RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 33 जन्तु ऊतक

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 33 जन्तु ऊतक

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
रक्त है
(अ) उपकला ऊतक
(ब) संयोजी ऊतक
(स) तंत्रिका ऊतक
(द) कोई नहीं।

प्रश्न 2.
वह पेशी जो कभी नहीं थकती है
(अ) अरेखित पेशी
(ब) रेखित पेशी
(स) हृदय पेशी
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3.
तंत्रिकाक्ष पर उपस्थित संकुचित स्थानों को कहते हैं
(अ) रैवियर के नोड
(ब) श्वान के नोड
(स) द्रुमाश्म
(द) अंतर्ग्रथन

प्रश्न 4.
एक ध्रुवी तन्त्रिका कोशिकाएँ पायी जाती हैं
(अ) दृष्टि पटल में
(ब) मस्तिष्क में
(स) मेरु रज्जु में
(द) भ्रूण में

प्रश्न 5.
मज्जायुक्त तंत्रिका पर आवरण होता है
(अ) प्रोटीन का
(ब) वसा का
(स) कार्बोहाइड्रेट का
(द) उपकला का

उत्तरमाला
1. (ब)
2. (स)
3. (अ)
4. (द)
5. (ब)

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
दो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच क्रियात्मक सम्बन्ध क्या कहलाता है?
उत्तर-
दो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच क्रियात्मक सम्बन्ध को सिनेप्सिस (Synapses) कहते हैं।

प्रश्न 2.
तरल संयोजी ऊतक का उदाहरण दीजिये।
उत्तर-
रुधिर व लसिका तरल संयोजी ऊतक का उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.
कोशिकाकाय में उपस्थित कणीय रचनाओं का नाम लिखिये।
उत्तर-
कोशिकाकाय में उपस्थित कणीय रचनाओं का नाम निसिल्स कणिका है।

प्रश्न 4.
रक्त प्रोटीन गामा ग्लोबुलिन का प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर-
रक्त प्रोटीन गामा ग्लोबुलिन का प्रमुख कार्य प्रतिरक्षी का निर्माण करना है।

प्रश्न 5.
उपास्थि की वृद्धि के लिये आवश्यक प्रोटीन का स्रावण किन कोशिकाओं द्वारा किया जाता है?
उत्तर-
उपास्थ्यणु (chondrocyte) द्वारा कान्ड्रिन प्रोटीन का स्रावण किया जाता है।

प्रश्न 6.
तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई का नाम बताइये।
उत्तर-
तंत्रिका कोशिका (न्यूरोन) तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई है।

प्रश्न 7.
श्वान कोशिकाएँ कहाँ स्थित होती हैं?
उत्तर-
श्वान कोशिकाएं तंत्रिका कोशिका (न्यूरोन) में स्थित होती हैं।

प्रश्न 8.
रेखिते व अनैच्छिक पेशी का उदाहरण दीजिये।
उत्तर-
रेखित पेशी का उदाहरण पाद की पेशियां एवं मूत्राशय, श्वास नली, मूत्रवाहिनी, अनैच्छिक पेशी का उदाहरण है।

प्रश्न 9.
एक स्वस्थ मनुष्य में प्रति 100 मिली. रक्त में उपस्थित हिमोग्लोबीन की मात्रा लिखिये।
उत्तर-
एक स्वस्थ मनुष्य में प्रति 100 मिली रक्त में उपस्थित हिमोग्लोबिन की मात्रा 12 से 16 ग्राम होती है।

प्रश्न 10.
रेखित पेशी तन्तुक की प्रोटीन के नाम लिखिए।
उत्तर-
रेखित पेशी तन्तुक की प्रोयन का नाम एक्टिन व मायोसिन है।

प्रश्न 11.
उपास्थि की आधात्री किस प्रोटीन की बनी होती है?
उत्तर-
उपास्थि की आधात्री कॉन्ड्रिन प्रोटीन की बनी होती है।

प्रश्न 12.
लाल रक्त कणिका का जीवन काल बताइये।
उत्तर-
लाल रक्त कणिका का जीवन काल 120 दिन का होता है।

प्रश्न 13.
हिपेरिन का स्रावण करने वाले श्वेताणु का नाम लिखिये।
उत्तर-
हिपेरिन का स्रावण करने वाले श्वेताणु का नाम बेसीफिल (Basophil) है।

प्रश्न 14.
थक्का बनाने में सहायक रुधिर कणिका का नाम बताइये।
उत्तर-
थक्का बनाने में सहायक रुधिर कणिका का नाम रुधिर पट्टिकाणु (Blood platelet) हैं।

प्रश्न 15.
अंतर्विष्ट पट्ट (Intercalated disc) किस पेशी ऊतक में पाये जाते हैं?
उत्तर-
हृदय पेशी ऊतक में अंतर्विष्ट पट्ट (intercalated disc) पाये जाते हैं।

प्रश्न 16.
तंत्रिका ऊतक की अतंत्रिकीय कोशिका का नाम लिखिये।
उत्तर-
तंत्रिका ऊतक की अतंत्रिकीय कोशिका का नाम ग्लियल कोशिका है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अस्थि व उपास्थि में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
अस्थि व उपास्थि में अन्तर
(Difference between Bone & Cartilage)

अस्थि(Bone)उपास्थि (Cartilage)
1. अस्थि ऊतक का मैट्रिक्स ओसीन नामक प्रोटीन को होता हैं।1. उपास्थि का मैट्रिक्स कॉन्ड्रिन नामक प्रोटीन का होता है।
2. यह ऊतक परमाणु कोशिकाओं का बना होता है।2. यह ऊतक उपस्थाणु कोशिकाओं का बना होता है।
3. यह ऊतक कठोर होता है।3. यह ऊतक लचीला होता है।
4. अस्थि ऊतक में एक केन्द्रीय गुहिका पाई जाती है जिसे अस्थि मज्जा कहते हैं।4. उपास्थि ऊतक में केन्द्रीय गुहिका का अभाव होता है।
5. अस्थि कोशिकाएँ क्रमानुसार स्थित होती हैं।5. उपास्थि कोशिकाओं के विन्यास में कोई नियम नहीं होता है।
6. अस्थि ऊतक में हैवरसियन तन्त्र पाया जाता है।6. इस ऊतक में ऐसा कोई तन्त्र नहीं होता है।

प्रश्न 2.
ऐच्छिक पेशियां किन्हें और क्यों कहते हैं?
उत्तर-
रेखित पेशियों को ऐच्छिक पेशियां कहते हैं। प्रत्येक पेशी तन्तुओं से निर्मित होता है। इन तन्तुओं में हल्की एवं गहरी धारियां पायी जाती हैं, इसी कारण से ये रेखित पेशियां कहलाती है।
इन पेशियों में संकुचन जन्तु की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। अतः ये ऐच्छिक पेशियां (voluntary muscles) कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
यदि रक्त में लसिकाणुओं का निर्माण बन्द हो जावे तो शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर-
रक्त में लसिकाणुओं का निर्माण बंद हो जाने पर शरीर में रोग प्रतिरोधकता (immunity) उत्पन्न होना बंद हो जायेगी। इसके साथ ही लसिकाणुओं द्वारा प्रतिविष (antitoxin) भी तैयार किया जाता है जो रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न विषैले पदार्थों को नष्ट करते हैं, जो अब नहीं होगा। शरीर रोगग्रस्त हो जायेगा। वसा का स्थानान्तरण बंद हो जायेगा।

प्रश्न 4.
हेवर्सियन तंत्र क्या है?
उत्तर-
हैवर्सियन तन्त्र (Haversion system)-स्तनधारी जन्तुओं में अस्थियों की संरचना अत्यधिक जटिल, दृढ़ व सघन होती है। अतः इनके मैट्रिक्स में, रक्त की आपूर्ति हेतु अनेक नलिकाएं निर्मित हो जाती हैं, जिन्हें हैवर्सियन नलिकायें कहा जाता है। ये हैवर्सियन नलिकायें। परस्पर अनेक आड़ी-तिरछी नलिकाओं द्वारा सम्बन्धित रहती हैं जिन्हें वोल्कमैन्स नलिकायें (Volkman’s Canals) कहते हैं। प्रत्येक हैवर्सियन नलिका 8-15 समकेन्द्रीय (परस्पर समानान्तर) लैमेली द्वारा घिरी रहती है । इस लैमेली में आस्टियोसाइट्स (Osteocytes) भी उपस्थित होती है। इस प्रकार निर्मित जटिल संरचना हैवर्सियन-तंत्र (Haversion System) कहलाती है।

प्रश्न 5.
हृदय पेशी ऊतक की संरचना को समझाइए।
उत्तर-
हृदय पेशी-ये पेशियाँ केवल पृष्ठवंशियों के हृदय की भित्ति (wall) पर पाई जाती हैं। हृदय पेशी तन्तु छोटे बेलनाकार एवं शाखित होते हैं। शाखित होने के कारण एक अन्तर संयोजी जाल बनाते हैं। इनके सार्कोप्लाज्म में एक केन्द्रक मध्य में पाया जाता है। इनमें अन्तर्विष्ट पट्ट (intercalated disc) पाये जाते हैं जिनके कारण यह छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित रहता है। प्रत्येक खण्ड में रेखित पेशी तन्तु के समान गहरी व हल्की पट्टियाँ पाई जाती हैं। इन पर इच्छा शक्ति का नियन्त्रण नहीं है। होता है, इस तह कार्य की दृष्टि से ये अनैच्छिक होती हैं।
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ये हृदय की पेशियाँ अपने आप चित्र : हृदय पेशियों बिना रुके एक लय से बराबर आकुंचन करती हैं तथा इसी को हृदय की गति या धड़कन कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्रवर्थों की संख्या के आधार पर न्यूरोन्स के प्रकार उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर-
प्रवर्षों के आधार पर तन्त्रिका कोशिका (न्यूरोन) तीन प्रकार के होते हैं
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  • एक ध्रुवीय (unipolar) तन्त्रिका कोशिका-इनमें केवल एक छोटा सा प्रवर्ध, ऐक्सान होता है। ऐसी कोशिकाएं अकशेरुकियों में तो काफी, लेकिन कशेरुकियों में केवल भ्रूण में होती हैं। कशेरुकियों में मेरु तन्त्रिकाओं के पृष्ठमूल गुच्छकों (dorsal root ganglia) में मिथ्या एक ध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ (Pseudo unipolar neurons) होती हैं। इनमें साइटोन अथवा सोमा से एक प्रवर्ध निकलकर शीघ्र दो प्रवर्धांएक डेन्ड्रोन वे एक ऐक्सॉन-में बंट जाता है। देखिए चित्र A
  • द्विधुवीय (Bipolar) तन्त्रिका कोशिकाएँ-इनमें विरोधी ध्रुवों पर स्थित एक ऐक्सॉन और एक डेन्ड्रोन होते हैं। देखिये चित्र B. ये नेत्रों की रेटिना, श्रवण अंगों का कॉक्लिया (cochlea) और घ्राण उपकला में होती हैं।
  • बहुध्रुवीय (multipolar) तन्त्रिका कोशिकाएँ-इनमें एक ऐक्सॉन तथा कई डेन्ड्रोन्स होते हैं। देखिये ऊपर चित्र C में कशेरुकियों में अधिकांश तन्त्रिका कोशिकाएं ऐसी ही होती हैं।

प्रश्न 7.
उपास्थिकोरक (chondrioblast) एवं उपास्थ्यणु (chondrocytes) के कार्य लिखिए।
उत्तर-

  • उपास्थिकोरक का कार्य-इसके द्वारा उपास्थ्यणु (chondrocyte) का निर्माण किया जाता है।
  • उपास्थ्यणु का कार्य-इनके द्वारा कॉन्ड्रिन प्रोटीन का स्रावण किया जाता है, जिसके कारण उपास्थि में लचीलापन एवं वृद्धि होती है।

प्रश्न 8.
रुधिर प्लाज्मा के प्रमुख अवयव एवं उनके कार्य लिखिए।
उत्तर-
रुधिर प्लाज्मा के प्रमुख अवयव एवं उनके कार्य निम्न हैं

अवयवमात्राप्रमुख कार्य
1. जल90-92%रुधिर दाब एवं आयतन का नियमन, परिवहन
2.कार्बनिक पदार्थ-ऐल्बुमिन
ग्लोबुलिन-α, β, γ
फाइब्रिनोजन
प्रोश्रोम्बिन
ग्लूकोस
ऐमीनो अम्ल
वसा, अम्ल, ग्लिसरॉल
हॉर्मोन, एन्जाइम
यूरिया, यूरिक अम्ल
4.5%
2.5%
0.3%
अल्प
0.1%
0.04%
0.5%
अल्प
0.04%
परासरण दाब उत्पन्न करना (विलेय विभव निर्माण)
α, β,-परिवहन, γ-ऐन्टीबॉडी निर्माण
रुधिर स्कंदन
रुधिर स्कंदन
पोषक पदार्थ, कोशिकीय ईंधन
पोषक पदार्थ
पोषक पदार्थ
नियामक पदार्थ एवं जैव उत्प्रेरक
अपशिष्ट पदार्थ
3. अकार्बनिक पदार्थ
Na+, K+, Ca2+, Mg2+,
Cl, HCO3 , HPO4,
SO42-, आदि आयन
0.9%विलेय विभव एवं pH नियमन
4. गैसें-O2, CO2, N2 श्वसन कार्यिकी के महत्त्वपूर्ण अवयव

प्रश्न 9.
लसीका किसे कहते हैं? यह किस प्रकार का ऊतक है?
उत्तर-
लसीका (Lymph)-रक्त के शिकाएँ (Blood capillaries) शरीर के प्रत्येक अंग तथा ऊतक तक नहीं पहुँच पाती हैं, सिर्फ प्लाज्मा और श्वेताणु रक्त कोशिकाओं की दीवार (जो एण्डोथिलियम स्तर से बनी होती है) में से छनकर ऊतक कोशिकाओं के बीच के स्थान में पहुँच जाते हैं, यही छना हुआ द्रव लसीका (Lymph) कहलाता है।

लसीका का संघटन रक्त प्लाज्मा के समान होता है किन्तु इसमें घुले हुए पदार्थों की सान्द्रता भिन्न होती है। इस तरल भाग में पोषक तत्व, अपशिष्ट पदार्थ, आयन्स, गैस एवं हारमोन्स आदि होते हैं। इन पदार्थों का आदान-प्रदान ऊतकों व अंगों की कोशिकाओं के मध्य लसीका के माध्यम से होता है। लसीका एक तरल संयोजी ऊतक है।

प्रश्न 10.
प्रत्यास्थ उपास्थि के लचीलेपन के कारण लिखिए।
उत्तर-
प्रत्यास्थ उपास्थि के लचीलेपन कारण है इसमें श्वेत कॉलेजन तन्तुओं की जगह पीले कॉलेजन तन्तु पाये जाते हैं जो कि लचीले होते है। इस कारण से प्रत्यास्थ उपास्थि लचीली होती है।

प्रश्न 11.
कैल्सिभूत उपास्थि की कठोरता का कारण लिखिए।
उत्तर-
कैल्सिभूत उपास्थि के मैट्रिक्स में कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3) के कण पाये जाते हैं जिसके कारण यह हड़ी के समान कठोर हो जाती है। मेंढक की अंसमेखला में सुप्रास्केपुला तथा श्रोणि मेखला में प्यूबिस इसी उपास्थि की बनी होती है।

प्रश्न 12.
उपकला ऊतक की प्रमुख विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-
उपकला ऊतक की प्रमुख विशेषताएं

  • इनका मूल कार्य शरीर एवं आन्तरांगों के लिए सुरक्षात्मक आवरणों के रूप में होता है। ये भीतर स्थिर ऊतकों की कोशाओं को चोट से, हानिकारक पदार्थों तथा जीवाणुओं आदि के दुष्प्रभाव से और सूख जाने से बचाती है।
  • शरीर एवं आन्तरांगों का अपने-अपने बाहरी वातावरण से पदार्थों का सारा लेन-देन इनके उपकला आवरणों के ही आर-पार होता है। अतः ये आवरण चयनात्मक (selective) होते हैं, आवश्यक पदार्थ ही इनके आर-पार आ-जा सकते हैं, अनावश्यक पदार्थ नहीं।
  • आहारनाल की दीवार की भीतरी सतह पर ये पोषक पदार्थों एवं जल के अवशोषण (absorption) का, श्वसनांगों में गैसीय विनिमय (gaseous exchange) का और उत्सर्जन अंगों में उत्सर्जन का कार्य करते हैं।
  • त्वचा पर संवेदांगों में संवेदना ग्रहण (Sensory reception) का कार्य करती है।
  • कई नालवत् अंगों (श्वास नालों, जनन वाहिनियों, मूल वाहिनियों आदि) में ये श्लेष्म (mucus) या अन्य तरल पदार्थों के संवहन में सहायता करती है।
  • इनमें पुनरुदभवन (regeneration) की बहुत क्षमता होती है। अतः क्षत ऊतकों पर शीघ्रगतापूर्वक पुनरुत्पादित होकर ये घावों के भरने में सहायता करती हैं।

प्रश्न 13.
तंत्रिका कोशिका का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 14.
पेशी ऊतक के कार्य लिखिए।
उत्तर-
पेशी ऊतक के कार्य-

  • जन्तुओं में गमन तथा अंगों की गति प्रदान करना।
  • पेशियों के द्वारा रासायनिक ऊर्जा को यान्त्रिक ऊर्जा में बदला जाता है।
  • पेशियां गमन के अतिरिक्त निम्न कार्य से सम्बन्धित हैं; जैसे-संवातन (breathing), क्रमानुकुंचन (peristalsis) परिवहन, उत्सर्जन जनन आदि ।

प्रश्न 15.
रेखित व अरेखित पेशी में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
रेखित व अरेखित पेशी में अन्तर
(Difference between Striated & Unstriated Muscle)

रेखित पेशियाँ (Striped muscles)अरेखित पेशियाँ (Unstriped muscles)
1. इनकी कोशिकाएँ बेलनकार होती हैं तथा पेशीचोल नामक झिल्ली से स्तरित होती हैं।इनकी कोशिकाएँ तरूप, लम्बी व संकरी होती हैं।
2. रेखित पेशी कोशिका बहु-केन्द्रिकी होती हैं।अरेखित पेशी कोशिका में केवल एक केन्द्रक मध्य में स्थित होता है।
3. इनमें गहरी व हल्की पट्टियाँ एकान्तर क्रम में व्यवस्थित होती हैं।इनमें पेशी तन्तुक (Myofibrils) होते हैं।
4. ये जन्तु की इच्छा से सिकुड़ती व फैलती हैं, अतः ये ऐच्छिक होती हैं।ये स्वतः ही सिकुड़ती एवं फैलती हैं, अतः ये अनैच्छिक होती हैं।
5. ये अस्थियों से जुड़ी रहती हैं, अतः इन्हें कंकाल पेशी भी कहते हैं।ये पेशियाँ आन्तरांगों में पायी जाती हैं।
6. क्रियाशील रहने पर इनमें थकान का अनुभव होता है, अतः आराम आवश्यक है।क्रियाशील रहने पर भी इनमें थकान का अनुभव नहीं होता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 33 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बहुधुवीय मज्जावृत तंत्रिका कोशिकाएँ शरीर में कहाँ पाई जाती हैं? इनकी संरचना को आरेख चित्र द्वारा समझाइये।
उत्तर-
तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)-
तंत्रिका ऊतक तंत्रिका कोशिका (न्यूरोन) व ग्लियल कोशिकाओं से बना होता है। न्यूरोन तंत्रिका तन्त्र की इकाई है।

तन्त्रिका कोशिका अथवा न्यूरोन की संरचना (Structure of nerve cell or neuron), सोमा (Soma) अथवा कोशिकाय –
यह कोशिका का प्रमुख भाग होता है जिसमें एक केन्द्रक तथा कोशिका द्रव्य पाया जाता है। केन्द्रक में एक स्पष्ट केन्द्रिका (nucleolus) होती है। जबकि कोशिका द्रव्य में निस्सल कणिकाएँ (nissles granules) एवं न्यूरोफाइब्रिल्स (neurofibrils) नामक सूक्ष्म तन्तु पाये जाते हैं। सोमा से दो प्रकार के प्रवर्ध निकलते हैं जिन्हें क्रमशः द्रुमिकाएँ (dendrites) एवं तन्त्रिकाक्ष (axon) कहते हैं ।

द्रुमिकाएँ (Dendrites)-
ये छोटे शाखित प्रवर्ध होते हैं। इनमें संदेश सोमा (soma) की ओर चलता है।

तन्त्रिकक्ष (Axon)-
यह एक बड़ा प्रवर्ध होता है जो सोमा से निकलता है। तन्त्रिकाक्ष (axon) में संदेश सोमा से दूर चलते हैं।
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तन्त्रिकाक्ष अपने अधिकांश भाग में एक श्वेत अकोशिकीय मोटे आवरण द्वारा आवरित रहते हैं। इस आवरण को मज्जा आच्छद (medullary sheath) कहते हैं। यह श्वान कोशिकाओं (Schwann cells) द्वारा निर्मित होता है जो मज्जा आच्छद के भीतर की ओर उपस्थित होती है। मज्जा आच्छद के बाहर की ओर तन्त्रिकाछद (neurolemma) नामक आवरण पाया जाता है। मज्जा आच्छद में स्थान-स्थान पर संकीर्णन (constrictions) पाये जाते हैं जिन्हें रेन्वीयर की पर्व सन्धियाँ (nodes of Ranvier) कहते हैं। दो पर्व सन्धियों के बीच वाले भाग को पर्व (Node) कहते हैं । तन्त्रिकाक्ष (axon) से कहीं-कहीं पर पाश्र्व शाखाएँ। उत्पन्न होती हैं। इन्हें संपाश्विक तन्तु (Collateral fibres) कहते हैं। अपने दूरस्थ सिरे पर तन्त्रिकाक्ष शाखित हो जाता है तथा प्रत्येक शाखा के अन्तिम सिरे पर बटन (terminal button) पाये जाते हैं।

ग्लियल कोशिकाएं (Glial cells)-
ये कोशिकाएँ सामान्यतः मस्तिष्क मेरुरज्जु व गैग्लिया में पाई जाने वाली आलम्बी (supporting) संकुलनकारी (packing) अतंत्रिकीय (non nervous) कोशिकाएं होती हैं। इनकी संख्या न्यूरॉन्स की अपेक्षा दस गुना अधिक होती है। ये कोशिकाएँ तंत्रिका ऊतक के पोषण व उत्सर्जन में सहायक होती हैं। तंत्रिका प्रवर्थों की संख्या के आधार पर न्यूरॉन्स तीन प्रकार के होते हैं
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  • एक ध्रुवीय (Uni polar)-इन कोशिकाओं क सतह से केवल एक ही प्रवर्ध निकला रहता हैं। यह तन्त्रिकाक्ष होता है। इस प्रकार एक ध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाओं में द्रुमाश्म का अभाव होता है। ये भ्रूण की तन्त्रिका में पायी जाती हैं।
  • द्विध्रुवीय (Bipolar)-तंत्रिका कोशिकाओं पर दो प्रवर्ध होते हैं। इनमें से एक द्रुमाश्म एवं एक तंत्रिकाक्ष होता है। दृष्टिपटल में इस तरह की तंत्रिका कोशिकाएँ पायी जाती हैं।
  • बहुधुवीय (Multi polar)-तंत्रिका कोशिकाओं पर अनेक प्रवर्ध होते हैं। इनमें से एक लम्बा तंत्रिकाक्ष तथा शेष सभी दुमाश्म होते हैं। ये कोशिकाएँ मस्तिष्क एवं तन्त्रिको रज्जु में पायी जाती हैं।
    तन्त्रिका कोशिकाएँ अन्य की तरह एक-दूसरे से चिपकी हुई नहीं रहती हैं। इनके बीच संयोजी ऊतक तन्त्रिबंध (Neuroglia) होता है। जिनके द्वारा आपस में बंधी रहती हैं। दो तन्त्रिका कोशिकाओं के प्रवर्षों के बीच क्रियात्मक सम्बन्ध होते हैं, इन स्थानों को सिनेप्स (Synapse) कहते हैं।

कार्य-

  • यह ऊतक प्रेरणाओं (impulses) का संवहन करता है जिससे उपवाहक अंग (effector organs) प्रतिक्रिया करते हैं।
  • यह ऊतक शरीर के विभिन्न अंगों के मध्य पारस्परिक समन्वयन (coordination) स्थापित करता है।

प्रश्न 2.
स्तनधारियों के रक्ताणुओं व श्वेताणुओं के प्रकार एवं उनके कार्य का वर्णन कीजिये।
उत्तर-
तरल संयोजी ऊतक (Fluid connective tissue)-
रुधिर व लसिका तरल संयोजी ऊतक है। यह शरीर का लगभग आठ प्रतिशत भाग बनाते हैं । इस ऊतक में मैट्रिक्स (Matrix) प्लाज्मा के रूप में होता है, जिसमें तन्तुओं का अभाव होता है। यह ऊतक शरीर में निरन्तर परिभ्रमण करता हुआ एक भाग को दूसरे भाग से सम्बन्धित रखता है।

रुधिर (Blood)-
रुधिर एक परिसंचारी (circulating) तरल ऊतक (Liquid tissue) है जो रुधिर वाहिनियों एवं हृदय में होकर पूर्ण शरीर में निरन्तर परिक्रमा करके पदार्थों का स्थानान्तरण करता रहता है। सामान्य वयस्क मनुष्य में लगभग 5.0 लीटर रुधिर पाया जाता है जो शारीरिक भार का लगभग 7 से 8.0 प्रतिशत भाग बनाता है। यह पानी से लगभग 5 गुणा अधिक विस्कासी (viscous) होता है। रुधिर क्षारीय माध्यम का होता है। तथा इसका pH 7.4 होता है। यह स्वाद में नमकीन (salty) होता है।

रुधिर के द्रव भाग को प्लाज्मा (plasma) कहते हैं । यह सम्पूर्ण रुधिर का लगभग 55 प्रतिशत है और शेष भाग 45 प्रतिशत रक्त रक्ताणुओं (Blood Corpusucles) के रूप में होता है।

(अ) प्लाज्मा (Plasma)
यह रुधिर का हल्के पीले रंग का स्वच्छ एवं निर्जीव तरल (ground fluid) होता है तथा रुधिर का 55 प्रतिशत भाग बनाता है। इसमें 9092 प्रतिशत जल, 6-8 प्रतिशत प्रोटीन्स, 0.9 प्रतिशत लवण एवं 0.1 प्रतिशत ग्लूकोज होता है। प्लाज्मा के प्रमुख अवयव एवं उनके कार्यों का विवरण निम्न प्रकार से है

(ब) रुधिर कणिकाएं (Blood Corpusles)
ये तीन प्रकार की होती हैं-
लाल रुधिर कोशिकाएँ (Red blood cells), श्वेत रुधिर कोशिकाएँ (White blood cells) तथा रुधिर पट्टिकाणु (Blood Platelets) को संयुक्त रूप से संगठित पदार्थ (Formed Elements) कहते हैं। ये रुधिर का 45 प्रतिशत भाग बनाते हैं ।

(A) लाल रुधिर कोशिकाएँ (RBC)-
इन्हें इरिथ्रोसाइट्स (Erythrocytes) भी कहते हैं। इनकी संख्या बहुत अधिक होती है। कुल रुधिर कणिकाओं में से लगभग 99 प्रतिशत होती हैं। इनका व्यास 7 से 8 µ तथा मोटाई लगभग 2 µm होती है। ये आकार में वृत्ताकार, डिस्कीरूपी, उभयावतल (Biconcave) एवं केन्द्रक रहित होती हैं। इनमें केन्द्रक के अतिरिक्त माइटोकॉण्डूिया, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका एवं गॉल्जीकॉय आदि का अभाव होता है। वयस्क पुरुष में 50-55 लाख प्रति घन मिमी. और महिला में लगभग 45 लाख प्रति घन मिमी. होती हैं। केन्द्रक की अनुपस्थिति के कारण इनमें हीमोग्लोबिन (haemoglobin) अधिक पाया जाता है। यह कणिकाओं के कोशिकाद्रव्य में पाया जाता है एवं श्वसन वर्णक (respiratory pigment) का कार्य करता है। हीमोग्लोबिन की प्रोटीन ग्लोबिन (globin) होती है जो हीम (haem) नामक लाल रंगा पदार्थ से जुड़ी रहती है। रुधिर का लाल रंग हीम के कारण ही होता है।
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हीमोग्लोबिन का प्रत्येक अणु ग्लोबिन की चार पॉलिपेप्पटाइड श्रृंखलाओं तथा फेरस (Fe+2) आयन युक्त हीम के चार अणुओं से मिलकर बनता है। हीमोग्लोबिन, ऑक्सीजन से संयोग करके ऑक्सी हीमोग्लोबिन नामक यौगिक बनाता है। इनका संयोग ऑक्सीजन के आंशिक दाब पर निर्भर करता है। इनमें कार्बोनिक एनहाइड्रेस भी काफी मात्रा में पाया जाता है। एक स्वस्थ मनुष्य में हीमोग्लोबिन की मात्रा औसतन 12 से 16 ग्राम प्रति 100 मिलिलीटर होती है।

इरिथ्रोसाइटस के निर्माण की प्रक्रिया को इरिथ्रोपोइसिस (Erythropoiesis) या हीमोपोइसिस (Haemopoiesis) कहते हैं। भ्रूणावस्था में इरिथ्रोसाइटस का निर्माण यकृत, प्लीहा, थाइमस आदि अंगों में होता है लेकिन वयस्क अवस्था में इनको निर्माण लाल अस्थि मज्जा (red bone marrow) (लम्बी अस्थियाँ जैसे फीमर, उरोस्थि, कपालीय अस्थियाँ आदि) में होता है ।।

इरिथ्रोसाइटस का जीवनकाल 120 दिन का होता है। नष्ट हुई । लाल रुधिर कणिकाओं को विघटन प्लीहा एवं यकृत में किया जाता है। इसलिए प्लीहा को रक्त कणिकाओं का कब्रिस्तान (Graveyard of RBCs) कहते हैं । हीमोग्लोबिन के प्रोटीन भाग (ग्लोबिन) को एमीनो अम्लों में तोड़ा जाता है। हीम समूह के लोह युक्त को यकृत में संग्रहित कर लिया जाता है तथा शेष भाग को बिलिरुबिन (Bilirubin) एवं बिलिवर्डिन (Billiverdin) नाम के पीत वर्णकों में परिवर्तित कर उत्सर्जित कर दिया जाता है।

(B) श्वेत रुधिर कोशिकाएँ (White blood cells)-
इन्हें ल्यूकोसाइट (Leucocytes) भी कहते हैं। इनमें हीमोग्लोबिन के अभाव के कारण तथा रंगहीन होने से इन्हें श्वेत रुधिर कोशिकाएँ कहते हैं। ये लाल रुधिर कोशिकाओं की अपेक्षा बड़ी अनियमित (irregular) एवं परिवर्तनशील आकार (changeable shape) के परन्तु संख्या में बहुत कम, औसतन इनकी संख्या लगभग 7000-8000 प्रति घन मिमी. होती है। इनमें केन्द्रक पाया जाता है। केन्द्रक की उपस्थिति के कारण इन्हें वास्तविक कोशिकाएँ (True cells) कहते हैं।

अन्य कोशिकाओं के समान इनमें माइटोकॉन्ड्रिया एवं गॉल्जीकाय पाये जाते हैं। इनका आकार लगभग 8 से 15 µ होता है। इनका जीवनकाल 4-5 दिनों से कई दिनों तक हो सकता है। अमीबीय गति इनको विशेष लक्षण होता है।

(I) कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes)-
इनके कोशिकाद्रव्य में विशिष्ट अभिरंजक ग्रहण करने वाली अनेक कणिकाएँ पाई जाती हैं। इसलिए इन्हें कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes) कहते हैं। इनका आकार गोल परन्तु सक्रिय रूप से अमीबॉय (Amoeboid) होती है। इनका केन्द्रक 2-5 परस्पर जुड़े हुए पिण्डों (lobes) में बंटा और असममित (Asymmetrical) होता है। इसी कारण से इन्हें पॉली मार्कोन्यूक्लिअर रक्त कणिकाएँ कहते हैं।

इनका औसतन आकार 10 से 12 µ होता है। कुल श्वेताणुओं की संख्या का लगभग 65 प्रतिशत ये कोशिकाएँ होती हैं। इन कोशिकाओं का निर्माण RBC की भाँति लाल अस्थि मज्जा (red bone marrow) की मज्जाकोरक या माइलोब्लास्ट (myeloblasts) या रेटिकुलर कोशिकाओं (reticular cells) से होता है।

इन कोशिकाओं को अभिरंजक (Stain) के प्रति धनात्मक सक्रियता के आधार पर तीन प्रकार की होती है –

  • इओसिनोफिल्स (Eosinophils)-
    इनके कोशिका द्रव्य में अम्लीय अभिरंजक (Acidic Dye) जैसे इओसिन (Eosin) ग्रहण करने वाले कण पाये जाते हैं। मनुष्य के रक्त में 1-4% इओसिनोफिल्स पाये जाते हैं। इनका व्यास लगभग 10-15 µ होता है। इनका केन्द्रक दो | स्पष्ट पिण्डों (lobes) में बंटा होता है जो एक महीन सूत्र या तन्तु द्वारा जुड़े रहते हैं ।
    इनका औसत जीवनकाल (average life span) लगभग 8-12 दिन होता है। ये संक्रमण से बचाव करती हैं एवं एलर्जी (allergy) प्रतिक्रिया आदि में महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं।
  • बेसोफिल्स (Basophils)-
    मनुष्य में इनकी संख्या लगभग 0.5-1 प्रतिशत होती है। इनका व्यास भी लगभग 10-15 µ में होता है। इनका केन्द्रक बड़ा वृक्काकार (Kidney shaped) या ‘S’ आकार का तथा 2-3 पिण्डों का बना होता है। इनके कोशिकाद्रव्य में कणिकाएँ। बड़ी किन्तु संख्या में कम होती हैं जो क्षारीय प्रकृति की होती हैं। ये क्षारीय अभिरंजक (Basic stain) जैसे मैथाइलीन ब्लू (Methylene Blue), हिमेटॉक्सलिन को ग्रहण करती हैं। ये हिस्टामिन, सिरोटोनिन एवं हिपेरिन उत्पन्न करती हैं। इनका औसत जीवनकाल 12 से 15 दिन होता है।
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  • न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils)-
    कणिकामय श्वेत रुधिराणुओं में इनकी संख्या सबसे अधिक होती है। इनका प्रतिशत 60-70 होता है। प्रति घन मिमी. रुधिर में 4000 से 5000 होती हैं। इनका व्यास 12-15 µ होता है। इनकी कणिकाएँ छोटी एवं संख्या में अधिक होती हैं, ये । उदासीन अभिरंजक (Neutral stain) द्वारा अभिरंजित की जाती हैं। इनका केन्द्रक 3 से 7 पिण्डों का बना होता है जो एक सूत्र द्वारा जुड़े रहते हैं। इस कारण इन्हें पॉलिमारफोन्यूक्लिअर ल्यूकोसाइटस (Polymorphonuclear leucocytes) भी कहते हैं।

महिलाओं में कुछ न्यूट्रोफिल्स के केन्द्रक से एक सूक्ष्म गोल सा पिण्ड जुड़ा रहता है, जिसे ड्रम स्टिक (Drum stick) कहते हैं। यह बार काय (Bar body) की भाँति, एक X क्रोमोसोम के रूपान्तरण के फलस्वरूप बनता है।

ये सबसे सक्रिय श्वेत रुधिराणु हैं। ये कोशिका पारण (diapedesis) की क्रिया द्वारा केशिकाओं (Capillaries) से बाहर निकलकर अमीबीय गति (amoeboid movement) प्रदर्शित करती हैं। ये कोशिकाएँ हानिकारक बाहरी पदार्थों एवं जीवाणुओं (Bacteria) का भक्षण (Phagocytosis) करती हैं। इनको जीवनकाल 2 से 4 दिन होता है ।

(II) कणिकाविहीन श्वेतरक्ताणु (Agranulocytes)-
इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाओं का अभाव होता है। इनमें सिर्फ एक केन्द्रक होता है जो गोल या वृक्काकार (Kidney Shaped) होता है। एक केन्द्रक होने के कारण इन्हें मोनोन्यूक्लिअर ल्यूकोसाइट (Mononuclear leucocytes) कहते हैं। ये सम्पूर्ण ल्यूकोसाइट का लगभग 25 से 30 प्रतिशत भाग बनाती हैं। इनका निर्माण थाइमस (Thymus), प्लीहा (Spleen) एवं लसिका गांठों (Lymph nodes) में होता है। इनका औसतन आकार 8-20 um होता है।

केन्द्रक की स्थिति एवं आकार के आधार पर ये निम्न दो प्रकार की होती हैं-

  • लिम्फोसाइटस (Lymphocytes)-
    ये समस्त ल्यूकोसाइटस का लगभग 20 से 25 प्रतिशत भाग बनाती हैं। इनका आकार 8 से 16 µ होता है। इनका केन्द्रक बड़ा गोल या एक तरफ से पिचका हुआ होता है जो केन्द्र में स्थित होता है। कोशिका द्रव्य बहुत कम होता है। ये अन्य ल्यूकोसाइटस से कम भ्रमणशील होती हैं।
    ये थायमस ग्रन्थि एवं लसीका ऊतकों में ऐसी कोशिकाओं से उत्पन्न की जाती हैं जिनका उद्भव अस्थि मज्जा से होता है। इनका जीवनकाल 2 से 100 दिनों तक या अधिक हो सकता है।
    लिम्फोसाइटस दो प्रकार की होती हैं-
    (i) B-लिम्फोसाइटस
    (ii) T-लिम्फोसाइटस।।
    इनको प्रमुख कार्य बीटा (Beta) एवं गामा (Gama) ग्लोब्यूलिन (Globulins) का निर्माण करना होता है। गामा ग्लोब्यूलिन से एण्टीबॉडी (antibodies) का निर्माण होता है, जिससे शरीर में रोग प्रतिरोधकता (immunity) उत्पन्न होती है। लिम्फोसाइटस द्वारा प्रतिविष (antitoxins) भी उत्पन्न किये जाते हैं। प्रतिविष रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न विषैले पदार्थ को नष्ट करते हैं। ये वसा के स्थानान्तरण में मदद करते हैं।
  • मोनोसाइटस (Monocytes)-ये संख्या में 4 से 10 प्रतिशत, परन्तु इनका पृरिमाण लगभग 15 से 20 µ (सबसे बड़ा) होता है। इनका केन्द्रक बड़ा अंडाकार, वृक्काकार या वृत्ताकार होता है तथा परिधि की ओर (Eccentric) स्थित होता है। कोशिकाद्रव्य लिम्फोसाइटस की तुलना में अधिक होता है। ये न्यूट्रोफिल्स की तरह शरीर में प्रवेश करने वाले सूक्ष्म जीवों का अन्तःग्रहण (ingestion) कर भक्षण (phagocytosis) करती हैं।

ये मृत कोशिकाओं के निस्तारण का भी कार्य करते हैं और अपमार्जक (scavangers) या मेहत्तर कहलाते हैं। इन्हें घुमक्कड़ कोशिकाएँ कहते हैं। प्रतिघन मिमी. रुधिर में इनकी संख्या 200-700 तक होती है।

(C) रुधिर प्लेटलेट्स (Blood platelets)-
ये बहुत ही छोटे (व्यास 2-4 µm) होते हैं। इनका निर्माण लाल अस्थि मज्जा (red bone marrow) में पाई जाने वाली महाकेन्द्रक कोशिकाएँ या मेगा कैरिओसाइटस (mega karyocytes) से कलियों के रूप में बनकर इससे पृथक् हुए टुकड़ों के रूप में होता है। इनकी आकृति अनियमित होती है एवं केन्द्रक का अभाव होता है। इनकी संख्या लगभग 1.5 से 3.5 लाख प्रति घन मिमी. तथा जीवनकाल 5-7 दिन होता है।

स्तनधारियों के अतिरिक्त सभी कशेरुकियों में प्लेटलेट्स के स्थान पर त कोशिकाएँ (Spindle cells) या थोम्बोसाइट (Thrombocytes) पाई जाती हैं। इनकी औसत संख्या में कमी होने की अवस्था को थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (Thrombocytopenia) कहते हैं।

घाव पर फटी हुई रुधिर वाहिनियों से जब ये बाहर निकलकर । हवा के सम्पर्क में आती हैं, तो ये स्वयं टूटकर निम्न कार्यों में मदद करती हैं ।

ये रक्त के स्कन्दन (clotting) में सहायता करती हैं जिससे रक्त वाहिनियों के कटे भाग से रक्त स्राव बन्द हो जाता है।

लसीका (Lymph)-
लसीका को RBCs रहित किन्तु WBCs की अधिकता के रूप में निरूपित किया जा सकता है। लसीका मुख्यतः प्लाज्मा तथा ल्यूकोसाइटस | से मिलकर बना होता है। लसीका के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान अंतराली अवकाश होता है। अंतराली द्रव अन्तराकोशिकीय द्रव, ऊतक द्रव तथा लसीका सभी संघटन में समान होते हैं। रुधिर एवं ऊतक द्रव्य के मध्य पदार्थों का आदान-प्रदान रुधिर कोशिकाओं के द्वारा होता है।
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प्रश्न 3.
स्तनधारियों की अस्थि के अनुप्रस्थ काट का सचित्र वर्णन कीजिये।
उत्तर-
अस्थि (Bone)-
अस्थि की संरचना (Structure of the bone)-अस्थि की संरचना का अध्ययन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जाता है

(1) पेरिआस्टियम (Periosteum)-
यह अस्थि का बाह्य दृढ़ आवरण है जो संयोजी ऊतक का बना होता है। पेरिआस्टियम में दो परतें पायी जाती हैं

  • बाह्य परत (Outer Layer)-इस परत में रक्त लिम्फ वाहिकायें, तन्त्रिकाएं तथा कुछ वसीय कोशिकाएँ विद्यमान होती हैं।
  • आन्तरिक परत (Inner Layer)-यह आस्टियोब्लास्ट्स या अस्थि कोरक कोशिकाओं (osteoblast) की इकहरी परत होती है। ये कोशिकायें ओसीन (Osin) नामक प्रोटीन का स्रावण करके अस्थि (मैट्रिक्स) की वृद्धि करती है।

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(2) एण्डोआस्टियम (Endosteum)-
यह आस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं की इकहरी परत से बना पतला (पेरिआस्टियम की अपेक्षा पतला) स्तर है जो मज्जा-गुहा (Marrow Cavity) का आवरण बनाता है। एण्डोआस्टियम की आस्टियोब्लास्ट्स भी पेरिआस्टियम की भांति ऑस्टियोब्लास्टस की भॉति ऑसीन का स्रावण करके मैट्रिक्स (अस्थि) की वृद्धि करती है। इस प्रकार अस्थि में दोहरी वृद्धि (बाहर एवं अन्दर दोनों ओर से) होती है। एण्डोआस्टियम के अन्दर मज्जा गुहा स्थित रहती है।

(3) मैट्रिक्स (Matrix)-
अस्थि का मैट्रिक्स पेरिऑस्टियम व एण्डोऑस्टियम के मध्य स्थित होता है तथा ओसिन से निर्मित होता है। पेरिऑस्टियम की ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकायें, अस्थि के मैट्रिक्स की अन्दर की ओर वृद्धि करती हैं जबकि एन्डोऑस्टियम की आस्टियोब्लास्ट कोशिकायें अस्थि के मैट्रिक्स की बाहर की ओर वृद्धि करती हैं। इस प्रकार अस्थि में दोहरी (द्विदिशीय) वृद्धि होती है। मैट्रिक्स में ओसीन की गोलीय, समकेन्द्रीय समानान्तर धारियाँ उपस्थित होती हैं जिन्हें लैमेली या पटलिकाएं (larmellae) कहा जाता है। लैमिली के मध्य में अनेक पंक्तिबद्ध ‘लैक्युनी’ (Lacunae) विद्यमान होती है, जो परस्पर केनालीक्यूली द्वारा सम्बन्धित रहती हैं। प्रत्येक लैक्युनी में एक शाखित, चपटी कोशिका उपस्थित होती है जिसे आस्टियोसाइट (Osteocyte) या अस्थि कोशिका कहते हैं।

मैट्रिक्स में हैवर्सियन तन्त्र (Haversion system in matrix)-
स्तनधारी जन्तुओं में अस्थियों की संरचना अत्यधिक जटिल, दृढ़ व सघन होती है। अतः इनके मैट्रिक्स में, रक्त की आपूर्ति हेतु अनेक नलिकाएं निर्मित हो जाती हैं, जिन्हें हैवर्सियन नलिकायें कहा जाता है। ये हैवर्सियन नलिकायें परस्पर अनेक आड़ी-तिरछी नलिकाओं द्वारा सम्बन्धित रहती हैं। जिन्हें वोल्कमैन्स नलिकायें (Volkman’s Canals) कहते हैं। प्रत्येक हैवर्सियन नलिका 8-15 समकेन्द्रीय (परस्पर समानान्तर) लैमेली द्वारा घिरी रहती है। इस लैमेली में आस्टियोसाइट्स (Osteocytes) भी उपस्थित होती है। इस प्रकार निर्मित जटिल संरचना हैवर्सियन-तंत्र (Haversion System) कहलाती है।
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(4) मज्जा गुहा (Marrow cavity)-
एण्डोआस्टियम के अन्दर मज्जा गुहा (Marrow Cavity) उपस्थित होती है। इसमें पाये जाने वाला अर्ध-ठोस, कोमल, वसामय (एडिपोज) ऊतक अस्थि मज्जा (Bone Marrow) कहलाता है। इसमें अनेक वसीय कोशिकायें (Fat Cells) रक्त वाहिकायें एवं तन्त्रिकायें विद्यमान होती हैं। अस्थि मज्जा दो प्रकार का होता है

  • पीला अस्थि मज्जा (Yellow bone marrow)-अस्थि मज्जा गुहा के अधिकांश मध्य भाग में अस्थि-मज्जा का रंग पीला होता है अतः इसे पीला अस्थि मज्जा कहते हैं । यह वसा का संचय करती है।
  • लाल अस्थि मज्जा (Red bone marrow)-अस्थि मज्जा गुहा के दोनों सिरों के क्षेत्र में अस्थि-मज्जा का रंग लाल होता है क्योंकि लाल अस्थि मज्जा (मानव) में ‘एरिथ्रोब्लास्ट्स’ कोशिकायें पाई जाती हैं जो लाल रक्त कणिकाओं (RBC) का उत्पादन करती हैं।

अस्थियों के प्रकार (Types of Bones)-संरचना के आधार पर अस्थियां दो प्रकार की होती हैं-

  • स्पंजी अस्थि
  • ठोस या संहत अस्थि

प्रश्न 4.
पिशितांश या सार्कोमियर क्या है? रेखित पेशी कोशिका की संरचना को आरेख चित्र द्वारा समझाइये।
उत्तर-
पेशी ऊतक (Muscular tissue)-
उच्च स्तरीय प्राणियों में गमन तथा विभिन्न अंगों की गति के लिए पेशी ऊतक पाये जाते हैं जिनमें संकुचन (contraction) की क्षमता होती है। पेशी ऊतक पेशी कोशिकाओं द्वारा निर्मित होता है। पेशी कोशिकाएँ लम्बी-पतली होती हैं, इसलिए इन्हें पेशी तन्तु (muscle fibre) भी कहा जाता है। पेशी तन्तु के अन्दर अनेक पेशी तन्तुक (myofibrils) पाये जाते हैं। पेशियों में संकुचनशीलता एवं उत्तेजनशीलता का गुण होने के कारण ये गति एवं चलन में महत्त्वपूर्ण हैं।

गमन के अलावा पेशियाँ पाचन (digestion), श्वसन (respiration), परिवहन (circulation), उत्सर्जन (excretion) एवं जनन (reproduction) आदि क्रियाओं में भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करती हैं।
पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं

(1) रेखित पेशियाँ (Striated muscles)-
इन्हें कंकाली पेशियाँ (skeletal muscles) भी कहते हैं क्योंकि अस्थियों से जुड़ी रहती हैं। प्रत्येक रेखित पेशी कोशिका एक बहुकेन्द्रकी बेलनाकार कोशिका होती है। जिसकी कोशिका कला को सार्कोलेमा (sarcolemma) एवं कोशिका द्रव्य को पेशी द्रव्य (sarcoplasm) कहते हैं। पेशी द्रव्य में अनेक अत्यन्त सूक्ष्म पेशी तन्तुक (myofibrils) एक-दूसरे के समानान्तर दिशा में संयोजी ऊतक झिल्ली के द्वारा पूलों (bundles) में जुड़े रहते हैं। पेशी तन्तुओं के इन पुलों को फैसिकुलाई (Faciculi) तथा इनको बाँधने वाली झिल्ली को एपिमाइसियम कहते हैं। मोटी पेशियों में बहुत सारे फैसिकुलाई एक झिल्ली द्वारा जुड़े रहते हैं। इस झिल्ली को पेरिमाइसियम कहते हैं। प्रत्येक पेशी तन्तु के बाहर संयोजी ऊतक होता है जिनमें तन्त्रिकाएँ व लसीका कोशिकाएँ फैली रहती हैं। ऊतक के इस भाग को एन्डोमाइसियम कहते हैं।

प्रत्येक पेशी तन्तु में गहरी व हल्की पट्टियों के संपात (coincidence) के कारण कंकाली पेशियों के तन्तु रेखित दिखाई देते हैं।
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गहरी पट्टियों को A पट्टियाँ (Anisotropic band) व हल्की पट्टियों को I पट्टियाँ (Isotropic band) कहते हैं। प्रत्येक I पट्टी के मध्य भाग में एक गहरी Z पट्टी (Z-line or Z wiss chenscheibe line) कहते हैं । यह धारी I पट्टी को दो समान भागों में बाँट देती है। Z पट्टी को क्राउसे झिल्ली (Karuse’s membrane) भी कहते हैं।

गहरी पट्टियों को A पट्टियाँ (A-band) कहते हैं। A पट्टियों के बीच तुलनात्मक रूप से एक कम गहरा क्षेत्र पाया जाता है जिसे H बैण्ड (Henson’s line or disc) कहते हैं। इसी प्रकार दो Z पट्टी (Z-line) के बीच पाई जाने वाली संरचनात्मक इकाई को सारकोमियर (Sarcomerce) कहते हैं। इस प्रकार प्रत्येक पेशी तन्तुक में अनेक सार्कोमिअर्स होते हैं जो एक रेखीय क्रम में व्यवस्थित रहते हैं।

प्रत्येक सार्कोमिअर में मायोसिन (myosin) एवं एक्टिन (actin) नामक प्रोटिन्स द्वारा निर्मित दो प्रकार के सूत्रों (filaments) की विशिष्ट व्यवस्था होती है।

रेखित पेशियों का संकुचन तीव्र होता है, परन्तु संकुचन प्राणी की इच्छा द्वारा नियन्त्रित होता है। इसलिए इन पेशियों को ऐच्छिक पेशियाँ (voluntar muscles) भी कहते हैं।

(2) चिकनी पेशियाँ (Smooth muscles)-
इन्हें अरेखित पेशियाँ भी कहते हैं। इस ऊतक की पेशी तन्तु सामान्यतः अलग-अलग रहती है। परन्तु कुछ में यह समूह में भी होती है। ये समूह योजी ऊतकों के द्वारा बंधे रहते हैं। प्रत्येक तन्तु एक पेशी कोशिका होती है। यह लम्बी तर्क के आकार (spindle shape) की होती है। इसके चारों ओर प्लाज्मा झिल्ली का आवरण होता है। इसे सार्कोलेमा (sarcolemma), कहते हैं। कोशिका में भरे हुए कोशिका द्रव्य को सार्कोप्लाज्म (Sarcoplasm) कहते हैं। इसमें एक बड़ा एवं स्पष्ट केन्द्रक पाया जाता है। सार्कोप्लाज्म में अनेक पेशी तन्तु (myofibril) पूरी लम्बाई में समानान्तर फैले रहते हैं।
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पेशियों में संकुचन धीमी गति से लम्बे समय तक होता है। इन पर जन्तु की इच्छा का नियन्त्रण नहीं होने से इसे अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscles) भी कहते हैं। इस प्रकार पेशियाँ शरीर के आन्तरिक अंगों में पाये जाने के कारण इन पेशियों को अन्तरांगीय पेशी (visceral muscles) भी कहा जाता है।

ये पेशियाँ मूत्राशय, श्वासनली, मूत्रवाहिनियाँ, रुधिर वाहिनियाँ एवं आन्त्र में पायी जाती हैं।

(3) हृदय पेशियाँ (Cardiac muscles)-
ये पेशियाँ केवल पृष्ठवंशियों के हृदय की भित्ति (wall) पर पाई जाती हैं । हृदय पेशी तन्तु छोटे बेलनाकार एवं शाखित होते हैं । शाखित होने के कारण एक अन्तर संयोजी जाल बनाते हैं। इनके सार्कोप्लाज्म में एक केन्द्रक मध्य में पाया जाता है। इनमें अन्तर्विष्ट पट्ट (intercalated disc) पाये जाते हैं जिनके कारण यह छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित रहता है। प्रत्येक खण्ड में रेखित पेशी तन्तु के समान गहरी व हल्की पट्टियाँ पाई जाती हैं। इन पर इच्छा शक्ति का नियन्त्रण नहीं होता है, इस तरह कार्य की दृष्टि से ये अनैच्छिक होती हैं।
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ये हृदय की पेशियाँ अपने आप बिना रुके एक लय से बराबर आकुंचन करती हैं तथा इसी को हृदय की गति या धड़कन कहते हैं।

प्रश्न 5.
उपास्थि कितने प्रकार की होती है? काचाभ उपास्थि की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिये।
उत्तर-
उपास्थि (Cartilage)-
यह आलम्बी योजी ऊतक अस्थि की तुलना में कोमल एवं लचीला होता है। इस ऊतक के चारों ओर पतली परन्तु दृढ़ झिल्ली का आवरण होता है। इसे पर्यपास्थि (Perichondrium) कहते हैं। यह आवरण पारगम्य होता है जिसके कारण भोज्य कण अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। आन्तरिक रचना में जेली समान आधात्री (Matrix) होती है। यह कोन्ड्रिन (Chondrin) नामक प्रोटीन की बनी होती है। आधात्री में अनेक छोटी-बड़ी द्रव भरी आशय होती है, इन्हें अवकाशिकाएँ या रिक्तिकाएँ (Lacunae) कहते हैं। रिक्तिकाओं में गोल अथवा अण्डाकार उपास्थ्यणु (Chondrocyle) स्थित होती है। एक रिक्तिका में इनकी । संख्या एक से चार तक होती है। इनसे कोन्ड्रिन प्रोटीन का स्रावण होता है। परिधीय भाग में पर्यपास्थि के नीचे अधिक सक्रिय कोशिकाएँ स्थित होती हैं। ये उपास्थिकोरक कहलाती हैं। इनसे उपास्थ्यणु का निर्माण | होता है। सभी प्रकार की उपास्थियों की संरचना समान होती है लेकिन इनमें पाये जाने वाले तन्तु एवं रासायनिक पदार्थों के आधार पर यह ऊतक चार प्रकार का होता है

(अ) काचाभ उपास्थि (Hyaline cartilage)
(ब) रेशेदार या तन्तुक उपास्थि (Fibrous cartilage)
(स) प्रत्यास्थ उपास्थि (Elastic cartilage)
(द) कैल्सिभूत उपास्थि (Calcified cartilage)

(अ) उपास्थि या काचाभ उपास्थि (Hyaline cartilage)-
इसे सूत्रविहीन (nonfibrous) उपास्थि कहते हैं क्योंकि इसमें सूत्र या तन्तु नहीं पाये जाते हैं। इसकी मैट्रिक्स स्वच्छ, अर्द्ध-पारदर्शक व हल्के नीले रंग का होता है। इसलिए इसका रंग भी हल्का नीला दिखाई देता है। यह श्वास नली, हाएड, स्टरनम तथा टांगों व पसलियों के अन्तिम सिरों पर पार्य।
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(ब) तन्तुमय उपास्थि (Fibrous cartilage)-
इस प्रकार की उपास्थि सुदृढ़ होती है और इसके मैट्रिक्स में अनेक सफेद कौलेजन तन्तुओं के गुच्छे पड़े रहते हैं। स्तनधारी जन्तुओं की कशेरुकाओं के बीच में पायी जाने वाली प्लेटें (in vertebral discs) इसी उपास्थि की बनी होती हैं।
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(स) कैल्सीफाइड उपास्थि (Calcified cartilage)-
इसके मैट्रिक्स में कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3) के कण पाये जाते हैं, जिनके कारण यह हड्डी के समान कड़ी हो जाती है। शेष रचना हायलिन कार्टिलेज (Hyline Cartilage) के समान ही है। मेंढ़क की अंसमेखला (pectoral girdle) में सुप्रास्केपुला (suprascapulla) तथा श्रोणि मेखला (pelvic girdle) में प्यूबिस (pubis) इसी उपास्थि की बनी होती है।
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(द) प्रत्यास्थ या लचीली उपास्थि (Elastic cartilage)-
यह उपास्थि भी तन्तुमय उपास्थि के समान होती है, परन्तु इसमें श्वेत कोलेजन तन्तुओं की जगह पीले कोलेजन तन्तु पाये जाते हैं जो कि लचीले होते हैं। यह हमारे बाहरी कान के पिन्ना (pinna) में, एपीग्लोटिस (epiglottis) तथा स्तनियों के नाक के सिरे पर पाई जाती है।
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