RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 पादप जगत

RBSE Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 पादप जगत

Rajasthan Board RBSE Class 11 Biology Chapter 5 पादप जगत

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रोकैरियोटिक कोशिका होती है –
(अ) हरित शैवाल में
(ब) नील हरित शैवाल में
(स) भूरी शैवाल में
(द) लाल शैवाल में

प्रश्न 2.
जेलिडियम शैवाल से प्राप्त किया जाता है –
(अ) आयोडीन
(ब) डायटोमाइट
(स) ऐगार-ऐगार
(द) ब्रोमिन

प्रश्न 3.
प्रो. शिवराम कश्यप हैं –
(अ) भारतीय शैवालविज्ञान के जनक
(ब) भारतीय कवकविज्ञान के जनक
(स) भारतीय ब्रायोफाइटाविज्ञान के जनक
(द) भारतीय टेरिडोफाइटाविज्ञान के जनक

प्रश्न 4.
निम्नांकित में कौनसा पादप ब्रायोफाइट है –
(अ) फ्यूनेरिया
(ब) पोलीसाइफोनिया
(स) इक्वीसीटम
(द) साइकस

प्रश्न 5.
संवहनी क्रिप्टोगेम्स (अपुष्पीपादप) है –
(अ) थैलोफाइटा
(ब) ब्रायोफाइटा
(स) टेरिडोफाइटा
(द) स्पर्मेटोफाइटा

प्रश्न 6.
वह पादप वर्ग जिसमें दोनों पीढियाँ स्वपोषी व स्वतंत्र होती हैं –
(अ) शैवाल
(ब) कवक
(स) ब्रायोफाइटा
(द) टेरिडोफाइटा

प्रश्न 7.
फलरहित बीज वाले पादपों को कहते हैं –
(अ) ऐन्जियोस्पर्म
(ब) जिम्नोस्पर्म
(स) टेरिडोस्पर्म
(द) फाइटोस्पर्म

प्रश्न 8.
पोलीपेटली का अर्थ है –
(अ) दलपुंज पृथकदली
(ब) दलपुंज संयुक्तदली
(स) बाह्यदलपुंज पृथकदली
(द) बाह्यदलपुंज संयुक्तदली
उत्तरमाला:
1. (ब), 2. (स), 3. (स), 4. (अ), 5. (स) 6. (द), 7. (ब), 8. (अ)

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अविभेदित पादप शरीर को …….. कहते हैं।
उत्तर:
थैलस।

प्रश्न 2.
शैवाल के उन दो संवर्गों के नाम लिखिए जिनमें कशाभिकीय कोशिकायें नहीं पायी जाती हैं।
उत्तर:
रोडोफाइसी तथा सायनोफाइसी।

प्रश्न 3.
किन्हीं दो खाद्य शैवालों के नाम बताइये।
उत्तर:
क्लोरेला तथा स्पाइरुलिना।

प्रश्न 4.
ब्रायोफाइटा में लैंगिक जनन ……. प्रकार का होता है।
उत्तर:
विषमयुग्मकी।

प्रश्न 5.
पीट कोयला किससे बनता है ?
उत्तर:
स्फैग्नम से बनता है।

प्रश्न 6.
किन्हीं दो समबीजाणुक टेरिडोफाइट का नाम लिखिए।
उत्तर:
इक्वीसीटम, साइलोटम।

प्रश्न 7.
किन्हीं दो विषमबीजाणुक टेरिडोफाइट के नाम लिखिये।
उत्तर:
सिलेजिनेला, मार्सीलिया।

प्रश्न 8.
राजस्थान में पाये जाने वाले जंगली जिम्नोस्पर्म का नाम क्या है ?
उत्तर:
इफीड्रा फोलियेटा।

प्रश्न 9.
दोहरा निषेचन तथा त्रिक संयोजन किन पौधों में सम्पन्न होता है ?
उत्तर:
ऐंजियोस्पर्म (Angiosperm) पादपों में।

प्रश्न 10.
आवृतबीजी पौधों का भ्रूणपोष कितने गुणित होता है ?
उत्तर:
त्रिगुणित (Triploid)।

प्रश्न 11.
चिलगोजा किससे प्राप्त होता है ?
उत्तर:
पाइनस जिरारडिआना।

प्रश्न 12.
टैक्सस से कौनसा कैंसर रोधी पदार्थ प्राप्त होता है ?
उत्तर:
टैक्सोल।

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शैवालों के चार प्रमुख लक्षण लिखिये।
उत्तर:

  1. शैवाल जलीय आवास में रहते हैं।
  2. शैवालों को पादप शरीर थैलस होता है।
  3. शैवालों के पादप शरीर में ऊतक विभेदन तथा संवहन तंत्र नहीं पाया जाता है।
  4. इनका मुख्य पादप शरीर युग्मकोभिद होता है।

प्रश्न 2.
जल प्रस्फुटन या उफान को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
अनेक बार छोटे जल स्रोतों में कुछ शैवालों जैसे माइक्रोसिस्टिस, ऑसिलेटोरिया आदि की संख्या अत्यधिक हो जाती है। इनमें से अधिकांश शैवाल मर जाते हैं जिससे जल दुर्गन्ध मय हो जाता है। व इसमें O2 की कमी हो जाती है। इससे जलीय जन्तुओं की दम घुटने से मृत्यु हो जाती है। इस स्थिति को जल प्रस्फुटन या उफान कहते हैं।

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प्रश्न 3.
किसी ब्रायोफाइटा पादप का नामांकित चित्र बनाइये।
उत्तर:

प्रश्न 4.
एक जलीय ब्रायोफाइटा का नाम बताइये।
उत्तर:
रिक्सिया फ्लूटेन्स।

प्रश्न 5.
दो जलीय टेरिफ्नोफाइटा के नाम लिखिये।
उत्तर:
अजोला तथा सल्विनिया (Azolla and Salvinea)।

प्रश्न 6.
समबीजाणुक व विषमबीजाणुक पदों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
टेरिडोफाइटा के जिन सदस्यों में एक ही प्रकार के बीजाणु बनते हैं, उन्हें समबीजाणुक पादप कहते हैं, उदाहरण-इक्वीसीटम। अन्य पादपों में दो प्रकार के बीजाणु बनते हैं, उन्हें विषमबीजाणुक पादप कहा जाता है, उदाहरण – सिलेजिनेला।

प्रश्न 7.
किसी एक टेरिडोफाइट का नाम बताइये जिसमें द्वितीयक वृद्धि होती है ?
उत्तर:
आइसोइटिस।

प्रश्न 8.
अण्डधानी व स्त्रीधानी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अण्डधानी का निर्माण प्रायः साधारण पौधों (शैवाल, कवक) में होता है। आधार पर यह गोल फूली हुई होती है, इसमें केवल एक अण्ड होता है।

ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा व जिम्नोस्पर्म पौधों में स्त्रीधानी का निर्माण होता है। स्त्रीधानी फ्लास्क की आकृति की संरचना होती है। इसके आधारीय फूले हुए भाग में अण्ड तथा वेन्टर केनाल कोशिका (VCC) तथा संकरी ऊपरी नाल में नेक केनाल कोशिकाएँ (NCC) 2 से 6 तक होती हैं।

प्रश्न 9.
द्विलिंगाश्रयी तथा एकलिंगाश्रयी पदों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
जब पौधे के जननांग अलग-अलग पौधों पर स्थित हों तो उसे एकलिंगाश्रयी कहते हैं तथा दोनों जननांगों का परिवर्धन एक ही पौधे पर होने को द्विलिंगाश्रयी कहते हैं।
उदाहरण – एकलिंगाश्रयी अरंड, द्विलिंगाश्रयी – गुडहल।

प्रश्न 10.
नग्नबीजी से क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
जिन पौधों में बीज फलों में रक्षित नहीं होते अर्थात् बीज नग्न होते हैं अर्थात् फलरहित बीज वाले पौधे होते हैं। उदाहरणअनावृतबीजी पादप।

प्रश्न 11.
पीढी एकान्तरण क्या है ? समझाइये।
उत्तर:
प्रायः पौधों में दो प्रकार की पीढ़ियाँ होती हैं – बीजाणुभिद पीढी तथा युग्मोभिद पीढ़ी। दोनों प्रकार की पीढ़ियाँ जीवनवृत्त में एकदूसरे के बाद एकान्तर में आती रहती हैं। जैसे ब्रायोफाइट्स में मुख्य पादप अगुणित अर्थात् युग्मकोभिद होता है। इस पर पुंधानी व स्त्रीधानियाँ उत्पन्न होती हैं। पुंधानियों से पुमणु व स्त्रीधानियों से अण्ड बनते हैं। अण्ड व पुमणु संयोजित होकर द्विगुणित युग्मनज बनाते हैं। यह युग्मनज परिवर्धित होकर बीजाणुभिद कैप्स्यूल बनाता है। कैप्स्यूल में अर्धसूत्री विभाजन होने से अगुणित बीजाणु बनते हैं जिससे पुनः युग्मकोभिद पादप बनता है। अतः पौधे के सम्पूर्ण जीवन वृत्तान्त में यह दोनों पीढ़ियाँ एकान्तर में आती हैं, इसे ही पीढी एकान्तरण कहते हैं।

प्रश्न 12.
जिम्नोस्पर्मी के किन्हीं चार पादपों के नाम लिखिये।
उत्तर:
साइकैस, पाइनस, एफिड्रा तथ टैक्सस।

प्रश्न 13.
दो मरुस्थली व दो जलीय आवृतबीजियों के नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. मरुस्थली पादप-नागफनी, आक।
  2. जलीय पादप-हाइड्रिला, वेलिसनेरिया।

प्रश्न 14.
डाइकोटिलिडनी के पोलिपेटेली व गेमोपेटेली की श्रेणियाँ बताइये।
उत्तर:

  1. पोलिपेटेली की श्रेणियाँ-थैलेमिफ्लोरी, डिस्कीफ्लोरी, कैलिसिफ्लोरी।
  2. गेमोपेटेली की श्रेणियाँ-इनफेरी, हेटेरोमेरी, बाइकार्येलिटी।

प्रश्न 15.
एक बीजपत्री पादपों के चार लक्षण बताइये।
उत्तर:

  1. इनमें एकबीजपत्र होता है।
  2. मूलें अपस्थानिक होती हैं।
  3. पर्यों में शिराविन्यास समानान्तर होता है।
  4. पुष्प त्रतीय होते हैं।

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शैवालों के वर्गीकरण एवं मुख्य लक्षणों को स्पष्ट करें।
उत्तर:
शैवालों के सामान्य लक्षण (General Characters of Algae):

  1. मुख्यतः शैवाल जलीय आवास में पाये जाते हैं। ये अलवणीय, लवणीय, समुद्री जल में, बर्फ में तथा नम स्थानों पर पाये जाते हैं।
  2. इनका पादप शरीर थैलस (Thallus, सूकाय) होता है जो युग्मकोभिद् पीढ़ी (Gametophytic generation) को निरूपित करता है। पादप शरीर में मूल, स्तम्भ व पर्यों का विभेदन नहीं होता है। पादप शरीर को थैलस कहते हैं जो एककोशिक या बहुकोशिक होता है।
  3. पादप शरीर में ऊतक विभेदन तथा संवहने तंत्र अनुपस्थित होता है। शैवालों में कोशिका भित्ति सेलूलोज व पेक्टिन की बनी होती है। भूरी शैवालों (Phaeophyceae) की भित्ति में एल्जिनिक व फ्यूसिनिक अम्ल होता है परन्तु लाल शैवालों (Rhodophyceae) की भित्ति में पोलीसल्फेट एस्टर्स (अतिरिक्त रूप से) पाये जाते हैं।
  4. सभी शैवाले ससमीमकेन्द्रकी (Eukaryotic) होती हैं।
  5. वर्णक कलाबद्ध कोशिकांगों में व्यवस्थित रहते हैं, उन्हें लवक (Plastids) कहा जाता है। पर्णहरित युक्त लवकों को क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) कहते हैं। शैवालों में क्लोरोप्लास्ट विभिन्न आकृतियों के होते हैं। शैवालों में विभिन्न प्रकार के क्लोरोफिल (Chl a, b, c, d, e), कैरोटीन (α, β, γ) व जैन्थोफिल पाये जाते हैं।
  6. संचित खाद्य पदार्थ प्रायः मण्ड (Starch) होता है, कुछ शैवालों में वसा व तेल भी पाये जाते हैं। शैवालों के लवकों में एक या अधिक पाइरीनाइड्स (Pyrenoids) पाये जाते हैं, इनमें अल्पमात्रा में प्रोटीन तथा स्टार्च संचित रहते हैं। किन्तु जैन्थोफाइसी समूह में पाइरीनॉइड्स का अभाव होता हैं।
  7. लाल शैवालों (Rhodophyceae) के अतिरिक्त सभी शैवालों में कशाभिकीय संरचनायें पायी जाती हैं। कशाभिककाएँ दो प्रकार की होती हैं – (i) प्रतोद (whiplash) कशाभिकाओं की सतह चिकनी होती है तथा (ii) कूर्च (Tinsel) कशाभिकाओं की सतह पर छोटे-छोटे रोम होते हैं।
  8. शैवालों में जनन कायिक (Vegetative), अलैंगिक (Asexual) तथा लैंगिक (Sexual) विधियों द्वारा होता है।
  9. कायिक जनन व्यापक रूप से होता है, यह अनेक विधियों से होता है, जैसे-विखण्डन (Fission), खण्डन (Fragmentation), हार्मागोन द्वारा (By hormogones), अपस्थानिक शाखाओं के निर्माण, कंद (tubers) तथा मुकलन द्वारा (By budding)।
  10. अलैंगिक जनन अनुकूल परिस्थितियों में विविध प्रकार के गतिशील अथवा अचल बीजाणुओं द्वारा होता है, जैसे-अलैंगिक चल बीजाणु या जूस्पोर (Zoospore), अचलबीजाणु (Aplanospores), सुप्त बीजाणु (Hypanospores), चतुष्कीबीजाणु (Tetraspores), जनकाभ बीजाणु (Autospores) तथा पाल्मेला या श्लेष्मावस्था द्वारा (By palmella stage)।
  11. लैंगिक जनन के अन्तर्गत विभिन्न वर्गों में जननांगों की संरचनात्मक व शरीर क्रियात्मक विशेषताओं तथा उनकी जटिलताओं के आधार पर शैवालों में विभिन्न प्रकार के लैंगिक जनन पाये जाते हैं, जैसे-स्वकयुग्मन (Autogamy), पूर्णयुग्मन (Hologamy), समयुग्मन (Isogamy), शरीर क्रियात्मक असमयुग्मन (Physiological anisogamy), असमयुग्मन (Anisogamous) तथा विषम युग्मन (Oogamous)।
  12. लैंगिक जननांग सदैव एककोशिक होते हैं किन्तु कुछ सदस्यों में बहुकोशिक भी होते हैं तथा इसकी सभी कोशिकाएँ जननक्षम (fertile) होती हैं। नर जननांग पुंधानी (Anteridium) तथा मादा जननांग अण्डधानी (Oogonium) होते हैं।
  13. निषेचन के पश्चात् बने द्विगुणित युग्मनज (Zygote) से भ्रूण का निर्माण नहीं होता है।
  14. शैवालों के जीवनचक्र में अस्पष्ट पीढ़ी एकान्तरण (Alternation of generation) पाया जाता है। इनका मुख्य पादप शरीर अगुणित युग्मकोभिद् पीढ़ी को दर्शाता है, यह दीर्घजीवी तथा प्रमुख पीढ़ी होती है। बीजाणुभिद् पीढ़ी अल्पजीवी व अप्रभावी पीढ़ी द्विगुणित युग्मनज द्वारा निरूपित होती है।


शैवाल वर्ग तथा उनके महत्त्वपूर्ण लक्षणों का सारांश तालिका में दिया जा रहा है –

2. शैवालों का वर्गीकरण (Classification of Algae):
एल्गी शब्द को लिनीएस (1753) ने दिया था किन्तु इनकी सही पहिचान ए.एल. डी. जस्सु (A.L. De Jussieu, 1789) ने की थी। वर्गीकरण में लिनीयस ने शैवाल को क्रिप्टोगेमिया ((Cryptogamia = अपुष्पीपादप) तथा ईक्लर (Eichler, 1886) ने इसको थैलोफाइटा (Thallophyta) प्रभाग में रखा था।

शैवालों का विस्तृत एवं आधिकारिक वर्गीकरण सर्वप्रथम एफ. ई. फ्रिश (FE. Fritsch, 1935) ने अपनी पुस्तक ‘दी स्ट्रक्चर एण्ड रिप्रोडक्शन ऑफ दी ऐल्गी’ (The Structure and Reproduction of the Algae) में दिया। यह वर्गीकरण वर्णक एवं केशाभिकाओं के प्रकार (types of pigment and flagella) तथा संचित भोज्य पदार्थों की प्रकृति पर आधारित है। फ्रिश ने शैवालों को निम्नलिखित 11 वर्गों (classes) में विभाजित किया –

(i) वर्ग: क्लोरोफाइसी (Class – Chlorophyceae, हरित शैवाल, green algae):
मुख्य वर्णक क्लोरोफिल (Chl.a तथा Chl.b), संचित भोज्य पदार्थ – स्टार्च (starch), कशाभिकाएँ (यदि उपस्थित हो) समान लम्बाई की, प्रतोद (whiplash) तथा अग्र निविष्ट (anteriorly inserted), कोशिकाभित्ति सेलुलोस से निर्मित, लैंगिक जनन समयुग्मक (isogamous), असमयुग्मक (anisogamous), अथवा विषमयुग्मक (oogamous)।
उदाहरण: क्लेमाइडोमोनॉस, वॉल्वॉक्स, स्पाइरोगारटा, यूलोथ्रिक्स तथा कारा।

(ii) वर्ग: जैन्थोफाइसी (Class – Xanthophyceae, पीत – हरित शैवाल yellow-green algae):
मुख्य वर्णक-जैन्थोफिल (xanthophyll) तथा Chl.a तथा Chl.e, प्लास्टिड्स में पाइरीनॉइड अनुपस्थित, संचित भोज्य पदार्थ तेल (oil) तथा ल्यूकोसिन (leucosin), दो असमान लम्बाई की कशाभिकाएँ, छोटी कशाभिका प्रतोद (whiplash) व लम्बी कशाभिका कूर्च (tinsel), लैंगिक जनन समयुग्मक।
उदाहरण – वॉकैरिया, बॉट्रिडियम।

(iii) वर्ग: क्राइसोफाइसी (Class – Chrysophyceae):
ये शैवाल फाइकोक्राइसिन (phycochrysin) की अधिकता के कारण भूरे – नारंगी रंग के होते हैं तथा Chl.a भी होता है। क्रोमेटोफोरों में पाइरीनॉइड के समान नग्न पिण्ड होता है। संचित भोज्य पदार्थ क्राइसोलेमिनेरिन एवं ल्यूकोसिन, गतिशील कोशिकाएँ प्रायः दो समान कशाभिका युक्त, लैंगिक जनन का प्रायः अभाव और यदि हो तो समयुग्मकी।
उदाहरण-क्रिप्टोफोरा।

(iv) वर्ग: बैसीलेरियोफाइसी (Class – Bacillariophyceae, पीत अथवा सुनहरे-भूरे शैवाल, yellow or golden-brown algae):
इस वर्ग में डायटम (diatoms) सम्मिलित हैं। मुख्य वर्णक chl.a, chl.c तथा फ्यूकोजैन्थिन, क्रोमेटोफोर में पाइरीनॉइड उपस्थित, संचित
भोज्य पदार्थ वसा एवं वोल्यूटिन, कोशिका भित्ति सिलिकामय, चल कोशिकाओं में केवल एक कशाभिका, लैंगिक जनन सम अथवा असम युग्मकी।
उदाहरण – नेवीक्यूला, पिन्यूलेरिया।।

(v) वर्ग: क्रिप्टोफाइसी (Class – Cryptophyceae):
इस वर्ग के शैवालों का रंग भूरा अथवा लाल होता है। मुख्य वर्णक – Chl.a, Chl.c, जैन्थोफिल एवं α व β कैरोटीन तथा पाइरीनॉइड सदृश्य संरचनाएँ उपस्थित होती हैं परन्तु वे क्रोमेटोफोर से जुड़ी नहीं होती हैं। संचित भोज्य पदार्थ स्टार्च तथा तेल, गतिशील कोशिकाएँ दो असमान कशाभिकायुक्त, कोशिकाओं में जटिल रिक्तिका तंत्र उपस्थित, लैंगिक जनन दुर्लभ, समयुग्मकी।
उदाहरण – क्रिप्टोमोनास, टेट्रागोनीडियम।

(vi) वर्ग: डाइनोफाइसी (Class – Dinophyceae):
ये शैवाल गहरे पीले अथवा भूरे रंग के होते हैं। मुख्य वर्णक – Chl.a, Chl.c व कैरोटीन तथा जैन्थोफिल, संचित भोज्य पदार्थ स्टार्च तथा वसा, गतिशील कोशिकाएँ द्विकशाभिक।
उदाहरण-डेस्मोकेप्सा, जिम्नोडियम।

(vii) वर्ग-क्लोरोमोनैडिनी (Class – Chloromonadineae):
इन शैवालों का रंग चमकदार हरा (bright green) होता है। मुख्य वर्णक – Chl.a तथा जैन्थोफिल, संचित भोज्य पदार्थ वसा तथा तेल, जनन केवल कोशिकाओं के अनुदैर्घ्य (longitudinal) विभाजन से।
उदाहरण – ट्रेन्टोनिया, वैक्योलेरिया।

(viii) वर्ग: युग्लीनी अथवा यूग्लीनोफाइ सी (ClassEuglenineae or Euglenophyceae):
ये शैवाल प्रायः एककोशिकीय, हरित तथा कशाभिक हैं। मुख्य वर्णक – Chl.a, Chl.b तथा B कैरोटीन व ल्यूटिन, संचित भोज्य पदार्थ-तेल व पारमायलम (paramylum, एक जटिल कार्बोहाइड्रेट), प्रायः एकल परन्तु कभीकभी निवह रूपी (colonial form), जनन प्रायः कोशिका विभाजन द्वारा होता है, लैंगिक जनन समयुग्मकी (isogamous) होता है।
उदाहरण – यूग्लीना, हेटैरोनीमा।

(ix) वर्ग: फिओफाइसी (Class – Phaeophyceae; भूरे शैवाल, brown algae):
मुख्य वर्णक – Chl.a, Chl.c, B कैरोटीन व भूरे रंग का फ्यूकोजैन्थिन (fucoxanthin), थैलस तंतुल (filamentous) अथवा सुसंगठित पैरेन्काइमी (well organised parenchymatous); संचित भोज्य पदार्थ लेमिनेरिन व मेनीटोल, जनन कोशिकाएँ द्विकशाभिक; कशाभिकायें पाश्र्व अथवा उपशिखाग्र (lateral or sub – apical), लैंगिक जनन समयुग्मकी (isogamous), असमयुग्मकी (anisogamous) अथवा विषमयुग्मकी (heterogamous)।
उदाहरण – एक्ट्रोकार्पस, सारगेसम, फ्यूक्स आदि।

(x) वर्ग: रोडोफाइसी (Class – Rhodophyceae; लाल शैवाल, red algae):
मुख्य वर्णक – Chl.a, Chl.d, α व β कैरोटीन, rफाइकोइरिथिन (r – phycoerythrin) तथा r – फाइकोसायनिन (rphycocyanin), संचित भोज्य पदार्थ फ्लोरीडीन स्टार्च (floridean starch), जनुन कोशिकाएँ अकशाभिक, जननांग अत्यधिक विकसित, जनन विषमयुग्मकी ।
उदाहरण – पोलीसाइफोनिया, पोरफाइरा।

(xi) वर्ग: मिक्सोफाइ सी अथवा सायनो फाइ सी (Myxophyceae or Cyanophyceae, नील-हरित शैवाल, blue green algae):
मुख्य वर्णक – Chl.a, Chl.c, c-फाइकोसायनिन (c – phycocyanin), प्रोकेरियोटी (prokaryotic) शैवाल, कोशिका भित्ति म्यूकोपॉलीमर (mucopolymer) से निर्मित, संचित भोज्य पदार्थ सायनोफाइसियन स्टार्च व ग्लाइकोजन (glycogen), लैंगिक जनन अनुपस्थित, अलैंगिक जनन होर्मोंगोनिया (hormogonia) अथवा निश्चेष्ट बीजाणुओं (akinetes) द्वारा।
उदाहरण – ऑसीलेटोरिया, नॉस्टॉक, ऐनावीना। फ्रिश्च के वर्गीकरण के पश्चात् जी.एम. स्मिथ (1955), राउण्ड (1965), चेपमेन तथा चेपमेन (1973), कुमार व सिंह (1971) ने भी वर्गीकरण प्रस्तुत किये। वर्तमान में फ्रिश्च का वर्गीकरण सर्वाधिक मान्य है।

प्रश्न 2.
शैवालों के आर्थिक महत्त्व पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
शैवालों का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Algae):
शैवाल लाभदायक भी हैं तो हानिकारक भी हैं। ये पारिस्थितिक तंत्र के महत्त्वपूर्ण घटक हैं। शैवाल प्राथमिक उत्पादक के रूप में बहुत अधिक मात्रा में सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में स्थिर करते हैं व पर्याप्त मात्रा में O2 मुक्त करते हैं।
1. शैवालों के लाभदायक प्रभाव (Useful effectes of algae):

(i) भोजन के रूप में (As food):
स्वपोषित (autotrophic) होने के कारण शैवालों में कार्बोहाइड्रेट्स तथा अनेक कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ, प्रोटीन्स, विटामिन्स इत्यादि पाये जाते हैं। कुछ शैवालों में यह पर्याप्त मात्रा में होने के कारण उनका उपयोग खाने के लिए किया जाता है। कुछ प्रमुख उदाहरण निम्न प्रकार से हैं।

  1. अलवा (Ulva): यह हरित शैवाल (chlorophyceae) समुद्री सलाद (Sea Lettuce) कहलाया जाता है तथा जापान में शाक के रूप में उपयोग में लाया जाता है।
  2. क्लोरेला (Chlorella): इस एककोशिकीय हरित शैवाल में प्रोटीन, विटामिन A तथा D प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इस शैवाल की वृद्धि भी तेजी से होती है। इस कारणवश वैज्ञानिकों के अनुसार यह भविष्य का प्रमुख खाद्य पदार्थ बनने की क्षमता रखता है। अन्तरिक्ष यानों में भी टंकियों (tanks) में क्लोरेला सुलभता से वृद्धि करता है और अन्तरिक्ष यात्रियों के लिए खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इससे बिस्कुट व केक भी बनाये जाते हैं।
  3. स्पाइरुलिना (Spirulina): इस नीले हरे शैवाल (Cyanophyceae) में भी प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। इसे खाने के काम में लाया जाता है।
  4. सरगासम (Sargassum), लेमिनेरिया (Laminaria), इत्यादि भूरे शैवाल (brown algae अथवा phaeophyceae) जापान तथा पूर्व एशिया (East Asia) के महाद्वीपों में, शाक के रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। इनमें आयोडिन अत्यधिक मात्रा में होने के कारण, खाने वाले व्यक्तियों का गलगण्ड (goitre) नहीं होता।
  5. कुछ लाल शैवालों (red algae अथवा rhodophyceae) को जैसे पोरफायरा (Porphyra), कोन्ड्रस (Chondrus), रोडिमेनिया (Rhodymenia), इत्यादि खाने के काम में लाये जाते हैं। इनमें से पोरफायरा की जातियों में विटामिन C और B,, उपयुक्त मात्रा में पाये जाते हैं।
  6. नॉस्टॉक कोम्यूनी (Nostoc Commune): यह नीला-हरा शैवाल (blue-green algae अथवा cyanophyceae) चीन में भोजन के रूप में खाया जाता है।

(ii) उद्योगों में शैवालों का महत्त्व (Importance of algae in industries):
शैवाल अनेक उद्योगों में उपयोगी पाया गया है। इनमें से कुछ मुख्य उपयोगों की सूची नीचे दी गयी है

(अ) ‘ऐगार – ऐगार’ (Agar – agar):
यह पदार्थ ग्रेसिलेरिया (Gracilaria) तथा ओलिडियम (Gelidium), कोन्ड्रस (Chondrus) आदि की जातियों से प्राप्त किया जाता है। ‘ऐगार’ एक कोलॉइडी पदार्थ है। यह सूक्ष्मजीवियों के संवर्धन माध्यम (culture medium) के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त ऐगार का उपयोग बेकिंग (baking) में, मिष्ठान्न शालाओं (confectionary) में तथा औषधरसायन (pharmaceutical) उद्योगों में इमल्सीकारक (emulsifying agent) के रूप में किया जाता है। यह कपड़ा, चमड़ा तथा कागज, आइसक्रीम निर्माण उद्योगों में भी काम में लाया जाता है। ऐगार, मृदु विरेचक (laxative) का भी काम करता है।

(ब) एल्जिन (Algin):
अलेरिया (Ataria), लेमिनेरिया (Laminaria) इत्यादि भूरे शैवालों से एल्जिन नाम का कोलॉइडी जेल (gel) मिलता है। यह एल्जिनिक अम्ल का कैल्सियम लवण होता है। आइसक्रीम में बड़े क्रिस्टलों को बनने से रोकने के लिए एल्जिन का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त बेकिंग में, रबड़ तथा पेन्ट उद्योगों में इमल्सीकारक और निलम्बन (Suspension) के लिये यह उपयोगी होता है।

(स) केराजीनिन (Carrageenin):
कोन्ड्रस (Chondrus) नाम के लाल शैवाल की कोशिका भित्ति से केराजीनिन प्राप्त होता है। इसका प्रमुख उपयोग इमल्सीकारक तथा स्थायीकारक (stabilising agent) के रूप में आइसक्रीम, जेली, चॉकलेट, श्रृंगार प्रसाधन इत्यादि में किया जाता है।

(द) डायटम के उपयोग (Uses of diatoms):
डायटम बेसीलेरियोफाइसी कुल के सदस्य होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति में सिलिकन – डाइऑक्साइड (SiO2) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, अतः डाइएटम्स, डाइएटोमेशियस मृदा (diatomaceous earth) का निर्माण करती है जो निम्नलिखित रूप से उपयोगी है –

  1. चीनी मिलों में जीवाणु छन्नों के रूप में।
  2. काँच तथा पोर्सिलेन के निर्माण में।
  3. बॉयलर (boiler) तथा वात भट्टी (blast furnace) में रोधी (insulator) के रूप में।
  4. धातु प्रलेप (metal paints), वार्निश, पालिश तथा टूथपेस्ट के निर्माण के लिए अपघर्षक (abrasive) के रूप में।
  5. द्रव नाइट्रोग्लिसरीन (liquid nitroglycerine) के अवशोधक (absorbent) के रूप में।

(य) बहुत-सी शैवाल [जैसे लेमिनेरिया (Laminaria), फ्यूकस (Fucus) आदि] बहुत-से रसायनों जैसे आयोडीन, ब्रोमीन अम्ल, ऐसीटोन आदि के निर्माण में प्रयोग की जाती हैं।

(iii) चारे के रूप में (As Fodder):
कई समुद्री शैवालों विशेषकर भूरी शैवालों (Phaeophyceae) जैसे सरगासम, फ्यूकस, लेमिनेरिया तथा मेक्रोसिस्टिस की जातियों को पालतू पशुओं को चारे के रूप में खिलाया जाता है। इन शैवालों से मुर्गियों व सूअरों के लिए भी पशु आहार बनाया जाता है। कई शैवाल मछलियों द्वारा खायी जाती हैं, जैसे माइक्रोस्पोरा, ऊडोगोनियम आदि।

(iv) औषधियों के रूप में (As Medicines):
अधिकांश भूरी शैवालों में आयोडीन उपस्थित होता है। अतः इन शैवालों का उपयोग, गलगण्ड (Goiter) के उपचार से सम्बन्धित सभी औषधियों में किया जाता है। जेलिडियम शैवाल से उदर रोगों की औषधियाँ बनाई जाती हैं। क्लोरेला (Chlorella) से एक प्रतिजैविक (antibiotic) क्लोरेलीन (chlorellin) तैयार की जाती है। यह क्रिस्टलीय होती है तथा 120°C तक स्थिर रहती है। यह ग्राम-निगेटिव तथा ग्राम-पोजिटिव दोनों प्रकार के जीवाणुओं (bacteria) से रक्षा करती है। कारा (Chara) तथा नाइटेला (Nitella) नामक शैवाल जलाशयों में उपस्थित मच्छरों को मारकर मलेरिया उन्मूलन में सहायक होते हैं।

(v) कृषि में शैवाल (Algae in agriculture):
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation): मिक्सोफाइसी वर्ग के पौधे जैसे नोस्टोक (Nostoc), एनाबीना (Anabaena) आदि वायुमण्डलीय तात्विक (elemental) नाइट्रोजन को पौधों के काम में आने योग्य यौगिकों में परिवर्तित करते हैं। इस क्रिया को नाइट्रोजन स्थिरीकरण (nitrogen fixation) कहते हैं। इस क्रिया में जीवाणु (bacteria) भी भाग लेते हैं। इस क्रिया में भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। कुछ समुद्री शैवाल खाद के रूप में प्रयोग की जाती है तथा कुछ हरी-नीली शैवाल में यह गुण भी पाया जाता है कि ये ऊसर भूमि को उपजाऊ भूमि में परिवर्तित कर सकती हैं।

(vi) शैवाल अनुसंधान कार्यों में (Algae in biological research):
प्रकाश-संश्लेषण की क्रियाओं का आधुनिक ज्ञान क्लोरेला (Chlorella) नामक शैवाल पर किये प्रयोगों तथा अनुसंधानों पर आधारित हैं। कुछ शैवाल जैसे ऐसीटेबूलेरिया (Acetabularia) तथा वेलोनिया (Valonia) आदि केन्द्रक तथा जीवद्रव्य के आपसी सम्बन्धों की खोज में प्रयोग किये जाते हैं।

शैवालों के हानिकारक प्रभाव (Harmful effects of algae):
इन सब लाभदायक कार्यों के अतिरिक्त कुछ शैवाल जैसे माइक्रोसिस्टिस (Microcystis), क्रोकोकस (Chrococcus), ओसिलेटोरिया (Oscillatoria), एनाबीना (Anabaena), लिंगबाया (Lyngbya) आदि जलाशय में ‘जलउफान पैदा करके गन्ध उत्पन्न करते हैं। इससे पानी सड़ जाता है जिससे मछलियाँ मर जाती हैं तथा जल पशुओं आदि के पीने योग्य नहीं रहता।

कभी-कभी समुद्री शैवाल का विकास इतना अधिक हो जाता है कि जलपोतों की गति में बाधा पड़ने लगती है। कुछ शैवाल जैसे सिफेल्युरोस (Cephaleuros) की कुछ प्रजातियाँ चाय आदि की पत्तियों पर परजीवी होती हैं और चाय उद्योग को हानि पहुँचाती हैं। चाय, कॉफी व काली मिर्च की पत्तियों पर लाल रोली (Red rust) रोग करती है। गोनिएलिक्स शैवाल से स्रावित टेट्राओडोनटॉक्सिन विष मछली के द्वारा मनुष्य में प्रवेश कर लकवे के लक्षण उत्पन्न कर देता है।

प्रश्न 3.
ब्रायोफाइटा के मुख्य लक्षणों को स्पष्ट कीजिये तथा वर्गीकरण के प्रमुख वर्गों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
ब्रायोफाइटा के सामान्य लक्षण (General characters of Bryophyta):

  1. इस वर्ग के पौधे स्थलवासी होते हैं किन्तु कुछ जलवासी (aquatic) होते हैं, जैसे-रिक्सिया फ्लूइटैन्स (Riccid fluitans), रिक्सियोकार्पस नाटैन्स, स्फैग्नम, फोन्टिनैलिस। अनेक मॉस व फूलेनिया की जातियाँ अधिपादप (epiphytes) होती हैं परन्तु बक्सबौमिया एफिल्ला (मॉस), क्रिप्टोथैलस मिराविलिस (लिवरवर्ट) मृतोपजीवी (saprophytes) होते हैं। मृतोपजीवी को छोड़कर सभी स्वपोषित होते हैं।
  2. ब्रायोफाइटा साधारणतया, नम व छायादार स्थानों जैसे नम भूमि, नम दीवारों, लकड़ी के कुन्दों, पेड़ के तनों, चट्टानों की दरार आदि में उगते हैं।
  3. इस वर्ग के पौधे छोटे होते हैं। सबसे छोटा ब्रायोफाइटा जुऑप्सिस (Zoopsis) है तथा सबसे बड़ा सदस्य जलवासी फोन्टिनैलिस (Fontinalis) या ब्रुक मॉस (Brook moss) होता है।
  4. ब्रायोफाइट्स के जीवन-चक्र में सुस्पष्ट युग्मकोभिद् (gametophytic) एवं बीजाणुभिद् (sporophytic) प्रावस्थाएँ पाई जाती हैं। ये दोनों प्रावस्थायें विषमरूपी (heteromorphic) होती हैं।
  5. युग्मकोभिद् प्रावस्था अधिक सुस्पष्ट, दीर्घकालीन एवं हरित होती हैं जबकि बीजाणुभिद् पूर्ण रूप से युग्मकोभिद पर। आश्रित व अल्पजीवी होता है। संरचनात्मक दृष्टि से ब्रायोफाइट्स का युग्मकोभिद् जटिल शैवालों की अपेक्षा अधिक विभेदित होता है। रिक्सिया (Riccia), Hafen (Marchantia) 341fç 347EU (primitive) रूपों में पादप काय शयान (prostrate) एवं थैलाभ (thalloid) होता है तथा अधोस्तर पर कोमल, रोमिल एककोशिकीय मूलाभासों (rhizoids) द्वारा संलग्न होता है। परन्तु माँस का पादप काय ऊर्ध्व होता है जो एक स्तम्भ सदृश्य कोमल अक्ष (axis) तथा पत्ती सदृश्य पार्श्व उपांगों (lateral appendages) में विभेदित होता है। यह अधोस्तर पर मूल सदृश्य मूलाभासों द्वारा संलग्न रहता है (चित्र 5.2)।
  6. मूलाभास एककोशिकीय एवं अशाखित (जैसे हेपेटिकाप्सिडा व एन्थोसिरोटाप्सिडा में) अथवा बहुकोशिकीय एवं शाखित (जैसे ब्रायोप्सिडा में) होते हैं। मार्केन्शिएलीज़ गण के सदस्यों में मूलाभासों के अतिरिक्त कुछ हल्के बैंगनी रंग के स्केल (Scales) भी पाये जाते हैं। ये वृद्धि क्षेत्र की रक्षा व जल अवशोषण का कार्य करते हैं।
  7. इनमें उच्च श्रेणी के पौधों के समान जाइलम (Xylem), फ्लोएम (phloem) व अन्य लिग्निन युक्त ऊतकों का प्रायः अभाव होता है।
  8. इनमें जनन कायिक (vegetative) तथा लैंगिक (sexual) विधियों से होता है।

  9. कायिक प्रवर्धन थैलस के पुराने भागों के गलन अथवा मृत्यु से (by decay and death of old parts of thallus), अपस्थानिक शाखाओं (adventitious branches) द्वारा, अथवा विशेष प्रकार की संरचनाओं जैसे कंद (tubers), जेमी (gemmae) आदि द्वारा होता है।
  10. ब्रायोफाइटा में लैंगिक जनन विषमयुग्मकी (oogamous) होता है।
  11. नर जननांग, जिसे पुंधानी (antheridium) कहते हैं, संवृत, बहुकोशिकीय, गोलीय, गदाकार अथवा दीर्घवृत्तीय संरचना होती है। इसके चारों ओर बंध्य कोशिकाओं का एक आवरण होता है। इस आवरण के भीतर अनेक पुंकोशिकाएँ (androcytes) होती हैं। प्रत्येक पुंकोशिका एक पुमणु (antherozoid) बनाती है। इस प्रकार प्रत्येक पुंधानी में अनेक पुमणु बनते हैं।
  12. प्रत्येक पुमणु एक चल (motile) व द्वि कशाभिक (biflagellated) संरचना है।
  13. स्त्री जननांग, जिसे स्त्रीधानी (archegonium) कहते हैं, एक फ्लास्क सदृश्य बहुकोशिकीय संरचना होती है। इसका आधारीय फूला हुआ भाग अंडधा (venter) तथा ऊपरी दीर्घित भाग ग्रीवा (neck) कहलाता है।
  14. अंडधा व ग्रीवा के चारों ओर बंध्य कोशिकाओं का एक आवरण होता है।
  15. निषेचन के लिए जल आवश्यक है। यद्यपि अंधा में अनेक पुमणु प्रवेश करते हैं परन्तु अण्ड से केवल एक पुमणु संलयित होकर युग्मनज़ बनाता है।
  16. युग्मनज़ में निषेचन के तुरन्त पश्चात् विभाजन प्रारम्भ हो जाते हैं। इस समूह में युग्मनज़ निषेचन के पश्चात् विश्रामावस्था नहीं दर्शाते हैं।
  17. युग्मनज का प्रथम विभाजन एक अनुप्रस्थ भित्ति द्वारा होता है। इसके फलस्वरूप निर्मित दो कोशिकाओं में से बाह्य कोशिका अनेक विभाजनों द्वारा भ्रूण (embryo) बनाती है। इस प्रकार का भ्रूण विकास बहिर्मुखी (exoscopic) कहलाता है।
  18. ब्रायोफाइटा में भ्रूण का विकास स्त्रीधानी में ही होता है।
  19. बीजाणुभिद पूर्णरूप से युग्मकोद्भिद पर आश्रित होता है। बीजाणुभिद फुट (foot), सीटा (seta) एवं कैप्स्यूल (capsule) में विभेदित होता है। परन्तु कुछ सदस्यों में फुट व सीटा, दोनों (जैसे रिक्सिया) अथवा केवल सीटा (जैसे कॉर्सिनिया) अनुपस्थित होता है। कैप्स्यूल में बीजाणुजनन कोशिकाओं के अर्धसूत्रण (meiosis) से अनेक अगुणित बीजाणु बनते हैं।
  20. इस समूह के सभी सदस्य समबीजाणुक (homosporous) हैं अर्थात् इनमें केवल एक ही प्रकार के बीजाणु पाये जाते हैं। सभी बीजाणु आकार व आमाप में समान होते हैं।
  21. बीजाणुओं का विमोचन कैप्स्यूल भित्ति के फटने से होता है। बीजाणु अचल होते हैं तथा इनका प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है।
  22. अनुकूल परिस्थितियों में बीजाणु अंकुरित होकर एक तन्तुल जनन नाल (filamentous germ tube) बनाते हैं जिसके विभाजन से एक नया थैलस (लिवरवर्ट्स में) अथवा प्रथम तन्तु (protonema) बनता है। इसमें अनेक कलिकाएँ उत्पन्न होती हैं जिनसे नये ऊर्ध्व युग्मकधर (gametophore) विकसित होते हैं।

2. ब्रायोफाइटा का वर्गीकरण (Classification of Bryophyta):
इनका आधुनिक वर्गीकरण रोथमेलर (Rothmaler, 1951) तथा प्रोस्क्योर (Proskauer, 1957) द्वारा किया गया है –

ब्रायोफाइटा के वर्गों (classes) के विभेदी लक्षण निम्न हैं –
वर्ग 1. हेपेटिकोप्सिडा या हेपेटिसी (Hepaticopsida or Hepaticae):

  1. युग्मकोभिद् प्रायः थैलसाभ (thallose) होता है, इस कारण इन्हें लिवरवट्स कहते हैं, कभी-कभी पर्णिल; (यदि पर्णिल तो पत्तियों में मध्य शिरा अनुपस्थित होता है)।
  2. मूलाभास एककोशिक व अशाखित तथा पटरहित (without septa) होते हैं।
  3. हरितलवक (chloroplasts) अनेक व पाइरीनॉइड रहित (without pyrenoids)।
  4. लैंगिक अंगों का परिवर्धन थैलस की पृष्ठ सतह पर सतही कोशिकाओं में होता है।
  5. बीजाणुद्भिद सरल (रिक्सिया में केवल संपुट) या अधिकांश में पाद (foot), संपुटिका वृंत (seta) व संपुट (capsule) होता है।
  6. संपुट (capsule) स्तंभिका (columella) रहित होता है।
  7. कुछ सदस्यों में बीजाणुओं के साथ इलेटर्स (Elaters) का निर्माण भी होता है।
    उदाहरण: रिक्सिया, मार्केन्शिया।

वर्ग 2. एन्थसिर्राटाप्सिडा या एन्थसिरोटी (Anthocerotopsida or Anthocerote):

  1. युग्मकोभिद थैलसाभ (thallose); वायु प्रकोष्ठों व शल्कों का अभाव होता है।
  2. मूलाभास एककोशिक, चिकने, अशाखित व पटरहित होते है।
  3. प्रत्येक कोशिका में एक बड़ा, पायरीनॉइडयुक्त हरितलवक उपस्थित होता है।
  4. पुंधानियाँ अंतर्जात (endogenously) अर्थात् थैलस की पृष्ठ सतह पर धंसी हुई विकसित होती हैं।
  5. बीजाणुभिद रेखाकार व संपुट (capsule) में स्तम्भिका (columella) की उपस्थिति होती है।
    उदाहरण: ऐन्थोसिरोस, नोटोथेलस।

वर्ग 3. ब्रायोप्सिडा या मसाई (Bryopsida or Musci):

  1. युग्मकोभिद एक शयान प्रथम तंतु (prostrate protonema) व एक ऊर्ध्व युग्मकधर (erect gametophore) में विभेदित होता है।
  2. युग्मकधर पर्णिल होता है।
  3. मूलाभास बहुकोशिकीय व तिरछे पटों से युक्त (with oblique septa) व शाखित होते हैं।
  4. कैप्स्यूल में स्तम्भिका (columella) उपस्थित किन्तु इलेटर अनुपस्थित होते हैं। कैप्स्यूल के परिमुख पर परिमुखदन्त उपस्थित रहते हैं। उदाहरण: फ्यूनेरिया, पोलीट्राइकम, स्फैग्नम्।

प्रश्न 4.
टेरिडोफाइटा के प्रमुख लक्षणों को स्पष्ट कीजिये।
उत्तर:
टेरिडोफाइटा के सामान्य लक्षण (General Characteristics of Pteridophyta):

  1. अधिकांश टैरिडोफाइट्स स्थलीय हैं जो प्रायः नम व छायांदार स्थानों पर उगते हैं। कुछ सदस्य जलीय जैसे ऐजोला, मार्सिलिया स्थायी जलकुण्डों में उगते हैं, परन्तु कुछ जातियाँ मरुभिदी आवासों में भी पायी जाती हैं जैसे इक्वीसीटम आरवेन्स (Equisettum arvense), सिलेजिनेला रुपस्ट्सि (Seluginella rupestris)।
  2. मुख्य पादप बीजाणुभिद् (sporophyte) होता है तथा इनमें वास्तविक मूल, तना तथा पत्तियाँ होती हैं।
  3. इस समूह में सूक्ष्म एजोला (Azolla) से लेकर बड़े आकार के वृक्ष फर्नस जैसे – सायेथिया (Cyathea), लाइ गोडियम (Lygodium) पाये जाते हैं। जीवाश्म ले पीडो डैन्डान (Lepidodendron) वंश के पौधे बहुत बड़े वृक्ष थे।
  4. संवहन ऊतक में जाइलम तथा फ्लोयम होते हैं परन्तु जाइलम में वाहिकाएँ (vessels) तथा फ्लोयम में सहकोशिकाएँ (companion cells) व चालनी नलिकाओं (sieve tubes) का अभाव होता है। इनमें एधा के अभाव के कारण द्वितीयक वृद्धि नहीं होती है।
  5. इन पादपों में बीज तथा पुष्प निर्मित नहीं होते हैं, अतः इन्हें बीजरहित (seedless) तथा पुष्परहित (flowerless) पादप भी कहते हैं।
  6. टैरिडोफाइट में पत्तियाँ छोटी, लघुपर्ण (microphyll) उदा. सिलैजिनेला अथवा बड़ी, वृहतपर्ण (megaphyll) हो सकती हैं। जैसे फर्न।
  7. स्पोराफाइट पादप में बीजाणुधानी (sporangium) होती है जो पत्ती की तरह के बीजाणुपर्ण (sporophyll) पर लगी रहती है। कुछ टैरिडोफाइट्स में बीजाणु पर्ण सघन होकर एक सुस्पष्ट रचना बनाते हैं जिसे शंकु (cone) कहते हैं।
    उदाहरण – सिलैजिनेला, इक्वीसीटम।
  8. बीजाणुधानी में उपस्थित बीजाणु मातृ कोशिकाओं (spore mother cells) में अर्धसूत्री विभाजन के कारण अगुणित बीजाणु बनते हैं।
  9. इन अगुणित बीजाणुओं के अंकुरण होने पर एक अस्पष्ट, छोटा, बहुकोशिक, अधिकांशतः प्रकाशसंश्लेषी थैलाभ युग्मकोभिद् बनाते हैं जिसे प्रोथैलस (prothallus) कहते हैं।
  10. युग्मकोभिदों के विकास हेतु ठण्डा, गीला, छायादार स्थान आवश्यक है। युग्मकोभिद् या प्रोथैलस में नर व मादा जनन अंग बनते हैं, जिन्हें क्र मशः पुंधानी (antheridium) व स्त्रीधानी (archegonium) कहते हैं। जननांग बहुकोशिक व बाह्य बन्ध्य आवरण (sterile jacket) द्वारा आवरित होते हैं।
  11. पुंधानी से पुमणु के निकलने के बाद उसे स्त्रीधानी के मुँह तक पहुँचने के लिये जल की आवश्यकता होती है। निषेचन रसायन अनुचलन (chemotactic) प्रकार का होता है। पुमणु, स्त्रीधानी में स्थित अण्ड से संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज (zygote) बनाता है।
  12. युग्मनज के विकास फलस्वरूप बहुकोशिक, सुस्पष्ट स्पोरोफाइट बन जाता है और यही इन पौधों की प्रभावी अवस्था होती है।

  13. अधिकांश टैरिडोफाइट्स में बीजाणु (spores) एक ही प्रकार के होते हैं, ऐसे पौधों को समबीजाणुक (homosporous) कहते हैं जैसे इक्वीसीटम, लाइकोपोडियम। कुछ अन्य पौधों में बीजाणु दो प्रकार के होते हैं – बड़े बीजाणु (megaspore) तथा लघु या छोटे बीजाणु (microspore); इन्हें विषमबीजाणु (heterosporous) कहते हैं, उदा. सिलेजिनेला, साल्वीनिया, मार्सीलिया।
  14. समबीजाणुक पादपों में बीजाणुओं के विकास से एक ही प्रकार के प्रोथैलस बनते हैं जो उभयलिंगाश्रयी (monoecious) होते हैं। केवल कुछ समबीजाणुक फर्मों के प्रोथैलस एकलिंगाश्रयी (dioecious) होते हैं।
  15. विषमबीजाणुक टैरिडोफाइट्स में गुरुबीजाणु (megaspore) सदैव स्त्री प्रौथेलस तथा लघुबीजाणु नर प्रौथेलस बनाते हैं। ऐसे पौधों में स्त्री प्रौथेलस (मादा युग्मकोभिद्) अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पैतृक स्पोरोफाइट से जुड़ा रहता है।
  16. मादा युग्मकोभिद् में युग्मनज का विकास होता है जिससे एक नवीन शैशव भ्रूण बनता है। टेरिडोफाइटा में भ्रूण दो प्रकार के होते हैं जिन्हें बहिर्मुखी (Exoscopic) तथा अंतर्मुखी (Endoscopic) कहते हैं। भ्रूण निर्माण की यह घटना अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह बीजी प्रकृति की ओर ले जाती है।

प्रश्न 5.
टेरिडोफाइटा के आर्थिक महत्त्व बताइये।
उत्तर:
टेरिडोफाइटा का आर्थिक महत्त्व (Economic importance of Pteridophyta):

(i) औषधीय उपयोग (Medicinal uses):
लाइकोपोडियम क्लेवेटम से प्रसिद्ध होमियोपैथिक औषधि लाइकोपोडियम निकाली जाती है जो वृक्क, यकृत व फेफड़े के रोगों व बुखार में उपयोगी है। यह वृद्धावस्था रोगों में भी उपयोगी है। इक्वीसीटम डेबाइल स्त्री जननांगों के रोगों के उपचार में उपयोगी है। एन्जियोप्टेरिस का उपयोग रेबीज (कुत्ते के काटने का रोग) में किया जाता है। ऑसमुण्डा रिगेलिस में कैल्सियम। की प्रचुरता होने के कारण कमजोर हड्डियों में लाभदायक है।

(ii) सजावटी पादप (Ornamental plants):
फर्मों का उपयोग उद्यानों में सजावटी पौधों के रूप में किया जाता है, जैसे-टेरिस, नेफ्रोलेपिस, एडियन्टम, टेरिडियम आदि। वृक्ष फर्न जैसे सायथियम, एलसोफिला भी। उगाये जाते हैं।

(iii) उर्वरक के रूप में (Use as fertiliser):
जलफर्न या ऐजोला (Azolla) में सायनो जीवाणु एनाबीना सहजीव के रूप में रहता है। यह नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है। इस कारण चावल के खेतों में ऐजोला डाला जाता है। ऐजोला की राख में अधिक पोटेशियम होने के कारण उसका उपयोग भी कृषि में होता है। इक्वीसीटम की राख में सिलिका अधिक होता है।

इसका उपयोग जेवरे, पीतल की वस्तुओं को चमकाने में काम आती है। साल्विनिया तथा ऐजोला जल में तीव्रता से फैलते हैं। जिसका जल जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। टेरिडियम मृदा में कुछ ऐसे. रसायन छोड़ता है जिससे अन्य पौधों के बीजों का अंकुरण व वृद्धि रुक जाती है। इसे एलीलोपैथी (Allelopathy) कहते हैं।

प्रश्न 6.
अनावृतबीजियों के प्रमुख लक्षण बताइये।
उत्तर:
अनावृतबीजी के सामान्य लक्षण (General Characteristics of Gymnosperms):

  1. अधिकांश जीवित जिम्नोस्पर्म सदाहरित वृक्ष (evergreen tree), बहुवर्षी, काष्ठीय, मध्यम अथवा लम्बे वृक्ष तथा क्षुप (shrubs) होते हैं। जिम्नोस्पर्म का सिकुआ (Sequid) वृक्ष सबसे लम्बा है। इनमें शाक नहीं होते तथा प्रायः मरुभिदी लक्षण वाले होते हैं।
  2. राजस्थान में केवल एफीड्रा फोलिएटा (Ephedra – foliata) मरुस्थलीय आवासों में जंगली रूप में मिलता है। इनके अनेक सदस्य जीवाश्मी हैं जैसे-विलियसमोनिया।
  3. ये पौधे बीजाणुभिद् (sporophytic) होते हैं तथा मूल, स्तम्भ व पत्तियों में विभेदित होते हैं।
  4. इनमें संवहन ऊतक सुविकसित होती है परन्तु जाइलम में वाहिकाएँ। (vessels) तथा फ्लोयम में सहकोशिकाओं (companion cells)
    का अभाव होता है।
  5. इनमें प्रायः मूसला मूल होती है। कुछ वंशों में मूल व कवक सम्बन्ध होता है, जिसे कवक मूल (mycorrhiza) कहते हैं, उदा. पाइनस । परन्तु अन्य वंशों में छोटी विशिष्ट मूल नाइट्रोजन स्थिर करने वाले सायनो बैक्टिरिया के साथ सहयोग करती है। जिसे प्रवाल मूल (coralloid root) कहते हैं, उदा. साइकैस।
  6. तना शाखित (पाइनस, सीडूस) अथवा अशाखित (साइकैस) होते हैं।
  7. तनों पर गिरी हुई पत्तियों के पर्ण चिन्हन (Leaf scars) होते हैं। इनमें द्वितीयक वृद्धि होती है व स्पष्ट वार्षिक वलय (annual rings) बनते हैं। काष्ठ को मुलायम काष्ठ (soft wood) कहते हैं।
  8. पत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं-भूरे रंग की शल्क पत्र (scale leaves) तथा हरे रंग की सामान्य पर्ण (foliage leaves)। सामान्य पर्ण सरल तथा संयुक्त होती हैं। साइकैस में पिच्छाकार पत्तियाँ कुछ वर्षों तक पौधों पर लगी रहती हैं। पर्ण मरुभिद्दी लक्षण वाली होती हैं । शंक्वाकार पौधों में पत्तियाँ सूई की भाँति होती हैं। इनकी पत्तियों का सतही क्षेत्रफल कम, मोटी क्यूटिकल तथा रंध्र धंसे हुए (sunken stomata) होते हैं । इन लक्षणों के कारण पत्तियों से जल की हानि कम होती है। उदा-पाइनस।

  9. जिम्नोस्पर्म विषमबीजाणुक (heterosporous) हैं। इनमें अगुणित लघुबीजाणु तथा गुरु बीजाणु बनते हैं। बीजाणुधानियाँ क्रमशः गुरु व लघुबीजाणुपर्यों पर पायी जाती हैं। बीजाणुपर्ण सर्पिल की तरह तने पर लगे रहते हैं व सघन शंकु (cone) बनाते हैं।
  10. शंकु जिस पर लघुबीजाणुपर्ण तथा लघुबीजाणुधानी होती हैं, उन्हें नर शंकु (male cone) कहते हैं। प्रत्येक लघुबीजाणु से नर युग्मकोभिद् बनता है, जो बहुत ही न्यूनीकृत (reduced) होतो है। इस नर युग्मकोभिद् को परागकण (pollen grain) कहते हैं । परागकणों का विकास लघुबीजाणुधानी के अन्दर होता है।
  11. जिस शंकु पर गुरुबीजाणुपर्ण तथा गुरुबीजाणुधानी होती है, उसे मादा शंकु कहते हैं। (साइकस में मादा शंकु नहीं होते।)
  12. नर तथा मादा शंकु एक ही वृक्ष (पाइनस) अथवा विभिन्न वृक्षों पर (साइकैस) पर स्थित हो सकते हैं।
  13. गुरुबीजाणुधानियाँ अथवा बीजाण्ड (ovule) बीजाणुपर्यों पर नग्न पाये जाते हैं। बीजाण्ड ऋजु (orthotropous) तथा केवल एकअध्यावरणी (unitegmic) होते हैं। बीजाण्ड में स्थित गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्धसूत्री विभाजन होने से चार अगुणित गुरुबीजाणु (megaspore) बन जाते हैं। इनमें से तीन गुरुबीजाणु नष्ट हो जाते हैं तथा अन्दर की ओर स्थित अकेला गुरुबीजाणु मादा युग्मकोभिद् में विकसित होता है।
  14. मादा युग्मकोभिद् में दो या दो से अधिक स्त्रीधानियाँ (archegonia) होती हैं। प्रत्येक स्त्रीधानी में केवल एक अण्ड तथा एक अण्डधा नाल कोशिका (venter canal cell) होती है।
  15. जब लघुबीजाणुधानी से परागकण बाहर निकलते हैं तो ये गुरुबीजाणुपर्ण पर स्थित बीजाण्ड के छिद्र तक हवा द्वारा ले जाये जाते हैं। परागकण से एक परागनली बनती है जिसमें नर युग्मक (male gamete) होता है। यह परागनली स्त्रीधानी की ओर जाती है और वहाँ पर शुक्राणु छोड़ देती है। इनमें परागण वायु द्वारा (anemophilous) तथा निषेचन नालयुग्मनी (Siphonogamous) प्रकार का होता है।
  16. शुक्राणु व अण्ड का संलयन अर्थात् निषेचन होने से द्विगुणित युग्मनज (zygote) बनता है जिससे बाद में भ्रूण बनता है और बीजाण्ड से बीज बनते हैं। ये बीज नग्न होते हैं। भ्रूण से विकास होकर नये पादप का निर्माण होता है।
  17. भ्रूणपोष (Endosperm) का परिवर्धन निषेचन से पूर्व होता है व यह सदैव अगुणित होता है। बीजों में बीजपत्रों की संख्या 2 (साइकस में) या अधिक (पाइनस में) हो सकती है। एक बीज में एक से अधिक भ्रूण के बनने को बहुभ्रूणता (Polyembryony) कहते हैं। यह अनावृतबीजी में पायी जाती है।

प्रश्न 7.
जिम्नोस्पर्मी के आर्थिक महत्त्व पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
अनावृत्तबीजियों का आर्थिक महत्त्व (Economic importance of Gymnosperms):
अनेक अनावृत्तबीजी पौधे आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं –

(i) इमारती काष्ठ (Timber):
अनेक वृक्षों की काष्ठ का विविध रूप से उपयोग किया जाता है। सीडूस देओदारा (Cedrus deodara) से दयार व पाइनस वालिचिआना (Pintus watlichiana syn. P. excelsa) से कैल व पाइनस रॉक्सबर्गाई (P. rosxburghii) से चीड़ | नाम की लकड़ी मिलती है। एबीज की लकड़ी भी उपयोगी है। इन जातियों से प्राप्त काष्ठ का उपयोग फर्नीचर, रेलवे स्लीपर, पैकिंग खोखे, | दरवाजे व खिड़कियाँ आदि के बनाने में होता है। जूनीपेरस वर्जिनियाना की काष्ठ से पेन्सिल के खोल, स्केल व कलमें बनाई जाती हैं। टैक्सोडियम व पोडोकार्पस की काष्ठ से प्लाईवुड बनाई जाती है।

(ii) रेजीन व तेल (Resin and Oil):
हमारे देश में कई जिम्नोस्पर्मी वृक्षों जैसे पाइनस रॉक्सबर्गी, पा, बेलिचिएना व अन्य से व्यावसायिक उपयोग के रेजिन तथा तारपीन का तेल प्राप्त होते हैं। पाइनस, लेरिक्स और एबीज वृक्षों से कनाडा बालसम, वार्निश, टैनिन आदि प्राप्त किये जाते हैं।

(iii) कागज उद्योग (Paper industry):
पाइसिया तथा पाइनस मर्कुसाई की काष्ठ का उपयोग कागज पल्प (pulp) बनाने में किया जाता है क्योंकि इनकी काष्ठ मुलायम होती है।

(iv) जूनीपेरस वर्जीनिएना (Juniperus virginiana) की अन्त:काष्ठ (heartwood) से सेडारवुड आयल (cedarwood oil) निकलता है। यह माइक्रोस्कोप के तैल निमज्जन लैंस (oil immersion lens) के काम आता है। इसका प्रयोग इत्र बनाने में भी किया जाता है।

(v) कनाडा बालसम (Canada balsam) का जीव वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में आरोपण माध्यम (mounting medium) के रूप में प्रयोग होता है, यह ऐबीज बालसेमिया (Abies balsamea) की राल (resin) है।

(vi) भोजन के रूप में (As food):
अनावृतबीजियों का महत्त्व खाद्य पदार्थ के रूप में भी है। सागो पाम साइकैस रेवोलूटा (Cycas revoluta) के तने से साबुदाना प्राप्त होता है हालांकि साबुदाने (sago) की व्यापारिक आपूर्ति एक अन्य पौधे मैट्रोजाइलॉन रम्फाई (Metroxylon rumphit) से की जाती है जो कि एक ऐन्जियोस्पर्म है। पाइनस जेरारडिआना (Pinus gerardiana) के बीज (seeds) से प्रसिद्ध सूखा मेवा चिलगोजा प्राप्त होता है जो खाने के काम आता है।

(vii) औषध के रूप में (As medicin):
इफेड़ा (Ephedra) की जाति ए. जिरार्डियान (E. gerardiana) से प्रसिद्ध औषधि इफेड़ीन (Ephedrine) निकलती है जिसका प्रयोग खाँसी व दमे (asthma), हे ज्वर (Hay fever) में होता है। सीडूस की काष्ठ मूत्रल (diuretic) व वातहर (carminative) है। थूजा (Thuja) से गठिया, बुखार व खांसी का इलाज किया जाता है। टैक्सस (Taxis) की छाल से टैक्सोल नामक एल्कोलॉइड कैंसर की औषधि तैयार की गई है। साइकस सर्सिनेलिस की पत्तियों के रस का प्रयोग पेट तथा त्वचा रोगों में किया जाता है।

(viii) शोभाकारी पादप (Ornamental plants):
ऐरोकेरिया एक्सेल्सा (Araucaria excelsa – Christmas tree), ऐरोकेरिया ऐरोकैना (A, duracana – Monkey puzzle) व पाइनस (Pinus – Pine), सजावटी पौधों के रूप में लगाये जाते हैं। इसके अलावा उद्योगों में साइकस रिवोल्यूटा, सा. सर्सिनेलिस, क्यूप्रेसस, पाइनस, थूजा व जैमिया को उगाया जाता है। टैक्सस बकाटा की लचीली काष्ठ से धनुष बनाये जाते थे। अन्य लकड़ियों से हल, बैलगाड़ियों के चूल, नाव के चप्पू व झोंपड़ियों की छत बनायी जाती है। पाइसिया व ऐवीज की लकड़ी का उपयोग कठौते (water trough) बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 8.
जिम्नोस्पर्म व ऐन्जियोस्पर्म में अन्तर बताइये।
उत्तर:
जिम्नोस्पर्म व ऐन्जियोस्पर्म में अन्तर (Differences between Gymnosperms and Angiosperms)

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms)ऐन्जियोस्पर्म (Angiosperms)
1. बीजाण्ड (ovules), अण्डाशय (ovary) के न होने के कारण। अथवा बीज (seeds), फल (fruits) न बनने के कारण खुले अथवा नग्न’ (naked) होते हैं।1. बीजाण्ड, अण्डाशय के अन्दर तथा बीज, फल के अन्दर बन्द होते हैं।
2. परागकण (pollen grains) सीधे बीजाण्डद्वार (microphyle) पर गिरते हैं और बीजाण्ड के अन्दर अंकुरित होते हैं।2. परागकण वर्तिकाग्र (stigma) पर गिरते हैं, वहाँ अंकुरित होते हैं। और फिर पराग नलिका (pollen tube) वर्तिका (Style) से होते हुए बीजाण्डद्वार तक पहुँचती है।
3. भ्रूणपोष (endosperm) अगुणित (haploid) होता है और निषेचन से पहले बनता है।3. भ्रूणपोष त्रिगुणित (tripold) होता है और निषेचन (fertilization) के बाद बनता है।
4. जाइलम (xylem) में वाहिकाओं (vessels) का अभाव होता है। तथा फ्लोएम (phloem) में सहचर कोशिकाओं (companion cells) का अभाव होता है।4. जाइलम में वाहिकायें, वाहिनिकाएँ, जाइलम पैरेन्काइमा इत्यादि और फ्लोएम में चालनी नलिकायें, सहचर कोशिकायें, फ्लोएम पैरेन्काइमा, इत्यादि सभी उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 9.
ऐन्जियोस्पर्मों की बैन्थम-हुकर वर्गीकरण प्रणाली का फ्लोचार्ट बनाइये।
उत्तर:
आवृतबीजी पादपों का वर्गीकरण (Classification of Angiosperms):
अनेक वर्गिकी के वैज्ञानिकों ने आवृतबीजी पादपों का वर्गीकरण दिया है, जिनमें से बैन्थम तथा हुकरे, ऐन्ग्लर तथा प्रैन्टल, तख्ताजान,
थोर्ने तथा क्रोनक्विस्ट की वर्गीकरण पद्धतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। भारत में बैन्थम तथा हुकर के वर्गीकरण का उपयोग किया जाता है। बैन्थम तथा हुकर के वर्गीकरण प्रणाली का प्रकाशन 1862-1863 के बीच एक तीन खण्डीय ग्रन्थ ‘जेनेरा प्लान्टेरम’ में हुआ। यह पद्धति मूल रूप से पूर्व प्रकाशित डी कन्डोले की पद्धति पर आधारित है। इस पद्धति को निम्नांकित फ्लोचार्ट से संक्षेपित किया जा रहा है –
इसमें श्रेणियों (series) को गणों (orders) तथा गणों को कुलों (families) में विभाजित किया गया है।

डिविजन – फे ने रोगेम्स (Division – Phanerogams, पुष्पोझिद):
ये सभी पुष्पधारी पादप होते हैं, जो लैंगिक जनन के उपरान्त बीजों का निर्माण करते हैं।

1. क्लास डाइकोटिलिडनी (Class – Dicotyledonae; द्विबीजपत्री):
इनके बीजों में दो बीजपत्र होते हैं, मूलें मूसला मूल तंत्र बनाती हैं, तने में आंतरिक रूप से संयुक्त, संपार्श्विक, अंतः आदिदारुक तथा वर्षी संवहन पूल (Conjoint, Collateral, endarch and Open Vascular bundle) पाये जाते हैं जो एक वलय में व्यवस्थित होते हैं। पर्यों में शिराविन्यास जालिकावत तथा पुष्प चतुर्तयी या पंचतयी (Tetramerous or pentamerous) होते हैं।

2. क्लास – जिम्नोस्पर्मी (Class – Gymnospermae; अनावृतबीजी):
इनके बीज नग्न होते हैं अर्थात् फलभित्ति से आवतरित नहीं होते हैं।

3. क्लास – मोनोकोटिलिडनी (Class – Monocotyledonae; एकबीजपत्री):
इनके बीजों में एक बीजपत्र होता है, मूलतंत्र रेशेमय, तने में संवहनपूल संयुक्त, संपार्श्विक, अंतः आदिदारुक, तथा अवर्धा (Close) प्रकार के होते हैं जो भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं, पर्यों में शिराविन्यास समान्तर तथा पुष्प त्रतयी (Trimerous) होते हैं।

क्लास डाइकोटिलिडनी के उपक्लास:

  1. उपक्लास – पोलिपेटली (Subclass – Polypetalae): बाह्यदलपुंज व दलपुंज दोनों पृथक्-पृथक् सुस्पष्ट, दलपुंज पृथक्दली।
  2. उपक्लास – गेमोपेटली (Subclass – Gamopetalae): बाह्यदलपुंज व दलपुंज दोनों पृथक्-पृथक् सुस्पष्ट दलपुंज संयुक्तदली।
  3. उपक्लास – मोनोक्लेमाइडी (Subclass – Monochlamydeae): बाह्यदलपुंज व दलपुंज अस्पष्ट, दोनों भिन्न चक्रों के स्थान पर प्रायः अविभेदित परिदलपुंज (Perianth) उपस्थित जो अधिकतर बाह्यदलाभ (Sepaloid) होते हैं।

पोलिपेटली की श्रेणियाँ:

  1. श्रेणी – थैलेमिफ्लोरी (Series – Thalamiflorae):पुष्प जायांगाधर (Hypogymous), अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती।
  2. श्रेणी – डिस्कीफ्लोरी (Series – Disciflorae): पुष्प जायांगधर, अण्डाशय के निचले भाग पर गद्दीदार चक्रिका उपस्थित।
  3. श्रेणी – कै लिसिफ्लोरी (Series – Calyciflorae): पुष्प जायांगोपरिक (Epigynous) या परिजायांगी (Perigynous), अण्डाशय अधोवर्ती या अर्धअधोवर्ती।

गेमोपेटली की श्रेणियाँ:

  1. श्रेणी – इनफेरी (Series – Inferae): पुष्प जायांगो परिक, अण्डाशय अधोवर्ती, पुंकेसरों की संख्या प्रायः अण्डाशय के बराबर।
  2. श्रेणी – हेटेरोमेरी (Series – Heteromerae): पुष्प जायांगाधर, अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती अण्डप सदैव दो से अधिक पुंकेसर दलों के बराबर या दुगने।
  3. श्रेणी – बाइकार्पेलिटी (Series – Bicarpellatae): पुष्प जायांगाधर, पुंकेसर दलों के बराबर या कम अण्डप प्रायः दो।

मोनोक्लेमाइडी की श्रेणियाँ:

  1. श्रेणी – कर्वएम्ब्री (Series – Curvembryae): भ्रूण भ्रूणपोष के चारों ओर कुण्डलित होकर वक्र हो जाता है।
  2. श्रेणी – मल्टीओव्यूलेट एक्वेटिसी (Series – Multiovulate Aquaticeae): जलीय शाक प्रत्येक कोष्ठ में अनेक बीजाण्ड।
  3. श्रेणी – मल्टीओव्यूलेट टैरिस्ट्रिस (Series – Multiovulate Terrestris): भौमिक शाक, प्रत्येक कोष्ठ में अनेक बीजाण्ड।
  4. श्रेणी – माइक्रोएम्ब्री (Series – Microembryae): भ्रूण अत्यन्त सूक्ष्म, भ्रूणपोष बड़ा।
  5. श्रेणी – डेफनेलीज (Series – Daphnales): जायांग एकअण्डपी तथा एकबीजाण्ड युक्त।
  6. श्रेणी – ऐक्लेमाइडोस्पोरी (Series – Achlamydosporae): अण्डाशय अधोवर्ती, एककोष्ठीय, बीजाण्डे 1-3।
  7. श्रेणी – यूनिसेक्युएलीज (Series – Unisexuales): पुष्प एकलिंगी

क्लास मोनोकोटिलिडनी की श्रेणियाँ:

  1. श्रेणी – माइक्रोस्पर्मी (Series – Microspermae): बीज सूक्ष्म, अण्डाशय अधोवर्ती।
  2. श्रेणी – एपिगाइनी (Series – Epigynae): बीज बड़े, अण्डाशय अधोवर्ती।
  3. श्रेणी – कोरोनेरी (Series – Coronarieae): अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती, परिदलपुंज रंगीन।
  4. श्रेणी – केलिसिनी (Series – Calycineae): अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती, परिदलपुंज शूकीय या झिल्लीमय।
  5. श्रेणी – न्यूडीफ्लोरी (Series – Nudiflorae): अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती, परिदलपुंज अनुपस्थित।
  6. श्रेणी – ऐपोकाप (Series – Apocarpae): अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती, जायांग मुक्ताण्डपी।
  7. श्रेणी – ग्लूमेसी (Series – Glumaceae): परिदलपुंज ह्रासित, शल्की या तुषी (Glumae) अण्डाशय एककोष्ठीय, एकबीजाण्डी।

प्रश्न 10.
आवृतबीजी पादपों के आर्थिक महत्त्व पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
आवृतबीजियों के आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Angiosperms):

मानव की तीन मूलभूत आवश्यकताओं:
भोजन, वस्त्र तथा आवास की आपूर्ति पूर्णतः पादपों व उनके उत्पादों से सम्भव है। इस प्रकार आर्थिक दृष्टि से आवृतबीजियों का महत्त्व सर्वोपरि व निर्विवाद है। उपयोगिता के आधार पर पादपों से अनेक उत्पाद प्राप्त किये जाते हैं, जैसे धान्य या अनाज (Cereals), दालें (Pulses), शर्करायें तथा स्टार्च (Sugars and starches), वसायें तथा तेल (Fats and Oils), मसाले तथा गर्ममसाले (Spices and Condiments), पेय (Beverages), फल व सब्जियाँ (Fruits and Vegetables), औषधीय पादप (Medicinal Plant), रेशे (Fibres), इमारती काष्ठ (Timber), गौंद तथा रंजक (Gums and resins), शोभाकारी पादप तथा अन्य। पादपों से उत्पाद उनके विभिन्न भागों जैसे मूलों, स्तम्भों, पर्यों, छालों, पुष्पों, फलों व बीजों से प्राप्त किये जाते हैं। कुछ पदार्थ उनसे उत्पन्न लैटेक्स (रबड़क्षीर) तथा स्रावों से मिलते हैं।

(i) धान्य व अनाज (Cereals):
पोएसी कुल के कुछ सदस्यों | से उनके फल केरियोप्सिस (Caryopsis) से अनाज प्राप्त होता है। ये स्टार्च के स्रोत होते हैं।

  1. गेहूँ (Wheat) : Triticum aestivum
  2. चावल (Rice): Oryza sativa
  3. मक्का (Maize) : Zea mays
  4. बाजरा (Pearl Millet): Pennisetum glaucum

(ii) दालें (Pulses):
लेग्यूमिनोसी कुल के उपकुल पेपिलियोनेसी के कई सदस्यों के बीजों से दालें प्राप्त होती हैं। ये प्रोटीन के स्रोत होते हैं।

  1. मूंग (Green gram): Vignar radiata
  2. उड़द (Black gram): Vigna mungo
  3. चना (Chick Pea): Cicer arietinum
  4. अरहर, तूअर (Pigeon pea): CajanuS cajan
  5. मसूर (Lentil): Lens culinaris

(iii) वसीय तिल (Fatly oils)

  1. तिल (Til): Sesamum indicum
  2. मूंगफली (Groundnut): Arachis hypogea
  3. सोयाबीन (Soybean): Glycine max
  4. नारियल (Coconut): Cocos mucifera (भ्रूणपोष से)

(iv) मसाले (Spices)

  1. मिर्च (Chillies): Capsicum annuum
  2. हल्दी (Turmeric): Curcuma longa
  3. धनिया (Coriander): Coriandrum sativum
  4. जीरा (Cumin): Cuminum cyminum

(v) औषधीय पादप (Medicinal Plants)

  1. अश्वगंध: Withania somnifera
  2. सर्पगन्धा (Serpent wood): Rauvolfia serpentina
  3. अमृता; नीम गिलाय: Tinospora cordifolia
  4. अर्जुन: Terminalia arjuna

(vi) रेशे (Fibers)

  1. कपास (Cotton): Gossypium hirsutum
  2. जूट (Jute): Corchorus capsularis
  3. पटसन (Kenof): Hibiscus cannabinus
लक्षण (Character)ब्रायोफाइट्स (Bryophytes)टेरिडोफाइट्स (Pteridophytes)अनावृत्तबीजी (Gymnosperms)आवृत्तबीजी (Angiosperms)
1.प्रमुख अवस्था (Dominant phase)युग्मकोभिद (Gametophyte)बीजाणुभिद (Sporophyte)बीजाणुभिदबीजाणुभिद
2. मुख्य पादप (Main plant)अगुणितद्विगुणितद्विगुणितद्विगुणित
3. पादप शरीर (Plant body)सूकाय या पर्णिल (Thalloid or leafy)जड़, तना, पत्तियाँजड़, तना, पत्तियाँजड़, तना, पत्तियाँ
4. संवहन ऊतक (Vascular tissue)अनुपस्थितउपस्थितउपस्थितउपस्थित
5. बीजाणु प्रकार (Spores type)समबीजाणुक (Hormosporous)समबीजाणुक तथा विषमबीजाणुकविषमबीजाणुक (Heterosporous)विषमबीजाणुक
6. बीज (Seed)अनुपस्थितअनुपस्थितनग्न बीज उपस्थितफल भित्ति द्वारा ढके बीज
7. पुष्प (Flower)अनुपस्थितअनुपस्थितअनुपस्थितउपस्थित

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
फाइकोलोजी अध्ययन है –
(अ) शैवालों का
(ब) कवकों को
(स) जीवाणुओं का
(द) उपरोक्त सभी का

प्रश्न 2.
अगर-अगर प्राप्त किया जाता है –
(अ) कोन्ड्रस से
(ब) जेलीडियम से
(स) ग्रेसीलेरिया से
(द) उपरोक्त सभी से

प्रश्न 3.
प्रोटीन सम्पन्न शैवाल है –
(अ) क्लोरेला
(ब) स्पाईरोगायरा
(स) ऑसिलेटोरिया
(द) यूलोथ्रिक्स

प्रश्न 4.
गेमीटोफाइट पीढ़ी प्रभावी होती है –
(अ) टेरिडोफाइटा में
(ब) ब्रायोफाइटा में
(स) एन्जियोस्पर्म में
(द) जिम्नोस्पर्म में

प्रश्न 5.
जमीन पर प्रथम उगने वाले पादप हैं –
(अ) एन्जियोस्पर्मुस
(ब) जिम्नोस्पर्मुस
(स) ब्रायोफाइट्स
(द) टेरिडोफाइट्स

प्रश्न 6.
ब्रायोफाइट्स के सन्दर्भ में क्या सही है?
(अ) यह आर्किगोनिया धारण करते हैं।
(ब) इनमें क्लोरोप्लास्ट पाया जाता है।
(स) यह थैलायड होते हैं।
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 7.
किसमें जल के अवशोषण की क्षमता, कॉटन को विस्थापित करने तथा ईंधन की तरह प्रयोग करते हैं –
(अ) मार्केन्शिया
(ब) रिक्सिया
(स) स्फैग्नम
(द) फ्यूनेरिया

प्रश्न 8.
ब्रायोफाइटा शब्द किसने दिया
(अ) डार्विन
(ब) ब्रॉन
(स) अरस्तू
(द) गेलेन

प्रश्न 9.
पादप जगत का उभयचर किसे कहा जाता है –
(अ) ब्रायोफाइट्स
(ब) टेरिडोफाइट्स
(स) जिम्नोस्पर्म
(द) शैवाल

प्रश्न 10.
निम्न में से कौन संवहनी क्रिप्टोगेम से सम्बन्धित होता है –
(अ) ब्रायोफाइटा
(ब) टेरिडोफाइटा
(स) जिम्नोस्पर्म
(द) एन्जियोस्पर्स

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौन ऐसा पादप है जिसमें संवहन आपूर्ति तथा स्पोर्स का उत्पादन होता है परन्तु बीज नहीं पाये जाते हैं –
(अ) ब्रायोफाइट
(ब) टेरिडोफाइट
(स) जिम्नोस्पर्म
(द) एन्जियोस्पर्म

प्रश्न 12.
फर्न में निषेचन के दौरान नर युग्मक, मादा युग्मक पर किसके माध्यम से पहुँचते हैं –
(अ) जल
(ब) कीट
(स) रसायन
(द) वायु

प्रश्न 13.
कौनसा टेरिडोफाइट हॉर्स टेल कहलाता है –
(अ) इक्वीसीटम
(ब) लाइकोपोडियम
(स) मार्सीलिया
(द) सिलेजिनेला

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से कौनसा विषमबीजाणुक है –
(अ) एडिएन्टम
(ब) इक्वीसीटम
(स) ड्रायोप्टेरिस
(द) साल्विनिया

प्रश्न 15.
निम्न किस वर्ग में आप ऐसे पौधे को रखोगे जो बीज बनाते हैं। किन्तु उसमें पुष्प और फल नहीं आते –
(अ) कवक
(ब) ब्रायोफाइटा
(स) टेरिडोफाइटा
(द) जिम्नोस्पर्म
उत्तरमाला:
1. (अ), 2. (द), 3. (अ), 4. (ब), 5. (स), 6. (द), 7. (स), 8. (ब), 9. (अ), 10. (ब), 11. (ब), 12. (अ), 13. (अ), 14. (द), 15. (द)

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जगत प्लान्टी के अन्तर्गत कौन-कौन से पादप समूह होते है ?
उत्तर:
शैवाल, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी तथा आवृतबीजी पादप समूह।

प्रश्न 2.
एल्गी का शाब्दिक अर्थ क्या है ?
उत्तर:
समुद्री खरपतवार।

प्रश्न 3.
शैवाल को सामान्य तथा अंग्रेजी भाषा में क्या कहा जाता है ?
उत्तर:
सामान्य रूप से शैवालों को ‘काई’, ‘कांजी’ तथा अंग्रेजी भाषा में “Pond scums, water mosses” व “Frog Spittle” कहते हैं।

प्रश्न 4.
नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाली कुछ शैवालों के नाम लिखिये।
उत्तर:
ऑसिलेटोरिया, एनाबिना, नॉस्टॉक, ऑलोसिरा तथा साइटोनिमा आदि।

प्रश्न 5.
किन शैवालों को अंतरिक्ष उड़ानों में शोध कार्य हेतु उपयुक्त माना गया है ?
उत्तर:
कुछ शैवालों जैसे क्लोरेला, सिनेकोकोकस को अंतरिक्ष उड़ानों में शोध कार्य के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है।

प्रश्न 6.
ब्रायोफाइटा वर्ग में सम्मिलित पादपों को सामान्य रूप से क्या-क्या कहा जाता है ?
उत्तर:
इस वर्ग में सम्मिलित भिन्न-भिन्न पादपों को सामान्य रूप में लिवरवस (Liverworts), हॉर्नवस (Hornworts) तथा मॉसेज (Mosses) कहते हैं।

प्रश्न 7.
ब्रायोफाइटा का आधुनिक वर्गीकरण किसने दिया था ?
उत्तर:
रोथमेलर तथा प्रोस्क्योर ने दिया था।

प्रश्न 8.
स्फेग्नोल किससे बनाया जाता है ?
उत्तर:
पीट कोयले के आसवन से स्फेग्नोल बनाया जाता है।

प्रश्न 9.
टेरिडोफाइटा पादपों की संवहन ऊतकों में किसका अभाव होता है ?
उत्तर:
जाइलम में वाहिकाओं का तथा फ्लोयम में सहकोशिकाओं तथा चालनी नलिकाओं का अभाव होता है।

प्रश्न 10.
टेरिडोफाइटा के किस वर्ग में पर्णे, गुरुपणे व पिच्छाकार संयुक्त होती हैं ?
उत्तर:
वर्ग टेरोप्सिडा में।

प्रश्न 11.
जिम्नोस्पर्म के किसी जीवाश्मी सदस्य का नाम बताइये।
उत्तर:
विलियमसोनिया।

प्रश्न 12.
किस अनावृतबीजी में कवकमूल सम्बन्ध पाया जाता है ?
उत्तर:
पाइनस की मूल में।

प्रश्न 13.
अनावृतबीजी में परागण व निषेचन का प्रकार बताइये।
उत्तर:
परागण वायु द्वारा (Anemophilous) तथा निषेचन नालयुग्मकी (Siphonogamous)।

प्रश्न 14.
किसी मृतोपजीवी आवृतबीजी पादप का नाम बताइये।
उत्तर:
मोनोटापा (Monotrapa या Indian pipe plant)।

प्रश्न 15.
आवृतबीजी पादपों का भ्रूणपोष कितने गुणित का होता है ?
उत्तर:
त्रिगुणित (triploid)।

RBSE Class 11 Biology Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आवृतबीजी पादपों में पोषण किस-किस प्रकार से होता है ?
उत्तर:
अधिकांश सदस्य प्रकाश संश्लेषी अर्थात् स्वपोषी होते हैं। बहुत कम सदस्य विषमपोषी के रूप में पोषण प्राप्त करते हैं। जैसे परजीवी (अमरबेल CusCuta, Orobanche), मृतजीवी (Indian Pipe Plant Monotropa), आंशिक विषमपोषी जैसे कीटभक्षी’ (घटपर्णी, Nepenthes, वीनस फ्लाईट्रेप, Dionaea) आदि।

प्रश्न 2.
आवृतबीजियों में पाये जाने वाले संवहन तंत्र के विषय में बताइये।
उत्तर:
आवृतबीजियों में सुविकसित संवहन तंत्र पाया जाता है। जाइलम व फ्लोएम दोनों ऊतक चार-चार तत्त्वों से बने होते हैं। जाइलम का निर्माण वाहिनिकाओं, वाहिकाओं, जाइलम रेशों तथा जाइलम मृदूतकों (Tracheids, Vessels, Xylem fibres and Xylem parenchyma) तथा फ्लोएम का निर्माण चालनी नलिकाओं, सहकोशिकाओं, फ्लोएम रेशों तथा फ्लोएम मृदूतकों (Sieve tubes, Companion cells, phloem fibres and phloem parenchyma) से होता है। द्विबीजपत्री पादपों में द्वितीयक वृद्धि हेतु एधा (Cambium) बनती है।

प्रश्न 3.
शैवालों में पादप शरीर किस प्रकार का होता है ? बताइये।
उत्तर:
शैवालों का पादप शरीर थैलस (Thallus, सूकाय) होता है जो अधिकांश सदस्यों में युग्मकोद्भिद पीढ़ी (Gametophytic generation) को निरूपित करता है। अविभेदित पादप शरीर, जिसमें मूल, स्तम्भ व पर्यों का विभेदन नहीं होता है, थैलस कहलाता है। थैलस एककोशिक या बहुकोशिक हो सकता है। शैवालों के पादप शरीर में ऊतक विभेदन तथा संवहन तंत्र नहीं पाया जाता है।

प्रश्न 4.
ऐगार-ऐगार को समझाइये।
उत्तर:
ऐगार एक चूर्णी पदार्थ जो जल के साथ जेल (Gel) बनाता है। यह नाइट्रोजन रहित होता है जो कुछ लाल शैवालों जैसे जेलिडियम, कोन्ड्रस, ग्रेसिलेरिया इत्यादि से प्राप्त किया जाता है। ऐगारऐगार का उपयोग सूक्ष्मजीवों के संवर्द्धन माध्यम बनाने, बेकरी में, सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण, आइसक्रीम निर्माण, चमड़ा तथा कपड़ा उद्योग में, मांस की डिब्बाबन्दी तथा दाँतों के साँचे बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 5.
मॉस के पौधे झुण्डों में क्यों उगते हैं?
उत्तर:
मॉस के पौधों में बीजाणुओं के अंकुरण से अत्यधिक शाखित, हरे रंग की तन्तुरूपी रचना प्रोटोनीमा (Protonema) बनती है। सभी प्रोटोनीमा मिलकर उस स्थान पर जाल सा बना लेती हैं। इनसे ही पास-पास में ऊध्र्वाधर (Vertical) पर्णिल पादपों का निर्माण होता है। जिनसे अनेक कलिकाएँ उत्पन्न होकर अनेक मॉस पादपों का निर्माण होता है।

प्रश्न 6.
शैवालों के वर्गीकरण का क्या आधार है?
उत्तर:
शैवालों को मुख्य रूप से प्रकाश संश्लेषी वर्णक, संचित खाद्य पदार्थ, कोशिका भित्ति की संरचना तथा कशाभिकाओं की उपस्थिति, अनुपस्थिति तथा संख्या के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। शैवालों को तीन प्रमुख वर्गों में वर्गीकृत किया गया है – क्लोरोफाइसी (Chlorophyceae), फिओफाइसी (Phaeophyceae) तथा रोडोफाइसी (Rhodophyceae)।

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