।
    • कायिक प्रजनन, उदाहरण – पत्थरचट्टा।
    • परपोषी से भोजन का अवशोषण, उदाहरण – अमरबेल।

प्रश्न 3.
मूसला मूल एवं अपस्थानिक मूल में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
मूसला मूल व अपस्थानिक मूल में अन्तर –

मूसला मूल (Tap root)अपस्थानिक मूल (Adventitious root)
1. यह मूलांकुर से उत्पन्न होती है।1. मूलांकुर के अतिरिक्त पौधे के अन्य भाग जैसे तना, पत्ती इत्यादि से उत्पन्न होती है।
2. इससे प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक मूलें निकलती हैं।2. इसमें से इस प्रकार की मूलें नहीं निकलती हैं।
3. प्राथमिक जड़ तथा उसकी शाखाओं को मूसला मूल तन्त्र (tap root system) कहते हैं।3. अपस्थानिक मूल तथा इसकी शाखाओं को रेशेदार तन्त्र (fibrous system) कहते हैं।
4. ये भूमि में अधिक गहराई तक जा सकती हैं।4. ये मूलें अधिक गहराई तक नहीं जाती हैं।
5. सामान्यतः द्विबीजपत्री पौधों में मिलती हैं।5. सामान्यतः ये एकबीजपत्री पौधों में मिलती हैं।
6. ये सदा भूमिगत होती हैं।6. ये भूमिगत तथा वायवीय दोनों प्रकार की हो सकती हैं।

RBSE Class 11 Biology  Chapter 17 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अपस्थानिक मूलों को यांत्रिक कार्यों के लिए होने वाले रूपान्तरणों का सचित्र वर्णन करें।
उत्तर:
यांत्रिक आधार के लिए रूपान्तरण (Modification for mechanical support):

  1. अवस्तम्भ मूल (Prop root): ये वायवीय शाखाओं से निकलकर लटक जाती हैं। इन पर मूल गोप होती है तथा ये वृद्धि करती हुई भूमि में प्रवेश कर जाती हैं। ये पौधों को स्तम्भ के समान दृढ़ता प्रदान करती हैं। उदा – बरगद।
  2. जटा मूल (Stitt root): ये स्तम्भ के आधारीय भाग से निकलकर तिरछी दिशा में वृद्धि करती हुई भूमि में प्रवेश कर जाती हैं। ये स्तम्भ को आधार प्रदान करती हैं। उदा – मक्का, गन्ना, केवड़ा इत्यादि।
  3. आरोही मूल (Climbing root): ये पर्वसन्धियों से निकलती हैं व पौधे को आरोहण में सहायता प्रदान करती हैं। उदा – पान।
  4. वप्रमूल (Buttress root): कुछ बड़े वृक्षों में स्तम्भ के निचले हिस्से से तख्ते के समान जड़े निकलकर विभिन्न दिशाओं में विस्तारित रहती हैं। ये वास्तव में कुछ स्तम्भ व कुछ मूल का हिस्सा होती हैं। उदा – सेमल, टर्मिनेलिया।
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प्रश्न 2.
खाद्य संग्रहण के लिए मूसला मूलों व अपस्थानिक मूलों के रूपान्तरण का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मूसला मूल के रूपान्तरण (Modifications of tap root):

खाद्य संग्रह हेतु रूपान्तरण (Modification for storage of food): ये जड़े अतिरिक्त खाद्य पदार्थों का संग्रह कर मांसल हो जाती हैं। आकृति के आधार पर ये निम्न प्रकार की होती हैं –

  1. तरूपी (Fusiform): ये मध्य भाग में फूली हुई होती हैं तथा दोनों सिरों पर क्रमशः पतली होती जाती हैं। उदा – मूली।
  2. कुम्भीरूपी (Napiform): इनका ऊपरी भाग काफी फूला हुआ होता है तथा निचला भाग एकदम से पतला हो जाता है। उदा – शलजम व चुकंदर।
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  3. शंकुरूपी (Conical): इसका ऊपरी हिस्सा चौड़ा होता है। तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती जाती है। उदा – गाजर।
  4. साकंद (Tuberous): इसमें मूल फूली हुई तथा अनिश्चित आकृति वाली होती है। उदा – गुलअबास।

अपस्थानिक मूल के रूपान्तरण (Modifications of adventitious root): इन मूलों के रूपान्तरणों को उनके कार्यों के अनुसार निम्नलिखित श्रेणियों में विभक्त किया गया है –

भोजन संग्रह के लिए (For storage of food):

  1. कंदिल जड़ें (Tuberous roots): कुछ पौधों में शयान (prostrate) स्तम्भ की पर्वसन्धियों से जड़े निकलती हैं। जो खाद्य संग्रह के कारण मोटी व कहीं पतली हो जाती हैं। तथा निश्चित आकृति की नहीं होती हैं। उदा – शकरकन्द।
  2. कंदिल गुच्छ मूल (Fasciculated root): अपस्थानिक जड़ें गुच्छों में निकलती हैं व सभी फूली हुई होती हैं। उदा – शतावर (Asparagus), डहेलिया (Dahalia) इत्यादि।
  3. ग्रन्थिमय मूल (Nodulose root): अपस्थानिक मूल का अन्तिम छोर या शीर्ष खाद्य संचय के कारण फूलकर गोल हो जाता है। उदा – आम्बा हल्दी।
  4. मालाकार मूल (Moniliform root): ये जड़े एकान्तर क्रम में फूली व पिचकी हुई होती हैं तथा माला के समान संरचना बनाती हैं। उदा – करेला।
  5. वलयाकार मूल (Annulated root): भूमिगत अपस्थानिक मूल में खाद्य संचय होकर फूले हुए भागों में वलयों की श्रृंखला बन जाती है। उदा. आइपिकाक (Ipecac)।
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प्रश्न 3.
मूलशीर्ष के विभिन्न क्षेत्रों को चित्र की सहायता से समझाइये।
उत्तर:
मूले के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करने के लिये किसी अंकुरित बीज की मूल सबसे अच्छा साधन है। मूलशीर्ष में निम्नलिखित क्षेत्र होते हैं –

(i) मूल गोप क्षेत्र (Root cap region):
मूल शीर्ष पर एक टोपीनुमा संरचना होती है, जिसे मूल गोप कहते हैं। यह मूल के वृद्धि क्षेत्र अर्थात् शीर्ष को सुरक्षा प्रदान करती है। मूल की भूमि के अन्दर वृद्धि होने से मूल गोप की कोशिकाएँ घर्षण द्वारा नष्ट होती जाती हैं किन्तु विभज्योतक ऊतक से बनी नई कोशिकाएँ इसकी पूर्ति करती रहती हैं। फलस्वरूप मूलगोप ज्यों की त्यों बनी रहती है। जलीय पादपों में मूल गोप के स्थान पर मूल कोटरिकाएँ या पॉकेट (root pockets) पाई जाती हैं, उदा – लेम्ना, पिस्टिया इत्यादि।

(ii) कोशिका विभाजन या विभज्योतकी क्षेत्र (Cell division or meristematic region):
मूल का यह क्षेत्र शीर्ष से ऊपर की ओर एक मिलीमीटर तक होता है, यद्यपि इस क्षेत्र का अधिकांश भाग मूल गोप से ढका होता है। क्षेत्र की कोशिकाएँ सघन जीवद्रव्य युक्त, आकार में छोटी तथा पतली भित्ति वाली होती हैं। कोशिकाओं में बारम्बार विभाजन होने से कोशिकाओं की संख्या में बढ़ोतरी होती रहती है। नई बनी कोशिकाएँ मूल गोप की नष्ट हुई कोशिकाओं की पूर्ति करती हैं। तथा ऊपर की ओर नई बनी कोशिकाएँ लम्बी होकर मूल की लम्बाई बढ़ाती हैं।

(iii) दीर्घाकरण क्षेत्र (Region of elongation):
यह क्षेत्र विभज्योतक क्षेत्र के ऊपर 1 से 5 मिलीमीटर तक होता है। इस क्षेत्र में विभज्योतक क्षेत्र से बनी कोशिकाएँ लम्बाई में वृद्धि कर मूल की लम्बाई बढ़ाती हैं ।
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(iv) परिपक्वन क्षेत्र (Region of maturation):
दीर्धीकरण क्षेत्र के ऊपर का कुछ मिलीमीटर से लेकर कुछ सेमी. तक का क्षेत्र परिपक्वन का होता है। इस क्षेत्र में कोशिकाएँ अपना पूर्ण आकार प्राप्त कर, परिपक्व होकर ऊतकों में विभेदित हो जाती हैं। इस क्षेत्र की अधिचर्म की कोशिकाओं की अतिवृद्धि होकर असंख्य मूल रोम बनते हैं। मूलरोमों के कारण पौधे भूमि में दृढ़ता से स्थिर रहकर जल व खनिज पदार्थ का अवशोषण करते हैं। उपरोक्त सभी क्षेत्रों के बाद ऊपर वाले भाग में अग्राभिसारी क्रम में पाश्र्व जड़े विन्यासित होती हैं।

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