RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 37 मेंढक

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 37 मेंढक

RBSE Class 11 Biology Chapter 37 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 37 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मेंढक किस वर्ग का प्राणि है
(अ) मेमैलिया
(ब) एम्फीबिया
(स) रैप्टिलिया
(द) पिसीज

प्रश्न 2.
मेंढक है
(अ) मांसाहारी
(ब) शाकाहारी
(स) सर्वाहारी
(द) फलाहारी

प्रश्न 3.
मेंढक में हृदय है
(अ) द्विकोष्ठीय
(ब) चार कोष्ठीय
(स) त्रिकोष्ठीय
(द) एककोष्ठीय

प्रश्न 4.
मेंढक में श्वसन होता है
(अ) त्वचा द्वारा
(ब) मुखगुहा द्वारा
(स) फुफ्फुस द्वारा
(द) उपरोक्त सभी के द्वारा

प्रश्न 5.
मेंढक में निषेचन होता है
(अ) आन्तरिक
(ब) बाह्य
(स) कभी बाह्य कभी आन्तरिक
(द) न बाह्य न आन्तरिक

प्रश्न 6.
मेंढक के डिंभक (लार्वा) का नाम है
(अ) टेडपाल
(ब) निम्फ
(स) टोरनेरिया
(द) बाईपिन्नेरिया

प्रश्न 7.
उत्सर्जी पदार्थ की प्रकृति के आधार पर मेंढक होता है
(अ) यूरिकोटेलिक
(ब) अमोनोटेलिक
(स) यूरियोटेलिक
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 8.
मेंढक में कितनी कपाल तंत्रिकाएँ (Cranial nerves) पाई जाती
(अ) 12 जोड़ी
(ब) 10 जोड़ी
(स) 8 जोड़ी
(द) 14 जोड़ी

उत्तरमाला
1. (ब)
2. (अ)
3. (स)
4. (द)
5. (ब)
6. (अ)
7. (स)
8. (ब)

RBSE Class 11 Biology Chapter 37 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय मेंढक को सामान्य रूप से किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर-
भारतीय मेंढक को सामान्य रूप से राना टिग्रीना (Rana Tigrina) के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2.
मेंढक का वैज्ञानिक नाम बताइये।
उत्तर-
मेंढक का वैज्ञानिक नाम राना टिग्रीना है।

प्रश्न 3.
भारतीय मेंढक (राना टिग्रीना) का आवास स्थान बताइये।
उत्तर-
गड्ढे, तालाब भारतीय मेंढक का आवास स्थान है।

प्रश्न 4.
मेंढक को भोजन क्या है ?
उत्तर-
मेंढक मांसाहारी प्राणि है। इसका भोजन कीड़े, मकोड़े, मोलस्का संघ के प्राणि आदि है।

प्रश्न 5.
मेंढक की जिव्हा की विशेषता बताइये।
उत्तर-
मेंढक की जिव्हा का अगला भाग आगे की ओर से गुहा की निचली दीवार से जुड़ा रहता है, परन्तु पिछला भाग द्विशाखी (bifid) वे स्वतंत्र होता है।

प्रश्न 6.
मेंढक में परिसंचरण तंत्र किस प्रकार की होता है ?
उत्तर-
मेंढक में परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार (closed type) का होता है।

प्रश्न 7.
मेंढक में वृक्क किस प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
मेंढक में वृक्क मीसोनेफ्रॉस (mesonephros) प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 8.
मेंढक में परिवर्धन कहाँ पर होता है ?
उत्तर-
मेंढक में परिवर्धन शरीर से बाहर जल में होता है।

प्रश्न 9.
मेंढक के लार्वा का नाम बताइये।।
उत्तर-
मेंढक के लार्वा का नाम टेडपोल (Tadpole) है।

प्रश्न 10.
मेंढक में युग्मक (शुक्राणु व अंडाणु) किस संरचना द्वारा बाहर निकलते हैं।
उत्तर-
मेंढक में युग्मक (शुक्राणु व अंडाणु) अवस्कर द्वारा बाहर निकलते हैं।

प्रश्न 11.
मेंढक टर्र-टर्र की ध्वनि कैसे उत्पन्न करता है ?
उत्तर-
मेंढक टर्र-टर्र की वाक कोश (Vocal cord) से उत्पन्न करता है।

प्रश्न 12.
मेंढक के हृदय के किस कोष्ठ में शुद्ध व अशुद्ध रुधिर मिश्रित हो जाते हैं ?
उत्तर-
मेंढक के हृदय के निलय कोष्ठ में शुद्ध व अशुद्ध रुधिर मिश्रित हो जाते हैं।

प्रश्न 13.
मेंढक में नेत्र (Eyes) कैसे होते हैं ?.
उत्तर-
मेंढक के नेत्र बड़े, उभरे, गोल होते हैं।

प्रश्न 14.
मेंढक में मुख्य उत्सर्जी पदार्थ क्या होता है ?
उत्तर-
मेंढक में मुख्य उत्सर्जी पदार्थ यूरिया (Urea) होता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 37 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मेंढक के आवास एवं स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
यह जन्तु अलवणीय जल में पाया जाता है, जैसे-तालाब, पोखर, झील आदि। नदी के किनारे उन गड्ढों में, जहाँ नदी का जल रुका रहता है, मेंढक पाये जाते हैं। अलवण-जलीय जलाशयों के आसपास नम भूमि में भी पाये जाते हैं ताकि अपनी त्वचा को गीली रख सके। इस प्रकार यह एक उभयचरी (Amphibious) प्राणी है। यह असमतापी (coldblooded) प्राणी है।

प्रश्न 2.
मेंढक के बाह्य लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
बाह्य संरचना (Morphology)-मेंढक की त्वचा मुलायम, नम एवं लसलसी होती है।

  • आकार एवं परिमाप (Shape & Size) – मेंढक की आकृति त्रिशंकु के आकार की होती है। अग्र भाग थोड़ा नुकीला होता है तथा पश्च भाग थोड़ा गोलाकार होता है। राना टिग्रीना की लम्बाई 12-18 सेमी. तथा चौड़ाई लगभग 5-8 सेमी. होती है।
  • रंग (Colour) – मेंढक का रंग हरा तथा सिर पर अव्यवस्थित धारियाँ और धब्बे होते हैं। अधर सतह पर यह पूरी तरह से पीला होता है। नर का रंग थोड़ा गहरा होता है तथा पतला भी होता है।

इसका शरीर दो भागों में विभाजित होता है–(i) सिर (ii) धड़। ग्रीवा का इसमें अभाव होता है। सिर के अग्र भाग पर मुख पाया जाता है। प्रोथ के ऊपर एक जोडी नासाछिद्र होते हैं। सिर के पिछले चौडे भाग के दोनों ओर ऊपर की तरफ उभरे हुई दो बड़े-बड़े गोलाकार नेत्र स्थित होते हैं। नेत्र पर एक परिभाषी झिल्ली होती है जिसे निमेषक पटल कहते हैं। आँखों के थोड़ा पीछे की तरफ सिर के दोनों ओर कर्ण पटह (tympanic membrane) होते हैं।

धड़ भाग से दो जोड़ी पाद जुड़े होते हैं जिन्हें अग्रपाद व पश्चपाद कहते हैं । अग्रपाद पश्च पाद से छोटे होते हैं। अग्र पाद तीन भागों से बना होता है जिन्हें क्रमशः प्रगंड (upper arm), प्रकोष्ठ (fore arm), हाथ (hand) कहते हैं। इसके अग्रपाद में चार अंगुलियाँ होती हैं। नर मेंढक में हाथ की पहली अंगुली पर मैथुन पीठिका होती है। पश्च पाद भी तीन

भागों से बना होता है जिन्हें क्रमशः ऊरु (thigh), जंधा (shank), पाद (foot) । पश्च पाद में पाँच अंगुलियाँ मय जाल में होती हैं जो तैरने में सहायता करती हैं। धड़ के आखिरी सिरे पर एक छिद्र होता है जिसे अवस्कर कहते हैं।

प्रश्न 3.
मेंढक में शीत निष्क्रियता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
शीतनिष्क्रियता (Hibernatis)-मेंढक एक असमतापी जन्तु है अर्थात् इसके शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार घटताबढ़ता है। शीत ऋतु में जब वातावरण का तापमान बहुत कम हो जाता है। तो यह भूमि में 30-60 सेमी. की गहराई में चला जाता है, इस समय देह की सभी क्रियाएँ मंद हो जाती हैं। यह भोजन नहीं करता है तथा श्वसन नम त्वचा द्वारा होता है। इसे शीत निष्क्रियता कहते हैं। शीतकाल के अन्त में एवं बसंत के प्रारम्भ में तापमान बढ़ने पर यह पुनः सक्रिय हो जाता है।

प्रश्न 4.
मेंढक की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 5.
मेंढक के पाचन में एन्जाइम की भूमिका लिखिए।
उत्तर-
मेंढक अपनी द्विपालित जीभ से भोजन का शिकार पकड़ता है। इसके भोजन का पाचन आमाशय की दीवारों द्वारा स्रावित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रसों द्वारा होता है। अर्ध पचित भोजन काइम (chyme) कहलाता है जो आमाशय से ग्रहणी में जाता है। ग्रहणी पित्ताशय से पित्त और अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस मूल पित्त वाहिनी द्वारा प्राप्त करती है। पित्त रस वसा तथा अग्न्याशयी रस कार्बोहाइड्रेटों तथा प्रोटीन का पाचन करता है। पाचन की अन्तिम प्रक्रिया आंत में होती है। पचित भोजन आंत के अन्दर अंकुर और सूक्ष्मांकुरों द्वारा अवशोषित होते हैं। अपचित भोजन अवस्कर द्वार से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है।

प्रश्न 6.
मेंढक में पानी के अन्दर व पानी के बाहर किस प्रकार का श्वसन होता है ?
उत्तर-

  • त्वचीय श्वसन (Integumentary respiration) – मेंढक में अधिकांशतः त्वचीय श्वसन ही पाया जाता है। मेंढक की त्वचा में रक्त वाहिनियाँ काफी संख्या में होती हैं। मेंढक की त्वचा में श्लेष्मा ग्रन्थियाँ होती हैं, जो त्वचा को नम बनाये रखती हैं। जिससे O2 त्वचा से विसरित होकर रक्त में पहुँच जाती है। यह जल में, स्थल पर, शीत व ग्रीष्म निष्क्रियता के समय विसरण विधि द्वारा गैसों का विनिमय कर श्वसन क्रिया को सम्पन्न करती है।
  • मुखगुहीय श्वसन (Buccal respiration) – मेंढक में मुखगुहा के द्वारा भी श्वसन किया जाता है। यह जब थल पर होता है, वायु मुखगुहिका में प्रवेश करती है तथा बाहर आती रहती है। मुखगुहा में रक्तवाहिनियाँ अधिक संख्या में अधिक होती हैं तथा ये ऑक्सीजन का अवशोषण करती हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकाल दिया जाता है।
  • फुफ्फुसीय श्वसन (Pulmonary respiration) – फुफ्फुस के द्वारा श्वसन फुफ्फुसीय श्वसन कहलाता है। फुफ्फुस अण्डाकार गुलाबी रंग की थैलेनुमा संरचनाएँ होती हैं जो देहगुहा के ऊपरी वक्षीय भाग में पायी जाती हैं। मेंढक में फुफ्फुसीय श्वसन के साथ मुखगुहीय तथा त्वचीय श्वसन भी होता है। क्योंकि सिर्फ फुफ्फुसीय श्वसन से श्वसन क्रिया पूर्ण नहीं हो पाती है।

प्रश्न 7.
मेंढक के हृदय के बाह्यदृश्य का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 8.
मेंढक में रुधिर परिसंचरण तन्त्र की क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर-
मेंढक में रुधिर परिसंचरण तन्त्र (circulatory system) बंद प्रकार का होता है।

मेंढक में अशुद्ध रुधिर तीन महाशिराओं द्वारा शिराकोटर में आता है। शिराकोटर से शिराआलिन्द छिद्र द्वारा दाहिने आलिंद में आता है। बायें आलिन्द से फुफ्फुस से शुद्ध रुधिर फुफ्फुस शिरा द्वारा आता है। दोनों आलिन्दों के संकुचित होने के कारण सामान्य आलिन्द निलय छिद्र द्वारा रुधिर निलय में आता है। यहाँ रुधिर दाहिनी ओर अशुद्ध होता है, मध्य में मिला हुआ तथा बायीं ओर शुद्ध होता है। निलय के संकुचन से रुधिर शंकु में जाता है तथा उसके बाद आर्टीरिओसस में आता है तथा यहाँ से धमनी चापों में प्रवेश करता है। शुद्ध रुधिर (ऑक्सीजनित) ग्रीवा चापों द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों में भेज दिया जाता है एवं मिश्रित रुधिर दैहिक चापों के द्वारा शुद्ध होने हेतु फुफ्फुस में भेज दिया जाता है। इस प्रकार हृदय में दो बार रुधिर प्रवेश करता है। इसे दोहरा परिसंचरण तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 9.
मेंढक के मस्तिष्क का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मेंढक का मस्तिष्क हड्डियों से निर्मित एक संदूक (Box) के समान रचना में स्थित होता है जिसे कपाल (cranium) कहते हैं। मेंढक का मस्तिष्क तीन भागों में विभाजित होता है
(1) अग्र मस्तिष्क (Fore Brain)
(2) मध्य मस्तिष्क (Mid Brain)
(3) पश्च मस्तिष्क (Hind Brain)

  1. अग्र मस्तिष्क (Fore Brain)-इसके अन्तर्गत घ्राण पॉलिया, एक जोड़ी प्रमस्तिष्क गोलार्द्र तथा डायनसेफेलोन आते हैं।
  2. मध्य मस्तिष्क (Mid Brain)-ये दो दृक पालियो (optic labes) से बना होता है। इन दृक पालियों को कोरपोरा बाइजेमिना (Corpora Bigemina) कहते हैं।
  3. पश्च मस्तिष्क (Hind Brain)-मेड्यूलाआब्लांगेटा व अनुमस्तिष्क से बना होता है। मेड्यूलाआब्लांगेटा का पश्च भाग संकरा होकर मेरुरज्जु की केन्द्रीय नाल में खुलता है।

प्रश्न 10.
मेंढक में कौन-कौन से संवेदांग पाये जाते हैं ?
उत्तर-
मेंढक में पाँच प्रकार के संवेदांग पाये जाते हैं

  1. स्पर्श-संवेदी अंग (Tango receptors)-ये अधिचर्म (epidermis) के नीचे काफी संख्या में उपस्थित होते हैं। ये स्पर्श सम्बन्धी, जैसे—रसायन, ताप, नमी, प्रकाश, दर्द आदि को महसूस करते हैं।
  2. स्वाद-संवेदी अंग (Gustoreceptors)-ये अंग स्वाद से सम्बन्धित हैं। ये जिह्वा में पाये जाते हैं तथा मुख गुहिका के ऊपर भी उपस्थित रहते हैं।
  3. गंध-संवेदी अंग (Olfactoreceptors)-ये संवेदी अग नासिका क्षेत्र में स्थित होते हैं तथा यह गंध को महसूस करते हैं।
  4. नेत्र (Eves)-मेंढक में एक जोड़ी गोलाकार नेत्र गड्ढों में स्थित होते हैं। ये साधारण नेत्र होते. हैं । ये देखने का ज्ञान कराते हैं।
  5. कर्ण (Ear)-मेंढक में बाह्य कर्ण (external ear) अनुपस्थित होते हैं। सिर्फ कर्ण पटह बाहर से दिखाई देता है। कर्ण सुनने के साथ-साथ शरीर का सन्तुलन बनाये रखता है।

प्रश्न 11.
नर व मादा मेंढक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
नर मेंढक व मादा मेंढक में विभेद
(Difference between Male Frog and Female Frog)

नर मेंढक
(Male Frog)
मादा मेंढक
(Female Frog)
1. नर मेंढक में वाक-कोश (vocal sac) पाये जाते हैं।मादा में वाक-कोश (vocal sac) नहीं पाये जाते हैं।
2. प्रजनन काल में नर की प्रथम अंगुली में मैथुन गद्दियाँ (copulatory pad) विकसित हो जाती हैं।मादा में मैथुन गद्दियाँ (copulatory pad) नहीं पायी जाती हैं।
3. प्रौढ़ नर मादा से छोटा होता है।प्रौढ़ मादा नर से बड़ी होती है।

प्रश्न 12.
मेंढक में पाई जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एवं उनसे निकलने वाले हार्मोन्स के नाम लिखिए।
उत्तर-
मेंढक में निम्न अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ एवं उनसे निकलने वाले हार्मोन्स

ग्रन्थि का नामनाम हार्मोन
1. पिटयूटरी
2. थाइरॉइड
3. पेराथाइरॉइड
4. पीनीयलकाय
5. अग्न्याशयी द्वीप
6. अधिवृक्क ग्रन्थि
7. वृषण
8. अण्डाशय
पीयूष हार्मोन
थाइरॉक्सिन
पैराथार्मोन
मिलेटोनिन
इन्सुलिन व ग्लूकोगॉन
एड्रीनेलिन हार्मोन
टेस्टोस्टेरोन
ऐस्ट्रोजन

प्रश्न 13.
मेंढक के नर जनन तंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 14.
मेंढक के मादा जनन तंत्र को नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
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प्रश्न 15.
मेंढक की पाचन क्रिया में HCI क्या कार्य करता
उत्तर-
पाचन क्रिया में HCI का कार्य

  • भोजन काफी समय तक आमाशय में पड़ा रहता है, इसलिए यह सम्भव हो सकता है कि वह सड़ जाये परन्तु इस अम्ल के कारण वह सड़ नहीं पाता है।
  • यह अम्लीय माध्यम प्रदान करता है।
  • HCl कठोर ऊतकों को घोलने में सहायता करता है।
  • यह भोजन को रोगाणु रहित (Sterlize) करता है।
  • निष्क्रिय पैप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है।
  • जठरनिर्गमी रोधनी (pyloric sphiycter) को नियंत्रित करता
  • कैल्सियम एवं लौह के अवशोषण में सहायता करता है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 37 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मेंढक की बाह्य संरचना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मेंढक की आकृति त्रिशंकु (spindle) के आकार की होती है। अग्र भाग नुकीला होता है तथा पश्च भाग थोड़ा गोलाकार होता है। राना टिग्रीना की लम्बाई 12-18 सेमी. तथा चौड़ाई लगभग 5-8 सेमी. होती है। इसकी त्वचा श्लेष्मा के कारण लसलसी एवं चिकनी होती है। त्वचा हमेशा नम रहती है। मेंढक की ऊपरी सतह पर धारियाँ हरे रंग की होती हैं जिसमें अनियमित धब्बे होते हैं जबकि अधर सतह हल्की पीले रंग की होती है। नर का रंग थोड़ा गहरा होता है। मेंढक पानी में रहते हुए कभी पानी नहीं पीता है क्योंकि इसकी त्वचा ही पानी का अवशोषण करती है।
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मेंढक का शरीर दो भागों में बंटा होता है जिन्हें क्रमशः सिर (Head) व धड़ (Trunk) कहते हैं। इस प्राणी में गर्दन व पूंछ का अभाव होता है। गर्दन की अनुपस्थिति से ही प्राणी का शरीर धारा रेखित होकर जलीय जीवन के उपयुक्त होता है।
(1) सिर – मेंढक का सिर त्रिभुजाकार तथा चपटा होता है। इसका अगला भाग संकड़ा, पिछला भाग चौड़ा होता है। सिर पर निम्नलिखित रचनाएँ पाई जाती हैं

  • मुख द्वार–सिर के नुकीले भाग को प्रोथ (snout) कहते हैं। प्रोथ के नीचे की ओर मुख द्वार स्थित होता है। मुख द्वार दो जबड़ों द्वारा घिरा रहता है, ऊपरी जबड़ा व नीचे वाला जबड़ा।
  • बाह्य नासा छिद्र–प्रोथ के अग्र भाग में पृष्ठ तल पर एक जोड़ी सूक्ष्म छिद्र होते हैं, इन्हें बाह्य नासा द्वार कहते हैं। ये श्वसन क्रिया में सहायता करते हैं।
  • ने सिर के सबसे ऊपरी भाग में एक जोड़ी बड़े उभरे हुए नेत्र होते हैं। प्रत्येक नेत्र चारों ओर घूम सकता है। नेत्र पर दो पलकें होती हैं—ऊपरी पलक व निचली पलक। ऊपरी पलक गतिहीन होती है जबकि निचली पलक गतिशील होती है। निचली पलक का ऊपरी भाग पारदर्शी झिल्ली का रूप ले लेता है। इसे निमेषक पटल कहते हैं। यह पटल जल के अन्दर आँखों की सुरक्षा करती है एवं एक चश्मे का कार्य करती है।

कर्ण पटह–आँखों के पीछे दो गोलाकार पर्दे मिलते हैं जिन्हें कर्ण पटह कहते हैं। इनसे प्राणी को ध्वनि का ज्ञान होता है।

नर प्राणियों के सिर के अधर तल पर एक जोड़ी हल्के लाल रंग की झुर्रादार थैलियाँ होती हैं। इन्हें वाक कोश (vocal sac) कहते हैं। इन्हीं को फुलाकर नर मेंढक ध्वनि उत्पन्न करता है।

(2) धड़ (Trunk) – सिर के पीछे का भाग धड़ कहलाता है। सम्पूर्ण धड़ की त्वचा ढीली होती है। धड़ के पिछले भाग के पृष्ठ क्षेत्र में कूबड़ पाई जाती है। यह कूबड़ श्रोणि मेखला (pelvic girdle) के मेरुदण्ड (vertebral column) से जुड़ने के कारण बन जाती है। धड़ के पिछले सिरे पर मध्य पृष्ठ रेखा के अन्त में एक वृत्ताकार छिद्र पाया जाता है, इसे अवस्कर द्वार (cloacal aperture) कहते हैं तथा इसके माध्यम से आहारनाल एवं जनन-मूत्र-तन्त्र दोनों शरीर से बाहर खुलते हैं।

धड़ पर दो जोड़ी टाँगें पाई जाती हैं—अग्र पाद (fore limb) एवं पश्च पाद (hind limb)।

  • अग्र पाद (Fore limb)—प्रत्येक अग्र पाद के तीन भागऊपरी बाहु (upper arm), अग्र बाहु (fore arm) एवं हस्त (hand) । अग्र पाद में अंगुलियों की संख्या चार होती है। मेंढक के अग्र पाद में । अंगूठे का अभाव होता है। अग्र पाद अपेक्षाकृत छोटे होते हैं।
  • पश्च पाद (Hind limb)—प्रत्येक पश्च पाद के भी तीन भाग होते हैं-ऊरु (thigh), जंघा (shank) तथा पाद (foot)। पश्च पाद में पाँच अंगुलियाँ होती हैं तथा इनके बीच त्वचा की एक झिल्ली फैली रहती है जिसे पाद जाल (web) कहते हैं। पश्च पाद तैरने में पतवार की तरह एवं फुदकने में स्प्रिंग की तरह कार्य कर गमन के लिए आवश्यक गति उत्पन्न करते हैं।

मेंढक में लैंगिक द्विरूपता देखी जा सकती है। नर मेंढक में ट्र्र….. टा….. टर्र…… टा की ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाक कोश (vocal sac) के साथ-साथ अग्र पाद की पहली अंगुली में मैथुन अंग (copulatory pad) पाये जाते हैं। ये अंग मादा मेंढक में नहीं पाये जाते हैं। वाक कोश से उत्पन्न ध्वनि नर मेंढक मादा मेंढक को मैथुन के लिए आकर्षित करता है। इसी प्रकार नर मेंढक के मैथुन अंग (copulatory pad) से चिपचिपा पदार्थ निकलता है । मैथुनी आलिंगन (Amplexus) के समय नर मेंढक इन मैथुन अंग (copulatary pad) की सहायता से मादा मेंढक को मजबूती से पकड़ने में सहायता करता है।

प्रश्न 2.
मेंढक के पाचन की क्रियाविधि (Physiology) का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मेंढक एक मांसाहारी (Carnivorous) प्राणी है, विभिन्न प्रकार के कीड़े, मकोड़े, घोंघे, वर्ल्स आदि इसका भोजन है। यह जिव्हा द्वारा शिकार को पकड़ता है।

मेंढक अपना भोजन बिना चबाए ही निगल जाता है। इस प्रकारे मुख-ग्रसनी गुहिका में कोई पाचन क्रिया नहीं होती है। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि मुख-ग्रसनी गुहिका में म्यूकस के साथ पेप्सिन एन्जाइम भी बनता है; परन्तु इसकी भोजन पर कोई क्रिया नहीं होती है जब तक कि यह आमाशय में नहीं पहुँच जाता है।

आमाशय की दीवारों के बार-बार सिकुड़ने से लहरें उठने लगती हैं जिनके कारण भोजन धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ने लगता है। इस क्रिया को क्रमाकुंचन (peristalsis) कहते हैं। इन्हीं क्रमाकुंचक लहरों की सहायता से भोजन में पाचक द्रव आसानी से मिल जाते हैं।

भोजन के आमाशय में आने पर जठर ग्रन्थियाँ (gastric glands) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (14%) और पेप्सिन स्रावित करने लगती है। अम्ल के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य होते हैं
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  • जीवाणुओं को नष्ट करता है।
  • जीवित भोज्य कोशिकाओं को नष्ट करता है।
  • भोजन को सड़ने से रोकता है।
  • यह भोजन से चूने का अंश निकाल देता है।
  • लोहे के अवशोषण में मदद करता है।
  • भोजन की हड्डियों तथा कठोर आवरणों को घोलने में मदद करता है।
  • निष्क्रिय पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है।
  • एन्जाइम की क्रिया के लिए अनुकूलतम (optimum) माध्यम प्रदान करता है।

पेप्सिन प्रोटीन को पेप्टोन (peptone) तथा प्रोटियोस (proteose) में बदल देता है। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि पेप्सिन आहारनाल की दीवारों को भी क्यों नहीं पचाता जो कि स्वयं भी प्रोटीन की ही बनी होती हैं ? इसके दो कारण हैं

  • पेप्सिन प्रारम्भ में निष्क्रिय अवस्था में स्रावित होता है।
  • आहारनाल की भीतरी स्तर श्लेष्मा (mucous) से ढकी रहती है, जिसके कारण पाचक रस इस स्तर को पार करके श्लेष्मिका कला (mucous membrane) तक नहीं पहुँच पाता। श्लेष्मा से ढका खाना अधिक समय तक एक स्थान पर रुकता नहीं है, आगे बढ़ता जाता है।

आमाशय में क्रमाकुंचन की क्रिया द्वारा भोजन को लुगदी के रूप में बदल दिया जाता है जिसे काइम (Chyme) कहते हैं। काइम बनते । ही जठर-निर्गम कपाट (pyloric valve) बार-बार खुलने लगता है। इसके फलस्वरूप काइम धीरे-धीरे ग्रहणी (duodenum) में प्रवेश करता है। ग्रहणी में जाने के बाद हाइड्रोक्लोरिक अम्ल श्लेष्मिका में शोषित होकर दो प्रकार के हारमोन को उत्सर्जित करता है। अम्ल के मिलते ही सिक्रिटीन (secretin) तथा कोलीसिस्टोकाइनिन (cholecystokinin) हारमोन सक्रिय होकर रक्त परिसंचरण द्वारा यकृत एवं अग्न्याशय में पहुँचते हैं । सिक्रिटीन हारमोन के फलस्वरूप अग्न्याशय में संकुचन शुरू होता है तथा इसका पाचक रस अग्न्याशय वाहिनियों में होता हुआ ग्रहणी में आता है। कोलीसिस्टोकाइनिन हारमोन पित्ताशय को उत्तेजित करता है। जिसके कारण पित्त, पित्त-वाहिनियों द्वारा ग्रहणी में जाता है।

अग्न्याशयी रस क्षारीय होते हैं तथा इसमें तीन प्रकार के एन्जाइम होते हैं-

(अ) ट्रिपसिन (trypsin)-
यह प्रोटियोस तथा पेप्टोन्स को पेप्टाइड्स (peptides) में बदल देता है। प्रारम्भ में ट्रिपसिन निष्क्रिय अवस्था में रहता है जिसे ट्रिपसिनोजन (trypsinogen) कहते हैं। ग्रहणी में जाते ही यह सक्रिय हो उठता है । यह काम एक एन्जाइम द्वारा होता है जिसे एन्टेरोकाइनेज (enterokinase) कहते हैं। ग्रहणी और आंत्र की दीवारें इसका संश्लेषण करती हैं।

(ब) एमिलेस (amylase)-
यह मंड या स्टार्च (starch) और बहुशर्कराइड (polysaccharide) को शर्करा में बदल देता है।

(स) लाइपेस (lipase)-
यह पायस या इमल्शन (emulsion) के रूप में बनी हुई वसा को ग्लिसरॉल (glycerol) तथा वसा अम्लों (fatty acids) में बदल देता है। लाइपेस की क्रिया के पहले वसा को पानी के साथ मिलाकर अपघटित किया जाता है। इसी क्रिया को पायसीकरण (emulsification) कहते हैं । वसा को पायस या इमल्शन में बदलने में पित्त सहायता करता है । क्रमाकुंचन से यह क्रिया और तेज हो जाती है। पित्त में मुख्यत: पित्त-लवण (bile salts) व जल होता है। यह लवण कई प्रकार के होते हैं और वसा के पायसीकरण में सहायता करते हैं। पायसीकरण के बाद लाइपेस की क्रिया तेज हो जाती है। छोटी आंत्र में पहुँचने से पूर्व काफी भोजन पच जाता है। आंत्र की श्लेष्मिका से आंत्रीय रस निकलते हैं जिनमें निम्नलिखित एन्जाइम पाये जाते हैं-जैसे एन्टेरोकाइनेज (enterokinase), इरेप्सिन (erepsin) और एमिलेस (amylase)। इनके अतिरिक्त ट्रिप्सिन, एमिलाप्सिन व लाइपेस भी, जो कि मुख्य अग्न्याशयी (pancreatic) एन्जाइम हैं, आंत्र में क्रियाशील रहते हैं । इरेप्सिन में वास्तव में कई एन्जाइम पाए जाते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से पेप्टीडेस (peptidase) कहते हैं। ये एन्जाइम प्रोटीन के अखंडित (unbroken) अणुओं पर क्रियाशील नहीं होते परन्तु पेप्टोन व प्रोटियोस (proteose) का एमीनो अम्लों में जल-अपघटन (hydrolysis) कर देते हैं। एमिलेस मुख्यत: अग्न्याशयी रस के घटक के रूप में ही स्रावित होता है। आंत्र की दीवार से स्रवित एमिलेस की क्रियाशीलता इसकी तुलना में नगण्य है। इस प्रकार छोटी आंत्र में आते-आते पोषक पदार्थ रुधिर में मिलने योग्य हो जाते हैं।

अवशोषण व बहिक्षेपण (Absorption and Egestion) – ग्लूकोस, एमीनो अम्ल, ग्लिसरॉल व वसीय अम्लों का अवशोषण (absorption) छोटी आंत्र की श्लेष्मिका द्वारा प्रारम्भ हो जाता है। आंत्र की अवशोषण-क्षमता या अवशोषकता (absorptive power) बढ़ाने के लिए उसकी आन्तरिक सतह पर दीर्घरोम (villi) पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कोशिका की आन्तरिक सतह पर सूक्ष्मरोम (microvilli) भी पाए जाते हैं। इस प्रकार आंत्र की अवशोषण-सतह बहुत बढ़ जाती है। पचे हुए पदार्थों को आंत्र की कोशिकाओं एवं रुधिर कोशिकाओं में प्रवेश पाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः इस क्रिया को सक्रिय अवशोषण (active absorption) कहते हैं । रुधिर कोशिकाओं से यह पदार्थ यकृत वाहिनिका शिरा द्वारा यकृत में पहुँच जाते हैं।

अपचित पदार्थ बड़ी आंत्र और अवस्कर में होते हुए अवस्कर-द्वार (Cloacal aperature) द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं। मेंढक में यह क्रिया एक विशेष प्रकार से होती है। मेंढक अपनी विष्ठा या मल (faeces) को एक झिल्लीनुमा थैले में बन्द करके शरीर से बाहर फेंकता है। यह झिल्ली मल के चारों ओर अवस्कर में ही बनती है। कभी-कभी मल ऐंठदार रूप में भी बाहर फेंका जाता है। इन्हीं दो कारणों से मेंढक के जनन-मूत्र द्वार (urino-genital opening) जो कि अवस्कर में ही खुलता है, मल से बन्द नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त मल एक थैले में अलग से बन्द रहे जाने के कारण अवस्कर में ही आकर गिरने वाले जननिक उत्पाद (genital products) संदूषित (contaminated) नहीं हो पाते। इसके अतिरिक्त मल के ऐंठदार होने के कारण मेंढक उसे अपने से दूर फेंक सकता है।

प्रश्न 3.
मेंढक के तंत्रिका तंत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
तन्त्रिका तन्त्र का निर्माण तन्त्रिका ऊतक से होता है जो प्रमुख रूप से तन्त्रिका कोशिकाओं (nerve cells) व न्यूरोग्लीया (neuroglia) से बनता है। तन्त्रिका तन्त्र को तीन भागों में बाँटा गया है
(1) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central nervous system)
(2) परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (Peripheral nervous system)
(3) स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomous nervous system)।

(1) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central nervous system)-
तन्त्रिका तन्त्र का वह भाग जो शरीर के मध्य व पृष्ठ भाग में स्थित होता है, केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र कहलाता है। यह तन्त्र दो अंगों मस्तिष्क व मेरुरज्जु (spinal cord) से मिलकर बना होता है।

मस्तिष्क (Brain)-मेंढक का मस्तिष्क करोटि (skull) के मध्य में मस्तिष्क कोटर, कपाल या ब्रेन बॉक्स (cranium) में स्थित होता है। अस्थिल कोटर कोमल मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करता है। मस्तिष्क के चारों ओर दो झिल्लियाँ पाई जाती हैं जिन झिल्लियों को मस्तिष्कावरण या मैनिन्जीस (meninges) कहते हैं। बाहरी झिल्ली डयुरामेटर (duramater) मोटी व मजबूत होती है। भीतरी झिल्ली जिसे पायामेटर (piamater) कहते हैं, पतली व कोमल होती है।

मस्तिष्क तीन भागों में बंटा होता है-

  • अग्र मस्तिष्क (Fore brain),
  • मध्य मस्तिष्क (Mid brain),
  • पश्च मस्तिष्क (Hind brain)
    मस्तिष्क के ये तीनों भाग भी कई पालियों में बंटे होते हैं।

अग्र मस्तिष्क (Fore brain) – मस्तिष्क का अग्र भाग अग्र मस्तिष्क कहलाता है। यह तीन भागों में विभाजित होता है—घ्राण पालियाँ (olfactory lobes), प्रमस्तिष्क (cerebrum) व अग्र मस्तिष्क पश्च (diencephelon) । मस्तिष्क का सबसे आगे स्थित छोटा व गोलाकार भाग है। यह एक जोड़ी पालियों से मिलकर बना होता है और घाण अंग व सेरीब्रम के बीच स्थित होता है। प्रत्येक पाली के अग्र सिरे को घ्राण तन्त्रिका अंगों को जोड़ती है। यह गंध का ज्ञान कराती है।

प्रमस्तिष्क (Cerebrum) – मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है। यह दो प्रमस्तिष्क गोलार्ध लम्बा व अण्डाकार होता है। यह ऐच्छिक व तुरन्त होने वाले कार्यों पर नियन्त्रण करता है। यह स्मृति (याददाश्त), बुद्धि व विचारों का भी केन्द्र है।

अग्र मस्तिष्क पश्च/डाएनसेफेलॉन दोनों गोलार्थों के पश्च सिरों व दृक पालियों के बीच स्थित होता है। डाएनसेफेलॉन मेंढक में कम विकसित होता है। इस भाग का कार्य सम्भवतः शरीर के तापक्रम, नींद, जनन सम्बन्धी क्रियाएँ, भूख आदि पर नियन्त्रण करता है।

मध्य मस्तिष्क (Mid brain) – इस भाग में केवल दो पालियाँ पाई जाती हैं, इन्हें दृक पालियाँ कहते हैं। इन दोनों पालियों को संयुक्त रूप से कार्पोरा बाइजेमिना (corpora bigemina) कहते हैं। ये पालियाँ अण्डाकार व चिकनी होती हैं । दृक पालियों का कार्य नेत्रों से सम्बन्धित है। नेत्र पेशियों व शरीर की संस्थिति (posture) का नियन्त्रण भी ये ही पालियाँ करती हैं। रेटिना पर बने प्रतिबिम्ब को समझना भी इसी के कार्य , क्षेत्र में आता है।
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पश्च मस्तिष्क (Hind brain) – मस्तिष्क का यह भाग दो हिस्सों में बंटा होता है—अनुमस्तिष्क व मेड्यूला आब्लांगेटा। अनुमस्तिष्क दृक पालियों के ठीक पीछे स्थित होता है। यह पीछे की ओर पतला होता है। मेड्यूला आब्लांगेटा पीछे की ओर करोटि महारन्धं (foramen magnum) से निकलकर कशेरुक दण्ड में जाकर मेरुरज्जु (spinal cord) बनाता है। अनुमस्तिष्क शरीर के सन्तुलन का कार्य करता है जबकि मेड्यूला आब्लांगेटा समस्त प्रतिवर्ती क्रियाओं व अनैच्छिक क्रियाओं पर नियन्त्रण करता है।

(2) परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (Peripheral nervous system)-
मस्तिष्क से निकलने वाली कपाल तन्त्रिकाएँ (cranial nerves) तथा मेरुरज्जु से निकलने वाली मेरु तन्त्रिकाएँ (spinal nerves) मिलकर परिधीय तन्त्रिका तन्त्र का निर्माण करती हैं।

कपाल तन्त्रिकाओं की संख्या 10 जोड़ी होती हैं जबकि मेरु तन्त्रिकाओं की संख्या राना टिग्रीना में 9 जोड़ी पायी जाती है। सभी मेरु तन्त्रिकाएँ मिश्रित होती हैं।

(3) स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomous nervous system)-
शरीर क्रिया अथवा संरचना एवं कार्यिकी की दृष्टि से यह दो भागों में बांटा गया है—

  • अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र (sympathetic nervous system),
  • सहानुकम्पनी तन्त्र (parasympathetic system)।

शरीर की प्रत्येक क्रिया का नियन्त्रण अनुकम्पी व परानुकम्पी दोनों करते हैं। यह दोनों एक-दूसरे के विरोधी कार्य करते हैं। इसलिए इन्हें एन्टागोनिस्टिक (Antagonistic) कहते हैं।

शरीर के आन्तरिक पर्यावरण के नियमन व संचालन से सम्बद्ध तन्त्रिका तन्त्र को स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र कहते हैं।

प्रश्न 4.
मेंढक में जनन तंत्र एवं भ्रूणीय परिवर्धन का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कशेरुकी जन्तुओं के उत्सर्जी तन्त्र एवं जनन तन्त्र परस्पर सम्बन्धित होते हैं। इसलिए इन दोनों तन्त्रों को सम्मिलित रूप से जनन-मूत्र-तन्त्र (urinogenital system) कहते हैं । सभी कशेरुकी एकलिंगी प्राणि होते हैं। इसलिए मेंढक भी एकलिंगी होता है। अर्थात् नर एवं मादा अलग

अलग होते हैं। प्रजनन तन्त्र दो प्रकार का होता है-
1. नर जनन तन्त्र (Male reproductive system)-
मेंढक का नर जनन तन्त्र वृषण, शुक्र वाहिनिकाओं, मूत्र जनन वाहिनी, शुक्राशय, अवस्कर व अवस्कर द्वार का बना होता है।

वृषण (Testis) – प्रत्येक वृक्क की अधर तल पर अग्र सिरे के पास पीले रंग का बेलनाकार एक छोटा सा वृषण स्थित होता है। यह उदर गुहा की. पृष्ठ भित्ति व वृक्क से एक पतली झिल्ली वृषणधार/मीसोर्कियम (mesorchium) द्वारा जुड़ा रहता है। मीसोर्कियम वास्तव में पेरिटोनियम की दोहरी परत है। प्रत्येक वृषण में 10 से 14 पतली पतली शुक्रवाहिकाएँ निकल कर मीसोर्कियम से होती हुई वृक्क के अन्दर, भीतरी किनारे के पास स्थित बिडर्स नलिका (bidder’s canal) में खुलती हैं।
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वृषण की संरचना – वृषण में अनेक सूक्ष्म कुण्डलित नलिकाएँ पाई जाती हैं जिन्हें शुक्रजनक नलिकाएँ (seminiferous tubules) कहते हैं। प्रत्येक शुक्रजनक नलिका की दीवार में बाहर की ओर पतली स्वान्तर कला (membrana propria) नामक झिल्ली होती है और इसके अन्दर की ओर जनन उपकला (germinal epithelium) पाई जाती है। जनन उपकला की कोशिकाएँ शुक्रजनन (spermatogenesis) की क्रिया द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण करती है। शुक्रजनक नलिकाओं के बीच-बीच में उपस्थित योजी ऊतक में रक्त केशिकाएँ, तन्त्रिका तन्तु एवं अन्तराली कोशिकाएँ (interstitial cells) पाई जाती हैं। अन्तराली कोशिकाओं द्वारा नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन (testosterone) उत्पन्न किया जाता है जिसके कारण नर मेंढक में द्वितीयक लैंगिक लक्षण (secondary sexual characters) विकसित होते हैं।

शुक्रजनक नलिकाएँ एक सिरे पर बन्द होती हैं। इनके दूसरे सिरे पतले व विभाजित होकर एक महीन जाल वृषण जाल (retetestis) बनाते हैं। शुक्रवाहिकाएँ इसी जाल से निकलती हैं।

शुक्राणु शुक्रजनक नलिकाओं से वृषण जाल में वे वृषण जाल से शुक्रवाहिका में आते हैं। यहाँ से वृक्क में स्थित बिडर्स नलिका (bidder’s canal) में आ जाते हैं। बिडर्स नलिका से कई अनुप्रस्थ संग्रह नलिकाएँ निकलकर एक अनुदैर्घ्य संग्रह नलिका (longitudinal collecting tubule) में खुलती हैं जो स्वयं मूत्र वाहिनी में खुलती है। नर मेंढक में मूत्र वाहिनी द्वारा मूत्र और शुक्राणु दोनों ही बाहर निकलते हैं। इस प्रकार मूत्रवाहिनी शुक्रवाहिनी (vasdeference) का भी कार्य सम्पन्न करती हैं। इसलिए इसे जनन मूत्रवाहिनी (urinogenital duct) कहते हैं।

मेंढक की कुछ जातियों में मूत्र-जनन वाहिनी का अग्र सिरा फूल कर शुक्राशय (seminal vesicles) बनाता है। शुक्राणु बिडर्स नलिका से अनुप्रस्थ संग्रह नलिका, अनुप्रस्थ संग्रह नलिका से अनुदैर्घ्य संग्रह नलिका में होते हुए शुक्राशय में (यदि हो तो) एकत्रित हो जाते हैं । मैथुन के समय ये शुक्राणु मूत्र जनन नलिका से निकलकर अवस्कर में आ जाते हैं और वहाँ से अवस्कर द्वारा बाहर निकल जाते हैं।

2. मादा जननांग (Female reproductive system)-
अण्डाशय (ovary), अण्डवाहिनिय (oviducts), अवस्कर व अवस्कर द्वार (Cloacal aperture) मिलकर मादा जननांग बनाते हैं।

प्रत्येक वृक्क के अधर तल पर अग्र भाग की ओर पीले रंग का एक अण्डाशय स्थित होता है। वृषण की भाँति, अण्डाशय भी उदर की पृष्ठ भित्ति व वृक्क से पेरीटोनियम की दोहरी झिल्ली अण्डाशयधर (mesovarium) द्वारा जुड़ा रहता है। अण्डाशय अनियमित आकार के आठ पिण्डों में बंटी एक छोटी संरचना है, जो प्रजनन ऋतु में परिपक्व व बहुत सारे अण्डों से भरी होने के कारण फूलकर देहगुहा के अधिकांश भाग को घेर लेती है। इस समय यह सफेद-काले रंग की दिखाई देती है।

अण्डाशय का प्रत्येक पिण्ड छोटे-छोटे अनेक पिण्डकों में बंटा होता है। प्रत्येक पिण्डक में एक गुहा होती है जो दो पर्त मोटी भित्ति से घिरी होती है। भित्ति का बाहरी स्तर संयोजी ऊतक व भीतरी स्तर जनन उपकला (germinal epithelium) का बना होता है। जनन उपकला की कोशिकाएँ विभाजित होकर छोटे-छोटे गुच्छक या पुटिकाएँ (follicles) बनाती हैं। पुटिका की एक कोशिका अन्य कोशिका से बड़ी हो जाती हैं। यही कोशिका परिवर्धित होकर अण्डाणु बनाती है। पुटिका की शेष कोशिकाएँ बड़ी कोशिका के चारों ओर एकत्रित होकर पुटिका स्तर (follicular layer) बनाती हैं। पुटिका स्तर की कोशिकाएँ (follicular cells) अण्डाणु का पोषण करती हैं। धीरे-धीरे केन्द्र स्थित कोशिका में पोषक पदार्थ पीतक (yolk) के रूप में इकट्ठे होने से कोशिका का आकार बढ़ता जाता है, जैसे-जैसे अण्ड कोशिका को आकार बढ़ता जाता है, पुटिका कोशिकाएँ छोटी होती जाती हैं और अन्त में यह पीतक झिल्ली (vitelline membrane) का रूप धारण कर लेती हैं। अण्डाणु जब अण्डाशय से बाहर आता है तो इसी झिल्ली में बन्द होता हैं।
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मादा मेंढक के उदर में पार्श्व तल पर देहगुहा की पूरी लम्बाई में एक जोड़ी लम्बी, पतली व कुण्डलित नलिकाएँ फैली होती हैं जिन्हें अण्डवाहिनी कहते हैं। अण्डवाहिनियों का अण्डाशय से कोई संरचनात्मक सम्बन्ध नहीं होता। प्रत्येक नली का अगला सिरा ग्रसिका के पास फुफ्फुस के आधार के समीप पृष्ठ तल पर स्थित होता है। यह सिरा फूलकर एक चौड़ी कीपनुमा आकृति बनाता है। कीप के किनारे सिलिययित होते हैं। इस कीप को अण्डाशयी कीप (ovidutal funnel) व इसमें स्थित छिद्र को आस्य (ostium) कहते हैं । अण्डवाहिनी का पिछला सिर अवस्कर में खुलने से पूर्व कुछ फूलकर डिम्बकोष (ओवीसेक, ovisac) बनाता है। कुछ जन्तु विशेषज्ञ इसे गर्भाशय की संज्ञा देते हैं। परन्तु वास्तव में यह गर्भाशय नहीं है। गर्भाशय अण्डवाहिनी के उस भाग को कहते हैं, जहाँ भ्रूण का परिवर्धन होता है। चूंकि मेंढक में भ्रूण का परिवर्धन शरीर के बाहर होता है और इस भाग से अण्डे बाहर निकलने से पहले केवल कुछ समय के लिए संचित रहते हैं। इस अंग को गर्भाशय कहना उचित प्रतीत नहीं होता। डिम्बकोष एक पेपिला पर स्थित एक संकीर्ण छिद्र द्वारा अवस्कर में खुलता है।

एक परिपक्व मादा एक बार में 2500 से 3000 तक अण्डे दे सकती है। अनिषेचित अण्ड गोलाकार 1.75 से.मी. व्यास का होता है। इसमे बाह्य निषेचन (External fertilization) होता है। परिवर्धन अपरोक्ष होता है, जो कि टेडपोल लार्वा (Tadpole Larva) के माध्यम से होता है।

प्रश्न 5.
मेंढक के रुधिर परिसंचरण तंत्र का वर्णन कीजिए एवं हृदय की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर-
मेंढक का परिसंचरण बन्द प्रकार का होता है, क्योंकि इसमें रुधिर बंद रुधिर वाहिनियों में प्रवाहित होता है। मेंढक में एकल परिसंचरण पाया जाता है अर्थात् इसके हृदय में शुद्ध (oxygenated) और अशुद्ध (Deoxygenated) दोनों प्रकार का रुधिर प्रवेश करता है और निलय (ventricle) में मिश्रित हो जाता है। परिसंचरण तंत्र में हृदय, रक्त वाहिनियाँ और रुधिर सम्मिलित हैं।

हृदय (Heart) – मेंढक का हृदय पतली, पारदर्शी द्विस्तरीय झिल्ली से घिरा होता है जिसे पेरिकार्डियम (pericardium) कहते हैं। यह एक त्रिकक्षीय संरचना है जो दो ऊपरी आलिंदों (Auricles) और एक निचले निलय (Ventricle) का बना हुआ है। मेंढक के हृदय से दो अतिरिक्त कक्ष शिराकोटर (साइनस वेनोसस) (Sinus venosus) और धमनीकरण टूकस आर्टीरियोसस जुड़े हुए रहते हैं। साइनस वेनोसस एक तिकोना कक्ष है जो कि हृदय की पृष्ठ सतह पर उपस्थित और तीन मुख्य महाशिराओं (दो अग्र महाशिरा तथा एक पश्च महाशिरा) से अशुद्ध रुधिर संग्रहित कर दायें आलिंद में पहुँचता है। दायें आलिंद में इसकी ओपनिंग पर साइनु ऑरिकुलर वाल्व उपस्थित होता है। हृदय की वेन्ट्रल सतह से सम्बन्धित एक अतिरिक्त कक्ष जिसे टूकस आर्टीरियोसस कहते हैं, निलय से रुधिर संग्रहित कर इसे सम्पूर्ण शरीर में वितरित करता है। टूकस आर्टीरियोसस का अपेक्षाकृत अधिक पेशीय फूला हुआ आधार भाग पाइलेजियम (pylangium) या कोनस आर्टीरियोसस (Conus arteriorus) कहलाता है जबकि इसका अपेक्षाकृत कम पेशीय ऊपरी संकरा भाग सायनेजियम (synangium) या बल्बस आर्टीरियोसिस (Bulbus arteriosus) कहलाता है। पाइलेजियम (pylangium) भाग में उपस्थित स्पाइरल वाल्व (spiral valve) इसे दायें तथा बायें कक्षों में विभाजित करता है जो कि क्रमशः केवम एओर्टिकम (cauum aortium) तथा केवम पल्मोकुटेनियम (cauum pulmoculavenum) कहलाते हैं। धमनी तथा शिराओं का एक निश्चित जाल है जिसे धमनी तथा शिरा तंत्र कहते हैं।
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मेंढक में दो निवाहिका तन्त्र पाये जाते हैं

  • यकृत निवाहिका तन्त्र,
  • वृक्कीय निवाहिका तन्त्र।

इन तन्त्रों से सम्बन्धित शिराएँ आंत्र से प्रारम्भ होकर अपने सम्बन्धित अंगों तक जाकर छोटी-छोटी केशिकाओं (capillaries) में बँट जाती हैं।

रुधिर – रुधिर एक तरल संयोजी ऊतक है। रुधिर प्लाज्मा (तरल) और रुधिर कणिकाओं (कोशिकायें) से मिलकर बना होता है। प्लाज्मा (तरल) में तीन प्रकार की रुधिर कणिकायें लाल रुधिर कणिकायें (Red blood erythrocytes/RBCs), श्वेत रुधिर कणिकायें (White blood corpuscles / Leucocytes) और श्रॉम्बोसाइट्स या स्पिण्डल कोशिकायें (Thrombocytes/spindle cells) उपस्थित होती हैं। RBCs केन्द्रक युक्त अण्डाकार और द्विउत्तल तथा हीमोग्लोबिन (श्वसन रंगा) युक्त होती है। WBCs अमीबीय आकृति की तथा कार्य में सुरक्षात्मक होती। है। श्रॉम्बोसाइटस स्पिण्डल आकृति की और रुधिर स्कंदन में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

मेंढक के हृदय की क्रिया का आरेखी निरूपण
(Diagrammatic representation of working of the heart of frog)
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लसीका तंत्र (Lymphatic System) निम्न से मिलकर बनता है
(अ) लसिका
(ब) लसिक नलिकाएँ
(स) लसिका ग्रन्थियाँ।
लसिका तन्त्र तथा रुधिर परिसंचरण तन्त्र आपस में जुड़े रहते हैं।

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