RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 44 जैव विविधता

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 44 जैव विविधता

RBSE Class 11 Biology Chapter 44 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 44 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसी पुस्तक जिसमें विलुप्ति का खतरा झेल रहे वन्य जीवों की सूची है, कहलाती है
(क) ग्रीन डाटा बुक
(ख) रेड डाटा बुक
(ग) व्हाईट ड्यटी बुक
(घ) ब्ल्यू डाटा बुक

प्रश्न 2.
भारत का तप्तस्थल है
(क) थार राष्ट्रीय उद्यान
(ख) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान
(ग) ताल छापर अभयारण्य
(घ) पश्चिमी घाट

प्रश्न 3.
राजस्थान का राज्य पक्षी है ?
(क) घूसर तीतर
(ख) सारस कोंच
(ग) नीलकंठ
(घ) गोडावण

प्रश्न 4.
बाघ परियोजना कहाँ से और कब शुरू की गयी ?
(क) उत्तर प्रदेश 1973
(ख) राजस्थान 1970
(ग) बंगाल 1950
(घ) मणिपुर 1977

प्रश्न 5.
निम्न में से कौनसी पक्षी की जाति घना राष्ट्रीय उद्यान भरतपुर में आती है और संकटापन्न की श्रेणी में रेड डाटा बुक में सम्मिलित
(क) साइबेरियन क्रेन
(ख) ब्लैक नेकेड क्रेन
(ग) भारतीय सोन चिड़िया
(घ) चीर फीजेन्ट

प्रश्न 6.
राजस्थान में विलुप्ति के कगार पर है
(क) लेटेना
(ख) नीम
(ग) पार्थेनियम
(घ) गूगल

प्रश्न 7.
राजस्थान का राज्य पक्षी, राज्य वृक्ष व राज्य पुष्प घोषित किया गया है
(क) गोडावण, बबूल, गुलाब
(ख) तीतर, खेजड़ी, रोहिड़ा
(ग) गोडावण, खेजड़ी, रोहिड़ा
(घ) गोडावण, बबूल, रोहिड़ा

प्रश्न 8.
खेजड़ी वृक्ष को वनस्पति शास्त्र की भाषा में क्या नाम दिया।
(क) टेकोमिला अनडयूलेटो
(ख) प्रोसोपिस सिनेरेरिया
(ग) प्रोसोपिस स्पीसीजेरा
(घ) एकेशिया अरेबिका

उत्तरमाला
1. (ख)
2. (घ)
3. (घ)
4. (क)
5. (क)
6. (घ)
7. (ग)
8. (ख)

RBSE Class 11 Biology Chapter 44 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव विविधता को किनसे खतरा है ?
उत्तर-
जैव जातियों के निरन्तर शिकार होने व आवासों के नष्ट होने से संकटग्रस्त या विलुप्त हो जाने से है।

प्रश्न 2.
राजस्थान के तीन प्रमुख संकटग्रस्त जन्तुओं के नाम बताइये।
उत्तर-
बाघ, नीलगाय, काला हिरण।

प्रश्न 3.
M.A.B. का महत्त्व बताइये ।
उत्तर-
मानव तथा जीव मण्डल कार्यक्रम (Man and Biosphere programme) के अन्तर्गत शोध व अध्ययन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शोध क्षेत्रों की स्थापना, शोध क्षेत्रों के बीच सूचनाओं का आदानप्रदान करना व कार्यक्रमों का प्रबन्धन करना इत्यादि।

प्रश्न 4.
ताल छापर अभयारण्य किसके लिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर-
यह काले हिरणों के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 5.
साइबेरियन सारस राजस्थान में कहाँ आते हैं ?
उत्तर-
केवलादेव घना पक्षी बिहार, भरतपुर में आते हैं।

प्रश्न 6.
भारत के प्रमुख तप्तस्थल कौनसे हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी घाट तथा पूर्वी हिमालय पश्चिमी घाट के क्षेत्र में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु व केरल में श्रीलंका है। पूर्वी हिमालय हॉट स्पॉट भारत व भूटान तथा नेपाल तक फैला है।।

प्रश्न 7.
राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्रफल के कितने प्रतिशत भाग पर सघन वन क्षेत्र हैं ?
उत्तर-
तीन प्रतिशत ।

प्रश्न 8.
राजस्थान का राज्य वन्य पशु कौन है ?
उत्तर-
चिंकारा ।

प्रश्न 9.
राजस्थान की पर्वत श्रृंखलाओं के नाम बताइये।
उत्तर-
विंध्याचल व अरावली पर्वत श्रृंखलायें ।

प्रश्न 10.
राजस्थान में पाए जाने वाले चार कीटों के नाम लिखिये।
उत्तर-
टिड्डी (Grasshopper), दीमक (Termites), एफिड्स (Aphids), मक्खी (Housefly) ।

प्रश्न 11.
राजस्थान के वनों में पाए जाने वाले शाकाहारी वन्य जीव कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
नीलगाय, कृष्ण मृग, खरहे, काले हिरण, चौसिंगा, रीसस बंदर, खरगोश, चिंकारा आदि।

प्रश्न 12.
जंगलों को साफ रखने में कौनसा वन्य जीव सहायता करती है ?
उत्तर-
जरख।

प्रश्न 13.
खेजड़ी वृक्ष के फूलों में कौनसा खुशबूदार रसायन पाया जाता है ?
उत्तर-
ग्लोकोसाइट पदार्थ ।

प्रश्न 14.
लूम किसे कहते हैं ?
उत्तर-
खेजड़ी के पत्तों को लूम कहते हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 44 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूसंरचना के आधार पर राजस्थान को कितने भागों में बांटा गया है, नाम बताइये।
उत्तर-
चार भागों में बांटा गया है-
(अ) मरुस्थलीय क्षेत्र,
(ब) पूर्वी व मैदानी क्षेत्र,
(स) दक्षिणी क्षेत्र तथा
(द) पर्वतीय क्षेत्र ।

प्रश्न 2.
मरुस्थलीय क्षेत्र में कौन-कौन से अभयारण्य स्थित हैं ?
उत्तर-
इस क्षेत्र में दो अभयारण्य हैं-

  • ताल छापर अभयारण्य (चूरू) तथा
  • मरु उद्यान/जैव मण्डल रिजर्व जैसलमेर।

प्रश्न 3.
पूर्वी व मैदानी भागों में कौन-कौन से पक्षी व जलीय जीव पाये जाते हैं ?
उत्तर-
पक्षी – स्टार्क, इग्रेट, स्पून बिल, जल कौवे, प्लोवर, सैण्ड पाइपर, वार्बलर, पाईपिट, गिद्ध, ईगल्स, क्रोच व साइबेरियन क्रेन मुख्य हैं।
जलीय जीव – कछुए, ऊद बिलाव, मेंढ़क, जलीय सर्प, जोंक, घोंघे व अनेक प्रकार के कीट मिलते हैं।

प्रश्न 4.
राज्य पक्षी गोडावण पर टिप्पणी लिखिये।
उत्तर-
गोडावण (Choritus nigercipes) को राजस्थान का राज्य पक्षी घोषित किया गया है। यह जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी, पाली, कोटा, बारां, अजमेर जिलों में पाया जाता है। लगातार शिकारे करने के कारण इनकी संख्या बहुत कम हो गई है जिससे इनके विलुप्त होने का खतरा हो गया है। नर पक्षी की ऊँचाई 120 से 160 सेमी तथा नर के मुकुट पर काली कलंगी होती है। मादा आकार में छोटी होती है। इसकी ऊँचाई 70 से 75 सेमी होती है। यह तेज नहीं उड़ पाते हैं। यह स्वभाव से संकोची हैं तथा बस्तियों से दूर रहता है। इसका भोजन कीड़े, मकोड़े, छिपकली, सांप, जंगली बेर आदि हैं।

प्रश्न 5.
खेजड़ी को राजस्थान का ”कल्प वृक्ष” क्यों कहते
उत्तर-
मरुस्थल में उगने वाला वृक्ष पौधा है। इस पौधे का प्रत्येक भाग का उपयोग होता है। इसके पत्तों (लूम) को चारे के रूप में पशुओं को खिलाते हैं, इसकी फलियाँ मीठी व गूदेदार होती हैं जो सूखने पर सांगरी कहलाती हैं इसका उपयोग सब्जी बनाने में करते हैं। फलियों से सीने का दर्द व पेट की गर्मी शान्त होती है। इसकी लकड़ी जलाने के काम आती है। इनके फूलों को चीनी में मिलाकर गर्भपात रोकने के लिए दवा के रूप में उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 6.
राजस्थान में पाई जाने वाली कुछ वनस्पतियों के औषधीय उपयोग बताइये।
उत्तर-
खेजड़ी के फूलों को चीनी में मिलाकरे गर्भपात रोकने के लिए दवा के रूप में उपयोग करते हैं। रोहिड़ा की पत्तियों से यकृत वे प्लीहा का रोग ठीक किया जाता है। यह नेत्रों के लिए भी लाभदायक है। इसके साथ ही यह कृमिहर, रक्त शोधक, मूत्र संग्राहक, योनिवस्त्रावहर, अग्निदीपक तथा विषहर होती है। पलास के पत्तों से संग्रहणी व खांसी का उपचार होता है, इसके बीज कृमिनाशक, जड़ रतौंधी व नेत्र की फूली को नष्ट करती है तो फूल कफ, पित्त व दाद को ठीक करता है।

प्रश्न 7.
वन्य जीवों से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
प्रकृति में अनेक जीव जंगलों में निवास करते हैं। प्रत्येक जीवधारी का अपना स्वयं का वासस्थान (habitat) तथा निकेत (niche) होता है । इन वासस्थानों पर उन्हें पूर्ण रूप से आश्रय प्राप्त होता है तथा भोजन की पूर्ति होती है। जंगलों में स्वछन्द विचरण करते हैं। इन्हीं स्थानों पर प्रजनन कर अपने वंश को बढ़ाते हैं। जीव जंगलों में रहकर पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखते हैं। वन्य जीवों से मानव ने अपने स्वार्थ के लिए अनेक जन्तुओं को पालतू बना लिया है। वन्य जीवों पर किसी का अधिकार नहीं होता है। वर्तमान में मानव की विभिन्न गतिविधियों के फलस्वरूप इनका अस्तित्व संकटग्रस्त है अतः सरकार ने इनके संरक्षण सम्बन्ध में विविध उपाय किये हैं व अनेक कानूनों का निर्माण किया है।

प्रश्न 8.
जैव विविधता किसे कहते हैं ?
उत्तर-
किसी प्राकृतिक प्रदेश में पाये जाने वाले जीवधारियों (पादप, जीव-जन्तु) में उपस्थित विभिन्नता, विषमता तथा पारिस्थितिक जटिलता ही जैव विविधता कहलाती है। अन्य शब्दों में किसी स्थान पर एक साथ विभिन्न प्रकार के जीवों का एक साथ समुदाय में रहना जैव विविधता कहलाता है।

प्रश्न 9.
तप्तस्थल क्या होते हैं ? भारत में तप्त स्थल कहाँ पर स्थित हैं ?
उत्तर-
नोरमेन मायर्स (Norman Myers, 1988) ने विश्व के ऐसे स्थानों को हॉट-स्पॉट के रूप में चिन्हित किया जहाँ पर

  • जीव जातियों की अत्यधिक बहुतायत,
  • क्षेत्रविशेषी (Endemic) जातियों की अधिकता तथा
  • जहाँ जीव जातियों के अस्तित्व पर निरन्तर बढ़ता संकट विद्यमान होता है।

मायर्स ने सन् 2000 विश्व में 34 हॉट स्पॉट्स चिन्हित किए जिनमें से दो भारतीय भूभाग में स्थित हैं। प्रथम पश्चिमी घाट (Western ghat) तथा द्वितीय पूर्वी हिमालय (Eastern Himalayas) पश्चिमी घाट भारत के तिकोने पेनिनसुला के पश्चिमी समुद्रीय तट के समानान्तर स्थित है। यह 1600 किमी. क्षेत्र में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु व केरल से श्रीलंका तक फैला है। पूर्वी हिमालय हॉट स्पॉट भारत व भूटान तथा नेपाल तक फैला हुआ है।

प्रश्न 10.
निम्न पर लघु टिप्पणियाँ लिखिये
(क) लाल आंकड़ों की पुस्तक
(ख) संकट ग्रस्त जातियाँ
(ग) बाघ परियोजना
(घ) जैव विविधता पर खतरे
उत्तर-
(क) लाल आंकड़ों की पुस्तक (Red Data Book)
लाल आंकड़ों की पुस्तक वह पुस्तक है जिसमें विश्व की विलुप्तप्रायः हो रही जातियाँ, जिनके बचाव का समग्र रूप से ध्यान रखना आवश्यक है, की जानकारी लाल पृष्ठों पर मुद्रित होती है। इस पुस्तक के प्रथम संस्करण का प्रकाशन 1 जनवरी, 1972 को हुआ था। लाल आंकड़ों की पुस्तक के अनुसार पूरे विश्व में लगभग 25,000 जैविक जातियाँ संकटग्रस्त हैं। इस पुस्तक के अनुसार मछलियों की 193, उभयचरों तथा सरीसृपों की 138, पक्षियों की 400 तथा स्तनधारी प्राणियों की 305 जातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।

(ख) संकटाग्रस्त जातियाँ (Endangered species)
IUCN द्वारा जारी की जाने वाली संकटग्रस्त जन्तु व पादप । जातियों की सूची को लाल आँकड़ों की सूची (Red data list) कहते हैं। यह एक विश्वसनीय सूची है जिसमें विभिन्न वर्गों जैसे-संकटग्रस्त, सुमेघ आदि का सही प्रकार से मूल्यांकन व निर्धारण किया जाता है। इसका प्रथम संस्करण 1 जनवरी, 1972 में प्रकाशित किया गया था। पुस्तक के अनुसार पूरे विश्व में लगभग 25,000 जैविक जातियाँ संकटग्रस्त हैं। मछलियों की 193, उभयचरों तथा सरीसृपों की 138, पक्षियों की 400 तथा स्तनधारी प्राणियों की 205 जातियाँ विलुप्त होने के कगार पर है।

लाल आंकड़ों की पुस्तिका (Red data book)-IUCN ने विश्व की विलुप्तप्रायः हो रही जातियों की जानकारी लाल पृष्ठों पर मुद्रित की है। इनके बचाव का समग्र रूप से ध्यान रखना आवश्यक है। इसके अनुसार विश्व भर में लगभग 20,000 पादप जातियाँ विलोपन का खतरा झेल रही हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं-ऐकेशिया कोआ, मैस्कारीना रिवेन्जिलिनी, लोडोइसिआ स्केचेलारम, सिप्रिपीडियम कैलकोलम इत्यादि।

हमारे देश में भी पिछले कुछ वर्षों में कृषि के तीव्र विस्तार, शहरीकरण, अतिचारण इत्यादि के कारण अनेक पादप जातियाँ गम्भीर रूप से प्रभावित हुई हैं। इनमें से कुछ पौधे हैं-बैलेनोफेरा इन्वोल्युकेटा, पैराटाइओपसिस इजेक्युमोन्टिना, सॉसार्ड लापा, डाइआस्कोरिया, अनेक ऑर्किड्स इत्यादि ‘भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण’ के अनुसार ‘नेपंथीस खासियाना’ नामक कीटहारी पौधा भी संकटग्रस्त पादपों की सूची में सम्मिलित है, जो मुख्यतः उत्तर पूर्व की खासी पहाड़ियों में पाया जाता है।

(ग) बाघ परियोजना (Tiger project)
बाघ (Panthera tigris)-
यह एक मांसाहारी प्राणी है, इसका भोजन चीतल व सांभर आदि हैं। यह रात्रि में शिकार करता है व दिन में विश्राम करता है। इसे रात्रि में दिखाई देता है व इसकी घ्राण शक्ति बहुत तेज होती है। सामान्यत: यह 10 फुट लम्बा व 3 से 3% फीट ऊँचा होता है। शरीर सुनहरा पीले रंग का जिस पर काले रंग की लम्बी धारियाँ होती। हैं। यह अकेला विचरण करता है। बाघिन अपने बच्चों को खाने व शिकार करने का तरीका सिखाती है। यह एक बार में 2 से 3 शावकों को जन्म देती है व इसकी गर्भावधि 95 से 105 दिवस की होती है। राजस्थान में बाघ भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य, चित्तौड़गढ़; रणथम्भौर अभयारण्य, सवाईमाधोपुर; सरिस्का अभयारण्य, अलवर तथा रामगढ़ अभयारण्य बूंदी में पाया जाता है।

(घ) जैव विविधता पर खतरे (Threats to Biodiversity)
मानव के बढ़ते क्रिया-कलापों के कारण पृथ्वी पर जैव संपदा की तेजी से हानि हो रही है। मानव द्वारा प्रशांत उष्ण कटिबंधीय द्वीपों पर आवासीय बस्तियाँ स्थापित करने से वहां के मूल पक्षियों की 2 हजार से अधिक जातियां विलुप्त हो गई हैं। आई.यू.सी.एन. (IUCN) की लाल सूची (Red Data Book-2004) के अनुसार पिछले 500 वर्षों में 784 जातियां विलुप्त हो चुकी हैं। इनमें 338 कशेरुकी, 359 अकशेरुकी जातियाँ तथा 87 पादप जातियाँ हैं। नयी विलुप्त जातियों में मॉरीशस का डोडो (dodo = Raphntus cucutlantius) पक्षी, अफ्रीका का क्वैगा (Quagga), आस्ट्रेलिया की थाइलेसिन (Thylacine), रूस की स्टेलर समुद्री गाय (Steller’s sea cow) एवं बाली, जावा तथा कैस्पियन के बाघ की तीन उपजातियाँ–बाली, जावन व कैस्पियन (Bali, Javan and Caspian) इत्यादि हैं।

जीवाश्म अभिलेखों (fossil records) के आधार पर पृथ्वी के इतिहास को जानने से यह प्रतीत होता है कि पृथ्वी पर 5 बार इतनी बड़ी संख्या में जातियों के विलोपन की घटना हो चुकी है। वर्तमान में यह छंठा विलोपन (extinction) चल रहा है। यह भी सत्य है कि मानव के अस्तित्व से पहले के विलोपन की अपेक्षा वर्तमान में चल रहे विलोपन की दर 100 से 1000 गुना अधिक तेज आंकी जा रही है। इस प्रकार की दर हेतु मानव के क्रिया-कलाप ही जिम्मेदार हैं। यदि वर्तमान में विलुप्ति की दर इसी प्रकार चलती रही तो आगे आने वाले 100 वर्षों में पृथ्वी की आधी जातियाँ विलुप्त हो जायेंगी।

सामान्यतः किसी क्षेत्र की जैव विविधता की हानि होने से निम्न दुष्प्रभाव होते हैं

  • पादप उत्पादकता घटती है।
  • पर्यावरणीय समस्याओं, जैसे—सूखा आदि के प्रति प्रतिरोध (resistance) में कमी आती है।
  • कुछ पारितंत्रों की प्रक्रियाओं, जैसे-पादप उत्पादकता, जल उपयोग, पीड़क और रोग चक्रों की परिवर्तनशीलता बढ़ जाती है।

जैव विविधता की क्षति के कारण (Causes of depletion of biodiversity)-
जैसा कि पूर्व में बताया गया है कि जातीय विलोपन की दर जिसका वैश्विक स्तर पर संकट है, वह मुख्य रूप से मानव क्रियाकलापों के कारण है।

RBSE Class 11 Biology Chapter 44 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वन्य जीवों का संरक्षण क्यों आवश्यक है ? समझाइये।
उत्तर-
प्रकृति में विद्यमाने प्राणी एवं वनस्पति मानव मात्र (Human beings) हेतु नाना प्रकार से लाभदायक हैं। प्राचीन समय से ही मानव अपने भोजन, कपड़े, निवास, औषधियों इत्यादि हेतु प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जैव विविधता पर अवलम्बित रहा है। हमारी बौद्धिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक विविधता भी जैव विविधता का ही अंग है। प्राकृतिक संसाधनों पर ही राज्य, राष्ट्र और विश्व की आर्थिक व्यवस्था निर्भर करती है। जिस देश की जैव विविधता उच्च कोटि की होती है, तदनुरूप वह राष्ट्र आर्थिक दृष्टिकोण से भी पूर्ण आत्मनिर्भर होता है। इस प्रकार जैव विविधता हमारे लिए उपभोगात्मक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है वरन् इसका उत्पादक महत्त्व भी है।

जैव विविधता के मूल्य को निम्नलिखित उपशीर्षकों के माध्यम से विवेचित किया जा सकता है-
(i) खाद्य मूल्य (Food value)-
प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् (Ecologist) नॉमर्न मेयर्स के मतानुसार मनुष्य के द्वारा लगभग 80,000 पौधों की जातियों का उपभोग खाद्य के रूप में किया जाता है। संसार की सम्पूर्ण भोजन प्राप्ति मुख्य रूप से गेहूं, चावल, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, चुकन्दर, अरहर, नारियल, आलू, कसावा, शकरकन्द, चिकबीन्स, फिल्डबीन्स, गन्ना इत्यादि पर अवलम्बित है। इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के फल जैसे केला, आम, सीताफल (शरीफा), पपीता, अंगूर, सेब, संतरा, तरबूज, खरबूज़ा इत्यादि तथा विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ जैसे-बैंगन, भिण्डी, गोभी, टमाटर आदि एवं विभिन्न प्रकार की मछलियाँ संसार की खाद्य आपूर्ति में मुख्य भूमिका का निर्वहन करती हैं। वनस्पतियों की कुछ जातियाँ जैसे अदरक, हल्दी, केसर, धनिया, हींग, सौंफ, जीरा, अजवाइन, तेजपत्ता, कालीमिर्च आदि का उपयोग मुख्यतः घरेलू एवं व्यापारिक तौर पर किया जाता है।

(ii) औषधीय मूल्य (Medicinal value)-
विभिन्न प्रकार की औषधियाँ प्राणियों एवं वनस्पतियों से प्राप्त की जाती हैं। इनका विवरण निम्न प्रकार है

मेडागास्कर पेरिविंकल (Madagascar Periwinkle, Catharanthus roseus) या सदाबहार के पौधे से विनब्लास्टीन (Vinblastine) एवं विन्क्रिस्टीन नामक कैंसर रोधी औषधियाँ निर्मित की जाती हैं। इन औषधियों से बाल्यकाल में होने वाले रक्त कैंसर ‘ल्यूकेमिया’ (Leukemia) पर 99 प्रतिशत नियंत्रण कर लेने में सफलता अर्जित हुई है। कवक (Fungi) द्वारा पैनीसिलीन, बैक्टीरिया से एरिथ्रोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन नामक प्रति जैविक औषधियाँ निर्मित की जाती हैं।

पौधों का उपयोग असंख्य संश्लेषित उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है, जिन्हें बोटेनोकेमिकल्स (Botancochemicals) कहते हैं।

अफीम (पेपावर सोमनीफेरम-मार्फीन) दर्द निवारक के रूप में, सिनकोना (सिनकोना लेडजिरियाना-कुनैन) मलेरिया, टैक्सस (टैक्सस बकाटा-टेक्सोल) केन्सर, डिजिटेलिस परपुरिया (डिजिटॉक्सीन) हृदय रोग, होमोलेन्थस न्यूटान्स (प्रोटेस्टेटिन) एड्स में उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

(iii) सामाजिक मूल्य (Social value)-
जैव विविधता का सामाजिक मूल्य चिरकाल से ही मनुष्य के जीवन का अंग रही है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा जीवन की विविधता विभिन्न रूपों में सामाजिक माने को प्रतिबिम्बित करती है। उदाहरणार्थ-तुलसी, केला, पीपल, खेजड़ी आदि ऐसे पौधे हैं, जो हमारे घरों में आयोजित प्रत्येक धार्मिक समारोहों का अविभाज्य अंग होते हैं। अशोक, आम्र (आम) ऐसे वृक्ष हैं, जिनकी पत्तियों की वन्दनवार’ यज्ञ, विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अनिवार्य रूप से लगाई जाती है। नि:संदेह, मनुष्य की इस प्रकार की मनोवृत्ति प्रकृति की वानस्पतिक सम्पदा को सुरक्षित रखती है।

(iv) नीति मूल्य (Ethical value)-
भारतीय समाज आदिकाल से सदैव वृक्षों की पूजा करके उन्हें संरक्षित करने में अग्रणी रहा है।

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations Organisation-U.N.O.) की साधारण सभा के दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्येक जाति को स्वतंत्र रूप से जीने का नैतिक आधार है। हमारे समाज, धर्म तथा सभ्यता ने हमें नैतिक रूप से बलिष्ठ किया है, जिससे जैव विविधता को संरक्षित करने में भरपूर मदद मिली है। उदाहरणार्थ-हमारे देश के राजस्थान प्रान्त में कदम्ब, खेजड़ी, पीपल, आंवला, केला, बरगद; उड़ीसा में आम, इमली; मध्यप्रदेश में ढाक तथा बिहार में महुआ की पूजा की जाती है । इसी क्रम में नैतिकता का एक अन्य अनूठा तथा अनुकरणीय उदाहरण हमारे सामने है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America-U.S.A.) के नागरिकों ने ऐसी ट्यूना मछलियों को नहीं खरीदने का प्रण कर लिया था, जिनका शिकार एक छोटे जलीय जन्तु ‘परपोइसेस (Porpoises) की सहायता से किया जाता हो ।

(v) सौन्दर्यात्मक मूल्य (Aesthetic value)-
विविधता में ही सुन्दरता का वास होता है। प्रकृति में जितनी ज्यादा विविधता होगी, वह उसी अनुरूप उतनी ही सुन्दरतम होगी । प्रकृति को सुन्दर रूप प्रदान करने में जैव विविधता की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जन्तुआलय (Zoo) में जितनी ज्यादा जैव विविधता होती है, वह दर्शकों को उतना ही ज्यादा मनोरंजक लगती है। वर्तमान पीढ़ी को प्रकृति प्रदत्त जीवधारियों को। महत्त्व दिग्दर्शित कराना अत्यावश्यक है ताकि वे आने वाली भविष्य की पीढ़ी हेतु इनको संरक्षित रख सकें। पर्यटन के फैलाव में प्राकृतिक सुन्दरता की एक अति महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, जिससे आर्थिक क्षेत्र को सम्बल मिलता है। वन्य प्राणियों (Wild Animals) को उनके ही प्राकृतिक परिवेश में स्वतंत्र, निर्बाध रूप से विचरण करते हुए देखने को ही इकोटूरिज्म (Ecotourism) कहते हैं। यह आधुनिक पर्यटन (Modern Tourism) का एक अविभाज्य क्षेत्र है। इसके साथ ही साथ दूरदर्शन, सिनेमा, साहित्यिक पाठ्य-पुस्तकें, उपन्यास, मनोरंजक पुस्तकें आदि भी जैव विविधता के सौन्दर्यात्मक पहलू को उजागर करते हैं। कुछ पौधे सुन्दरता हेतु सड़कों के दोनों सिरों पर रोपित किए जाते हैं। जैसेकचनार, अमलतास (पीले फूल), बोगनविलिया (सफेद, गुलाबी फूल), गुलमोहर (लाल नारंगी फूल), कनेर (गुलाबी, पीले फूल), इराइथ्रिना (लाल फूल) इत्यादि।

(vi) आनुवंशिक मूल्य (Genetic value)-
जीवधारियों में ऐसे अनेक विशेषक (Traits) हैं, जिनका अनुसंधान होना अभी तक शेष है। विशेषक, जाति (Species) विशेष को जीवित रखने हेतु उत्तरदायी होते हैं। किसी भी समष्टि में जीन-कोश (Gene pool) सम्बन्धित जाति का प्रतिनिधि (Representative) होता है। जीन कोश से तात्पर्य है-‘किसी भी समष्टि के जीवधारियों के जीनों (Genes) का साथ-साथ जुड़ना’ । इनका संरक्षित रहना परम आवश्यक होता है ताकि निकट भविष्य में इनका लाभदायक उपयोग किया जा सके। कृषि के क्षेत्र में भी जीन कोश का महत्त्व है, क्योंकि भविष्य की खाद्य समस्याओं का त्वरित निराकरण इनके माध्यम से सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

(vii) पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन (Balance of Ecosystem)-
पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित एवं नियंत्रित रखने के लिए जैव विविधता आवश्यक है। प्राकृतिक संतुलन के लिए जैव विविधता के मुख्य कार्य वायुमण्डल के गैसीय संघटन को बनाए रखना, वनों एवं महासागर तंत्रों द्वारा जलवायु नियंत्रण, पीड़कों का प्राकृतिक नियंत्रण, कीटों एवं पक्षियों द्वारा पौधों का परागण, मृदा का निर्माण एवं संरक्षण, जल का संरक्षण, शुद्धिकरण एवं पोषक चक्रण इत्यादि है।

प्रश्न 2.
भारत में वन्य जीवों के प्रबन्धन पर एक निबन्ध लिखिये।
उत्तर-
वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए 1972 में ‘भारतीय वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम’ के नाम से केन्द्रीय सरकार ने एक कानून बनाया। अधिनियम के अन्तर्गत ऐसे दुर्लभ (rare) व संकटग्रस्त (endangered) प्राणियों की पाँच सूचियाँ तैयार की गई, जिन्हें पूर्ण सुरक्षा की आवश्यकता है। इसी के साथ वन्य जीवों को भी इसी में सम्मिलित किया गया व शिकार हेतु विशेष परिस्थितियों में लाइसेंस दिया जा सकता है। विभिन्न वन्य जीवों की घटती संख्या की समस्या को देखकर केन्द्र सरकार ने दुर्लभ वन्य जीवों को बचाने के लिए उचित कदम उठाये। सरकार ने विभिन्न जीवों के संरक्षण हेतु परियोजनायें बनाई हैं। कुछ परियोजनायें निम्न प्रकार से हैं

(i) बाघ या टाइगर प्रोजेक्ट परियोजना (Tiger project)
भारत में बाघों (Panthera tigris) की संख्या इस शताब्दी के प्रारम्भ में 40 हजार थी किन्तु इनकी संख्या में निरन्तर गिरावट आई। इस कारण भारत-सरकार ने 1 अप्रेल, 1973 में W.W.E तथा IUCN के सहयोग से बाघ परियोजना (Tiger project) प्रारम्भ की। वर्तमान में भारत के 14 राज्यों में 27 बाघ आरक्षित क्षेत्र हैं। राजस्थान में 2 बाघ संरक्षित क्षेत्र सरिस्का व रणथम्भौर हैं जिनमें लगभग 50 बाघ हैं। बाघ परियोजना में राजस्थान के स्वर्गीय कैलाश सांखला (टाइगर मैन) की भूमिका सराहनीय व ऐतिहासिक रही है।

(ii) गिर सिंह परियोजना (Gir lion project)
गुजरात के सौराष्ट्र प्रायद्वीप (peninsula) में गिर वन एशियाई सिंह, पेन्थेरा लिओन परसिका (Panthera leon persica) का अकेला अद्वितीय सजीव आवास है। वर्तमान में सम्पूर्ण एशिया में, यह सिंह केवल गुजरात के गिर वन में पाया जाता है। आज यह एक राष्ट्रीय उद्यान है। वर्तमान में यहाँ 200 सिंह हैं।

(iii) हिमालय कस्तूरी (Musk Deer)
परियोजना-किसी समय सारे हिमालय क्षेत्र में कस्तूरी मृग (मोस्कस मोस्किफेरम) पाया जाता था। परन्तु इसकी पिट्यूटरी ग्रंथि में जो ‘कस्तूरी’ (अत्यधिक महंगी) बनता है, इसे प्राप्त करने के लिए मानव ने इसका बेहद शिकार किया कस्तूरी सुगंध तथा दवा के रूप में प्रयुक्त होती है। यह मृग हिमालय की चम्बा घाटी से लेकर दक्षिण सिक्किम तक बहुत मिलता था किन्तु शिकार व आवास नष्ट होने से इनकी संख्या अत्यधिक कम हो गई। IUCN के संकटग्रस्त कार्यक्रम के अन्तर्गत भारत सरकार के सहयोग से एक संरक्षण परियोजना उत्तरप्रदेश के ‘केदारनाथ अभयारण्य’ में हिमालय कस्तूरी मृग के लिए आरम्भ की गई है।

(iv) मगर प्रजनन परियोजना (Crocodile breeding project)
मगर या घड़ियालों की जनसंख्या में गिरावट विश्व युद्ध के बाद हुई। इसके लिए 1974 में डॉ. एच. आर. बस्टर्ड जो मगर जनन और प्रबन्ध के विशेषज्ञ थे, उन्हें आमंत्रित किया गया। उनकी सलाह पर यह परियोजना 1 अप्रैल, 1975 को आरम्भ की गई।

भारत में मगर की तीन जातियाँ-
(अ) लवण जलीय या ज्वारनदमुखी (estuarine) मगरमच्छ क्रोकोडाइलस पोरोसस (crocodilus porosus),
(ब) अलवणजलीय, अनूप मगरमच्छ क्रोकोडाइलस पैलुस्ट्रिस (Crorodilus palustris) और
(स) घड़ियाल-गैविएलिस गैंजेटिकस (Gavialis gangeticus) पायी जाती हैं।

भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की सहायता से 1975 में उड़ीसा में मगर प्रजनन तथा प्रबन्ध की परियोजना आरम्भ की। बाद में इस परियोजना का विस्तार उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, गुजरात, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, अंडमान, असम, बिहार एवं नागालैण्ड तक विस्तार किया गया था।

(v) हाथी परियोजना (Project Elephant)
इस योजना का प्रारम्भ 1992 में किया गया। हाथियों की संख्या बढ़ाने, उनमें जनन के द्वारा संख्या बढ़ाना इसका उद्देश्य था। हाथी के लुप्त व पतन हुये आवासों को ठीक करने व उनके प्रवास तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए गलियारों (Corridors) का निर्माण, मानव-हाथी संघर्ष में कमी तथा हाथी के आवासों के निकट रहने वाले व्यक्तियों की जीवन की गुणवत्ता सुधारना व जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना इस परियोजना का उद्देश्य है।

प्रश्न 3.
जैव विविधता के उपयोगों पर सविस्तार चर्चा कीजिये।
उत्तर-
प्रकृति में विद्यमाने प्राणी एवं वनस्पति मानव मात्र (Human beings) हेतु नाना प्रकार से लाभदायक हैं। प्राचीन समय से ही मानव अपने भोजन, कपड़े, निवास, औषधियों इत्यादि हेतु प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जैव विविधता पर अवलम्बित रहा है। हमारी बौद्धिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक विविधता भी जैव विविधता का ही अंग है। प्राकृतिक संसाधनों पर ही राज्य, राष्ट्र और विश्व की आर्थिक व्यवस्था निर्भर करती है। जिस देश की जैव विविधता उच्च कोटि की होती है, तदनुरूप वह राष्ट्र आर्थिक दृष्टिकोण से भी पूर्ण आत्मनिर्भर होता है। इस प्रकार जैव विविधता हमारे लिए उपभोगात्मक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है वरन् इसका उत्पादक महत्त्व भी है।

जैव विविधता के मूल्य को निम्नलिखित उपशीर्षकों के माध्यम से विवेचित किया जा सकता है-
(i) खाद्य मूल्य (Food value)-
प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् (Ecologist) नॉमर्न मेयर्स के मतानुसार मनुष्य के द्वारा लगभग 80,000 पौधों की जातियों का उपभोग खाद्य के रूप में किया जाता है। संसार की सम्पूर्ण भोजन प्राप्ति मुख्य रूप से गेहूं, चावल, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, चुकन्दर, अरहर, नारियल, आलू, कसावा, शकरकन्द, चिकबीन्स, फिल्डबीन्स, गन्ना इत्यादि पर अवलम्बित है। इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के फल जैसे केला, आम, सीताफल (शरीफा), पपीता, अंगूर, सेब, संतरा, तरबूज, खरबूज़ा इत्यादि तथा विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ जैसे-बैंगन, भिण्डी, गोभी, टमाटर आदि एवं विभिन्न प्रकार की मछलियाँ संसार की खाद्य आपूर्ति में मुख्य भूमिका का निर्वहन करती हैं। वनस्पतियों की कुछ जातियाँ जैसे अदरक, हल्दी, केसर, धनिया, हींग, सौंफ, जीरा, अजवाइन, तेजपत्ता, कालीमिर्च आदि का उपयोग मुख्यतः घरेलू एवं व्यापारिक तौर पर किया जाता है।

(ii) औषधीय मूल्य (Medicinal value)-
विभिन्न प्रकार की औषधियाँ प्राणियों एवं वनस्पतियों से प्राप्त की जाती हैं। इनका विवरण निम्न प्रकार है

मेडागास्कर पेरिविंकल (Madagascar Periwinkle, Catharanthus roseus) या सदाबहार के पौधे से विनब्लास्टीन (Vinblastine) एवं विन्क्रिस्टीन नामक कैंसर रोधी औषधियाँ निर्मित की जाती हैं। इन औषधियों से बाल्यकाल में होने वाले रक्त कैंसर ‘ल्यूकेमिया’ (Leukemia) पर 99 प्रतिशत नियंत्रण कर लेने में सफलता अर्जित हुई है। कवक (Fungi) द्वारा पैनीसिलीन, बैक्टीरिया से एरिथ्रोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन नामक प्रति जैविक औषधियाँ निर्मित की जाती हैं।

पौधों का उपयोग असंख्य संश्लेषित उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है, जिन्हें बोटेनोकेमिकल्स (Botancochemicals) कहते हैं।

अफीम (पेपावर सोमनीफेरम-मार्फीन) दर्द निवारक के रूप में, सिनकोना (सिनकोना लेडजिरियाना-कुनैन) मलेरिया, टैक्सस (टैक्सस बकाटा-टेक्सोल) केन्सर, डिजिटेलिस परपुरिया (डिजिटॉक्सीन) हृदय रोग, होमोलेन्थस न्यूटान्स (प्रोटेस्टेटिन) एड्स में उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

(iii) सामाजिक मूल्य (Social value)-
जैव विविधता का सामाजिक मूल्य चिरकाल से ही मनुष्य के जीवन का अंग रही है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा जीवन की विविधता विभिन्न रूपों में सामाजिक माने को प्रतिबिम्बित करती है। उदाहरणार्थ-तुलसी, केला, पीपल, खेजड़ी आदि ऐसे पौधे हैं, जो हमारे घरों में आयोजित प्रत्येक धार्मिक समारोहों का अविभाज्य अंग होते हैं। अशोक, आम्र (आम) ऐसे वृक्ष हैं, जिनकी पत्तियों की वन्दनवार’ यज्ञ, विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अनिवार्य रूप से लगाई जाती है। नि:संदेह, मनुष्य की इस प्रकार की मनोवृत्ति प्रकृति की वानस्पतिक सम्पदा को सुरक्षित रखती है।

(iv) नीति मूल्य (Ethical value)-
भारतीय समाज आदिकाल से सदैव वृक्षों की पूजा करके उन्हें संरक्षित करने में अग्रणी रहा है।

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations Organisation-U.N.O.) की साधारण सभा के दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्येक जाति को स्वतंत्र रूप से जीने का नैतिक आधार है। हमारे समाज, धर्म तथा सभ्यता ने हमें नैतिक रूप से बलिष्ठ किया है, जिससे जैव विविधता को संरक्षित करने में भरपूर मदद मिली है। उदाहरणार्थ-हमारे देश के राजस्थान प्रान्त में कदम्ब, खेजड़ी, पीपल, आंवला, केला, बरगद; उड़ीसा में आम, इमली; मध्यप्रदेश में ढाक तथा बिहार में महुआ की पूजा की जाती है । इसी क्रम में नैतिकता का एक अन्य अनूठा तथा अनुकरणीय उदाहरण हमारे सामने है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America-U.S.A.) के नागरिकों ने ऐसी ट्यूना मछलियों को नहीं खरीदने का प्रण कर लिया था, जिनका शिकार एक छोटे जलीय जन्तु ‘परपोइसेस (Porpoises) की सहायता से किया जाता हो ।

(v) सौन्दर्यात्मक मूल्य (Aesthetic value)-
विविधता में ही सुन्दरता का वास होता है। प्रकृति में जितनी ज्यादा विविधता होगी, वह उसी अनुरूप उतनी ही सुन्दरतम होगी । प्रकृति को सुन्दर रूप प्रदान करने में जैव विविधता की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जन्तुआलय (Zoo) में जितनी ज्यादा जैव विविधता होती है, वह दर्शकों को उतना ही ज्यादा मनोरंजक लगती है। वर्तमान पीढ़ी को प्रकृति प्रदत्त जीवधारियों को। महत्त्व दिग्दर्शित कराना अत्यावश्यक है ताकि वे आने वाली भविष्य की पीढ़ी हेतु इनको संरक्षित रख सकें। पर्यटन के फैलाव में प्राकृतिक सुन्दरता की एक अति महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, जिससे आर्थिक क्षेत्र को सम्बल मिलता है। वन्य प्राणियों (Wild Animals) को उनके ही प्राकृतिक परिवेश में स्वतंत्र, निर्बाध रूप से विचरण करते हुए देखने को ही इकोटूरिज्म (Ecotourism) कहते हैं। यह आधुनिक पर्यटन (Modern Tourism) का एक अविभाज्य क्षेत्र है। इसके साथ ही साथ दूरदर्शन, सिनेमा, साहित्यिक पाठ्य-पुस्तकें, उपन्यास, मनोरंजक पुस्तकें आदि भी जैव विविधता के सौन्दर्यात्मक पहलू को उजागर करते हैं। कुछ पौधे सुन्दरता हेतु सड़कों के दोनों सिरों पर रोपित किए जाते हैं। जैसेकचनार, अमलतास (पीले फूल), बोगनविलिया (सफेद, गुलाबी फूल), गुलमोहर (लाल नारंगी फूल), कनेर (गुलाबी, पीले फूल), इराइथ्रिना (लाल फूल) इत्यादि।

(vi) आनुवंशिक मूल्य (Genetic value)-
जीवधारियों में ऐसे अनेक विशेषक (Traits) हैं, जिनका अनुसंधान होना अभी तक शेष है। विशेषक, जाति (Species) विशेष को जीवित रखने हेतु उत्तरदायी होते हैं। किसी भी समष्टि में जीन-कोश (Gene pool) सम्बन्धित जाति का प्रतिनिधि (Representative) होता है। जीन कोश से तात्पर्य है-‘किसी भी समष्टि के जीवधारियों के जीनों (Genes) का साथ-साथ जुड़ना’ । इनका संरक्षित रहना परम आवश्यक होता है ताकि निकट भविष्य में इनका लाभदायक उपयोग किया जा सके। कृषि के क्षेत्र में भी जीन कोश का महत्त्व है, क्योंकि भविष्य की खाद्य समस्याओं का त्वरित निराकरण इनके माध्यम से सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

(vii) पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन (Balance of Ecosystem)-
पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित एवं नियंत्रित रखने के लिए जैव विविधता आवश्यक है। प्राकृतिक संतुलन के लिए जैव विविधता के मुख्य कार्य वायुमण्डल के गैसीय संघटन को बनाए रखना, वनों एवं महासागर तंत्रों द्वारा जलवायु नियंत्रण, पीड़कों का प्राकृतिक नियंत्रण, कीटों एवं पक्षियों द्वारा पौधों का परागण, मृदा का निर्माण एवं संरक्षण, जल का संरक्षण, शुद्धिकरण एवं पोषक चक्रण इत्यादि है।

प्रश्न 4.
राजस्थान विलुप्त होते वन्य प्राणी तथा पौधे कौनसे हैं ? इनके संरक्षण के लिए सरकार व समुदायों द्वारा किये जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डालिये।
उत्तर-
संकटाधीन दृष्टिकोण के आधार पर आशंकित जैविक जातियों को पाँच श्रेणियों में वर्गीकृत किया है

  • विलुप्तप्रायः जातियाँ (Threatened Species = T) – ऐसी जैविक जातियाँ जिनके सदस्यों की संख्या कम होने की आशंका हैं।
  • संकटग्रस्त जातियाँ (Endangered Species = E) – ऐसी जैविक जातियाँ जिनकी आबादी बहुत कम है एवं निकट भविष्य में इनके विलुप्त होने का खतरा है।
  • सुमेघ जातियाँ (Vulnerable Species = V) – ऐसी जैविक जातियाँ जिनकी संख्या तेजी से घटती जा रही है तथा जिनके अतिशीघ्र ही संकटग्रस्त श्रेणी में आने की संभावना है।
  • विरल जातियाँ (Rare Species = R) – ऐसी जैविक जातियाँ जो सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में आबाद हैं या बहुत कम जनसंख्या में होने के कारण अकेले सदस्यों के रूप में रह गई हैं। इनके और भी विरल होने का डर है तथा ऐसी स्थिति में ये सुमेध श्रेणी में आ सकती हैं।
  • विलुप्त जातियाँ (Extinct Species = E) – ऐसी जातियाँ जिनका निकट अतीत में अस्तित्व था लेकिन अब ये अपने वासस्थानों के साथ-साथ अन्य वासस्थानों में भी पूर्णरूपेण समाप्त हो गई हैं।

आई.यू.सी.एन. जिसे अब विश्व संरक्षण संघ के नाम से जाना जाता है, की लाल सूची के अनुसार जातियों की आठ श्रेणियाँ हैंविलुप्त, वन्य रूप में विलुप्त, गंभीर रूप से संकटापन्न, नष्ट होने योग्य, नाजुक, कम जोखिम, अपूर्ण आंकड़े एवं मूल्यांकित नहीं । विलोपन के – संकटग्रस्त जातियों की श्रेणियों में सुभेद्य संकटान्नुपादन एवं गंभीर रूप से संकटग्रस्त सम्मिलित हैं।

सारणी : आई.यू.सी.एन. की संकटग्रस्त श्रेणियाँ

विलुप्त (Extinct)जाति के अंतिम सदस्य की समाप्ति (मृत्यु) पर जब कोई शंका नरहे।
वन्यरूप में विलुप्त (Extinct in the wild)जाति के सभी सदस्यों का किसी निश्चित आवास से पूर्ण रूप से समाप्ति।
गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically endangered)जब जाति के सभी सदस्य किसी उच्च जोखिम की वजह से एक आवास में शीघ्र ही लुप्त होने के कगार पर।
नष्ट होने योग्य (Endangered)जाति के सदस्य किसी जोखिम की वजह से भविष्य में लुप्त होने के कगार पर।
नाजुक (Vulnerable)जाति के आने वाले समय में समाप्त होने की आशा।
कम जोखिम (Lower risk)जाति जो समाप्त होने जैसी प्रतीत होती हो।
अपूर्ण सामग्री (Deficient data)जाति लुप्त होने के बारे में अपूर्ण अध्ययन एवं सामग्री।
मूल्यांकित नहीं (Not evaluated)जाति एवं उसके लुप्त होने के बारे में कोई भी अध्ययन या सामग्री न होना।

IUCN द्वारा जारी की जाने वाली संकटग्रस्त जन्तु व पादप जातियों की सूची को लाल आँकड़ों की सूची (Red data list) कहते हैं। यह एक विश्वसनीय सूची है जिसमें विभिन्न वर्गों जैसे-संकटग्रस्त, सुमेघ आदि का सही प्रकार से मूल्यांकन व निर्धारण किया जाता है। इसका प्रथम संस्करण 1 जनवरी, 1972 में प्रकाशित किया गया था। पुस्तक के अनुसार पूरे विश्व में लगभग 25,000 जैविक जातियाँ संकटग्रस्त हैं। मछलियों की 193, उभयचरों तथा सरीसृपों की 138, पक्षियों की 400 तथा स्तनधारी प्राणियों की 205 जातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।

लाल आंकड़ों की पुस्तिका (Red data book)-
IUCN ने विश्व की विलुप्तप्रायः हो रही जातियों की जानकारी लाल पृष्ठों पर मुद्रित की है। इनके बचाव का समग्र रूप से ध्यान रखना आवश्यक है। इसके अनुसार विश्व भर में लगभग 20,000 पादप जातियाँ विलोपन का खतरा झेल रही हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं-ऐकेशिया कोआ, मैस्कारीना रिवेन्जिलिनी, लोडोइसिआ स्केचेलारम, सिप्रिपीडियम कैलकोलम इत्यादि।

हमारे देश में भी पिछले कुछ वर्षों में कृषि के तीव्र विस्तार, शहरीकरण, अतिचारण इत्यादि के कारण अनेक पादप जातियाँ गम्भीर रूप से प्रभावित हुई हैं। इनमें से कुछ पौधे हैं-बैलेनोफेरा इन्वोल्युकेटा, पैराटाइओपसिस इजेक्युमोन्टिना, सॉसार्ड लापा, डाइआस्कोरिया, अनेक ऑर्किड्स इत्यादि।’ भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण’ के अनुसार ‘नेपॅथीस खासियाना’ नामक कीटहारी पौधा भी संकटग्रस्त पादपों की सूची में सम्मिलित है, जो मुख्यतः उत्तर पूर्व की खासी पहाड़ियों में पाया जाता है। (सारिणी-1)

सारिणी-1 भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विलुप्ति के खतरे से
प्रभावित प्रमुख जातियाँ एवं क्षेत्र

अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह क्षेत्र-

  • ऐलेन्थस कुरजाई (साइमारुबेसी-एन्जियोस्पर्मी)
  • डिप्टेरोकार्पस केरराई (डिप्टेरोकापेंसी)
  • मिरिस्टिका अण्डमानिका (मिरिस्टीकेसी)

हिमालय एवं पूर्वी भारत-

  • डायस्कोरिया डेल्टोइडिया (डायस्कोरिएसी)
  • ड्रॉसेरा इण्डिका (ड्रोसेरेसी)
  • नेपॅथीस खासियाना-घटपादप (नेपेन्थेसी)
  • रॉवुल्फिया सर्पेन्टीना-सर्पगंधा (एपोसाइनेसी)
  • वनीला पिलीफेरा (ऑर्काडेसी)

प्रायद्वीप पादप-

  • सिरोपिजिया फेनटास्टीका (ऐसक्लीपियेडेसी)
  • सेन्टेलम एल्बम-चन्दन (सेन्टेलेसी)

राजस्थान एवं गुजरात क्षेत्र-

  • कॉमिफोरा वाइटाई-गूगल (बरसेरेसी)
  • रोजा इन्वोलुक्रेटा-जंगली गुलाब (रोजेसी)

‘भारतीय प्राणी सर्वेक्षण’ (ZSI) और ‘भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण (BSI) ने संकटग्रस्त जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों की सूची तैयार की। है। हमारे देश में स्तनधारी प्राणियों की 390 और पक्षियों की 1232 जातियाँ हैं। इनमें से पक्षियों की 69 जातियाँ और स्तनधारी प्राणियों की 53 जातियाँ चिन्ता का विषय है। गुलाबी सिर वाली बत्तख (Pink Headed duck) की आखिरी जानकारी 1935 में वन्य और 1945 में पालतू रूप में दर्ज की गई थी। इसी तरह पहाड़ी बटेर (Mountain quail) भी अंग्रेज शिकारियों की हवस का शिकार होकर विलुप्त हो गया।
RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 44 जैव विविधता

भारत में विलुप्त होने के खतरे से घिरे कुछ प्रमुख प्राणी हैं-कृष्ण मृग (Black buck), चिंकारा (Chinkara), भेड़िया (Wolf), अनूपमृग (Swamp deer), नीलगाय (Nilgai), भारतीय कुरंग बारहसिंगा (Antelope), बाघ (Tiger), गेंडा (Rhinoceros), गिर सिंह (Gir lion), मगर (Crocodile), हंसावर (Flamingo), हवासिल (Pelican), सारंग (Bustard), श्वेत सारस (White crane), धूसर बगुला (Grey heron), तथा पर्वतीय बटेर (Mountain quail) (सारणी-2)

हमोर देश के अतिरिक्त अन्य देशों में भी वन्य प्राणी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। अफ्रीकी चीता (African Cheeta), श्याम गैंडा (Black rhino), अफ्रीकी सिंह (African lion), गोरिला (Gorilla), तथा रूसी ध्रुवीय भालू (Polar bear) एवं साइबेरियाई सारस (Siberian crane) इत्यादि विलुप्त हो रहे प्राणियों की गिनती में आते हैं। अमेरिका के दक्षिण पर्वतीय सिंह (Eastern mountain lion), यात्री कबूतर (Passenger pigeon), कैरोलियन तोता (Carolian parrot) तथा क्षुपी मुर्गी इतयादि तो विलुप्त हो चुके हैं। किसी समय हजारों की संख्या में पाये जाने वाला श्वेत पुच्छ प्रेअरी कुत्ता (White tailed prairyr dog) आजकल दुर्लभ प्राणी हो गया है। इसके अतिरिक्त कुक्कुट सारस (Whooping crane), डार्टर घोंघा मछली (Snail darter fish), मूज (Moose), ग्रिजली भालू (Grizzly bear), कैरीबू (Caribou), कशीका (Marten), गजदन्त चोंच कठफोड़वा (Ivory billed woodpecker), हवाई राजहंस (Hawian geese), फ्लोरिडा तेंदुआ (Florida panther) इत्यादि प्राणियों का अस्तित्व भी खतरे में है।

प्रश्न 5.
राजस्थान में कितने राष्ट्रीय पार्क हैं। उनके महत्त्व पर प्रकाश डालिये।
उत्तर-
नॉर्थ सिम्लीपल (उड़ीसा), केवलादेव (भरतपुर राज.), रणथम्भौर (सवाई माधोपुर राज.), सरिस्का (अलवर राज.), डेजर्ट नेशनल पार्क (जैसलमेर राज.), कंचनजंघा (सिक्किम), मुटुमलाई (तमिलनाडु), कोर्बट (उ.ख.), दूधवा (उ.प्र.), फूलों की घाटी (उ.ख.), सुन्दरवन (बंगाल) इत्यादि भारत के प्रमुख नेशनल पार्क हैं।

विश्व स्तर पर भी संरक्षण के प्रयास किये जा रहे हैं एवं कानून बनाये जा रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं-

प्राणियों के शिकार पर पाबन्दी है एवं पेड़-पौधों के व्यापार पर कई शर्ते लगाई गई हैं। जंगली प्राणियों की खाल बेचना, सांपों की खाल बेचना, हाथी-दाँत, गैंडे के सींग आदि का व्यापार भी गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है। विभिन्न वन्य सम्पदा वाले क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर पक्षी अभयारण्य और वन्य प्राणी अभयारण्य बनाये गये हैं, जिनमें पक्षी और अन्य प्राणी निर्भय होकर विचरण कर सकें। बहुत से क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया है। वन्य जीव संरक्षण के निम्न उपाय उपयुक्त सिद्ध हो सकते हैं।

  • आखेट पर प्रतिबन्ध (Restriction on hunting)
  • वासस्थानों में सुधार (Improvement in habitats)

इसके अन्तर्गत जाति विशेष की आहारी स्वभाव, जनन, आवास, स्थलीय आवश्यकताएँ, समष्टि आकार तथा उतार-चढ़ाव व अन्य जाति से सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित पारिस्थितिक ज्ञान से वन्य जीवों के संरक्षण में अत्यधिक सहायता मिलती है। अतः इनके लिए निम्न प्रकर के संरक्षण स्थल विकसित किये जाने चाहिये ।।

(i) राष्ट्रीय उद्यान (National park)-
इसके अन्तर्गत प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों व संसाधनों की सुरक्षा के लिए विविध प्रकार के पारिस्थितिकीय संसाधनों वाले क्षेत्रों को आरक्षित (reserve) कर दिया जाता है। इस प्रकार के स्थानों को राष्ट्रीय उद्यान (National park) कहा जाता है। इन उद्यानों की बाहरी प्राणियों वे मानव के प्रभावों से पूरी रक्षा की जाती है। वर्तमान में भारत में 166 तथा राजस्थान में 4 राष्ट्रीय उद्यान हैं।

(ii) अभयारण्य (Sanctuaries)-
ऐसे सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र जिनमें वन्य जीवों का आखेट व अन्य विनाशकारी गतिविधियाँ निषेद्ध हों, अभयारण्य कहलाते हैं। इनमें किसी जाति विशेष को भी संरक्षण देने के लिए भी अभयारण्य बनाया जा सकता है जैसे कृष्ण मृग के लिए तालछापर अभयारण्य, छापर, चूरू तथा बाघ के लिए सरिस्का अभयारण्य अलवर। भारत में कुल 515 तथा राजस्थान में 25 अभयारण्य हैं।

(iii) जीवमण्डल प्रारक्षण (Biosphere reserve)-
यह कार्यक्रम UNESCO के मानव तथा जीव मण्डल कार्यक्रम (Man and Biosphere = MAB) के अन्तर्गत आता है। इसमें प्राकृतिक आवासों तथा उनमें पाये जाने वाले पौधों व प्राणियों की रक्षा तथा संरक्षण किया जाता है। इस प्रारक्षण के तीन उद्देश्य हैं

(अ) संरक्षणात्मक भूमिका (Conservation role)-
जीन पूल (gene pool), प्राकृतिक पारिस्थितिक तन्त्रों का संरक्षण एवं जैविक विविधता का अनुरक्षण (maintenance)।
(ब) शोध सम्बन्धी भूमिका-
शोध एवं अध्ययन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शोध क्षेत्रों की स्थापना, विभिन्न शोध क्षेत्रों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान, कार्यक्रमों का प्रबंधन करना व संरक्षण से सम्बन्धित प्रशिक्षण देना।
(स) विकासीय भूमिका-
पर्यावरण संरक्षण व भूमि संसाधनों के विकास के बीच सम्बन्ध स्थापित करना।

प्रश्न 6.
राजस्थान में पाए जाने वाली मुख्य वनस्पतियों पर लेख लिखिए।
उत्तर-
राजस्थान की वनस्पति (Vegetation of Rajasthan)-
राजस्थान की अरावली की पहाड़ियों के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में एनोजीसस पेंडुला, (धोकड़ा), बोसवेलिया सेरेटा, स्टरक्यूलिया, यूरेन्स, (कतीरा) एकेशिया ल्यूकोफ्लीआ, एकेशिया कैटेचू (कत्था), जिजिफस नुमुलेरिया (झड़बेरी तथा यूफॉर्बिया केडसिफोलिया (थोर) के शुष्क कंटीले वन मिलते हैं।

अन्य वनस्पति में ऐलोवेरा (ग्वारपाठा) सोलेनम विर्जिनिएनम (भटकटैया), यूफॉर्बिया प्रोस्ट्रेटा (दूधी), एकाइनॉपस एकाइनेटस, (ऊंट कंटाला) जिजिफस जूजूबा (बेर), टेमेरिक्स आर्टिकुलेट (फरास), ब्यूटिया मॉनोस्पर्मा (ढाक), सैकेरेम पूंजा (सरकंडा), नीरियम इण्डिकम (कनेर) अकेशिया फर्नीसियाना (विलायती कीकर), प्रोसोपिस सिनेरेरिया (खेजड़ी) आदि भी मरुस्थल में पाई जाती है।

(i) राज्य वृक्ष-खेजड़ी (Prosopis cineraria)-
राजस्थान सरकार ने 31 अक्टूबर, 1983 में इसे राज्य वृक्ष घोषित किया था। स्थानीय भाषा में खेजड़ी, जाटी, शमीं आदि नामों से पुकारा जाता है।

इस वृक्ष का प्रत्येक भाग महत्त्व का होता है। औषध गुण को लेख आयुर्वेद शास्त्र में है, धार्मिक महत्त्व का भी है। मरुस्थल में मात्र यह ही एक वृक्ष है जो वहाँ के निवासियों के लिए वरदान है। इसी कारण यह मरुस्थल का कल्पतरु है। वहाँ के व्यक्ति तथा विश्नोई समाज के व्यक्ति इसकी अधिक रक्षा करते हैं तथा पूजा भी की जाती है। खेजड़ी के गीले व सूखे पत्तों को जानवरों को खिलाते हैं जिससे पशुओं की शारीरिक व दुग्ध में वृद्धि होती है। इसके फल (फलियाँ) मीठी व गूदेदार होती है। जिसे सांगरी कहते हैं, इन्हें सुखाने के बाद सब्ज़ी बनाई जाती है। फलियों से सीने के दर्द तथा पेट की गर्मी शान्त होती है। इस वृक्ष में पुष्प मार्च अप्रेल माह में आते हैं जिसमें पेटूलिट्रिन नामक सुगन्धित ग्लोकोसाइट पदार्थ पाया जाता है, यही नहीं गांवों में पुष्पों को चीनी में मिलाकर गर्भपात रोका जाता है।

(ii) राज्य पुष्प रोहिड़ा (Tecomella undulata)-
यह वृक्ष कम पानी व गर्म हवाओं को सहने वाला लम्बी जड़ों युक्त वृक्ष है। राजस्थान, पंजाब व गुजरात के मरुस्थलीय प्रदेशों में यह एक आदर्श वृक्ष है। वसन्त ऋतु में इसमें नारंगी व पीले रंग के बड़े पुष्प लगते हैं। यह मध्यमाकार, छायादार वृक्ष होता है। इसके फल 8 इंच लम्बे व बीज एक इंच लम्बा होता है। इसकी पत्तियाँ पशुओं के चारे में उपयोग होती हैं, स्वाद में कड़वी, कसैली, चटपटी होती है। यह यकृत, प्लीहा रोगहर, नेत्रों में लाभदायक, कृमिहर, रक्त शोधक, मूत्र संग्राहक, योनिवस्त्राबहर, अग्निदीपक तथा विषहर वृक्ष है। इसकी लकड़ी सागवान के समतुल्य होती है। लकड़ी मजबूत व धारियों युक्त होने से इसे मारवाड़ का सागवान कहते हैं।

(iii) पलाश या ढाक (Butea monosperma)-
इसे पलाश, टेसू या ढाक भी कहा जाता है। यह मध्यम आकार का गठा हुआ तथा टेढ़ा-मेढ़ा वृक्ष होता है। इसमें पत्ते तीन-तीन के समूह में लगते हैं। मार्च माह में बड़े, लाल नारंगी रंग के गंधयुक्त पुष्प लगते हैं। इसके अनेक उपयोग हैं

  • धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञों, क्रियाकर्मों में काम में लिया जाता है।
  • इसके बीज कृमिनाशक, जड़ रतौंधी व नेत्र के फूली को नष्ट करती है।
  • भूमि कटाव रोकने की क्षमता होती है।
  • इसके गोंद में काइनोटेमिन व गैलिक अम्ल होता है जो संग्रहणी व खांशी में उपयोगी है।
  • पुष्प में ग्लूकोसाइड ब्यूटीन होता है जो कफ, पित्त व दाद को दूर करता है।

(iv) देशी बबूल या कीकर (Acacia nilotica)-
मरु आवासों में मजबूत काष्ठ का मध्य से बड़े आकार का वृक्ष होता है। इससे गोंद प्राप्त होता है, लकड़ी का उपयोग फर्नीचर बनाने तथा फल व पत्तियों को मवेशी खाते हैं। इसी जाति का एक वृक्ष सफेद कीकर (Acacia leucophloea) भी पाया जाता है।

इनके अतिरिक्त बबूल जाति का एक छोटा वृक्ष कूमटा (Acacia senegal) भी पाया जाता है। इसके बीजों से पचकूटा सब्जी बनाई जाती है। राजस्थान में झड़बेरी (Ziziphus nummularia) कंटीली झाड़ी के रूप में पायी जाती है।

प्रश्न 7.
राजस्थान में पाए जाने वाले वन्य प्राणियों पर निबन्ध लिखिए।
उत्तर-
राजस्थान के मुख्य वन्य जीव (Main wildlife of Rajasthan)-
राजस्थान में नाना प्रकार की जातियों के वन्य जीव पाये। जाते हैं। वन्य जीवों की 60 जातियाँ हैं, 4 प्रकार के कछुएँ, दो प्रकार के मगर, दो प्रकार के बंदर व एम्फीबिया वर्ग के 9 जीव पाये जाते हैं। इनमें से मुख्य वन्य जीवों का विवरण इस प्रकार से हैं

(i) बाध (Panthera tigris)-
यह एक मांसाहारी प्राणी है, इसका भोजन चीतल व सांभर आदि हैं। यह रात्रि में शिकार करता है व दिन में विश्राम करता है । इसे रात्रि में दिखाई देता है व इसकी घ्राण शक्ति बहुत तेज होती है। सामान्यतः यह 10 फुट लम्बा व 3 से 3 फीट ऊँचा होता है। शरीर सुनहरा पीले रंग का जिस पर काले रंग की लम्बी धारियाँ होती हैं। यह अकेला विचरण करता है। बाघिन अपने बच्चों को खाने व शिकार करने का तरीका सिखाती है। यह एक बार में 2 से 3 शावकों को जन्म देती है व इसकी गर्भाविधि 95 से 105 दिवस की होती है।

राजस्थान में बाघ भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य, चित्तौड़गढ़; रणथम्भौर अभयारण्य, सवाईमाधोपुर; सरिस्का अभयारण्य, अलवर तथा रामगढ़ अभयारण्य बूंदी में पाया जाता है।

(ii) जरख (Hyaena-hyaena)-
इसके लचककर चलने के कारण इसे आम बोलचाल की भाषा में लकड़बग्घा कहते हैं व सम्पूर्ण राजस्थान में खुले जंगल व घास के मैदानों में मिलता है। इसका शरीर आगे से मजबूत परन्तु पीछे से कमजोर होता है। इसकी लम्बाई 100 सेमी. व पूँछ 45 सेमी. लम्बी होती है। अगले पैर लम्बे व मजबूत तथा पिछले पैर छोटे व कमजोर होते हैं। इसका रंग सलेटी व शरीर पर धारियाँ होती हैं। यह रात्रि में शिकार व दिन में विश्राम करता है। यह सबसे डरपोक परन्तु जंगल में मृतजीवों का भक्षण करता है।

(iii) चिंकारा (Gezella gazella)-
ये हल्के भूरे या बादामी रंग के होते हैं। इनका वजन 20 से 25 किग्रा. वे ऊँचाई में 60-70 सेमी. तक होते हैं। नर व मादा दोनों के सींग (25 से 30 सेमी. लम्बे) होते हैं। किन्तु समूह में रहते हैं। एक समूह में चार से छः चिंकारा होते हैं व तेज दौड़ते हैं। इनका भोजन घास, जंगली पौधे, कैर, आक आदि होता है।

(iv) नील गाय (Boselaphus tragocamelus)-
इसे गाँवों में रोज या रोजड़ा कहते हैं। वस्तुतः यह गाय नहीं है वरन् एन्टीलोप जाति का जीव है। यह घोड़े के समान मजबूत, भारी व आसमानी रंग का होता है। यह जंगल, मैदानों व खेतों में घूमते हैं। इनकी लम्बाई लगभग दो मीटर व ऊँचाई डेढ़ मीटर तक होती है। नर नील गाय का रंग गहरा नीला-काला, सींग लगभग 10 सेमी. व गले में बालों का गुच्छा होता है। मादा भूरे रंग की व सींग नहीं होते। ये शाकाहारी, समूहों में विचरण करने वाले व खेतों को अधिक हानि पहुँचाते हैं। नीलगाय, बेर, जामुन, कोमल पत्तियाँ, ज्वार, मक्का, बाजरा आदि के पत्तों को खाते हैं।

(v) अजगर (Python)-
ये विशालकाय सर्प होते हैं जो सुस्त, सीधे व विषहीन होते हैं। शिकार को अपने में जकड़कर मार देते हैं तथा उसे पूरा निगल जाते हैं। इनका शरीर दो से चार मीटर तक लम्बा, सौ से। दो सौ किलो वजन का, गोल शरीर, सिर चपटा व छोटा, पुतलियाँ तिरछी होती हैं । रात्रि में सरलता से देख सकते हैं। ये पठारों की ढाल, उजड़े स्थानों, पानी के आसपास व पेड़ों पर मिलते हैं। ये शिकार को अपनी दुम से कसकर पकड़ते हैं। मुख्य भोजन चिड़िया से हिरण तक के जीव हैं।

पक्षी जगत-राजस्थान में पक्षियों की 80 जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें पिन टेल, मयूर, गोड़ावन, सफेद सारस, बाहमनी डक, शालवार आदि मुख्य हैं।

गोडावन (Choritus Nigercipes)-
यह राजस्थान का राज्य पक्षी है। राजस्थान के जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी, पाली, कोटा, बारां व अजमेर जिलों में पाया जाता है। इसका निरन्तर शिकार होने से विलुप्त होने का संकट हो गया है। नर पक्षी की ऊँचाई 120-160 सेमी. व मुकुट पर काली केलंगी होती है। मादा छोटी 70 से 75 सेमी. होती हैं। ये बस्तियों से दूर रहते हैं। इनका भोजन छिपकली, कीड़े-मकोड़े, सांप, जंगली बेर आदि हैं।

प्रश्न 8.
राजस्थान को भौगोलिक क्षेत्रफल के आधार पर कितने भागों में बाँटा गया है? किन्हीं दो का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
सम्पूर्ण, राजस्थान को अरावली पर्वत की श्रृंखलायें कर्णवत् (diagonal) रूप से स्थित होकर दो भागों में विभक्त करती है। अरावली के पश्चिम में मरुस्थलीय व अर्द्ध-मरुस्थलीय मैदान है तथा पूर्व में मध्यवर्ती उच्च भूमि वनस्पति युक्त व उपजाऊ भाग है। यहाँ बहुत कम वर्षा होती है। राजस्थान के कुल क्षेत्रफल की 9 प्रतिशत भाग वन है तथा सघन वृक्ष क्षेत्र केवल 3 प्रतिशत ही है। पूर्वी-दक्षिण क्षेत्र में पहाड़ियाँ व पठार हैं। सम्पूर्ण राजस्थान को भू-संरचना अनुसार चार भागों में बाँट सकते हैं-

  1. मरुस्थलीय क्षेत्र,
  2. पूर्वी व मैदानी क्षेत्र,
  3. दक्षिणी क्षेत्र तथा
  4. पर्वतीय क्षेत्र।

(1) मरुस्थलीय क्षेत्र (Desert region)-
राजस्थान का पश्चिमी दो तिहाई भाग मरुस्थल है जिसे थार मरुस्थल कहते हैं। यहाँ की मृदा बलुई (रेत) है जिससे रेत के टीले (sand dunes) बने होते हैं । ये टीले तेज हवा के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित हो जाते हैं। वर्षा का वार्षिक औसत लगभग 100 मिलीमीटर होता है, अतः यहाँ की जलवायु शुष्क होती है। कम वर्षा के कारण यहाँ सेवन घास (लेसूरियस हिर्मुटस), बबूल (अकेशिया निलोटिका), आक, कैर (केपेरिस), बेर (जिजिफस), फोग (कैलिगोनम पोलीगोनॉइड्स) आदि झाड़ी या वृक्ष होते हैं।
यहाँ कृष्ण मृग, गोडावन, नील गाय, चिंकारा मुख्य वन्य जीव हैं। मुख्य पक्षी गिद्ध, चील, बाज, कुर्जा, तिलोर है।
इस क्षेत्र में दो अभयारण्य हैं

  • ताल छापर अभयारण्य (चूरू), तथा
  • मरू उद्यान/जैव मण्डल रिजर्व जैसलमेर।।

(2) पूर्वी व मैदानी क्षेत्र (Eastern and plain regions)-
इस क्षेत्र में मरुस्थलीय क्षेत्र की तुलना में अधिक वर्षा व जलवायु भी उन्नत होती है। यहाँ नदी, नालों व जल की उपलब्धता के कारण यह क्षेत्र उपजाऊ होता है। इन तालाबों में स्थानीय तथा प्रवासी पक्षी व जलचर निवास करते हैं।

वनस्पति की दृष्टिकोण से बबूल, इमली (टेमेरिन्डस इन्डिका), कदम्ब (एन्थोसिफेलस इण्डिकस), आम (मैन्जीफेरा इण्डिका), कत्था (अकेशिया केटैचू), पीपल (फाइकस रिलिजिओसा), बरगद (फाइकस बंगालेन्सिस), धोंकडा (एनोजिसस पेण्डुला) आदि के वृक्ष पाये जाते हैं।

जंगलों में अजगर, जरख, जंगली सूअर, काले हिरण, नेवले, जंगली बिल्ली, सिआर, लोमड़ी, सेही, खरहे, टोडी कैट, साम्भर व नील गाय पाये जाते हैं। पक्षियों में-इग्रेट, पाईपिट, जल कौवे, सेण्ड पाइपर, स्टार्क, स्पून बिल, प्लोवर, बार्णलर, गिद्ध, ईगल्स, क्रोच व साइबेरियन क्रेन मुख्य हैं। कछुए, मेंढ़क, जोंक, घोंघे, ऊद बिलाव, जलीय सर्प आदि जलीय जीव होते हैं। इस क्षेत्र में राष्ट्रीय पार्क तथा अभयारण्य हैं। राष्ट्रीय पार्क में

  • केवलादेव राष्ट्रीय उद्याने, भरतपुर,
  • राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य, राणा प्रताप सागर कोटा,
  • वन विहार अभयारण्य, धौलपुर,
  • जवाहर सागर अभयारण्य, कोटा
  • बंध बारेठा अभयारण्य, भरतपुर है।

(3) दक्षिणी क्षेत्र (South region)-
इस क्षेत्र में विंध्याचल व अरावली पर्वत मालाओं के काली मिट्टीयुक्त पठारी भाग हैं। इस क्षेत्र में आदिवासी अधिक संख्या में पाये जाते हैं। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 150 से 250 मिमी. होती है, इस कारण सघन वन भी पाये जाते हैं।

यहाँ की वनस्पति मुख्यतः दुधी (यूफॉर्बिया प्रोस्ट्रेय), बांस (बम्बूसा अरूण्डिनेलिया), तेन्दु (डायोस्पाईरस मैलेनोजाइलॉन), महुआ (मधुका इण्डिका), बहेड़ा (टरमिनेलिया), धोंकड़ा (एनौजिसस लैटिफोलिया) के वृक्ष हैं। यहाँ वर्षा अधिक होने के कारण सागवान (टेक्टोना ग्रेन्डिस) के वृक्ष अधिक मात्रा में हैं।

यहाँ वन्य जीव बघेरे, बाघ, चीतल, सांभर, उड़न गिलहरी, चौसिंगा, चिंकारा, जंगली सूअर, भालू, सेही, नील गाय, भेड़िया, जरख, सिआर, लंगूर, रीसस बंदर पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में आठ वन्य जीव अभयारण्य हैं

  • कुम्भलगढ़ अभयारण्य, राजसमंद
  • सज्जनगढ़ अभयारण्य, उदयपुर
  • फुलवारी की नाल अभयारण्य, पाली उदयपुर
  • बस्सी अभयारण्य, चित्तौड़गढ़
  • भैंसरोडगढ़ अभयारण्य, चित्तौड़गढ़
  • जयसमन्द अभयारण्य, जयसमंद
  • माउण्ट आबू अभयारण्य, सिरोही
  • सीतामाता अभयारण्य, प्रतापगढ़।।

(4) पर्वतीय क्षेत्र (Mountain region)-
राजस्थान के दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व तक फैली हुई अरावली वे विंध्याचले की पर्वत श्रृंखलायें मिलकर पर्वतीय क्षेत्र बनाती हैं। राजस्थान को यहाँ मुख्य वन क्षेत्र है। यहाँ औसतने वार्षिक वर्षा 500 से 700 मिमी. तक होती है। माउण्ट आबू में 1722 मीटर ऊँची चोटी गुरुशिखर है। यहाँ मुख्य वनस्पति के रूप में घास (सायनोडॉन डेक्टाइलोन), धोक, साल (शोरिया रॉबस्टा) तेन्दु, पलाश (ब्यूटिया मोनोस्पर्मा), आम आदि हैं।

वन्य जन्तुओं में बाघ (Tiger), बघेरा (पेंथर), रीछ, जरख, चीतल, चिंकारा, सांभर, सियार, नीलगाय, कृष्ण मृग, जंगली सूअर, खरगोश, नेवले, गोह, लोमडी, फ्लाईंग फोक्स, सर्प, चौसिंगा, गिरगिट आदि पाये जाते हैं।

पक्षियों में स्टार्क, स्पूनविल, हारिल, बत्तखें, जैसानरा, फ्लाई कैचर, बटेर, भटतीतर, उल्लू, ईगल, मोर इत्यादि पाये जाते हैं।

इस क्षेत्र में दस वन्य जीव अभयारण्य व राष्ट्र उद्यान स्थित हैंसरिस्का अभयारण्य, अलवर; रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान सवाई माधोपुर; दर्रा अभयारण्य, कोटा; नाहरगढ़ अभयारण्य, जयपुर; रामगढ़ अभयारण्य, बूंदी; जमवारामगढ़ अभयारण्य, जयपुर, शेरगढ़ अभयारण्य, बारां; सवाई मानसिंह अभयारण्य, सवाईमाधोपुर; कैलादेवी अभयारण्य, करौली तथा टॉडगढ़ रावली अभयारण्य, अजमेर है।

(अ) राजस्थान के मुख्य वन्य जीव (Main wildlife of Rajasthan)-
राजस्थान में नाना प्रकार की जातियों के वन्य जीव पाये। जाते हैं। वन्य जीवों की 60 जातियाँ हैं, 4 प्रकार के कछुएँ, दो प्रकार के मगर, दो प्रकार के बंदर व एम्फीबिया वर्ग के 9 जीव पाये जाते हैं। इनमें से मुख्य वन्य जीवों का विवरण इस प्रकार से हैं

(i) बाध (Panthera tigris)-
यह एक मांसाहारी प्राणी है, इसका भोजन चीतल व सांभर आदि हैं। यह रात्रि में शिकार करता है व दिन में विश्राम करता है । इसे रात्रि में दिखाई देता है व इसकी घ्राण शक्ति बहुत तेज होती है। सामान्यतः यह 10 फुट लम्बा व 3 से 3 फीट ऊँचा होता है। शरीर सुनहरा पीले रंग का जिस पर काले रंग की लम्बी धारियाँ होती हैं। यह अकेला विचरण करता है। बाघिन अपने बच्चों को खाने व शिकार करने का तरीका सिखाती है। यह एक बार में 2 से 3 शावकों को जन्म देती है व इसकी गर्भाविधि 95 से 105 दिवस की होती है।

राजस्थान में बाघ भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य, चित्तौड़गढ़; रणथम्भौर अभयारण्य, सवाईमाधोपुर; सरिस्का अभयारण्य, अलवर तथा रामगढ़ अभयारण्य बूंदी में पाया जाता है।

(ii) जरख (Hyaena-hyaena)-
इसके लचककर चलने के कारण इसे आम बोलचाल की भाषा में लकड़बग्घा कहते हैं व सम्पूर्ण राजस्थान में खुले जंगल व घास के मैदानों में मिलता है। इसका शरीर आगे से मजबूत परन्तु पीछे से कमजोर होता है। इसकी लम्बाई 100 सेमी. व पूँछ 45 सेमी. लम्बी होती है। अगले पैर लम्बे व मजबूत तथा पिछले पैर छोटे व कमजोर होते हैं। इसका रंग सलेटी व शरीर पर धारियाँ होती हैं। यह रात्रि में शिकार व दिन में विश्राम करता है। यह सबसे डरपोक परन्तु जंगल में मृतजीवों का भक्षण करता है।

(iii) चिंकारा (Gezella gazella)-
ये हल्के भूरे या बादामी रंग के होते हैं। इनका वजन 20 से 25 किग्रा. वे ऊँचाई में 60-70 सेमी. तक होते हैं। नर व मादा दोनों के सींग (25 से 30 सेमी. लम्बे) होते हैं। किन्तु समूह में रहते हैं। एक समूह में चार से छः चिंकारा होते हैं व तेज दौड़ते हैं। इनका भोजन घास, जंगली पौधे, कैर, आक आदि होता है।

(iv) नील गाय (Boselaphus tragocamelus)-
इसे गाँवों में रोज या रोजड़ा कहते हैं। वस्तुतः यह गाय नहीं है वरन् एन्टीलोप जाति का जीव है। यह घोड़े के समान मजबूत, भारी व आसमानी रंग का होता है। यह जंगल, मैदानों व खेतों में घूमते हैं। इनकी लम्बाई लगभग दो मीटर व ऊँचाई डेढ़ मीटर तक होती है। नर नील गाय का रंग गहरा नीला-काला, सींग लगभग 10 सेमी. व गले में बालों का गुच्छा होता है। मादा भूरे रंग की व सींग नहीं होते। ये शाकाहारी, समूहों में विचरण करने वाले व खेतों को अधिक हानि पहुँचाते हैं। नीलगाय, बेर, जामुन, कोमल पत्तियाँ, ज्वार, मक्का, बाजरा आदि के पत्तों को खाते हैं।

(v) अजगर (Python)-
ये विशालकाय सर्प होते हैं जो सुस्त, सीधे व विषहीन होते हैं। शिकार को अपने में जकड़कर मार देते हैं तथा उसे पूरा निगल जाते हैं। इनका शरीर दो से चार मीटर तक लम्बा, सौ से। दो सौ किलो वजन का, गोल शरीर, सिर चपटा व छोटा, पुतलियाँ तिरछी होती हैं । रात्रि में सरलता से देख सकते हैं। ये पठारों की ढाल, उजड़े स्थानों, पानी के आसपास व पेड़ों पर मिलते हैं। ये शिकार को अपनी दुम से कसकर पकड़ते हैं। मुख्य भोजन चिड़िया से हिरण तक के जीव हैं।

पक्षी जगत-
राजस्थान में पक्षियों की 80 जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें पिन टेल, मयूर, गोड़ावन, सफेद सारस, बाहमनी डक, शालवार आदि मुख्य हैं।

(i) गोडावन (Choritus Nigercipes)-
यह राजस्थान का राज्य पक्षी है। राजस्थान के जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी, पाली, कोटा, बारां व अजमेर जिलों में पाया जाता है। इसका निरन्तर शिकार होने से विलुप्त होने का संकट हो गया है। नर पक्षी की ऊँचाई 120-160 सेमी. व मुकुट पर काली केलंगी होती है। मादा छोटी 70 से 75 सेमी. होती हैं। ये बस्तियों से दूर रहते हैं। इनका भोजन छिपकली, कीड़े-मकोड़े, सांप, जंगली बेर आदि हैं।

(ब) राजस्थान की वनस्पति (Vegetation of Rajasthan)-
राजस्थान की अरावली की पहाड़ियों के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में एनोजीसस पेंडुला, (धोकड़ा), बोसवेलिया सेरेटा, स्टरक्यूलिया, यूरेन्स, (कतीरा) एकेशिया ल्यूकोफ्लीआ, एकेशिया कैटेचू (कत्था), जिजिफस नुमुलेरिया (झड़बेरी तथा यूफॉर्बिया केडसिफोलिया (थोर) के शुष्क कंटीले वन मिलते हैं।

अन्य वनस्पति में ऐलोवेरा (ग्वारपाठा) सोलेनम विर्जिनिएनम (भटकटैया), यूफॉर्बिया प्रोस्ट्रेटा (दूधी), एकाइनॉपस एकाइनेटस, (ऊंट कंटाला) जिजिफस जूजूबा (बेर), टेमेरिक्स आर्टिकुलेट (फरास), ब्यूटिया मॉनोस्पर्मा (ढाक), सैकेरेम पूंजा (सरकंडा), नीरियम इण्डिकम (कनेर) अकेशिया फर्नीसियाना (विलायती कीकर), प्रोसोपिस सिनेरेरिया (खेजड़ी) आदि भी मरुस्थल में पाई जाती है।

(i) राज्य वृक्ष-खेजड़ी (Prosopis cineraria)-
राजस्थान सरकार ने 31 अक्टूबर, 1983 में इसे राज्य वृक्ष घोषित किया था। स्थानीय भाषा में खेजड़ी, जाटी, शमीं आदि नामों से पुकारा जाता है।

इस वृक्ष का प्रत्येक भाग महत्त्व का होता है। औषध गुण को लेख आयुर्वेद शास्त्र में है, धार्मिक महत्त्व का भी है। मरुस्थल में मात्र यह ही एक वृक्ष है जो वहाँ के निवासियों के लिए वरदान है। इसी कारण यह मरुस्थल का कल्पतरु है। वहाँ के व्यक्ति तथा विश्नोई समाज के व्यक्ति इसकी अधिक रक्षा करते हैं तथा पूजा भी की जाती है। खेजड़ी के गीले व सूखे पत्तों को जानवरों को खिलाते हैं जिससे पशुओं की शारीरिक व दुग्ध में वृद्धि होती है। इसके फल (फलियाँ) मीठी व गूदेदार होती है। जिसे सांगरी कहते हैं, इन्हें सुखाने के बाद सब्ज़ी बनाई जाती है। फलियों से सीने के दर्द तथा पेट की गर्मी शान्त होती है। इस वृक्ष में पुष्प मार्च अप्रेल माह में आते हैं जिसमें पेटूलिट्रिन नामक सुगन्धित ग्लोकोसाइट पदार्थ पाया जाता है, यही नहीं गांवों में पुष्पों को चीनी में मिलाकर गर्भपात रोका जाता है।

(ii) राज्य पुष्प रोहिड़ा (Tecomella undulata)-
यह वृक्ष कम पानी व गर्म हवाओं को सहने वाला लम्बी जड़ों युक्त वृक्ष है। राजस्थान, पंजाब व गुजरात के मरुस्थलीय प्रदेशों में यह एक आदर्श वृक्ष है। वसन्त ऋतु में इसमें नारंगी व पीले रंग के बड़े पुष्प लगते हैं। यह मध्यमाकार, छायादार वृक्ष होता है। इसके फल 8 इंच लम्बे व बीज एक इंच लम्बा होता है। इसकी पत्तियाँ पशुओं के चारे में उपयोग होती हैं, स्वाद में कड़वी, कसैली, चटपटी होती है। यह यकृत, प्लीहा रोगहर, नेत्रों में लाभदायक, कृमिहर, रक्त शोधक, मूत्र संग्राहक, योनिवस्त्राबहर, अग्निदीपक तथा विषहर वृक्ष है। इसकी लकड़ी सागवान के समतुल्य होती है। लकड़ी मजबूत व धारियों युक्त होने से इसे मारवाड़ का सागवान कहते हैं।

(iii) पलाश या ढाक (Butea monosperma)-
इसे पलाश, टेसू या ढाक भी कहा जाता है। यह मध्यम आकार का गठा हुआ तथा टेढ़ा-मेढ़ा वृक्ष होता है। इसमें पत्ते तीन-तीन के समूह में लगते हैं। मार्च माह में बड़े, लाल नारंगी रंग के गंधयुक्त पुष्प लगते हैं। इसके अनेक उपयोग हैं

  • धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञों, क्रियाकर्मों में काम में लिया जाता है।
  • इसके बीज कृमिनाशक, जड़ रतौंधी व नेत्र के फूली को नष्ट करती है।
  • भूमि कटाव रोकने की क्षमता होती है।
  • इसके गोंद में काइनोटेमिन व गैलिक अम्ल होता है जो संग्रहणी व खांशी में उपयोगी है।
  • पुष्प में ग्लूकोसाइड ब्यूटीन होता है जो कफ, पित्त व दाद को दूर करता है।

(iv) देशी बबूल या कीकर (Acacia nilotica)-
मरु आवासों में मजबूत काष्ठ का मध्य से बड़े आकार का वृक्ष होता है। इससे गोंद प्राप्त होता है, लकड़ी का उपयोग फर्नीचर बनाने तथा फल व पत्तियों को मवेशी खाते हैं। इसी जाति का एक वृक्ष सफेद कीकर (Acacia leucophloea) भी पाया जाता है।

इनके अतिरिक्त बबूल जाति का एक छोटा वृक्ष कूमटा (Acacia senegal) भी पाया जाता है। इसके बीजों से पचकूटा सब्जी बनाई जाती है। राजस्थान में झड़बेरी (Ziziphus nummularia) कंटीली झाड़ी के रूप में पायी जाती है।

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