RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 36 तिलचट्टा

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 36 तिलचट्टा

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कॉकरोच है
(अ) शाकाहारी
(ब) मांसाहारी
(स) सर्वाहारी
(द) फलाहारी

प्रश्न 2.
कॉकरोच का सिर कितने भ्रूणीय खण्डों से मिलकर बना होता है।
(अ) 5
(ब) 6
(स) 7
(द) 8

प्रश्न 3.
कॉकरोच के उदर में भ्रूणीय अवस्था में कितने खण्ड पाये जाते
(अ) 10
(ब) 7
(स) 11
(द) 9

प्रश्न 4.
कॉकरोच का बाह्य कंकाल बना होता है।
(अ) काईटिन का
(ब) उपास्थियों का
(स) अस्थियों का
(द) किरैटिन का।

प्रश्न 5.
कॉकरोच की अंगिकाओं में पाये जाने वाले जान्स्टन अंग (Johnston organ) होते हैं।
(अ) स्वाद संवेदी
(ब) गंध संवेदी
(स) ध्वनि संवेदी
(द) गति संवेदी

प्रश्न 6.
कॉकरोच में जिव्हा के समान कार्य करने वाला मुखांग है
(अ) लैबियम
(ब) हाइपोफैरिंक्स
(स) मेडिबिल
(द) मैक्सिला

प्रश्न 7.
गुदा शूक (Anal Styles) पाये जाते हैं
(अ) केवल नर कॉकरोच में
(ब) केवल मादा कॉकरोच में
(स) दोनों में
(द) किसी में नहीं

प्रश्न 8.
कॉकरोच की देह गुहा को कहते हैं
(अ) सीलोम
(ब) ब्लास्टोसील
(स) हीमोसील
(द) लिम्फोसील

प्रश्न 9.
कॉकरोच की पेषणी में कितने क्यूटीकुलर दांत पाये जाते हैं
(अ) 4
(ब) 6
(स) 8
(द) 10

प्रश्न 10.
कॉकरोच में पश्चांत्र की उत्पत्ति होती है
(अ) एक्टोडर्म से
(ब) एण्डोडर्म से
(स) मीजोडार्म से
(द) उपरोक्त तीनों से

प्रश्न 11.
कॉकरोच में कितने जोड़ी श्वास रंध्र (Spiracles) पाये जाते हैं।
(अ) 12 जोड़ी
(ब) 14 जोड़ी।
(स) 10 जोड़ी
(द) 20 जोड़ी

प्रश्न 12.
कॉकरोच के रक्त को कहते हैं
(अ) लिम्फ
(ब) हीमोलिम्फ
(स) हीमोग्लोबिन
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।

प्रश्न 13.
कॉकरोच के परिधीय तंत्रिका तंत्र में कितनी जोड़ी तंत्रिकाएँ पाई जाती है।
(अ) 10 जोड़ी
(ब) 20 जोड़ी
(स) 30 जोड़ी
(द) 40 जोड़ी।

प्रश्न 14.
कॉकरोच में मुख्य उत्सर्जी पदार्थ है
(अ) यूरिया
(ब) अमोनिया
(स) अमीनोअम्ल
(द) यूरिक अम्ल

प्रश्न 15.
कॉकरोच में उत्सर्जी अंग (Excretory organ) है
(अ) मैल्पीघी नलिकाएं
(ब) वसाकाय कोशिकाएं
(स) यूरिकोस ग्रंथियां
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 16.
कॉकरोच में त्वक पतन (Ecdysis) को नियंत्रित करने वाला इकडायोसोन हार्मोन कहां से स्त्रावित होता है
(अ) कोरपोरा ऐलाटा से
(ब) तंत्रिका स्त्रावी कोशिकाओं
(स) प्रोथौरेसिक ग्रंथियों से
(द) मस्तिष्क से

प्रश्न 17.
कॉकरोच में संयुक्त नैत्र की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक ईकाई है
(अ) नैत्राशंक
(ब) कॉर्निया
(स) रैटिना
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 18.
निम्न में से कौनसी कॉकरोच के मादा जनन तंत्र की ग्रन्थि है
(अ) फैलिक ग्रंथि
(ब) छत्रक ग्रंथि
(स) कोलेटेरियल ग्रंथि
(द) यूरिकोस ग्रंथि

प्रश्न 19.
कॉकरोच के अण्ड प्रवार (ऊथिका) में कितने अंडे होते हैं
(अ) 14
(ब) 16
(स) 18
(द) 20

प्रश्न 20.
कॉकरोच के नवजात शिशु (तरुण कॉकरोच) को कहते है
(अ) निम्फ
(ब) मैगट
(स) पेरिब्लास्टुला
(द) इमैगो

उत्तरमाला
1. (स)
2. (ब)
3. (स)
4. (अ)
5. (द)
6. (ब)
7. (अ)
8. (स)
9. (ब)
10. (अ)
11. (स)
12. (ब)
13. (स)
14. (द)
15. (द)
16. (स)
17. (अ)
18. (अ)
19. (ब)
20. (अ)

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कॉकरोच की भारत में पाई जाने वाली जातियों के नाम लिखिये।
उत्तर-

  • पेरिप्लेनेटा अमेरिकाना
  • ब्लाटा ओरिएन्टेलिस
  • ब्लाटेला जर्मेनिका।

प्रश्न 2.
कॉकरोच में भ्रूणीय अवस्था एवं वयस्क अवस्था में कितने खण्ड पाये जाते हैं?
उत्तर-
भ्रूणीय अवस्था में 20 एवं वयस्क अवस्था में 19 खण्ड पाये जाते हैं।

प्रश्न 3.
कॉकरोच में जॉनस्टन अंग (Johnston Organ) कहां पाये जाते हैं? इनका क्या कार्य होता है?
उत्तर-
कॉकरोच में जॉनस्टन अंग अंगिका के मध्य भाग पर पाया जाता है, स्पर्श व गंध का ज्ञान।

प्रश्न 4.
कॉकरोच में मुखांग (Mouth parts) किस प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
कॉकरोच में मुखांग कुतरने तथा चबाने वाले (biting of chewing type) होते हैं।

प्रश्न 5.
कॉकरोच में पाये जाने वाले गुदा लुम (Anal Cerci) का कार्य लिखिये।
उत्तर-
कॉकरोच में पाये जाने वाले गुदा लुम का कार्य ध्वनि उद्दीपन को ग्रहण करना । इन्हें कॉकरोच के कान (Ear) भी कहते हैं।

प्रश्न 6.
कॉकरोच में कितनी जोड़ी टांगे पाई जाती है। प्रत्येक टांग कितने खण्डों की बनी होती है?
उत्तर-
कॉकरोच में तीन जोड़ी टांगे पाई जाती है। प्रत्येक टांग 5 खण्डों से बनी होती है।

प्रश्न 7.
कॉकरोच की देहगुहा को वास्तविक देहगुहा (True coelom) क्यों नहीं कहते हैं।
उत्तर-
कॉकरोच की देहगुहा को वास्तविक देहगुहा इसलिए नहीं कहते हैं क्योंकि इसके चारों ओर पेरीटोनियम (Peritoneum) का आवरण नहीं होता है।

प्रश्न 8.
कॉकरोच का भोजन क्या होता है।
उत्तर-
रोटी ब्रेड, मांस, सब्जी, फल आदि इसके अतिरिक्त चमड़े की वस्तुएं कपड़े तथा लकड़ी आदि भी खा जाता है।

प्रश्न 9.
कॉकरोच में श्वासरंध्र को घेरने वाली काइटिन की लचीली प्लैट को क्या कहते हैं?
उत्तर-
कॉकरोच में श्वासरंध्र को घेरने वाली काइटिन की लचीली प्लैट को पेरिट्रीम कहते हैं।

प्रश्न 10.
कॉकरोच के हृदय में कितने कक्ष पाये जाते हैं?
उत्तर-
कॉकरोच के हृदय में 13 कक्ष पाये जाते हैं।

प्रश्न 11.
कॉकरोच की अधर तंत्रिका रज्जू (Ventral nerve cord) में कितने गुच्छक (Ganglia) पाये जाते हैं।
उत्तर-
कॉकरोच की अधर तंत्रिका रज्जू में 9 गुच्छक पाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
कॉकरोच के मुख्य उत्सर्जी अंग का नाम बताइये
उत्तर-
कॉकरोच के मुख्य उत्सर्जी अंग का नाम मैल्पीधी नलिकाएँ है।

प्रश्न 13.
कॉकरोच के संयुक्त नेत्र में लगभग कितने कॉर्नियल फैसेट्स (नैत्राशंक) पाये जाते हैं।
उत्तर-
कॉकरोच के संयुक्त नेत्र में लगभग 2000 कार्नियल फैसेट (नैत्राशंक) पाये जाते हैं।

प्रश्न 14.
कॉकरोच में पाई जाने वाली फैलिक ग्रंथियों का कार्य लिखिये।
उत्तर-
यह शुक्राणुधर की बाहरी भित्ति के निर्माण का कार्य करती है।

प्रश्न 15.
कॉकरोच में कायान्तरण के दौरान कितनी बार निर्माचन होता है?
उत्तर-
कॉकरोच में कायान्तरण 7-10 बार निर्मोचन होता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कॉकरोच के सिर का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-
सिर कॉकरोच के शेष भाग में 90° का कोण बनाता है वे मुख नीचे की ओर झुका रहता है अतः इसे हाइपोग्नेथम अवस्था कहते हैं। इसका सिर त्रिभुजाकार या नाशपती के समान होता है। सिर पर युग्मित संयुक्त नेत्र, एन्टिना व सरल नेत्र पाये जाते हैं। सिर अनेक अस्पष्ट सीमा वाले क्षेत्रों-वर्टेक्स, फ्रांस, क्लाइपियस, अनुकपाल व जीनी में बंटा होता है। मुख के चारों ओर मेडीबुलेट मुखांगों की उपस्थिति के कारण मुख छिद्र से पहले मुखपूर्वी गुहा बन जाती है।

सिर पर एक जोड़ी वृक्काकार संयुक्त नेत्र पाये जाते हैं। प्रत्येक संयुक्त नेत्र में 2000 क्रियात्मक व संरचनात्मक इकाइयाँ पायी जाती हैं। जिन्हें ओमेटिडिया कहते हैं।

एक जोडी श्रृंगिकाएं पाई जाती हैं, श्रृंगिकाएँ संयुक्त नेत्रों के पास एक गड्डे से उद्गमित होती हैं इसे श्रृंगिका साकेट antenna socket) कहते हैं।
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प्रश्न 2.
कॉकरोच में पाये जाने वाले मुखांगों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच के मुखांग मेन्डिबुलेट प्रकार के या काटने एवं चबाने के प्रकार के होते हैं। इसका मुख भाग लेब्रम (ऊपरी होंठ), लेबियम (निचला होंठ), मैक्सिली (खण्डित एवं पैरों के समान), मैण्डीबल्स एवं हाइपोफैरिक्स (जीभ) से मिलकर बना होता है।

  • चबाने की मुख्य संरचनाएं मेण्डीबल्स होती है जो कि छोटी एवं दांत युक्त होती है।
  • मैक्सिला कार्डी, स्टाइप्स, गेलिया एवं पांच खण्डों वाली मैक्सीलरी पैल्प से मिलकर बना होता है।
  • लेबियम (द्वितीय मैक्सिला), सबमेन्टम, मेण्टम, प्रीमेण्टम, पैल्पीगर, पैराग्लॉसा ग्लासा एवं तीन संधित लेबियल पाल्प से मिलकर बना होता है।
  • ग्लासा एवं पैराग्लॉसा सम्मिलित रूप से लिंगुला कहलाता है। ये चबे हुए भोजन को मुखगुहा में धकेलता है।
  • हाइपोकेरिंक्स के आधार पर एक संयुग्मित लार नलिका खुलती है।

प्रश्न 3.
नर व मादा कॉकरोच में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
नर व मादा कॉकरोच में अन्तर
(Difference between Male & Female Cockroach)

नर कॉकरोचमादा कॉकरोच
1. शरीर कुछ छोटा एवं अधिक चपटा होता है।1. तुलनात्मक रूप से शरीर बड़ा एवं मोटा होता है।
2. उदर भाग में 9 खण्ड स्पष्ट होते हैं।2. उदर भाग में केवल 7 खण्ड स्पष्ट होते हैं।
3. उदर का पश्च भाग नुकीला एवं 7वां स्टरलाइट अविभाजित3. उदर का पश्च भाग चौड़ा एवं नोकाकार, 7वी स्टरनाइट दो भागों में विभाजित
4. 9वें उदरखण्ड की स्टरलाइट से एक जोड़ी गुद कंटिकाएं (Anal styles) निकली होती है।4. गुद कंटिकाएं अनुपस्थित होती है।
5. पंख बड़े वे शरीर के पीछे तक फैले रहते हैं।5. पंख छोटे व शरीर के पश्च छोर तक ही फैले रहते हैं।

प्रश्न 4.
कॉकरोच के पंखों की विशेषताएं लिखिये।
उत्तर-
कॉकरोच के पंखों की विशेषताएँ
पंख (Wings)-कॉकरोच में दो जोड़ी पंख होते हैं। नर के पंख, मादा की अपेक्षा, अधिक लम्बे होते हैं। पहली जोड़ी के पंख, मध्य वक्ष से तथा दूसरी जोड़ी के पंख पश्च वक्ष के अग्रपार्श्व भाग से प्लूरा व नोटम के बीच जुड़े रहते हैं। अग्र वक्ष में पंख अनुपस्थित होते हैं।

पक्षवर्म या टेगमिना (Elytra or tegmina)-प्रथम जोड़ी के पंखों को पक्षवर्म या टेगमिना कहते हैं। क्योंकि ये विश्रामावस्था में दूसरी जोड़ी के पंखों को पूर्ण रूप से ढके रहते हैं, इसलिए इन्हें ढापन पंख (wing covers) भी कहते हैं। इनका बायां पंख दांये पंख को विश्रामावस्था में किनारे से ढके रहता है।

यह कॉकरोच को उड़ने में सहायता नहीं करते हैं बल्कि सिर्फ सुरक्षात्मक रूप से ही दूसरी जोड़ी के पंखों को ढकें रहते हैं।

द्वितीय जोड़ी पंख (Second pair of wings)-ये पतले, पारदर्शक (transparent), झिल्लीनुमा व अधिक चौड़े होते हैं। ये पंख ही कम दूरी की उड़ान भरने में मदद करते हैं।

प्रश्न 5.
कॉकरोच की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाइये।
उत्तर-
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प्रश्न 6.
कॉकरोच में श्वसन क्रिया कैसे होती है? संक्षिप्त में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
श्वसन क्रियाविधि (Mechanism of Respiration)कॉकरोच में श्वसन क्रिया अन्त:श्वसन तथा बाह्य श्वसन श्वसन रन्ध्रों द्वारा होती है। बाह्य श्वसन एक सक्रिय क्रिया है जबकि अन्तःश्वसन निष्क्रिय क्रिया होती है । श्वसन क्रिया उदरीय पेशियों के लयबद्ध संकुचन व फैलाव से नियन्त्रित की जाती है। पेशियों के फैलाव से वायु भीतर प्रवेश करती तथा संकुचन से वायु बाहर निकलती है। अन्तःश्वसन के दौरान वायु श्वसन रन्ध्रों में से होकर श्वास नलियों (trachea) तथा श्वास नलिकाओं (tracheoles) में पहुँच जाती है, जिनमें ऊतक द्रव भरा रहता है । वायु में उपस्थित ऑक्सीजन इस द्रव में घुल जाती है तथा विसरित होकर ऊतक कोशिकाओं में पहुँच जाती है। श्वास नलिकाओं में जो द्रव भरा रहता है, वह परासरण दबाव के कारण आगे बढ़ता या पीछे हटता रहता है। उपापचयी पदार्थों के संघनन के कारण दाब अधिक बढ़ जाता है, जिनके कारण श्वास नलिकाओं के अन्तिम सिरों पर द्रव बाहर विसरित होने लगता है। और इसका स्थान ग्रहण करने के लिए बाहर के द्रव के साथ वायु भी नलिकाओं में अन्दर की तरफ विसरित हो जाती है।

प्रश्न 7.
कॉकरोच के रक्त परिसंचरण तंत्र का नामांकित चित्र बनाइये।
उत्तर-
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प्रश्न 8.
कॉकरोच के केन्द्रिय तन्त्रिका तंत्र का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर-
केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central Nervous System) इस भाग में निम्नलिखित दो प्रमुख रचनाएँ होती हैं

  • तन्त्रिको वलय (Nerve ring) – यह सिर में ग्रसिका के चारों ओर स्थित होती है। इसमें निम्नोक्त संरचनाएं पायी जाती हैं|
    (A) अधिग्रसिका गुच्छिका-1 जोड़ी (Supra Oesophageal Gangalion or Brain)
    (B) परिग्रसिका संयोजक-1 जोड़ी (Circum-Oesophageal Connectives)
    (C) अधोग्रसिका गुच्छिका-1 जोड़ी (Sub-Oesophageal Ganglion)
  • अधर तन्त्रिका रज्जु (Ventral Nerve Cord) – यह ग्रीवा,
    वक्ष तथा 7-उदर-खण्डों में स्थित रहती है। इसकी उत्पत्ति अधोग्रसिका से होती है। यह दोहरी होती है। इसमें 9 गुच्छक पाये जाते हैं

(क) वक्षीय गुच्छक (Thoracic Ganglia) – ये तीन गुच्छक होते हैं। प्रत्येक गुच्छक दो गुच्छकों के समेकन से बना होता है।
(ख) उदीय गुच्छक (Abdominal Ganglia) – ये 6 गुच्छक होते हैं। पहले 5 गुच्छक प्रथम पाँच उदरीय खण्ड में स्थित होते हैं, तथा प्रत्येक गुच्छक दो खण्डों के समेकन से बना होता है। छठा उदरीय गुच्छक बड़ा होता है और 7वें उदर खण्ड में स्थित होता है।

प्रश्न 9.
कॉकरोच में मैल्पीघी नलिकाएँ कहाँ पर स्थित होती है? ये किस प्रकार कार्य करती है।
उत्तर-
कॉकरोच में मैल्पीघी नलिकाएं आहारनाल की मध्यांत्र व पश्चान्त्र के संगम स्थल पर स्थित होती है।

उत्सर्जन की कार्यिकी (Physiology of Excretion)-कॉकरोच की शारीरिक कोशिकाएँ मुख्य रूप से पोटेशियम यूरेट उत्सर्जी पदार्थ के रूप में हीमोलिम्फ में मुक्त करती हैं। नलिकाएँ निरन्तर हीमोलिम्फ से कुछ तरल पदार्थों का अवशोषण करती रहती हैं। इस तरल पदार्थ में पोटेशियम यूरेट, जल, कुछ लवण, अमीनो अम्ल, CO2 आदि होती हैं। नलिकाओं के दूरस्थ भाग की कोशिकाएँ अवरोधी होने के साथ-साथ स्त्रावी भी होती हैं। ये कोशिकाएँ पोटेशियम यूरेट की जल तथा कार्बनडाइ-ऑक्साइड से प्रतिक्रियाएँ कर यूरिक अम्ल, जल तथा पोटेशियम बाइकार्बोनेट के रूप में बदल कर नलिकाओं में मुक्त कर देती हैं। सूक्ष्मांकुरों की गति एवं तरंग गति के कारण नलिकाओं में तरल का बहाव दूरस्थ भाग से समीपस्थ भाग की तरफ होता है। समीपस्थ भाग की कोशिकाएँ मुख्य रूप से अवशोषी होती हैं। ये तरल पदार्थ में से उपयोगी पदार्थों, जैसे-पोटेशियम बाई कार्बोनेट, लवणों, अमीनों अम्लों व जल को अवशोषित कर पुनः हीमोलिम्फ में मुक्त कर देती हैं तथा उत्सर्जी पदार्थों को आहारनाल में मुक्त कर दिया जाता है। सामान्य ताप पर मैलपिजियन नलिका में एक मिनट में पाँच से पन्द्रह बार तक क्रमाकुंचन की गति होती है।

प्रश्न 10.
निम्न पर टिप्पणी लिखिए
(i) अंशदर्श प्रतिबिम्ब (Apposition Image)
(ii) उपढांपन प्रतिबिम्ब (Superposition Image)
उत्तर-
(i) अंशदर्श प्रतिबिम्ब (Apposition Image) – इस प्रकार का प्रतिबिम्ब का निर्माण तीव्र प्रकाश में होता है। तव्र प्रकाश में वर्णकी ओच्छद पूर्णतया फैल जाते हैं जिससे नेत्रांशक पूर्णतया एक दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। ये बिल्कुल स्पष्ट किन्तु खण्डित प्रतिबिम्ब बनाते हैं। इसको मोजेक दृष्टि भी कहते हैं।
(ii) उपढांपन प्रतिबिम्ब (Superposition Image) – यह प्रतिबिम्ब मंद प्रकाश (रात में भी) बनता है। मंद प्रकाश में वर्णक आच्छदो का संकुचन हो जाता है जिससे नेत्राशंकों का प्रकाशीय पृथक्कीकरण समाप्त हो जाता है। यह अस्पष्ट प्रकाश का प्रतिबिम्ब होता है।

प्रश्न 11.
कॉकरोच के नर जननांगों का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 12.
कॉकरोच के मादा जननांगों का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 13.
कॉकरोच में ऊथीका (Ootheca) का निर्माण का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच में अण्ड प्रावर (अण्ड कवच) का निर्माण (Formation of Ootheca)-कॉकरोच के निषेचित अण्डे जनन कक्ष में प्रवेश करते हैं । यहाँ कोलेटरियल ग्रन्थि से स्कलेरोप्रोटीन (Scalero protein) का स्त्राव होता है, जिससे ऊथीका का निर्माण होता है। ऊथीका के निर्माण में लगभग 20 घण्टे का समय लगता है। एक मादा जन्तु अपने जीवनकाल में 20-40 तक ऊथीका का निर्माण करती है। कुछ दिनों के बाद मादा ऊथीका को अन्धेरे, सूखे तथा गर्म स्थान रख देती है। ऊथीका के ऊपर काइटिन का आवरण तथा माइक्रोपाइल पाया जाता है।

प्रश्न 14.
कॉकरोच की छत्रक ग्रन्थि (Mushroom gland) की संरचना व कार्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
छत्रा रूपा ग्रन्थि अथवा यूट्रिक्यूलस (Mushroom gland or utriculus)-प्रत्येक शुक्रवाहिका के अन्तिम सिरे पर अर्थात् जहाँ पर यह दूसरी ओर की शुक्रवाहिका मिलती है वहाँ पर इन्हीं से संलग्न एक बड़ी सफेद रंग की सहायक ग्रन्थि (accessory gland) स्थित होती है जो छत्रा रूपी होती है। इस ग्रन्थि को छत्रा रूपी ग्रन्थि अथवा यूट्रिक्यूल्स (Mushroom gland or utriculus) कहते हैं। इसमें तीन प्रकार की नलिकायें होती हैं-

  • सबसे भीतरी भाग छोटी एवं गोल नलिकायें जिन्हें शुक्राशय कहते हैं, ये शुक्रवाहिकायें वृषणों से लाये शुक्राणुओं को एकत्रित करती हैं।
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  • अग्र भीतरी भाग की ग्रन्थिल छोटी नलिकाएँ (small tubules) अथवा यूटीकुली ब्रिविओर्स। इनके स्त्राव से शुक्राणुओं का पोषण होता है।
  • बाहर की ग्रन्थिल लम्बी नलिकाएँ अथवा यूट्रीकुली मेजेरस-इसके स्त्राव से शुक्राणुधर (Spermatophore) की आन्तरिक परत का निर्माण होता है।

प्रश्न 15.
कॉकरोच में मैथुन व निषेचन का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच में मैथुन क्रिया-कॉकरोच में मार्च से सितम्बर तक प्रजनन काल होता है। मैथुन क्रिया रात के समय ही होती है। यह पुच्छ-पुच्छ अवस्था में होती है। प्रजनन काल में मादा कॉकरोच कामोत्तेजक फीरोमान से आकर्षित होकर नर से मैथुन करती है। नर कॉकरोच फैलोमियर्स के द्वारा मादा जनन छिद्र को खोलकर शुक्राणुधर को जनन कक्ष में प्रवेश कराता है। शुक्राणुधर स्पर्मथीका अंकुर से चिपक जाता है। इस कारण शुक्राणु शुक्रग्राही में प्रवेश कर जाते हैं तथा खाली शुक्राणुधर को बाहर निकाल दिया जाता है। कॉकरोच में मैथुन क्रिया एक घण्टे में पूर्ण होती है।

मैथुन क्रिया के फलस्वरूप दोनों अण्डाशय से 16 अण्डे जननकक्ष में आ जाते हैं। ये 8-8 की दो पंक्तियों में अण्डनिक्षेपक में व्यवस्थित हो जाते हैं। यहाँ शुक्राणुओं के द्वारा आन्तरिक निषेचन जनन कक्ष में होता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 36 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कॉकरोच की बाह्य संरचना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच का शरीर संकरा, लम्बा व पृष्ठ से प्रतिपृष्ठ की तरफ बना होता है। वयस्क कॉकरोच की लम्बाई लगभग 2 से 4 सेमी. तथा 1 सेमी. से 1.5 सेमी. चौड़ाई होती है। इसका रंग चमकीला भूरा होता है। नर व मादा कॉकरोच पृथक् होते हैं। नर कुछ छोटा और अधिक चपटा होता है। कॉकरोच एक द्विपार्श्व सममित प्राणी है।

कॉकरोच का शरीर खण्डयुक्त होता है। भ्रूणीय अवस्था में 20 खण्ड पाये जाते हैं। सिर के छः खण्ड, वक्ष के 3 व उदर के 11 खण्ड होते हैं जबकि वयस्क में 19 खण्ड होते हैं। कॉकरोच का शरीर तीन खण्डों में विभक्त होता है-
(i) सिर (Head),
(ii) वक्ष (Thorax),
(iii) उदर (Abdomen)।
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(i) सिर (Head) –
इसका सिर त्रिभुजाकार होता है। यह शरीर के लम्ब अक्ष पर समकोण स्थिति में जुड़ा रहता है। यह अपने सिर को इधर-उधर घुमा सकता है तथा सामान्य अवस्था में इसका सिर नीचे की ओर झुका रहता है। इस तरह यह हाइपोग्नेथस (Hypognathous) प्रकार का होता है। इसका सिर 6 भ्रूणीय खण्डों से मिलकर बना होता है। इसके सिर पर दो संयुक्त नेत्र (compound eyes) पाये जाते हैं जिनकी आकृति वृक्काकार (kidney shape) होती है। ये नेत्र वर्टेक्स (Vertex) के दोनों ओर स्थित रहते हैं। प्रत्येक संयुक्त नेत्र के निकट एक छोटा-सा स्थान फेनेस्ट्रा (Fenestra) होता है। इसे साधारण नेत्र कहते हैं। सरल नेत्र प्रकाश के प्रति संवेदनशील (photosensitive) होते हैं लेकिन इनमें प्रतिबिम्ब नहीं बनता है। कॉकरोच के सिर पर दो श्रृंगिकाएँ पाई जाती। हैं। प्रत्येक शृगिका (Antenna) के तीन भाग होते हैं
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(a) स्केप (Scape) – यह आधार भाग होता है जिसके द्वारा अंगिका सिर से जुड़ी होती है। यह छोटा एवं एक ही खण्ड का बना होता
(b) पेडीसिल (Pedicel) – शृंगिका का मध्य भाग़ पेडीसिल कहलाता है। इस पर जॉनस्टन अंग (Johnston organ) पाये जाते हैं। यह गति के प्रति संवेदनशील होते हैं।
(c) फ्लेजिलम (Flagellum) – श्रृंगिका का अन्तिम भाग फ्लेजिलम कहलाता है। यह धागेनुमा एवं अनेक खण्डों से बना होता है। यह स्पर्शग्राही तथा गंधग्राही होता है।

(ii) वक्ष (Thorax) –
कॉकरोच का वक्ष तीन खण्डों से मिलकर बना होता है –
(a) अग्र वक्ष (Prothorax),
(b) मध्य वक्ष (Mesothorax),
(c) पश्च वक्ष (Metathorax) ।

वक्ष के प्रत्येक खण्ड में एक जोड़ी टाँगें (legs) पाई जाती हैं। इसके अलावा मध्य एवं पश्च वक्ष पर एक-एक जोड़ी पंख जुड़े रहते हैं। इस तरह वक्ष पर तीन जोड़ी टाँगें एवं दो जोड़ी पंख होते हैं।

(iii) उदर (Abdomen)-
इसमें 10 खण्ड पाये जाते हैं। नर के उदर में 9 व मादा के उदर में 7 खण्ड दिखाई देते हैं। इसके पिछले सिरे पर गुदा होती है। 10वें खण्ड पर प्रत्येक ओर एक सन्धियुक्त गूदलूम (Anal cerci) होता है। नर में नवें खण्ड के अधर पार्श्व भाग में एक जोड़ी अखण्डित गुदा शूक अथवा एनल स्टाइल (Anal style) होते हैं। मादा में एनल स्टाइल नहीं पाये जाते हैं। सातवें खण्ड के मध्य में ऊथीकल वेश्म का छिद्र होता है। नर कॉकरोच में उदर में 5वें एवं 6वें खण्ड के बीच की झिल्ली में गन्ध ग्रन्थियाँ (Stink glands) को एक जोड़ा पाया जाता है।

प्रश्न 2.
कॉकरोच के पांचन तंत्र की सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-
आहारनाल (Alimentary Canal)-
कॉकरोच में एक लम्बी व नलिकाकारे आहारनाल पायी जाती है, इसके एक सिरे पर मुख व दूसरे सिरे पर गुदा पायी जाती है। इसकी आहारनाल में निम्न तीन भाग पाये जाते हैं
(अ) अग्रान्त्र या स्टोमोडियम (Stomodaeum)
(ब) मध्यान्त्र या मेसेन्ट्रोन (Mesentron)
(स) पश्चान्त्र या प्रोक्टोडियम (Proctodaeum)

अग्रान्त्र व पश्चान्त्र एक्टोडर्म द्वारा उद्गमित होती है व इसमें क्यूटिकल का अस्तर पाया जाता है। जबकि मध्यान्त्र का उद्भव एण्डोडर्म (endoderm) द्वारा होता है तथा इसमें क्यूटिकल का अस्तर नहीं पाया जाता है। क्यूटिकल की अनुपस्थिति में इस भाग में पचित भोजन का अवशोषण होता है।
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(अ) अग्रान्त्र (Fore gut or stomodoeum)-
इसमें निम्न भाग पाये जाते हैं

  1. मुखगुहिका (Buccal cavity)
  2. ग्रसनी (Pharynx)
  3. ग्रसिका (oesophagus)
  4. अन्नपुट (crop)
  5. पेषणी (gizzard) अग्रान्त्र आहारनाल का 1/3 भाग बनाती है।
  1. मुखगुहिका (Buccal cavity)-
    मुखांगों (Mouth parts) द्वारा घिरी हुई गुहा को. मुख गुहा कहते हैं। मुख गुहा दो भागों में विभक्त होती है-आगे का भाग सिबेरियम (cibarium) व पीछे का भाग लाराशय (Salivarium) कहलाता है। मुखगुहिका पीछे की ओर ग्रसनी (Pharynx) में खुलती है।
  2. ग्रसनी (Pharynx)-
    यह एक खड़ी नलिका के रूप में पायी जाती है जो पीछे मुड़क अनुकपाल रंध्र के समीप ग्रसिका में खुलती है। ग्रसनी की दीवार अनेक प्रसार पेशियों (dilatary muscles) द्वारा सिर के अन्तःकंकाल टेन्टोरियम से जुड़ी रहती है।
  3. ग्रसिका (Oesophagus)-
    यह आहारनाल का नलिकाकार भाग है जो ग्रीवा से होकर वक्ष भाग में प्रवेश करती है। वक्ष में यह एक थैलेनुमा भाग में खुलती है जिसे अन्नपुट (crop) कहते हैं। इसकी दीवार भीतर से अत्यधिक वलित (folded) होती है।
    इस भाग में कोई किसी प्रकार का पाचन नहीं होता है। इससे होकर भोजन अन्नपूट तक पहुँचाया जाता है।
  4. अन्नपुट (Crop)-
    यह एक खोखली बड़ी महीन भित्ति वाली थैली रूप संरचना होती है। यह उदर के मध्य का आधे से अधिक भाग घेरे होती है। इसकी महीन भितित अत्यन्त लचीली होती है तथा भीतरी स्तर पर आयाम वलन (Longitudinal folds) पाये जाते हैं।
    अन्नपुट में भोजन का पाचन व संग्रहण होता है। अन्नपुट (Crop) एक छोटी सी पेषणी में खुलता है।
  5. पेषणी (Gizzard)-
    पेषणी को प्रोवेन्ट्रीक्यूलस (proventriculus) भी कहते हैं। यह अन्नपुट (crop) के नीचे एक गांठनुमा रचना होती है जिसे पेषणी कहते हैं। पेषणी की दीवार अत्यधिक मोटी एवं कठोर होती है। इसमें वर्तुलपेशी स्तर अत्यधिक विकसित होता है।

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पेषणी का अग्र भाग आरमेरियम (armarium) कहलाता है। इस भाग में 6 अनुदैर्घ्य वलन (Longitudinal folds) पाये जाते हैं। इन वलन की क्यूटिकल अत्यधिक मोटी होकर 6 क्यूटीकली दांतों का निर्माण करती है। यह क्यूटिकली दांत भोजन की पिसाई का काम करते हैं। दांतों के बीच स्थान में सीटी पाये जाते हैं जो छलनी (filter) की तरह कार्य करते हैं।

पेषणी का पश्च भाग कीपनुमा होता है । इस भाग में प्रोवेंट्रिक्यूलर गद्दियां पायी जाती हैं। इसकी क्यूटिकल पर पीछे की ओर मुड़े हुए क्यूटिकल रोम (Cuticular hairs) पाये जाते हैं। यह भाग पिसे हुए। भोजन को छानने का कार्य करता है। पेषणी का पश्च भाग मध्यान्त्र में फँसकर एक दोहरी भित्तियुक्त नलाकार रचना बनाता है जिसे स्टोमोडियल वाल्व (Stomodeal valve) कहते हैं।

(ब) मध्यान्त्र (Midgut)-
यह एक समान व्यास की नलिका होती है तथा आहारनाल को मध्य भाग (Midgut) बनाती है। इसका अग्रभाग जिसमें स्टोमोडियम वाल्व खुलता है, कार्डिया (Cardia) कहलाता है। मध्यान्त्र का भीतरी स्तर स्तम्भाकार उपकला द्वारा निर्मित होता है। इस पर अनेक छोटे-छोटे रसांकुर (villi) पाये जाते हैं। मध्यान्त्र का उपकला स्तर अग्रभाग में अधिक ग्रन्थिल होता है तथा पश्च भाग की कोशिकाएँ अवशोषी होती है।

मध्यान्त्र के अगले सिरे की ग्रन्थिल कोशिकाओं द्वारा पेरीटोफिक झिल्ली (peritrophic membrane) का स्रावण होता है। यह झिल्ली मध्यान्त्र को कठोर भोज्य कणों से सुरक्षा प्रदान करती है व भोजन के अवशोषण व एन्जाइम हेतु पारगम्य होती है। पेरीट्रोफिक झिल्ली पतली, पारदर्शक, काइटिन व प्रोटीन द्वारा निर्मित होती है।
मध्यान्त्र में दो प्रकार की रचनायें पाई जाती हैं|

  • यकृतीय अंधनाल (Hepatic cacca)-यह मध्यान्त्र के अग्र भाग कार्डिया से निकलती है। यह पूर्वान्त्र व मध्यान्त्र के जंक्शन पर पाये जाते हैं। यह संख्या में 6-8 पतले, नलाकार व अंगुली के समान होती हैं एवं इनके स्वतन्त्र सिरे बंद होते हैं। इनके द्वारा पाचक एन्जाइम का स्रावण किया जाता है।
  • मैल्पीघी नलिकाएँ (Malpighian tubules)-यह मध्यान्त्र के पश्च छोर पर पीले रंग की बारीक नलिकाओं के समान रचनायें होती हैं। इनकी संख्या 50-150 होती है। इनका स्वतन्त्र सिरा बंद होता है। इनका प्रमुख कार्य उत्सर्जन करना है व उत्सर्जी पदार्थ को मध्यान्त्र में डाल देती हैं। अतः यह जलीय नियमन (Osmoregulation) में भी सहायक हैं।
    मध्यान्त्र में भोजन का पाचन व अवशोषण होता है। मध्यान्त्र पश्चान्त्र में पाइलोरिक कपाट द्वारा खुलता है।

(स) पश्चान्त्र (Hind gut)-
आहारनाल का अन्तिम शेष भाग पश्चान्त्र अर्थात् प्रोक्टोडियम कहलाता है, जो मध्यान्त्र से गुदा तक पाया जाता है। इसमें निम्न तीन भाग पाये जाते हैं

  • क्षुदान्त्र या इलियम (lleum)-यह एक संकरी व नलिकाकार रचना होती है। इसके पश्च छोर पर भीतर की ओर 6 त्रिभुजाकार वलन (Fold) पाये जाते हैं। यह वलन अवरोधनी (Sphinctor) की तरह कार्य करते हैं। क्यूटिकल पर शूक या कंटिकायें पायी जाती हैं जो पेरीटोफिक झिल्ली को फाड़ने का कार्य करती हैं।
  • वृहदान्त्र (colon)-यह मध्यान्त्र व क्षुद्रान्त्र से अधिक मोटी व नलिकाकार होती है। यह पश्चान्त्र का सबसे लम्बा भाग है। इसमें क्यूटिकल द्वारा निर्मित वलन (Folds) पाये जाते हैं। लेकिन शूक या कंटिकाओं का अभाव होता है।
  • मलाशय (Rectum)-यह आहारनाल का अन्तिम भाग है। जो थैलेनुमा होता है। इनके भीतर 6 अनुदैर्व्यवलन पाये जाते हैं जिन्हें मलाशयी अंकुर (Rectal papilla) कहते हैं । मलाशयी अंकुल मल से पानी का अवशोषण करते हैं। मलाशय में मल को अस्थायी रूप से संग्रह किया जाता है, जिसे समय-समय पर 10वें उदरीय टरगम के नीचे स्थित गुदा द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

लार ग्रन्थियाँ (Salivary glands)-कॉकरोच में एक जोडी लार ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। यह अन्नपुट (Crop) के दोनों ओर व उस पर चिपकी रहती हैं। ये ग्रन्थियाँ द्विपालित (Bilobed) होती हैं। प्रत्येक ग्रन्थि में दो भाग पाये जाते हैं-पत्तियों के समान भाग ग्रन्थिल भाग (Glandular Part) कहलाता है व थैले के समान भाग आशय (Reservoir) कहलाता है।
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(अ) ग्रन्थिल भाग (Glandular Part)-
ग्रन्थिल भाग में तीन पालियां पायी जाती हैं। दो पालियां बड़ी व एक पालि छोटी होती है । प्रत्येक पालि में अनेक पालिकाएँ (lobules) या एसिनाई (acini) पायी जाती हैं। पालियों में दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं

  • जाइमोजन कोशिकाएँ
  • वाहिनिकाधारी कोशिकाएँ ।

ये दोनों प्रकार की कोशिकाएँ लार का प्रावण करती हैं। लार में जाइमेज एन्जाइम व श्लेष्मा पाया जाता है। ग्रन्थिल पालियों से निकली छोटी-छोटी नलिकाएँ मिलकर एक बड़ी लार वाहिका का निर्माण करती

(ब) आशय (Reservoirs)-
लार को संचित करने के लिए एक लम्बी अण्डाकार थैलेनुमा संरचना पायी जाती है जिसे आशय कहते हैं। प्रत्येक आशय से एक आशयी वाहिका (reservior duct) निकलती है जो लारवाहिका के साथ मिलकर सहलार वाहिका (Common salivary duct) का निर्माण करती है। यह अधोग्रसनी (hypopharynx) की अधर सतह पर खुलती है। लार वाहिकाओं तथा आशयी वाहिकाओं में क्यूटिकल के बने स्प्रिंग जैसे छल्ले पाये जाते हैं।

पाचन की कार्यकी (Phyriology of Digestion)-
कॉकरोच एक सर्वाहारी (Omnivorous) प्राणी है। यह कपड़ा, कागज, रोटी, मांस, मृत, कीड़े-मकोड़े, स्वयं की निर्मोचित क्यूटिकल व अनाज के दानों का उपयोग भोजन के रूप में करता है।

1. भोजन का अन्तर्ग्रहण (Ingestion)-
कॉकरोच रात्रिचर (nocturnal) प्राणी है व रात्रि में भोजन ग्रहण करता है। भोजन की तलाश श्रृंगिकाओं (Antenna) द्वारा की जाती है। भोजन को अग्र टांग लेब्रम व लेबियम की सहायता से पकड़ा जाता है तथा दोनों ओर के मैक्सिला के लेसिनिया भोजन को मेन्डीबल्स के बीच पकड़े रहते हैं। मेन्डीबल्स अभिवर्तनी (adductor) वे अपवर्तनी (abductor) पेशियों की सहायता से अनुप्रस्थ गति करके भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने का कार्य करते हैं।
लेसिनिया, गेलिया, ग्लॉसा व पेराग्लॉसा भोजन को काटते समय बाहर नहीं निकलने देते हैं।

2. भोजन का पाचन (Digestion of food)-
मुखगुहा में भोजन के साथ लार मिलाई जाती है। लार का श्लेष्मा भोजन को नम बनाता है। लार में भीगा हुआ भोजन ग्रसनी तथा ग्रसिका से होकर अन्नपुट में चला जाता है। भोजन क्रमानुकुंचन (Peristalsis) द्वारा अन्नपुट तक पहुँचाता है। लार में ऐमाइलेज, (amylase) काइटिनेज व सेल्यूलेज एन्जाइम पाये। जाते हैं। एमाइलेज स्टार्च का पाचन माल्टोज (Maltose) में कर देता

क्राप में मध्यान्त्र की ग्रन्थिल कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित एन्जाइम पेषणी (Gizzard) से होते हुए पहुँच जाते हैं। मध्यान्त्र द्वारा स्त्रावित जो क्राप में पाचन करते हैं, निम्न हैं

  • कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम-इन्वरटेज, माल्टेज, लेक्टेज।
  • प्रोटीन पाचक एन्जाइम-ट्रिपसिन, प्रोटिएजेज व पेप्टीडेज ।
  • वसा पाचक एन्जाइम-लाइपेज ।।

कीटों में पेप्पसीन नामक एन्जाइम नहीं पाया जाता है क्योंकि आहारनाल का pH अधिक होता है जबकि पेप्सीन कम pH पर कार्य करता है। भोजन का अधिकांश पाचन अन्नपुट (crop) में होता है। अन्नपुट से अर्धपचित भोजन पेषणी (Gizzard) में पहुँचता है। पेषणी के अग्र भाग में 6 क्यूटीक्यूलर दांतों द्वारा उसकी पिसाई की जाती है। पेषणी के पश्च भाग में स्थित सीटी व रोम चलनी (filter) की तरह कार्य करते हैं। फिल्टर होकर भोजन पेषणी से मध्यान्त्र में चला जाता है। बड़े कण पुनः पेषणी के अग्र भाग में पिसाई हेतु डाल दिये जाते हैं। मध्यान्त्र में पहुँचा भोजन स्टोमोडियल कपाट के कारण पुनः ऊपर की ओर नहीं जा पाता है ।।

पेषणी में इस प्रकार मुख्यतया यान्त्रिक पाचन (Mechanical digestion) पाया जाता है। मध्यान्त्र में भोजन के पहुँचते ही इसके चारों ओर पेरीटोफिक झिल्ली का स्रावण हो जाता है। मध्यान्त्र के अग्रभाग द्वारा हिपेटिक सीका द्वारा स्रावित एन्जाइम भोजन का पाचन करते हैं। अतः शेष पाचन मध्यान्त्र के अग्र भाग में पूर्ण होता है।

3. अवशोषण (Absorption)-
मध्यान्त्र व हिपेटिक सीका के द्वारा पचित भोजन का अवशोषण होता है। आवश्यकता से अधिक वसा, ग्लाइकोजन व ऐल्ब्यूमिन का संग्रहण वसाकाय (Fatbodies) में किया जाता है।

4. बहिक्षेपण (Egestion)-
इलियम की क्यूटिकल पर पाये जाने वाले शूक व कंटिकाएँ पेरीट्रोफिक झिल्ली को फाड़ देते हैं।

मलाशय के मलाशय अंकुर (Rectal Papillac) जल व लवण अवशोषण कर देते हैं। जल का अवशोषण जलनियमन में सहायक हैं। जल व लवण के अवशोषण के बाद पचित भोजन छोटी-छोटी गोलियों के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इन गोलियों का त्याग, गुदा की संकोचक पेशी (Sphinctor Muscle) के संकुचन द्वारा हो जाता है।

प्रश्न 3.
कॉकरोच में श्वसनांग कौन से होते हैं। श्वसन तंत्र का चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच में श्वसन के लिए विशेष संरचनाएँ पायी जाती हैं जिन्हें श्वास नलियाँ या ट्रेकिया (Trachea) कहते हैं। इसके रक्त में हीमोग्लोबिन का अभाव होता है अतः यह O2 को विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य नहीं करता है। इसमें श्वसनतन्त्र स्वयं अपनी नलिकाओं द्वारा O2 ऊतकों तक पहुँचाता है।

कॉकरोच को श्वसनतन्त्र श्वसन रन्ध्र (spiracles) तथा श्वसन नलिकाओं (trachea) से मिलकर बना होता है।

श्वसन रन्ध्र (Spiracles)-
कॉकरोच में दस जोड़ी श्वसन रन्ध्र पाये जाते हैं जो शरीर की अधर सतह पर पाये जाते हैं। इनमें दो जोड़ी वक्ष भाग तथा आठ जोड़ी उदर भाग में स्थित होते हैं। प्रत्येक श्वसन रन्ध्र पर एक काइटिनी छल्ला पाया जाता है। जिसे परिरन्ध्र पट्ट या पेरीट्रीम (Peritreme) कहते हैं। श्वसन रन्ध्रों में रोम पाये जाते हैं। जिनसे छनकर वायु श्वास नलिकाओं में जाती है। प्रत्येक श्वसन रन्ध्र एक फूले हुए प्रकोष्ठ में खुलता है जिसे अलिन्द या एट्रियम या श्वसन कोष्ठ (Trachcal chamber) कहते हैं। श्वसन रन्ध्रों को कपाटों (valves) की सहायता से बन्द भी किया जा सकता है। प्रत्येक श्वसन रन्ध्र श्वास नलिका (Trachea) में खुलता है।
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श्वास नलिकाएँ या ट्रेकिया (Trachca)-
कॉकरोच के शरीर में श्वास नलियों (Trachca) का एक जाल बिछा रहता है। प्रत्येक रन्ध्र महाश्वासनली या महावातक (tracheal trunks) में खुलते हैं। कॉकरोच में तीन जोड़ी अनुदैर्ध्य महाश्वास नलियाँ पायी जाती हैं। इनमें से एक जोड़ी पाश्र्वीय, एक जोड़ी पृष्ठीय तथा एक जोड़ी अधरीय होती है। उदरीय श्वसन रन्ध्र मुख्य रूप से पाश्र्वीय महाश्वास नलियों में खुलते हैं। ये महाश्वास नलियाँ आपस में अनुप्रस्थ संधायिओं द्वारा जुड़ी रहती हैं। प्रत्येक महाश्वास नली से अनेक श्वासवाहिकाएँ निकलती हैं, जो अन्त में श्वास नलिका अन्तिम कोशिका (tracheal end cell) में समाप्त होती है। इन कोशिकाओं में से आगे की तरफ बहुत सूक्ष्म नलिकाएँ निकलती हैं। जिन्हें श्वास नलिकाएँ या लघुवातक या ट्रेकियोल्स (tracheoles) कहते हैं। ये ट्रेकियोल्स अन्य सिरों द्वारा ऊतकों की कोशिकाओं में समाप्त होती हैं। इन नलिकाओं में ऊतक द्रव भरा रहता है।

श्वसन क्रियाविधि (Mechanism of Respiration) –
कॉकरोच में श्वसन क्रिया अन्तःश्वसन तथा बाह्य श्वसन रन्ध्रों द्वारा होती है। बाह्य श्वसन एक सक्रिय क्रिया है जबकि अन्तःश्वसन निष्क्रिय क्रिया होती है। श्वसन क्रिया उदरीय पेशियों के लयबद्ध संकुचन व फैलाव से नियंत्रित की जाती है। पेशियों के फैलाव से वायु भीतर प्रवेश करती है तथा संकुचन से वायु बाहर निकलती है। अन्तःश्वसन के दौरान वायु श्वसन रन्ध्रों में से होकर श्वास नलियों (trachea) तथा श्वास नलिकाओं (Tracheoles) में पहुँच जाती है, जिनमें ऊतक द्रव भरा रहता है। वायु में उपस्थित ऑक्सीजन इस द्रव में घुल जाती है तथा विसरित होकर ऊतक कोशिकाओं में पहुँच जाती है। श्वास नलिकाओं में जो द्रव भरा रहता है, वह परासरण दबाव के कारण आगे बढ़ता या पीछे हटता रहता है। उपापचयी पदार्थों के संघनन के कारण दाब अधिक बढ़ जाता है। जिनके कारण श्वास नलिकाओं के अन्तिम सिरों पर द्रव बाहर विसरित होने लगता है और इसका स्थान ग्रहण करने के लिए बाहर के द्रव के साथ वायु भी नलिकाओं में अन्दर की तरफ विसरित हो जाती है।
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प्रश्न 4.
कॉकरोच के हृदय का नामांकित चित्र बनाते हुए हृदय के कार्य प्रणाली का वर्णन कजिए।
उत्तर-
कॉकरोच में रक्त का परिसंचरण स्पष्ट वाहिनियों एवं केशिकाओं (vessels and capillaries) में नहीं होता है किन्तु रक्त सीधे ही विभिन्न आंतरांगों के सम्पर्क में आता है। रक्त अनियमित आकार के रक्तपात्रों (Blood sinuses) में रहता है। ये रक्तपात्र विभिन्न आंतरांगों के चारों ओर पाये जाते हैं। वास्तव में ये रक्तपात्र कॉकरोच की परिवर्तित देहगुहा (Coelom) है क्योंकि जन्तु की देहगुहा रक्त से भरी रहती है। इसलिए इसे हीमोसील (haemocoel) की संज्ञा दी जाती है तथा परिसंचरण तन्त्र को हीमोसीलोमिक तन्त्र (haemocoelomic system) भी कहते हैं। इस प्रकार का रक्त परिसंचरण जिसमें स्पष्ट वाहिनियों का अभाव होता है तथा रक्तपात्रों में उपस्थित रहकर सीधे ही आंतरांगों के सम्पर्क में आता है, खुला परिसंचरण तन्त्र (Open circulatory system) कहलाता है।

रक्त (Blood)-
कॉकरोच के रक्त में हीमोग्लोबिन (haemoglobin) का अभाव होता है तथा यह रंगहीन होता है और इसे हीमोलिम्फ (haemolymph) कहते हैं। हीमोलिम्फ के प्लाज्मा में श्वेत रक्त कणिकाएँ अर्थात्, हीमोसाइट्स स्थित होती हैं। कणिकाएँ दो प्रकार की होती हैं-(1) फेगोसाइट्स (Phagocytes) तथा (2) प्रोल्यूकोसाइट्स (Proleucocytes) जो अपेक्षाकृत छोटी होती हैं। क्योंकि हीमोलिम्फ में हीमोग्लोबिन का अभाव होता है इसलिए श्वसन अर्थात् O2 व CO2 के लेन-देन में भाग नहीं लेता है परन्तु सम्भवतया केवल श्वेत कणिकाओं द्वारा हानिकारक पदार्थों का नाश होता है एवं पोषक पदार्थों को विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है।

रक्त-पात्र (Blood Sinuses)-
कॉकरोच की देहगुहा अर्थात् । हीमोसील दो महीन झिल्लियों द्वारा तीन क्षैतिज आयाम (Horizontal longitudinal) पात्रों (sinuses) में बंटी होती है। इन झिल्लियों को विभाजक पट्टियाँ (diaphragms) कहते हैं। सबसे ऊपरी पृष्ठ-पात्र जो अपेक्षाकृत संकरा होता है तथा हृदय को घेरे होता है, पेरीकार्डियल पात्र (Pericardial Sinus) कहलाता है। मध्य का सबसे चौड़ा पात्र जो आहारनाल तथा आंतरांगों को घेरे होता है, पेरीविसरल पात्र (Perivisceral Sinus) कहलाता है। अधर का संकरा पात्र जो तन्त्रिका रज्जु को घेरे होता है, पेरीन्यूरल पात्र (Perineural Sinus) कहलाता है।
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पेरीकार्डियल तथा पेरीविसरले पात्रों के बीच की विभाजक पृष्ठ पट्टी (dorsal diaphragm) कहलाती है तथा पेरीविसरल तथा पेरीन्यूरल पात्रों की खांच की विभाजक पट्टी अधर पट्टी (ventral diaphragm) कहलाती है। दोनों पट्टियों पर अनेक सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिनके द्वारा रक्त एक पात्र से दूसरे पात्र में जाता है।

पेरीकार्डियल पात्र तथा पृष्ठीय टरगा के भीतरी तल को 13 जोड़ी त्रिकोणाकार पंखे रूपी पेशियाँ परस्पर जोड़े रहती हैं। इन पेशियों को एलेरी पेशियाँ (alary muscles) कहते हैं। ये पेशियाँ हृदय की कार्यविधि से सम्बन्धित होती हैं।

हृदय (Heart)-
देहभित्ति के नीचे कॉकरोच की मध्यपृष्ठ रेखा (mid dorsal line) पर अग्र अन्त से पश्च अन्त तक एक सफेद लम्बी-नलिका फैली होती है, जिसे हृदय (Heart) कहते हैं। कॉकरोच का हृदय वक्ष के पहले खण्ड के उदर के अन्तिम
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खण्ड तक फैला रहता है। हृदय की भित्ति पेशीयुक्त होती है एवं हृदय स्पंदनशील (Pulsatile) होता है। यह एक मिनट में 49 बार धड़कता है। हृदय 13 छोटेछोटे समखण्डीय वेश्मों (Segmental Chambers) में बंटा होता है। देखिये ऊपर चित्र में। प्रत्येक वेश्म कीप-रूपी (Funnel-like) होता है तथा इसके पिछले चौड़े भाग में एक जोड़ी पाश्र्वीय छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें आस्टिया (Ostia) कहते हैं। ऑस्टिया पर एकतरफा कपाट (One-way Valve) लगे होते हैं जो रक्त को केवल हीमोसील से हृदय में जाने देते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वेश्म तथा अगले वेश्म के बीच भी कपाट (Valves) होते हैं जो रक्त को हृदय में केवल पीछे से आगे जाने देते हैं।
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हृदय को पश्च-सिरा बन्द होता है तथा अग्र छोर खुला होता है। जो प्रोथोरेक्स के अगले भाग में एक संकरी नालिका के रूप में होता है। जिसे अग्रमहाधमनी (anterior aorta) कहते हैं जो ग्रीवा से निकलकर सिर की गुहा में खुलती है।

कॉकरोच का हृदय न्यूरोजेनिक (neurogenic) प्रकार का होता है। परिसंचरण (Circulation)-
जब पेरिकार्डियल पात्र की एलेरी पेशियों में संकुचन होता है तब रक्त पेरीन्यूरल पात्र से पेरीविसरल पात्र में आता है तथा यहाँ से यह पेरीकार्डियल पात्र में चला जाता है तथा अन्त में आस्टिया द्वारा हृदय में चला जाता है। अब हृदय की भित्ति की पेशियों में स्वयं संकुचन होता है तथा रक्त अग्र महाधमनी (anterior aorta) से सिर की गुहा में पहुंचता है। यहाँ से रक्त पेरीविसरल पात्र में चला जाता है तथा साथ ही पेरीन्यूरल पात्र में भी चला जाता है। इस परिसंचरण में शरीर के विभिन्न अंग रक्त के सम्पर्क में आते हैं।
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स्पन्दनशील एम्पुला (Pulsatile ampulla)-
सिर पर स्थित प्रत्येक एन्टिना (antenna) के आधार पर एक छोटा-सा स्पन्दनशील एम्पुला (pulsatile ampulla or vesicle) स्थित होता है जिसके स्पंदन से रक्त ऐन्टिनी में जाता रहता है।

प्रश्न 5.
कॉकरोच में संयुक्त नेत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच के शरीर पर विभिन्न प्रकार के उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए अनेक प्रकार के ग्राही अंग (Receptors) पाये जाते हैं। इनकी संवेदी इकाई को संवेदीका कहते हैं। सामान्यतः दो प्रकार के ग्राही अंग अथवा संवेदांग पाये जाते हैं

(1) संवेदिका (Sensillae)-
कॉकरोच में ये हाइपोडर्मिस में पाये जाते हैं तथा सम्पूर्ण शरीर में स्थित होती है। ये निम्न है

  • स्पर्शग्राही,
  • स्वादग्रोही,
  • रसायनग्राही,
  • श्रवणग्राही
  • प्रॉप्रिओसेप्टर

(2) नेत्र (Eyes)-
ये दो प्रकार के होते हैं-सरल व संयुक्त नेत्र

  • सरल नेत्र (Simple eye)-
    कॉकरोच में सरल नेत्र भी सिर भाग पर अवशेषी रूप में पाये जाते हैं । ये अविकसित तथा अक्रियाशील होते हैं और फेनेस्ट्रा (Fenistra) के रूप में स्थित होते हैं। ये प्रकाश के प्रति संवेदनशील है।
  • संयुक्त नेत्र (Compound Eye)-
    सिर के पाश्वों में एकएक, बड़े व काले तथा वृक्काकार से (kidney-shaped) संयुक्त नेत्र कॉकरोच के सबसे महत्त्वपूर्ण और जटिल संवेदांग हैं तथा जन्तु को प्रकाश ज्ञान (photo-reception) कराते हैं। प्रत्येक नेत्र की सतह कुछ। उभरी हुई और लगभग 2000 छोटे-छोटे षट्भुजीय (hexagonal) क्षेत्र में बंटी होती है जिन्हें फलिकाएँ या फैसेट्स कहते हैं।
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    प्रत्येक फैसेट के ठीक नीचे भ्रूण की एक्टोडर्म से बनी कई छोटी-छोटी रचनाओं की श्रृंखला होती है जो अपनी फैसेट के साथ दृष्टिज्ञान की एक इकाई (unit) बनाती है। इकाई को नेत्रांशक या ओमेटीडियम (ommatidium) कहते हैं। इस प्रकार कॉकरोच के प्रत्येक संयुक्त नेत्र में दृष्टि ज्ञान की 2000 इकाइयाँ या ओमेटीडियम होते हैं।

(1) अंशदर्श अर्थात् एपोजीशन दृष्टि (Apposition or Masaic Vision)-
इस प्रकार का प्रतिबिम्ब बनने की क्रियाविधि में प्रत्येक नेत्रिका/ओमेटीडियम के रंगा खोल (pigment sheath) नेत्रिका को पूर्ण रूप से घेरे होती हैं अर्थात् प्रत्येक नेत्रिका अन्य नेत्रिकाओं से पृथक् होती है तथा इसमें आई प्रकाश की किरणें दूसरों में नहीं जा पाती हैं।

जब कोई वस्तु कॉकरोच के संयुक्त नेत्र के सामने आती है तब इसमें से निकली किरणें नेत्र के कार्निया से होकर अनेक नेत्रिकाओं में घुसती है। प्रकाश की किरण नेत्रिकाओं में कई कोणों से आती है। यदि

प्रकाश की कोई तिरछी किरण किसी नेत्रिका में घुसती है तो यह नेत्रिका के रंगा खोलों से टकराकर समाप्त हो जाती है, परन्तु यदि प्रकाश की कोई सीधी किरण नेत्रिका में घुसती है तो यह इसके फोकसिंग भाग से होकर सीधी संवेदी भाग में चली जाती है और इस नेत्रिका में केवल वस्तु के भाग का प्रतिबिम्ब बनता है जिससे यह सीधी किरण निकलती है। इस प्रकार पूर्ण वस्तु के विभिन्न छोटे-छोटे भागों के पृथक् प्रतिबिम्ब नेत्र की विभिन्न नेत्रिकाओं (ommatidium) में बनते हैं। इस पृथक् आंशिक प्रतिबिम्बों के सम्मिलित से पूर्ण वस्तु का एक संयुक्त प्रतिबिम्ब बनता है। इस प्रकार के प्रतिबिम्ब को अंशदर्श प्रतिबिम्ब (Apposition or mosaic vision) कहते हैं। अंशदर्श प्रतिबिम्ब अपेक्षाकृत उपढापन प्रतिबिम्ब से स्पष्ट होता है। अंशदर्श प्रतिबिम्ब बनाने के लिए प्रकाश का तेज होना जरूरी होता है तथा इसलिए यह प्रतिबिम्ब प्रायः उन्हीं कीटों में बनता है जो प्रायः दिन में निकलते हैं।
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(2) उपढापन अर्थात् सुपरपोजीशन दृष्टि (Super position Vision)-
इस प्रकार के प्रतिबिम्ब बनने की क्रिया-विधि में ओमेटीडियम के रंगा खोल (pigment sheath) सिकुड़कर अपने-अपने आधार भागों (basal region) में सीमित हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप प्रकाश की किरणें एक नेत्रिका से दूसरी नेत्रिका में तिरछी होने पर भी चली जाती हैं। अर्थात् प्रकाश की तिरछी तथा सीधी सभी प्रकार की किरणें नेत्रिकाओं में चली जाती हैं तथा सभी के प्रतिबिम्ब बन जाते हैं। परन्तु ये अनेक प्रतिबिम्ब एक दूसरे को ढांक लेते हैं जिससे वस्तु का पूर्ण प्रतिबिम्ब स्पष्ट होने के बजाय धुंधला बनता है। इस प्रकार के प्रतिबिम्ब को उपढापन प्रतिबिम्ब (Super position Vision) कहते हैं। उपढापन प्रतिबिम्ब मन्द प्रकाश में बनता है तथा प्रायः उन कीटों में बनता है जो रात्रिचर (nocturnal) होते हैं । यद्यपि कॉकरोच रात्रिचर है तथा प्रायः अन्धेरे में ही अपने निवास स्थान से बाहर निकलता है परन्तु इसके संयुक्त नेत्रों में केवल अंशदर्श प्रतिबिम्ब (apposition image) ही बनता है, क्योंकि इसकी नेत्रिकाओं/ओमेटिडीय (ommatidia) के रंगा खोलों में सिकुड़ने की क्षमता नहीं होती है तथा प्रत्येक नेत्रिका संयुक्त नेत्र की अन्य नेत्रिकाओं से पृथक् रहती है।

प्रश्न 6.
कॉकरोच के नर व मादा जनन तंत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कॉकरोच एक लिंगी जन्तु है अर्थात् नर व मादा प्राणी अलगअलग पाये जाते हैं। नर व मादा प्राणी को बाहरी लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है इसे लैंगिक द्विरुपता (Sexual dimorphism) कहते हैं।

1. नरजनन तन्त्र (Male Reproductive system)-
नर कॉकरोच के जननांग (reproductive organs) एक जोड़ी वृषण (testes), शुक्रवाहिकायें (vas deference), स्खलन वाहिनी (ejaculatory duct), छत्रारूपी ग्रन्थि (Mushroom (Gland) तथा फैलिक ग्रन्थि (phallic gland) होते हैं। इसके अतिरिक्त नर में गोनोपोफाइसिस (gonopophysis) नामक बाह्य जननांग (External genitalia) भी होते हैं।
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  • वृषण (Testes) – नर कॉकरोच के जनन (gonads) अर्थात् प्रमुख जननांग एक जोड़ी वृषण होते हैं जो उदर के दोनों पाश्र्यों में चौथे से छठे खण्ड तक फैले रहते हैं। प्रत्येक वृषण एक लम्बी एवं पतली बेलनाकार रचना होती है जो तीन पिण्डों (lobes) की बनी होती है तथा इसका प्रत्येक पिण्ड अनेक छोटे-छोटे पिण्डकों (lobules) को बना होता है। प्रत्येक वृषण के पश्च सिरे से एक शुक्रवाहिका (Vas deference) निकलती है।
  • शुक्रवाहिकायें (Vasdeference) – ये पतली, लम्बी धागे के समान होती हैं। दोनों शुक्रवाहिकाएँ पीछे बढ़कर उदर के पिछले अन्त के मध्य में परस्पर मिल जाती हैं तथा एक लम्बी चौड़ी स्खलने वाहिनी (ejaculatory duct) में खुल जाती हैं।
  • स्खलन वाहिनी (Ejaculatory duct) – स्खलन वाहिनी उदर के मध्य रेखा पर पीछे बढ़कर शरीर के पश्च अन्त पर एक नर जनन छिद्र (genital aperature) द्वारा बाहर को खुल जाती है।
  • छत्रा रूपी ग्रन्थि अथवा यूट्रिक्यूलस (Mushroom gland or utriculus) – प्रत्येक शुक्रवाहिका के अन्तिम सिरे पर अर्थात् जहाँ पर यह दूसरी ओर की शुक्रवाहिका मिलती है वहाँ पर इन्हीं से संलग्न एक बड़ी सफेद रंग की सहायक ग्रन्थि (accessory gland) स्थित होती है। जो छत्रा रूपी होती है। इस ग्रन्थि को छत्रा रूपी ग्रन्थि अथवा यूट्रिक्यूल्स (Mushroom gland or utriculus) कहते हैं। इसमें तीन प्रकार की नलिकायें होती हैं-
  1. सबसे भीतरी भाग छोटी एवं गोल नलिकायें जिन्हें शुक्राशय कहते हैं, ये शुक्रवाहिकायें वृषणों से लाये शुक्राणुओं को एकत्रित करती हैं।
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  2. अग्र भीतरी भाग की ग्रन्थिल छोटी नलिकाएँ (small tubules) अथवा यूट्रीकुली ब्रिविओर्स। इनके स्त्राव से शुक्राणुओं का पोषण होता है।
  3. बाहर की ग्रन्थिल लम्बी नलिकाएँ अथवा यूट्रीकुली मेजेरस-इसके स्त्राव से शुक्राणुधर (Spermatophore) की आन्तरिक परत का निर्माण होता है।
  • फैलिक ग्रन्थि (Phallic gland or conglobate gland)-छत्रा रूपी ग्रन्थि व स्खलन वाहिनी के अधर तल पर एक तुम्बाकार थैली रूपी फैलिक ग्रन्थि स्थित होती है। फैलिक ग्रन्थि का पिछला भाग संकरा होकर फैलिक नलिका (pahllic duct) में परिवर्तित हो जाता है। फैलिक नलिका शरीर के पश्च सिरे पर एक फैलिक छिद्र द्वारा जनन छिद्र के निकट बाहर को खुल जाती है।
  • गोनेपोफाइसिस (Gonapophyses)-ये रचनायें शरीर के पिछले सिरे पर जनन छिद्र के चारों ओर नर कॉकरोच के बाह्य जननांग (external genitalia) बनाती हैं। इनको नर गोनेपोफाइसिस के अतिरिक्त फैलोमियर्स (Phallomeres) भी कहते हैं।

फैलोमियर्स असममित होते हैं तथा काइटिन के बने होते हैं। ये संख्या में तीन होते हैं।
(i) दाहिना फैलोमियर
(ii) बायां फैलोमियर
(iii) अधर फैलोमियर।

(i) दाहिना फैलोमियर (Right phallomere) – द्विपिंडकीय (bilobed) होता है तथा इसका दाहिना पिण्ड दो झिल्ली रूपी चपटी प्लेटों का बना होता है जो आमने-सामने स्थित होती हैं तथा बायां पिण्ड (left lobe) चपटा होता है परन्तु कठोर होता है तथा इसके पिछले किनारे पर आरी समान छोटे-छोटे दांत होते हैं, इसके अतिरिक्त इसके घूमे हुए पिछले सिरे पर दो बड़े दांत होते हैं। दांतों के कारण इस पिण्ड को कंटक पिण्ड अर्थात् सैरेट पिण्ड (Serate lobe) कहते हैं। सैरेट पिण्ड के आधार भाग से एक हँसिया रूपी बड़ा कंटक (hook) निकला होता है।
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(ii) बायां फैलोमियर (Left Phallomere) का आधार भाग चपटा एवं चौड़ा होता है। इसमें चार प्रवर्ध रूपी पिण्ड निकले दिखाई देते हैं।
(a) टिटिलेटर (Titillator)-यह बायीं ओर पाया जाता है व इस पर एक हुक लगा रहता है।
(b) स्यूडोपेनिस (Pseudopenis)-यह एक लम्बा पिण्ड होता है जिसका अग्रसिरा फूला हुआ व हथौड़े के समान होता है।
(c) एस्पेरेट पिण्ड (Asperate lobe)-यह एक कोमल पिण्ड है व जिस पर एक छोटा हुक लगा होता है। इसके पास फैलिक नलिका खुलती है।
(d) एक्यूटोलोब (Acutolobe)-यह दायीं ओर पाया जाता है। व इस पर बड़ा हुक पाया जाता है।

(iii) अधर फैलोमियर (Venteral phallormere) – यह एक भूरे रंग की चपटी प्लेट के रूप में होता है। यह दाहिने फैलोमियर के ठीक नीचे स्थित होता है। नर जनन छिद्र अधर फैलोमियर पर खुलता है।

2. मादा जननांग (Female Reproductive System)-
मादा कॉकरोच के जननांग (reproductive organs) एक जोड़ी अण्डाशय (ovaries), अण्डवाहिनी (Oviducts), योनि (vagina), शुक्रग्राहिका (spermatheca) तथा कोलेटीरियल ग्रन्थियाँ (collaterial glands) होते हैं।
इसके अतिरिक्त मादा में भी बाह्य जननांग अथवा गोनोपोफाइसिस (gonopophyses) उपस्थित होते हैं।

  • अण्डाशय (Ovaries) – मादा कॉकरोच के जनद (gonads) अर्थात् प्रमुख जननांग एक जोड़ी अण्डाशय (ovaries) होते हैं । अण्डाशय उदर के दोनों पाश्र्यों में लगभग दूसरे से छठे खण्ड तक फैले रहते हैं। प्रत्येक अण्डाशय में आठ अण्डिकाएँ (Ovarioles) होती हैं।

प्रत्येक अण्डिका की रचना तीन भागों में विभेदित रहती हैसीमान्त तन्तु (Marginal filament), जर्मेरियम (Germarium) एवं विटलेरियम (Vitellarium)।
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सीमान्त तन्तु अग्र सिरे पर पतले तन्तु के समान होता है । जर्मेरियम मध्य भाग होता है। इसमें जनन कोशिकाओं का निर्माण होता है। विटलेरियम अन्तिम भाग होता है जो अपेक्षाकृत चौड़ी नली के रूप में होता है। इसमें अण्डाणु एक पंक्ति में विन्यासित रहते हैं। अण्डाणु एक पंक्ति में विन्यासित रहते हैं। अण्डाणु तलाभिसारी क्रम में विन्यासित रहते हैं। इस तरह अण्डिका पेनोइस्टिक (Panoistic) प्रकार की होती है।

सभी अण्डिकाएँ अग्र सिरों से स्वतन्त्र परन्तु पश्च सिरों से परस्पर संयुक्त रहती हैं।

  • अण्डवाहिनी (Oviduct)-प्रत्येक अण्डाशय के पश्च सिरे से छोटी परन्तु चौड़ी अण्डवाहिनी निकलती है। दोनों ओर की अण्डवाहिनियाँ मध्य रेखा की ओर बढ़कर योनि (Vagina) में खुलती हैं।
  • योनि (Vagina) – यह एक चौड़ी नली होती है। इसकी भित्ति पेशीय एवं ग्रन्थिल होती है। यह पश्च सिरे पर मादा जनन छिद्र द्वारा जनन वेश्म में खुलती है।
  • शुक्रग्राहिका (Spermatheca) – योनि के पृष्ठ तल पर एक द्विपालित शुक्र ग्राहिका स्थित रहती है। इसकी बायीं पाली दायीं पाली की तुलना में बड़ी होती है। इस रचना में मैथुन क्रिया द्वारा नर से प्राप्त शुक्राणुओं को संग्रह किया जाता है। यह जनन वेश्म (Genital chamber) में शुक्रग्राहिका अंकुर (Spermathecal papilla) पर एक छिद्र द्वारा खुलती है।
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  • कोलेटरियल ग्रन्थियाँ (Callaterial glands) – जनन वेश्म के पृष्ठ पर एक जोड़ी अत्यन्त शाखान्वित कोलेटरियल ग्रन्थियाँ उपस्थित होती हैं। बायीं कोलेटरियल ग्रन्थि सुविकसित एवं अधिक शाखित होती है। इससे घुलनशील प्रोटीन का स्त्राव होता है। दायीं कोलेटरियल ग्रन्ति अल्पविकसित होती है। इससे डाइहाइड्रोक्सी फिनोल (dihydroxy phenol) का स्त्राव होता है। दोनों ओर की ग्रन्थियाँ अपनी वाहिनी नलिकाओं द्वारा परस्पर मिलकर एक सह छिद्र (Common aperture) द्वारा जनन वेश्म के पृष्ठ पर ही खुल जाती हैं। इनका स्त्राव अण्डकवच या ऊथीका (ootheca) बनाता है।
  • जनन वेश्म (Genital chamber)-मादा कॉकरोच में उदर का आठवां एवं नवां स्टर्नम शरीर में धंसकर जनन वेश्म का निर्माण करता है। सातवां स्टर्नम एक जोड़ी नौकाकार (Boat shaped) प्लेटों में विभाजित रहकर गाइनोवेव्यूलर प्लेटों (Gynovalvular plates) बनाता है। यह रचना जनन वेश्म के छिद्र को ढके रहती हैं। जनन वेश्म दो भागों में विभाजित रहता है। इसके अग्र भाग को जननिक कोष्ठ (Genital chamber) एवं पश्च भाग को ऊथीकल कक्ष (oothecal chamber) कहते हैं । निषेचन तथा ऊथीका का निर्माण ऊथीकल कक्ष में ही होता
  • गोनोपोफाइसिस (Gonopophysis)-मादा कॉकरोच के जनन वेश्म में तीन जोड़ी गोनोपोफाइसिस पाये जाते हैं । गोनोपोफाइसिस अण्डनिक्षेपक (ovipositor) का कार्य करते हैं। ये निषेचित अण्डों को नवनिर्माणाधीन ऊथीका में जमाते हैं।

(i) स्परमेटोफोर का निर्माण (Formation of spermatophore)-
कॉकरोच के वृषणों से शुक्रजनन द्वारा परिपक्व शुक्राणु बनकर शुक्रवाहिकाओं से होकर छत्रा रूपी ग्रन्थि (mushroom gland) के शुक्राशयों में जमा होते हैं
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प्रत्येक शुक्राशय (Seminal vesicle) में स्थित शुक्राणु परस्पर चिपककर एक गुच्छा अथवा समूह बना लेते हैं। शुक्राणुओं के इस समूह को स्परमेटोफोर (Spermatophore) कहते हैं।

(ii) मैथुन तथा निषेचन (Copulation & fertilization)-
कॉकरोच में मैथुन क्रिया-कॉकरोच में मार्च से सितम्बर तक प्रजनन काल होता है। मैथुन क्रिया रात के समय ही होती है। यह पुच्छ-पुच्छ अवस्था में होती है। प्रजनन काल में मादा कॉकरोच कामोत्तेजक फीरोमोन से आकर्षित होकर नर से मैथुन करती है। नर कॉकरोच फैलोमियर्स के द्वारा मादा जनन छिद्र को खोलकर शुक्राणुधर को जनन कक्ष में प्रवेश कराता है। शुक्राणुधर स्परमैथिका अंकुर से चिपक जाता है। इस कारण शुक्राणु शुक्रग्राही में प्रवेश कर जाते हैं तथा खाली शुक्राणुधर को बाहर निकाल दिया जाता है। कॉकरोच में मैथुन क्रिया एक घण्टे में पूर्ण होती है।

मैथुन क्रिया के फलस्वरूप दोनों अण्डाशय से 16 अण्डे जननकक्ष में आ जाते हैं। ये 8–8 की दो पंक्तियों में अण्डनिक्षेपक में व्यवस्थित हो जाते हैं। यहाँ शुक्राणुओं के द्वारा आन्तरिक निषेचन जनन कक्ष में होता

(iii) ऊथीका का निर्माण (Formation of ootheca)-
कॉकरोच के निषेचित अण्डे जनन कक्ष में प्रवेश करते हैं। यहाँ कॉलेटरियल ग्रन्थि से स्कलेरोप्रोटीन (scaleroprotein) का स्राव होता है, जिससे ऊथीका का निर्माण होता है। ऊथीका के निर्माण में लगभग 20 घण्टे का समय लगता है। एक मादा जन्तु अपने जीवनकाल में 20-40 तक ऊथीका का निर्माण करती है। कुछ दिनों के बाद मादा ऊथीको को अन्धेरे, सूखे तक गर्म स्थान रख देती है। ऊथीका के ऊपर काइटिन का आवरण तथा माइक्रोपाइल पाया जाता है।
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(iv) भ्रूणीय परिवर्धन (Embryonic development)-
कॉकरोच में भ्रूण का परिवर्धन (Embryonic development) अण्ड कवच या ऊथीका में लगभग 1-3 महीने में पूरा होता है तथा पेरिब्लास्टुला का निर्माण सतही विदलन से होता है। इसके बाद यह गेस्टुला अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। और अन्तत: तरुण कॉकरोच का निर्माण होता है। इसमें लार्वा अवस्था नहीं होती है। तरुण कॉकरोच अवस्था कोमल व पंखविहीन होती है तथा इस अवस्था में जननांगों का विकास नहीं होता है। इन्हें निम्फ (Nymph) कहते हैं।

(v) कायान्तरण (Metamarphosis)-
कॉकरोच में भ्रूणीय परिवर्धन के फलस्वरूप पहले निम्फ (Nymph) बनता है। निम्फ में वयस्क के निर्माण में 6 माह से 2 साल तक का समय लग जाता है। इसके कायान्तरण में 7-10 बार त्वक् पतन या निर्मोचन होता है। निर्मोचन में बाह्य कंकाल पृथक् हो जाता है तथा शारीरिक वृद्धि से नया कंकाल बन जाता है। अन्तिम निर्मोचन के बाद 4-6 दिनों में जननांग विकसित हो जाते हैं। इसका जीवन काल 2-4 वर्षों का होता है।

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