RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 25 आवृत्तबीजी पादपों के कुल

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 25 आवृत्तबीजी पादपों के कुल

RBSE Class 11 Biology Chapter 25 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 25 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मालवेसी, सोलेनेसी तथा लिलिएसी निम्न लक्षण में समान है –
(अ) अक्षीय बीजाण्डान्यास
(ब) पुंकेसरों की संख्या
(स) परिदलपुंज की उपस्थिति
(द) पुंकेसरी नाल की उपस्थिति

प्रश्न 2.
जंगल की ज्वाला, ढाक, टेसू या पलाश का वंशीय नाम है –
(अ) क़ोरोनोपस
(ब) केशिया
(स) ब्यूटिया
(द) थेसपेशिया

प्रश्न 3.
उपकुल पेपिलियोनेटी की ग्रन्थिल मूल में नाइट्रोजन स्थिरीकारी कौनसा जीवाणु पाया जाता है –
(अ) क्लोस्ट्रीडियम
(ब) एजेटोबैक्टर
(स) राइजोबियम
(द) सायनोबैक्टीरिया

प्रश्न 4.
परिदलपुंज युक्त त्रितयी पुष्प निम्न में से किस कुल का अभिलाक्षणिक गुण है –
(अ) मालेवेसी
(ब) सोलेनेसी
(स) फेबेसी
(द) लिलिएसी

प्रश्न 5.
माइमोसा प्यूडिका का लोकप्रिय नाम है –
(अ) छुईमुई
(ब) चांदनी
(स) खेजड़ी
(द) गुलमोहर

उत्तर तालिका:
1. (अ), 2. (स), 3. (स), 4. (द), 5. (अ)

RBSE Class 11 Biology Chapter 25 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अनुबाह्यदलपुंज क्या है?
उत्तर:
जब पुष्प के बाह्यदलपुंज के नीचे 3 या अधिक सहपत्रिकाएं चक्र (Bracteoles) के रूप में उपस्थित हो तो उसे अनुबाह्यदलपुंज (epicalyx) कहते हैं, जैसे – गुडहल।

प्रश्न 2.
चतुर्दाघी पुंकेसर क्या होता है?
उत्तर:
जब पुमंग में 6 पुंकेसर हों, इनमें से चार के पुतन्तु लम्बे व दो छोटे होते हैं तो उसे चतुर्दाघी पुंकेसर कहते हैं, जैसे – सरसों।

प्रश्न 3.
क्रूसीफ्लॅम दलपुंज को नामांकित चित्र द्वारा समझाइये?
उत्तर:
जब चार स्वतंत्र दलपत्र क्रॉस बनाते हुए व्यवस्थित होते हैं और प्रत्येक दलपत्र फलक (Limb) व नखर (claw) में विभेदित हों, जैसे सरसों।
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प्रश्न 4.
एकसंघी व द्विसंघी पुमंग को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
एकसंघी-जब सभी पुंकेसरों के पुतन्तु परस्पर जुड़कर एक समूह बनाते हैं, परन्तु उनके परागकोष पृथक रहते हैं, जैसेगुडहले। द्विसंघी-जब पुंकेसरों के पुतन्तु जुड़कर दो समूह बनाते हैं, परन्तु परागकोष पृथक रहते हैं, जैसे – मटर।

प्रश्न 5.
सोलेनेसी कुल का पुष्प सूत्र लिखिये।
उत्तर:
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प्रश्न 6.
खांसी की उत्तम दवा ‘मुलेठी” का वानस्पतिक नाम लिखिये।
उत्तर:
ग्लाइसीराइजा ग्लेब्रा (Glycyrrhiza glabrd)।

प्रश्न 7.
चिरस्थाई बाह्यदलपुंज से आपको क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब पुष्प में निषेचन के बाद भी बाह्यदल झड़ते नहीं हों अपितु फल के साथ ही लगे रहते हैं, जैसे – टमाटर में।

प्रश्न 8.
अश्वगंधा की जड़े किसके उपचार में प्रयुक्त होती हैं?
उत्तर:
खांसी व गठिया के उपचार में प्रयुक्त होती हैं।

प्रश्न 9.
लिलिएसी कुल का कौनसा पादप चूहानाशक के रूप में उपयोगी है?
उत्तर:
अर्जिनिया इन्डिका (Urgined indica) के शल्ककंदों का चूर्ण चूहे मारने के काम आता है।

प्रश्न 10.
खेजड़ी को राजस्थान का कल्पवृक्ष भी कहा जाता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि इस वृक्ष का हर भाग यहां के निवासियों के द्वारा उपयोग में लाया जाता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 25 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पेपिलियोनेशियस दलपुंज को समझाइये।
उत्तर:
इसमें दल 5 (Petals-5), पृथकदलीय (Polypetalous), अवरोही, कोरछादी (Descending imbricate) दलविन्यास वाले होते हैं। पश्चदल (Posterior petal) सबसे बड़ा व बाहर होता है। इसे ध्वजक (Vexillum) कहते हैं। दो पाश्र्वदल (Lateral petal) पक्ष्म (Wings) कहलाते हैं, जबकि दो अग्रदल (Anterior petals) निकट रूप से संलग्न होकर नौकाकार नौतल (Keel) बनाते हैं। ऐसे दलपुंज को तितलियाकार (Papilionaceous) कहते हैं।

प्रश्न 2.
लेग्यूमिनोसी को कौनसे लक्षणों के आधार पर किन उपकुलों में विभक्त किया गया है?
उत्तर:
इस बड़े कुल को दलपुंज के विन्यास, पुमंग और कुछ पुष्पीय लक्षणों के आधार पर तीन उपकुलों में विभक्त किया गया है –

  1. पेपिलियोनेटी
  2. सेजैलपिनोइडी
  3. मिमोसोइडी

प्रश्न 3.
उपकुल मिमोसोइडी के प्रमुख लक्षण दीजिये।
उत्तर:
इसके प्रमुख लक्षण निम्न प्रकार हैं –

  1. पुष्प त्रिज्यासममित (Actinomorphic)
  2. दलों में कोरस्पर्शी (Valvate aestivation)
  3. पुंकेसर असंख्य व स्वतंत्र (Free)

प्रश्न 4.
ऐसे फूल का सूत्र लिखो जो त्रिज्या सममित, उभयलिंगी, अधोजायांगी, 5 संयुक्तबाह्यदली, 5 मुक्तदली, 5 मुक्त पुंकेसरी, द्विअण्डपी तथा उर्ध्ववर्ती अण्डाशय युक्त हो।
उत्तर:
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प्रश्न 5.
लेग्युमिनोसी तथा लिलिएसी कुल के अण्डाशय मिश्रित हो गये हैं, इन्हें आप कैसे पहचानेंगे?
उत्तर:
लेग्युमिनोसी का अण्डाशय एक कोष्ठीय व सीमान्त बीजाण्डन्यास होता है, जबकि लिलिएसी कुल का अण्डाशय त्रिकोष्ठी, अक्षीय बीजाण्डन्यास वाला होता है।

प्रश्न 6.
मालवेसी कुल के पुमंग की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पुके सर असंख्य (Indefinite), एक संघी (Monadelphous) पुतन्तु (Filaments) परस्पर जुड़कर एक पुंकेसरी नाल (Staminal tube) का निर्माण करते हैं, जो दललग्न (Epipetalous) होती है। परागकोष एककोष्ठी (Monothecous) वृक्काकार (Reniform) पृष्ठलग्न (Dorsifixed) व बहिर्मुख (Extrorse) होते हैं।

प्रश्न 7.
दललग्न पुंकेसर को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
जब पुंकेसर व दलों का सम्पर्क हो या पुंकेसर दल से चिपके हों तो दललग्न पुंकेसर कहलाते हैं। यह स्थिति सोलेनेसी कुले के पुमंगों से मिलती है। उदा – सोलेनम।

प्रश्न 8.
क्रूसीफेरी कुल के दो प्रमुख लक्षण तथा दो पौधों के वानस्पतिक नाम लिखिये।
उत्तर:
दलपुंज क्रॉसरूपी तथा पुंकेसर चतुदीर्घा। दो पौधों के नाम- काली राई (Brassica nigra), पीली सरसों (Brassica campestris var. sarson)

प्रश्न 9.
निम्न गुणों के आधार पर कुल का नाम लिखिये –
(अ) पुष्प एक व्यास सममित, पुंकेसर द्विसंघी, सीमान्त बीजाण्डान्यास।
(ब) अनुबाह्यदलपुंज उपस्थित, पुंकेसर असंख्य एकसंघी, स्तम्भीय बीजाण्डान्यास।
(स) दलपुंज क्रूसीफॉर्म, पुंकेसर चतुर्दी, भित्तीय बीजाण्डान्यास।
उत्तर:
(अ) पेपिलियोनेटी
(ब) मालवेसी
(स) क्रूसीफेरी

RBSE Class 11 Biology Chapter 25 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रेसीकेसी कुल के पुष्पीय लक्षणों का विस्तार से वर्णन कीजिये। पुष्पसूत्र व पुष्प आरेख भी दीजिये।
उत्तर:
मूल (Root):
मूसला मूल (Tap root) मूली (Raphantus sattvtus) की जड़ में भोजन संग्रह होने से मांसलदार होकर तरूपी (fusiform) होती है। शलजम (B.rapa) में भोजन का संग्रह हाइपोकोटाइल (Hypocotyle) में होने से मांसल प्रवृत्ति की होकर कुम्भीरूपी (napiform) होती है।

स्तम्भ (Stem): शाकीय (herbaceous) शाखित (branched) ऊर्ध्व (erect) बेलनाकार, परन्तु ह्रांसित (reduced) होता है (जैसे मूली, शलजम में), ठोस (solid), रोमिल (hairy) तथा पर्वसन्धियों व पर्व में (nodes and intenodes) में विभेदित होता है। बेसिका ओलिरेसिया वेराइटी गोंगीइलोड्स (B.oleracea var. gongylodes) के स्तम्भ में भोजन संग्रह होने के फलस्वरूप स्थूल हो जाता है।

पत्ती (Leaf):
मूलज (radical) या स्तम्भिक (cauline)। जब पत्तियां तने पर लगी हों तो स्तम्भिक (cauline) यदि पत्तियां मुख्य स्तम्भ पर न लगकर केवल शाखाओं पर हों तो शाखीय (ramal) परन्तु मूली व शलजम में तने के संघनित होने से पत्तियां भूमि से निकलती हुई प्रतीत होती हैं तब इसे मूलज (radical) कहते हैं।

यदा-कदा शाखीय (ramal), एकान्तर (alternate), सरल (simple), फलक अभिन्न (entire) या बड़ी पालियों में कटा पालिवत (lobed) या कटाफटा (dissected), प्रायः लायररूपी या वीणाकार (lyrate) आकृति की, रोमिल (hairy) पुष्पीय क्षेत्र की पत्तियां आरिक्युलेट (auriculate) तथा जालिकावृत एकशिरीय शिराविन्यास (reticulate unicostate venation) होता है।
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पुष्पक्रम (Inflorescence):
प्रायः असीमाक्षी (racemose), असीमाक्ष (raceme) जैसे- सरसों तथा कभी-कभी समशिख (corymb) होता है, जैसे आइबैरिस (Iberis amara = कैन्डीटफ्ट)।

पुष्प (Flower):
सहपत्रहीन (ebracteate), सर्वे त (pedicellate), पूर्ण (complete), द्विलिंगी (bisexual), त्रिज्या सममित (Actinomorphic), परन्तु कैन्डीटफ्ट (Candytuft) में एकव्यास सममित (Zygomorphic), जायांगधर (hypogynous), द्वितयी (bimerous = dimerous) या चतुष्टीय (tetramerous), नियमित (regular) परन्तु कैन्डिटफ्ट में अनियमित (irregular), चक्रीय (cyclic) होता है।

बाह्यदल पुंज (Calyx):
4 बाह्यदल (sepal) प्रत्येक दो के दो चक्रों (whorls) में व्यवस्थित, बाह्यचक्र में दो बाह्यदल मध्यस्थ तल (medium plane) में तथा अन्तःचक्र में दो पाश्र्व तल (lateral plane) में व्यवस्थित रहते हैं। पाश्र्वी (lateral) दो बाह्यदल आधार पर संपुटीयुक्त (saccate) होते हैं। पृथक बाह्यदलीय (polysepalous), पर्णपाती (deciduous), कोरछादी विन्यास (imbricate aestivation), हर रंग के परन्तु आंशिक रूप से दलाभ (petaloid) होते हैं।

दल पुंज (Corolla):
दल 4, पृथकदली (polypetalous), क्रॉसरूप (cruciform), प्रत्येक दल (petal) दो भागों में विभक्त होता है। दल का नीचे का संकीर्ण नखर (claw) तथा ऊपर के चौड़े फैले भाग को दल फलक (limb) कहते हैं। कैन्डीटफ्ट में दो अग्र दल (anterior petals), पश्च दलों (posterior petals) की तुलना में बड़े होते हैं। कोरस्पर्शी (valvate) विन्यास, कोरोनोपस (Coronopus= Senebiera) में दल अनुपस्थित होते हैं।

पुमंग (Androecium):
6 पुंकेसर (stamen), दो चक्रों में, पृथक पुंकेसरी (polyandrous), चतुर्थी (tetradynamous), बाहर के चक्र वाले दो पुंकेसर छोटे, पार्श्व (lateral) स्थित तथा अन्दर के चक्र वाले 4 बड़े अग्र-पश्च (anterio-posterior) स्थित होते हैं। 4 बड़े पुंकेसरों के आधार पर मकरन्दकोश (nectary) होते हैं। परागकोश द्विकोष्ठी (bilobed), आधारलग्न (basifixed), अन्तर्मुखी (introrse), अनुदैर्ध्य स्फुटन (lougitudinal dehiscence) होता है। परन्तु कोरोनोपस डाइडिमस (Coronopus didymus) में केवल 2 पाश्र्वीय पुंकेसर उपस्थित होते हैं।
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जायांग (Gynoecium):
द्विअण्डपी (bicarpellary), युक्ताण्डपी (syncarpous), अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (ovary superior), आरम्भ में एक कोष्ठीय (unilocular) परन्तु बाद में कूटपट (pseudoseptum = Replum) बनने से द्विकोष्ठीय (bilocular) हो जाता है। प्रत्येक कोष्ठ में अनेक बीज, भित्तिय बीजाण्डन्यास (Parietal placentation) में व्यवस्थित होते हैं। बीजाण्ड प्रतीत (anatropous) या वक्र (camphylotropous) प्रकार का, वर्तिका (style) एक, साधारण व छोटी, वर्तिकाय (stigma) द्विपालित (bilobed) या समुण्ड (capitate) होता है।

फल (Fruit):
अधिकतर इस कुल के सदस्यों में सिलिकुआ (Siliqua) फल होता है। आइबेरिस (Iberis) व कैपसेला (Capsella) में सिलिक्यूला (Silicula) फल होता है परन्तु मूली (Rhaphanus) में लोमेन्टम (lomentum) फल मिलता है।

बीज (Seed):
तेलयुक्त (Oily) अभ्रूणपोषी (nonendospermic) तथा भ्रूण बड़ा व वक्रित (curved) होता है। पुष्पसूत्र (Floral formula)
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परागकण (Pollination):
कुल के सदस्य स्वपरागित (Self pollinated) परन्तु मकरन्द ग्रन्थियों की उपस्थिति के कारण कीट-परागण। (entemophily) होने से पर-परागण (cross-pollination) होता है।

कुल के महत्वपूर्ण लक्षण (Important characters of family):

  1. स्वभाव: प्रायः शाक, यदाकदा क्षुप व वृक्ष नहीं।
  2. पत्ती: अननुपर्णी, सरल, स्तम्भिक, शाखीय व मूलज, एकान्तर, वीणाकार, पत्तियों के रस में सल्फर यौगिक के कारण तीखी गन्ध।
  3. पुष्पक्रम: असीमाक्षी यो समशिख, असीमाक्ष।
  4. पुष्प: असहपत्रीय, त्रिज्या सममित, यदाकदा एकव्यास सममित, चर्तुतयी, जायांगधर।
  5. बाह्यदलपुंज: 4 बाह्यदल, पृथक बाह्यदल, 2-2 के दो चक्रों में।
  6. दल-पुंज: 4 दल, पृथक दलों, प्रत्येक दल में नखर व फलक, क्रॉसरूपी।
  7. पुमंग: 6 पुंकेसर, पृथक पुंकेसरी, दो चक्रों में, बाहरी चक्र में 2 छोटे और अन्दर के चक्र में 4 बड़े पुंकेसर,
  8. चतुर्दीघी, परागकोश द्विकोष्ठी व अन्तर्मुखी। जायांग: द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती, एककोष्ठकी बाद में आभासी पट के कारण द्विकोष्ठकी, भित्तिय बीजाण्डन्यास।
  9. फल: सिलिकुआ व कुछ में सिलिक्यूला।

प्रश्न 2.
मालवेसी कुल का आर्थिक महत्व लिखिये।
उत्तर:
आर्थिक महत्व (Economic Importance):

1. सब्ज़ियाँ (Vagetable): भिंडी = Lady’s finger (Abelmoschus esculentus)

2. तेल (Oil):

  • कपास = cotton (Gossypium): बीजों से बिनौले का तेल प्राप्त होता है, जो खाना बनाने, साबुन व वार्निश इत्यादि के बनाने के उपयोग में आता है तथा तेल का हाइड्रोजनीकरण करके वनस्पति घी बनाया जाता है। पशुओं को कपास के बीजों (काकड़ा) को बंटे के रूप में खिलाया जाता है व तेल निकालने के बाद शेष रही खल (oil cake) में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन होने के कारण पशुओं को खिलाया जाता है।
  • हिबस्कस मॉस्चेंटस (Hibiscus moschattis): के बीजों से मस्क तेल (musk oil) प्राप्त होता है, इसका उपयोग इत्र उद्योग में भी होता है।
  • हिबस्कस कैनेबिनस (Hibiscus cannabinus): बीजों से प्राप्त तेल के द्वारा लिनोलियम (Linoleum) बनाया जाता है। शुद्धीकृत तेल भोजन बनाने व रंग रोगन बनाने के रूप में उपयोग किया जाता है।

3. रेशे (Fibres ):

  • कपास (Gossypium sp.): बीजावरण से निकलने वाले महीन सेल्यूलोज के रेशे कपड़ा उद्योग का मुख्य आधार है, कपास के रेशे बीजों के बाह्यत्वचीय उद्धर्ध (epidermal outgrowth) है, इसकी मुख्य चार जातियाँ हैं G.barbadense a G. hirsutum can new world cotton कहते हैं तथा G.arboreum व G.herbaceum को old world cotton कहते हैं।
  • पटसन = Madras hemp (Hibiscus cannabinus): स्तम्भ के बास्ट से प्राप्त होता है।
  • पटवा = Rosella or Rama (Hibiscus sabdariffa): तने के बास्ट से मिलता है।
  • विलायती सन् (Urnea tobata): बास्ट रेशे हैं, यह रेशे ब्राजील में बोरियाँ बनाने के काम आते हैं।

4. औषधियाँ ( Medicins ):

  • यूरिना लोबेटा (Urena lobata): जड़ों व छाल से निकला रस हाइड्रोफोबिया (hydrophobia) रोग में उपयोगी होता है।
  • कंधी (Abutilon indicum): पौधे के विभिन्न अंगों से अनेक प्रकार की आयुर्वेदिक औषधि प्राप्त की जाती है। जड़ का अर्क ज्वर में देते हैं।
  • माल्वा वर्टिसिलेटा (Malva verticillata) की जड़ काली खांसी (whooping cough) तथा शुष्क पत्तियों की भस्म स्केबीज (scabies) रोग के उपचार में लाभदायक होती है।

5. इत्र (Perfume): पैवोनिया ऑडोरेटा (Pavonia odorata) की मूल से हिना (hina) इत्र बनाया जाता है।

6. सजावटी पौधे (Ornamental plants):

  • हिबिस्कस रोजा सायनेन्सिस (Hibiscus rosa-sinensis = China rose = गुडहल या shoe flower) इसके पुष्पों से जूतों की पॉलिस भी बनाई जाती है।
  • गुलखेरा (Alrhea rosea = Holly hock)
  • अम्ब्रेला वृक्ष (Thespesia populnea = umbrella tree) इसे पारस पीपल भी कहते हैं।
  • परिवर्तनशील गुलाब (Changeable rose = Hibisucs mutaabilis = English china rose): इसके पुष्प के दल (Petals) का रंग दिन के समय सफेद से लाल या गुलाबी हो जाता है।
  • पेवोनिया ऑडोरेटा (Pavonia odorata)

7. रंग (Dyes):

  • एल्थिया रोजिया (Althaea rosea): पत्तियों से नीला रंग प्राप्त होता है।
  • थेस्पेसिया पोपुलनिया (Thespesia populnea): फलों से पीला रंग प्राप्त होता है।

प्रश्न 3.
लेग्युमिनोसी कुल के तीनों उपकुलों की तुलना कीजिये तथा प्रत्येक के आर्थिक महत्व के तीन-तीन पौधों के वानस्पतिक नाम दीजिये।
उत्तर:
इस कुल को शिम्ब कुल (Lagume family) भी कहते हैं। पुष्पधारी पादपों के अन्तर्गत सबसे बड़ा कुल ग्रेमेनी या पोयेसी (Graminae or Poaceae) का है, दूसरे स्थान पर कम्पोजिटी या एस्टोरेसी (Compositae or Asteraceae) का तथा तीसरे स्थान पर लेग्यूमिनासी या फैबेसी (Leguminosae or Fabaceae) का है। वैसे द्विबीजपत्री पादपों का यह दूसरा सबसे बड़ा कुल है। इस कुल को विशेषकर दलपुंज व पुमंग (corolla and androecium) तथा अन्य लक्षणों के आधार पर तीन उपकुलों में विभक्त किया गया है, परन्तु आधुनिक वर्गीकरण शास्त्रियों ने इन उपकुलों को कुलों की श्रेणी में स्थान प्रदान किया है। ये तीन उपकुल निम्न प्रकार से हैं –

  1. पेपिलियोनेटी (Papilionatae = Lotoideae)
  2. सेजलपिनोइडी (Caesalpinoideae)
  3. मिमोसाइडी (Mimosoideae)

1. उपकुल पेपिलियोनिटी या लोटोइडी (SUB-FAMILY. PAPILIONATAE OR LOTOIDEAE)

स्वभाव (Habit): एक वर्षीय या बहुवर्षीय शाक (herb), क्षुप (shrub), कुछ प्रतान आरोही (tendril climbers) जैसे पाइसम (pisum), लैथाइरस (Lathyrus), कुछ वल्लरी (twinner) जैसेक्लाइटोरिया (Clitoria) वे कुछ वृक्ष (trees) जैसे- डलबर्जिया (Dalbergia)।

जड़ (Root): मूसला मूल, अनेक पौधों की द्वितीयक मूल पर ग्रन्थिकाएँ (nodules) होती हैं, ग्रंथिकाओं में नाइट्रोजन यौगिकीकरण जीवाणु जैसे – राइजोबियम (Rhizobium) सहजीवी (symbiotic) रूप में रहते हैं। ये जीवाणु वायुमण्डल की स्वतंत्र नाइट्रोजन को उनके यौगिकों में बदलकर भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। इन जड़ों को ग्रन्थिल मूल (nodulated root) कहते हैं।

स्तम्भ (Stem): ऊर्ध्व (erect) या विसर्गी (creeping), बेलनाकार, शाखित, शाकीय व ठोस, कमजोर वल्लरी, आरोही होता हैं।

पत्ती (Leaf): अनुपर्णी (stipulate), मुक्त पार्वीय (free lateral) या पर्णाकार (foliaceous), जैसे-पाइसम व लैथाइरस (Pisum & Lathyrus) में। सर्वेती, एकान्तर, स्तम्भिक व शाखीय (cauline and ramal), पर्णाधार फूला हुआ (Pulvinous base of leaf), संयुक्त पत्ती कुछ में हस्ताकार संयुक्त (palmately compound), जैसे ट्राइफोलियम व मीलियोलोटस (Trifolium & Meliolotus) परन्तु प्रायः पिच्छाकार संयुक्त (Pinnately compound) होती है, पाइसम व लैथाइरस (Pisum & Latyrus) में ऊपर के पर्णक (leaflets) प्रतानों (tendrils) में रूपान्तरित, लै. एफाका (L.aphaca = wild pea) में सम्पूर्ण पत्ती प्रतान में रूपान्तरित, जालिकावृत शिराविन्यास।

कुल के कुछ पौधों की पत्तियों में नैश गति (sleep movement) पाई जाती है। टूाइफोलियम (Trifolium), डे स्मोडियम (Desmodium) इत्यादि में पर्णक रात्रि के समय ऊर्ध्व (vertical) स्थिति में रहते हैं। डेस्मोडियम गायरेन्स (Desmodium gyrans = Indian telegraph plant) में दो लघु पार्श्व पर्णक अधिक तापमान की स्थिति में ऊपर-नीचे गति करते रहते हैं।

पुष्पक्रम (Inflorescence): असीमाक्षी (recemose) असीमाक्ष (receme) या एकल कक्षीय (solitary axillary) होता है।

पुष्प (Flower): सहपत्री (bracteate), सहपत्रिकायुक्त (bracteolate), सर्वांत, पूर्ण, द्विलिंगी, एक व्यास सममित (2ygomorphic), जायांगधर (hypogynous) या परिजयांगी (Perigynous) तथा पंचतयी (Pentamerous) होते हैं। इस कुल के सभी पुष्प प्रायः अन्मुनलीय परागणी (cleistogamous) होते हैं।

बाह्यदलपुंज (Calyx): 5 बाह्यदल, संयुक्त बाह्यदल, विषम बाह्यदल अग्र (odd sepal is anterior), कोरस्पर्शी या आरोही कोरछादी (ascending imbricate) विन्यास होता है।

दलपुंज (Corolla): 5 दल, पृथकदली, पैपिलियोनेसियस (Papilionaceous = Butter fly shape), विन्यास अवरोही कोरछादी (descending imbricate = vexillary) – पांच दलों में से एक पश्च बड़ा दल ध्वजक या स्टेण्डर्ड या वैक्सीलम (standard or vexillum), दो पाश्र्व व छोटे पक्षक (wings) तथा दो अग्र सबसे छोटे आपस में जुड़कर नोकदार रचना कील या नोतल (keel) बनाते हैं (इसी कारण पुष्प एकव्याससममित होता है)। लेस्पीडेजा (Lespedeza) में दल पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
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पुमंग (Androecium):10 पुंके सर , द्विसंधी (diadelphous), पश्च की ओर एक पुंकेसर स्वतंत्र होता है शेष नौ एक संघ बनाते हैं। मूंगफली (Arachis hypogea), शीशम (Dalbergia sisso) इत्यादि में केवल नौ पुंकेसर होते हैं, इनमें पश्च पुंकेसर अनुपस्थित होता है। क्रोटोलेरिया (Crotolaria) तथा पोन्गेमिया (Pongamia) में दस पुंकेसर जुड़कर संघ बनाते हैं तथा मूंगफली (Arachis) में भी एक संघी अवस्था होती है। परागकोष द्विकोष्ठीय, पृष्ठलग्न (dorsifixed), अन्तर्मुखी (introrse), अन्त:स्थित (inserted) व अनुदैर्ध्य स्फुटित होते हैं।

जायांग (Gynoecium): एक अण्डपी, एककोष्ठकी, अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior), सीमान्त बीजाण्डन्यास (marginal placentation), अभ्यक्ष सीवन (ventral suture) पर अनेक बीजाण्ड स्थित होते हैं। वर्तिका (style) एक, कुछ मुड़ा हुआ तथा वर्तिकाग्र (stigma) समुंड (capitate) होती है। मटर में वर्तिकाग्र तलवार आकृति (sword shape) का होता है।

फल (Fruit): प्रायः फली या शिम्ब (legume or pod) इसे कुल का लक्षणीय फल है परन्तु डेस्मोडियम (Desmodium) तथा मूंगफली (Arachis) में लोमेन्टम (Lomentun) फल मिलता है। मूंगफली में पुष्प निषेचन के बाद जमीन में धंस जाता है तथा फल का विकास भूमि के अन्दर होता है। शिम्ब एक अथवा दोनों सीवनों (sutures) से दो कपाटों (valves) में स्फुटित होता है। शीशम (Delbergia sisso) के फल पंखदार (winged) होते हैं।

बीज: अभ्रूणपोषी (non-endospermic) होते हैं।

परागण (Pollination): मूंगफली व मटर में स्वपरागण होता है तथा अन्य में पर-परागण कीटों, प्रायः मधुमक्खियों द्वारा होता है।
पुष्प सूत्र (Floral formula)
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2. उप कुल – सेजलपिनोइडी (SUB – FAMILYCAESALPINOIDEAE) cuilcharut (Classification ):

स्वभाव (Habit):
अधिकतर वृक्ष, जैसे- इमली (Tamarindius), कचनार (Bauhinia), गुलमोहर (Delonix), अमलतास (Cassia) तथा कुछ क्षुप, जैसे- पारकिनसोनिया (Parkinsonia) व शाक, जैसेकेसिया टोरा (Cassia tora)। बाहुनिया वेहलाई (Bauhinia vahlii) काष्ठीय आरोही होता है।

जड़ (Root): मूसला मूल, शाखित।
स्तम्भ (Stem): ऊर्ध्व, बेलनाकार, ठोस, शाकीय व काष्ठीय, शाखित।

पत्ती (Leaf): अनुपर्णी, सवृन्ती, स्तम्भिक व शाखीय, पर्णाधार फूले हुए (Pulvinous base), एकान्तर पिच्छाकार संयुक्त (Pinn ately compound) – एकपिच्छकी या द्विपिच्छकी, पार्किन्सोनिया (Parkinsonia) में पर्ण द्विपिच्छाकार संयुक्त होती है, अनुपर्ण कांटों में बदल जाते हैं व पर्णक (leaflets) शीघ्र गिर जाते हैं व द्वितीयक रैकिस (Secondary rachis) हेरी व चपटा होकर पर्णाभवृन्त (Phyllode) में रूपान्तरित हो जाता है। जालिका वृत शिराविन्यास पाया जाता है।

पुष्पक्रम (Inflorescence): असीमाक्षी या यौगिक असीमाक्ष (Panicle)।
पुष्प (Flower): सहपत्री, सर्वांत, द्विलिंगी, पूर्ण, एकव्यास सममित (Zygomorphic) जायांगधार (hypogynous) व पंचतयी।

बाह्यदल पुंज (Calyx)-5 बाह्यदल, पृथक बाह्यदली (Polysepalous), कोरछादी या अवरोही कोरछादी (descending imbricate) विन्यास, विषम बाह्यदल (odd sepal) अग्र (anterior)।

दलपुंज (Coralla): 5 दल, पृथकदली, आरोही कोरछादी विन्यास (ascending imbicate), इमली (Tamarindus) में दो अग्रदल शल्क (scales) के रूप में होते हैं।
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पुमंग (Anderoecium):10 पुंकेसर, 5-5 के दो चक्रों में प्रायः 7 पुंकेसर जनन क्षमता योग्य (fertile) व 3 पश्च पुंकेसर बंध्य पुंकेसर (staminode) होते हैं। पार्किन्सोनिया (Parkinsonia) के सभी 10 पुंकेसर, इमली के केवल 3 पुंकेसर व बाहुनिया (Bauhinia) के 5 पुंकेसर जनन क्षमता योग्य होते हैं। पृथक पुंकेसरी (Polyandrous) परन्तु इमली में एकसंधी (monoadelphous) व्यवस्था पाई जाती है। परागकोष द्विकोष्ठी व अंतर्मुखी (introrse) तथा अंत:स्थित (inserted) होते हैं जो अंतस्थ छिद्रों (terminal pores) द्वारा या अनुदैर्घ्य रूप से स्फुटित होते हैं।

जायांग (Gynoecium): पैपिलियोनेटी के समान ही होते हैं। (चित्र 5)।
फल (Fruit): लम्बा शिम्ब (long legume)।
बीज (Seed): बीज भ्रूणपोषी (Endospermic) या अभ्रूणपोषी (Non-endospermic) होते हैं।
परागण (Pollination) कीट परागण (entomophily) होता है।
पुष्पसूत्र (Floral formula)
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3. मिमोसाइडी ( Sub – family – MIMOSOIDEAE )

स्वभाव (Habit):
अधिकतर वृक्ष (tree), जैसे- एकेशिया (Acacia), क्षुप जैसे डाइक्रोस्टैकिस (Dichrostachys), यदा कदा शाक (herb) जैसे – छुईमुई (Mimosa pudica) या काष्ठीय आरोही (woodly climber) जैसे ऐन्टैडा (Entada) आदि। कुछ पौधे मरूभिद, जैसे बबूल (Acacia) तथा नेपच्यूनिया ऑलेरिसिया (Neptunia olaracea) एक तैरने वाला जलोभिद है।

मूल (Root): मूसला मूल, शाखित।
स्तम्भ (Stem): बेलनाकार, ठोस, ऊर्ध्व, शाखित, काष्ठीय परन्तु ल्यूसिना (Leucaena) व एडिनेन्थिरा (Adenanthera) आदि अशाखित वृक्ष होते हैं।
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पत्ती (Leaf): अनुपर्णी (stipulate) कांटों या सूल में रूपान्तरित, संवृत, स्तम्भिक व शाखीय, फूले पर्णाधार (Pulvinous), एकान्तर, द्विपिच्छकी (bipinnate), आस्ट्रेलियन एकेशिया में पर्णदल (lamina) अल्पविकसित (reduced) व पर्णवृन्त चपय व चौड़ा तथा हरे रंग का होकर पर्णाभ वृन्त या फिल्लोड़ (phyllode) बन जाता है। जालिकावृत शिराविन्यास, छुईमुई (Mimosa pudica) व नेप्चूनिया ऑलिरेसिया (Neptunia oleracea) की पर्फे अधिक संवेदनशील होती है, जैसे ही कंपन का उद्दीपन (stimulus) मिलता है त्योंही बन्द हो जाती है, इस गति को कंपानुकुंचन (Seismonasty) कहते हैं।

पुष्पक्रम (Inflorescance): असीमाक्षी मुण्डक (Racemose head) या स्पाइक (spike)।
पुष्प (Flower): सहपत्री, अपुष्पवृन्त (sessile), द्विलिंगी, पूर्ण, त्रिज्यासममित (actinomorphic), चतुर्तयी या पंचतयी, जायांगधर (hypogynous)।
बाह्यदल पुंज (Calyx): 4 – 5 बाह्यदल, संयुक्त बाह्यदली (gamosepalous), osteggif (valvate)।
दलपुंज (Corolla): 4 – 5 दल, संयुक्तदली व कोरस्पर्शी (valvate)।

पुमंग (Androecium): असंख्य पुंकेसर (indefinite), पृथक पुंकेसरी (polyandrous), अनेक चक्रों में व्यवस्थित, पुतन्तु (filament) लम्बे। ऐल्बजिया (AIbizzia) व पिथीकोलोबियम (Pithecolobium) में पु के सर असंख्य व एक संघी (monoadelphous), प्रोसोपिस (Prosopis) में पुंकेसरों की संख्या दलपत्रों की संख्या से दुगनी होती है। इस स्थिति में पुंकेसर दो चक्रों अर्थात् द्विचक्कर-पुंकेसरी (diplostemanous) में रहते हैं, बाहरी चक्र में पुंकेसर बाह्यदल सम्मुख (antisepalous) तथा अन्दर के चक्र में दल सम्मुख (antipetalous) होते हैं। परागकोष द्विकोष्ठी, पृष्ठलग्न, अन्तर्मुखी (introrse), बाह्यस्थित (exserted) अनुदैर्घ्य स्फुटित (longitudinal dehiscence) होते हैं।

जायांग (Gynoecium): पैपिलियोनेटी के समान।
फल (Fruit): शिम्ब (Legume), अधिकतर लोमेन्टम (Lomentum)।
बीज (Seed): अभ्रूणपोषी (Non-endospermic), पिथीकोलोबियम ड्ल्स (Pithecotobium dulce) के बीज रसीले बीजचोल (pulpy aril) से घिरे होते हैं।
परागण (Pollination): प्रायः कीट परागण (entomophily) होता है।
पुष्प सूत्र (Floral formula):
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प्रश्न 4.
सोलेनेसी कुल के कायिक लक्षणों के विस्तार एवं आर्थिक महत्व का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
कुल के महत्वपूर्ण लक्षण (Important characters of family):

  • स्वभाव: शाक, क्षुप तथा वृक्ष कम व कुछ लताएं एवं वल्लरी।
  • पत्तियाँ: अननुपर्णी, एकान्तरित या अभिमुखी।
  • पुष्पक्रम: ससीमाक्षी या एकल।
  • पुष्प: सहपत्रहीन, द्विलिंगी, त्रिज्या सममित, जायांगधर, पंचतयी।
  • बाह्यदल पुंज: 5 बाह्यदल, संयुक्त बाह्यदली, कोरस्पर्शी।
  • दलपुंज: 5 दल, संयुक्तदली, कोरस्पर्शी या व्यावर्तित, कीपाकार या घंटाकार या द्विओष्ठी आकार के।
  • पुमंग: 5 पुंकेसर, पृथक पुंकेसरी, दललग्न, परागकोश द्विकोष्ठी, अंतर्मुखी, स्फुटन शीर्ष छिद्रों से।
  • जायांग: द्विअण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती, द्विकोष्ठी, स्तम्भीय बीजाण्डन्यास, तिर्यक कपाट, फूला हुआ बीजाण्डासन।
  • फल: बेरी या सम्पुट।

आर्थिक महत्व (Economic importance):

1. खाद्य पदार्थ (Edibles):

  • सोलेनम ट्यूबरोसम (Solanum tuberosum; Potato, आलू): इसमें खाद्य पदार्थ भूमिगत स्तम्भ कन्द (stem tuber) में पाया जाता है तथा प्रचुर मात्रा में स्टार्च होता है। यह अनेक औद्योगिक पदार्थ जैसे स्टार्च, डेक्सट्रिन (dextrin), एल्कोहॉल इत्यादि का मुख्य स्रोत है। आलू को स्पेन निवासी, दक्षिण अमेरिका से यूरोप में 1560 से 1570 के मध्य लाये थे।
  • सोलेनम मेलौन्जेना (Solanun melongena; Brinjal= Eggplant, बैंगन): इसके फल की सब्जी बनाई जाती है। फल का खाने योग्य भाग फलभित्ति व बीजाण्डासन है। इसमें आयोडीन प्रचुर मात्रा में होती है।
  • लाइकोपर्सिक में एस्क्यू लेन्ट म (Lycopersicum esculentam; Tomato=love apple, टमाटर): इनके फलों की सब्जी, चटनी बनाते हैं, खाने योग्य भाग फलभित्ति व बीजाण्डासन है।
  • कैप्सिकम एनुअम (Capsicum annunn; Chillies, मिर्च): इसे सब्जी व मसाले में उपयोग ली जाती है।
  • केप्सिकम फुटेसेन्स (C. frutescens; शिमला मिर्च): फलों की सब्जी बनाते हैं।
  • फाइसेलिस पेरूवियाना (Physalis peruviana; Cape goose – berry, रसभरी): फल खाये जाते हैं।

2. औषधियाँ (Medicines):

  • एट्रोपा बेलाडोना (Atropa bettadona): इसकी जड़ों से एट्रोपिन (Atropine) नामक एल्केलॉइड प्राप्त होता है, इससे बेलाडोना (belladona) औषधी बनाई जाती है, इसका उपयोग खांसी, दर्द व शान्तिकर (sedative) तथा उत्तेजक (stimulant) के रूप में होता है। एट्रोपिन का उपयोग नेत्र परीक्षण से पूर्व नेत्र की पुतली के प्रसारण हेतु किया जाता है। बेलाडोना का उपयोग प्लास्टरों में किया जाता है तथा यह अफीम विष के प्रति महत्वपूर्ण प्रतिविष प्रतिकारक (antidote) है। एट्रोपा एक्यूमिनेटा (Atropa acuminata; HIT 3777) Indian belladona होता है।
  • हायोसायमस नाइगर (Hyoscyamus niger; खुरसनी अजवाइन)-पत्तियों व पुष्पों से हेनवैन (henbane) नामक औषधि प्राप्त होती है, इसमें हायोसाइमीन व स्कोपोलामीन (Scopolamine) एल्केलॉइड होते हैं, इसका उपयोग दमा व काली खांसी (Asthma & Whooping cough) तथा उत्तेजित स्नायुओं को शान्त करने व पीड़ाशमन करने वाली औषधियों में किया जाता है।
  • डाटूरा मेटेल व डाटूरा स्ट्रेमोनियम (Datura metal= Thorn apple and D. stramonium, धतूरा): पत्तियों व पुष्पों से स्ट्रेमोनियम (Stramonium) नामक औषधि प्राप्त होती है। इसमें हायोसाइमीन, एट्रोपिन व स्कोपोलामीन एल्कलॉइड होते हैं। स्ट्रेमोनियम का उपयोग दमा व पार्किनसोनिज्म (Parkinsonisni) रोग के उपचार हेतु किया जाता है। धतूरा के बीज अधिक विषैले होते हैं।
  • विथानिया सोम्निफेरा (Withania somnifera, असगंध): जड़ से असगंध नामक औषधि प्राप्त होती है। जिसका उपयोग हिचकी (hiccup), खांसी व गठिया (rheumatism) रोग में किया जाता है। वि. कोगुलेन्स (W.cogulens) का उपयोग पनीर बनाने में होता है।

3. तम्बाकू (tobacco):
निकोटियाना टैबेकम (Nicotiana tabacum; virginia tobacco) व नि.रस्टिका (N. ॥ustica; green tobacco, तम्बाकू)-इनकी पत्तियों से खाने की, सूंघने की, बीड़ी सिगरेट की तम्बाकू प्राप्त होती है। इनमें एनाबेसिन व निकोटिन (Anabasine & Nicotine) एल्केलॉइड होते हैं। तम्बाकू विषैली (narcotic) है, इसका प्रभाव केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र पर होता है, अधिक सेवन से कैंसर हो जाता है, औषधि के रूप में शान्तिकर (sedative), कृमिहर (vermifuge) व प्रतिउद्धेष्टी (antispasmodic) है।

4. सजावटी पौधे (Ornamental plants):

  • पिटूनिया (Petunia) की अनेक जातियाँ।
  • सेस्ट्रम नाक्टर्नम (Cestrum nocturnum; Night jasmine, रात की रानी)।
  • सेस्ट्रम डायर्नम (Cestrium diurnum; day jasmine, दिन का राजा): इनके पुष्पों में तीव्र ग्रंध नहीं होती है।
  • सोलेनम जैसमिनॉइडिस (Solanum jasminoides)।
  • सोलेनम डलकेमेरा (Solanum dulcamara)।
  • ब्रेनफेल्सिया होपिआना (Brunfelsia hopeana; yesterday, today, tomorrow plant)।
  • शाइजैयन्थस (Schizanthees; Butterfly flower)
  • सैलपिग्लोसिस (Salpiglosis)

प्रश्न 5.
सोलेनेसी कुल के पुष्पीय लक्षणों को विस्तार से लिखते हुए पुष्पसूत्र एवं पुष्प आरेख दीजिये।
उत्तर:
स्वाभाव (habit): अधिकार पादप एकवर्षीय या बहुवर्षीय शाक (herbs) जैसे सोलेनम नइग्राम (solanum nigrum) निकोटियाना (nicotiana), कुछ क्षुप (shurb), जैसे सेस्ट्रम (cestrum) तथा बहुत ही कम वृक्ष, जैसे सोलेनम वर्बेसीफोलियम (solanum verbascifolilum) व कुछ आरोही (climber), जैसे सोलेनम डालकैमेरा (solanum dulcamara)।

जड़ (Root): मूसला शाखित मूल।

स्तम्भ (Stem): ऊर्ध्व, शाकीय या काष्ठीय, रोमिल या कंटकीय (hairy or prickly), कुछ में भूमिगत, भोजन संग्रह के कारण स्तम्भ कंदिल (stem tubcr), जैसे – आलू (Solanum tuberosum)।

पत्ती (Leaf): अननुपर्णी (exstipulate), संवृत (Petiolated), स्तम्भिक या शाखीय, एकान्तर परन्तु पुष्पीय क्षेत्र में विशेषतः अभिमुख (opposite), सरल, पत्ती आछिन्न कोर (entire) या कटे उपांत (margin) वाली, टमाटर (Lycopersicum) में पिच्छाकार संयुक्त (Pinnately compound), जालिकावृत शिराविन्यास।

पुष्पक्रम (Inflorescence): कक्षस्थ एकल (solitary axillary), जैसे फाइसेलिस (Physalis) या शीर्षस्थ एकल (Solitary terminal), जैसे- धतूरा (Datura), प्रायः ससीमाक्ष (Cymose)।

पुष्प (Flower): सहपत्रहीन (ebracteate), सपुष्पवृंत (pedicellate), पूर्ण, द्विलिंगी, त्रिज्यासममित (actinomorphic), जायांगधर (hypogynous) परन्तु सैल्पिग्लोसिस व शाइजैन्थम (Salpiglosis & Schizanthus) मै पुष्प एकव्याससमित (zygomorphic) पंचतयी, चक्रिक।

बाह्यदलपुंज (Calyx): 5 बाह्यदल, संयुक्त बाह्यदली, चिरलग्न (persistant), फाइसेलिस व विथेनिया (Physalis & Withuania) में चिरस्थायी बाह्यदलपुंज आकार में बढ़कर गुब्बारे (baloon) जैसी संरचना बनाकर पूर्ण रूप से फल को ढक लेती है। ऐसे बाह्यदल पुंज को उत्तरवर्षी बाह्यदल (accrescent sepal) कहते हैं परन्तु बैंगन (Solanum melongena) मे अपातजीर्णी (marcescent) atat है। विन्यास कोरस्पर्शी (valvate)।

दलपुंज (Corolla): 5 दल, संयुक्तदली, कीपाकार (infundibulum) – पिटूनिया (Petunia) में, घंटाकार फाइसेलिस में (campanulate in Physalis), शाइजैन्थम में द्विओष्ठी (Bilipped in schizanthus), विन्यास कोरस्पर्शी या व्यावर्तित (valvate or twisted)।

पुमंग (Androecium): 5 पुंकेसर, पृथकपुंकेसरी, सैल्पीग्लोसिस व शाइजैन्थस (Salpiglosis & Schisanthus) में 4 व 2 पुंकेसर होते हैं, दललग्न (epipetalous), दल एकान्तर (alternipetalous), परागकोश द्विकोष्ठी व अंतर्मुखी (bilobed & introrse), आधारलग्न, स्फुटन शीर्ष छिद्रों (apical pore) से।

जायांग (Gynoecium): द्विअण्डपी, संयुक्ताण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती अण्डाशय (superior ovary), द्विकोष्ठी, बीजाण्डन्यास स्तम्भीय (axile), अण्डप के 45 डिग्री दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में घूम जाने से अण्डाशय तिरछा (oblique), अतः इसमें तिरछा पट (oblique septum) मिलता है व बीजाण्डासन अधिक फूला हुआ (Swollen placenta) होता है। वर्ति का एक व सरल, वर्तिकाग्र (stigrma) द्विपालित या समुंड (bilobed or capitate) होती है।
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फल (Fruit): सरस भरी (berry) होता है, जैसे टमाटर (Lycopersicum), बैंगन (Snnelongena) या सम्पुट (capsule) होता है, जैसे- धतूरा (Datura) व पिटूनिया (Petunia) में।

बीज (Seed): भ्रूणपोषी, भ्रूण सीधा या वक्रित होता है।

परागण (Pollination): प्रायः कीट परागण होता है। आलू में पुष्प स्वपरागित तथा सैल्पिग्लोसिस में अनुन्मील्य परागणी (cleistogamous) होता है।
पुष्पसूत्र (Floral Formula)
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कुल के महत्वपूर्ण लक्षण (Important characters of family):

  • स्वभाव: शाक, क्षुप तथा वृक्ष कम व कुछ लताएं एवं वल्लरी।
  • पत्तियाँ: अननुपर्णी, एकान्तरित या अभिमुखी।
  • पुष्पक्रम: ससीमाक्षी या एकल।
  • पुष्प: सहपत्रहीन, द्विलिंगी, त्रिज्या सममित, जायांगधर, पंचतयी।
  • बाह्यदल पंज: 5 बाह्यदल, संयुक्त बाह्यदली, कोरस्पर्शी।
  • दलपुंज: 5 दल, संयुक्तदली, कोरस्पर्शी या व्यावर्तित, कीपाकार या घंटाकार या द्विओष्ठी आकार के।
  • पुमंग: 5 पुंकेसर, पृथक पुंकेसरी, दललग्न, परागकोश द्विकोष्ठी, अंतर्मुखी, स्फुटन शीर्ष छिद्रों से।
  • जायांग: द्विअण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती, द्विकोष्ठी, स्तम्भीय बीजाण्डन्यास, तिर्यक कपाट, फूला हुआ बीजाण्डासन।
  • फल: बेरी या सम्पुट।

प्रश्न 6.
लिलिएसी कुल के पुष्पीय लक्षणों के विस्तार का वर्णन कीजिये तथा किन्हीं पांच शोभाकारी पादपों के वानस्पतिक नाम लिखिए।
उत्तर:
स्वाभाव (habit): अधिकांशत: बहुवर्षीय शाक (perennial), कभी – कभी क्षुप जैसे ड्रेसीना (dracanea), यदा – कदा वृक्ष जैसे युक्का (yukka) कुछ आरोही (climber), जैसे ग्लोरिओसा (Gloriosa) व स्माईलेक्स।

मूल (Root): अपस्थानिक मूल (adventitious), तन्तुमय (fibrous), एस्पै रे गस (Asparagus ) व क्लोरोफाइट म (Chlorophytum tuberoSum; सफेद मूसली) में भोजन संग्रह करने वाली गुच्छित (fasciculated) मूल होती है।

स्तम्भ (Stem): वायव या भूमिगत (aerial or underground), भूमिगत में भोजन संग्रह होता है, जैसे – प्याज में शल्क कन्द (bulb), ऐस्पेरेगस में प्रकन्द (rhizome), कोल्चिकम (Colchicum) में धनकन्द (Corm)। स्तम्भे शाकीय या काष्ठीय, शाखित या अशाखित, ऐस्पेरेगस में तना एक पर्व (intenode) वाले ‘पर्णाभ पर्व (cladode) में तथा रस्कस (RusCLAS) में दो पर्वो वाले पर्णाभ पर्व (cladode) में रूपान्तरित हो जाता है। ड्रेसीन व युक्का (Dracaena & Yucca) में असामान्य द्वितीयक वृद्धि एक बीजपत्री वर्ग में अपवाद स्वरूप मिलती है।

पत्ती (Leaf): पत्तियाँ मूलज (radical) जैसे प्याज या स्तम्भिक (cauline) जैसे ड्रेसीना, अनुपर्णरहित (exstipulate), अवृन्ती, आधार आच्छादी (sheathing), एकान्तर, सम्मुख या चक्रीय। स्माइलेक्स (Smilax) में अनुपर्ण उपस्थित तथा प्रतानों में रूपान्तरित, समानान्तर शिरा विन्यास (parallel venation), परन्तु अपवाद स्वरूप स्माइलेक्स तथा पेरिस (Paris) में जालिकावृत शिरा विन्यास (reticulate vanation), ग्लोरियोसा (Gloriosa) में पर्णशीर्ष प्रतान में रूपान्तरित। ऐस्पेरेगस व रस्कस (RusCus) में पत्तियाँ शल्की (Scaly), प्याज में बेलनाकार (cylendrical= centric leaf), गंवारपाठे (aloe) में पत्तियाँ मांसल होती हैं।

पुष्पक्रम (Inflorescence): असीमाक्ष (raceme) या छत्रक (umbel) या एकल शीर्षस्थ या कक्षस्थ (solitary axillary or terminal) होता है। भूमिगत पादपों में पुष्यों के निर्माण के समय एक वायवीय तने के समतुल्य ऊर्ध्व रचना स्केप (Scape) बनती है, इस स्केप पर पुष्प लगते हैं तथा फल व बीज बनने के साथ स्केप सूखकर नष्ट हो जाता है। स्केपधारी पादपों को स्केपोज पादप (scapose plants) कहते हैं।
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पुष्प (Flower): सहपत्री, सपुष्पवृन्त, द्विलिंगी परन्तु रसकस व स्माइले क्स में एक लिंगी, पूर्ण या अपूर्ण, त्रिज्यासममित (actinomorphic), प्राय पुष्प जायांगधर (hypogynous) व त्रितयी (trimerous) होते हैं।

परिदलपुंज (Perianth): 6 परिदल (tepals), 3 – 3 के दो चक्रों में, पृथक या संयुक्त परिदली (Poly or gamophyllous), हरे या दलाम (sepaloid or petaloid), कोरस्पर्शी या कोरछादी (valvate or imbricate) विन्यास पाया जाता है। इनमें विषम परिदल अग्रस्थ होता है।

पुमंग (Androccium): 6 पुंकेसर, 3-3 के दो चक्रों में, पृथक पुंकेसरी (polyandrous), परिदललग्न (epiphyllous), परिदल सम्मुक (oppositiphyllous), परागकोष द्विकोष्ठी, अन्तर्मुखी या बहिर्मुखी (introrse or extrorse), पृष्ठलग्न या आधारलग्न या मुक्तदोली (dorsifixed or basifixed or versatile), छिद्रित या अनुदैर्घ्य (Porous or longitudinal) स्फुटन। रसकस के बाहरी चक्र के पुंकेसर बंध्य (staminode) होते हैं।

जायांग (Gynoecium): त्रिअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती, त्रिकोष्ठी (trilocular), स्तम्भीय बीजाण्डन्यास (axile placentation), वर्तिका एक व सरल, वर्तिकाग्र (stigma) त्रिपालित (trilobed) होती है (चित्र 8) ।

फल (Fruit): बेरी ( Barry) या संपुट (Capsule) होता है। बीज (Seed)-भ्रूणपोषी (endospermic) होते हैं।

परागण (Pollination): पुष्प कीटपरागित होते हैं। युक्का (Yucca) में एक विशेष शलभ (moth) प्रोनूबा युक्कासेला (Pronuba yuccasela) द्वारा कीट परागण होता है।
पुष्पसूत्र (Floral formula):
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कुल के महत्वपूर्ण लक्षण (Important characters or family):

  • स्वभाव: प्रायः शाक, प्रकंदीय व कंदीय स्तम्भ, मूलअपस्थानिक मूल।
  • पत्ती: एकान्तरित, मूलज यो स्तम्भीय, समानान्तर शिराविन्यास।
  • पुष्पक्रम: प्रायः असीमाक्षी यदाकदा ससीमाक्षी।
  • पुष्प: द्विलिंगी, त्रिज्या सममित, जायांगधर, त्रतयी।
  • परिदलपुंज: 6 परिदल, 3-3 के दो चक्रों में।
  • पुमंग: 6 पुंकेसर, 3 – 3 पुंकेसर दो चक्रों में, परिदल सम्मुख, परिदललग्नी, परागकोश द्विकोष्ठी, अंतर्मुखी।
  • जायांग: त्रिअण्डपी, युक्ताअण्डपी, त्रिकोष्ठी, स्तम्भिक बीजाण्डन्यास।
  • फल: सम्पुट।

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