RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 23 मानव का श्वसन-तंत्र

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 23 मानव का श्वसन-तंत्र

RBSE Class 12 Biology Chapter 23 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Biology Chapter 23 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्वसन में प्रयुक्त ऊर्जा है –
(अ) भौतिक ऊर्जा
(ब) रासायनिक ऊर्जा
(स) गतिज ऊर्जा
(द) विद्युत ऊर्जा
उत्तर:
(ब) रासायनिक ऊर्जा

प्रश्न 2.
वायु ग्रहण करते समय तनुपट होता है –
(अ) तिरछा
(ब) गुंबदाकार
(स) सामान्य
(द) चपटा
उत्तर:
(द) चपटा

प्रश्न 3.
निश्वसन में होता है –
(अ) तनुपट एवं बाह्य अंतरा पर्युक पेशियाँ संकुचित
(ब) तनुपट एवं बाह्य अंतरा पशुक पेशियाँ शिथिलित
(स) केवल तनुपट संकुचित
(द) केवल बाह्य अंतरा पशुक पेशियाँ शिथिलित
उत्तर:
(अ) तनुपट एवं बाह्य अंतरा पर्युक पेशियाँ संकुचित

प्रश्न 4.
उच्छवसन में होता है –
(अ) तनुपट एवं बाह्य अंतरा पशुक पेशियाँ संकुचित
(ब) तनुपट एवं बाह्य अंतरा पशुक पेशियाँ शिथिलित
(स) केवल तनुपट शिथिलित
(द) तनुपट बाह्य अंतरा पर्युक पेशियाँ संकुचित
उत्तर:
(ब) तनुपट एवं बाह्य अंतरा पशुक पेशियाँ शिथिलित

प्रश्न 5.
विश्राम अवस्था में वयस्क की श्वसन दर होती है –
(अ) 20-22 प्रति मिनट
(ब) 18-20 प्रति मिनट
(स) 16-20 प्रति मिनट
(द) 14-16 प्रति मिनट
उत्तर:
(स) 16-20 प्रति मिनट

प्रश्न 6.
सामान्य मनुष्य में विश्राम अवस्था में ज्वारीय आयतन होता है –
(अ) 1.2 ली.
(ब) 2.5 ली.
(स) 0.5 ली.
(द) 4.5 ली.
उत्तर:
(स) 0.5 ली.

प्रश्न 7.
फेफड़ों में श्वासनली की शाखा का अंतिम भाग है –
(अ) श्वसनिकाएँ
(ब) वायु कूपिकाएँ
(स) श्वसनियाँ
(द) वायु कोष
उत्तर:
(ब) वायु कूपिकाएँ

प्रश्न 8.
उच्छवसन के समय सीटी की आवाज आना कौन-से रोग की पहचान है –
(अ) वात स्फीति
(ब) अस्थमा
(स) श्वसनी शोय
(द) सिलिकोसिस
उत्तर:
(ब) अस्थमा

प्रश्न 9.
खानों या कारखानों में कार्य करने वालों श्रमिकों को कौन-सा रोग होने की अधिक संभावना रहती है –
(अ) न्यूमोनिया
(ब) श्वसनी शोथ
(स) वात स्फीति
(द) सिलिकोसिस
उत्तर:
(द) सिलिकोसिस

प्रश्न 10.
फेफड़ों की कुल क्षमता होती है –
(अ) 4600 मि.ली.
(ब) 3500 मिली.
(स) 5800 मिली.
(द) 2300 मिली.
उत्तर:
(स) 5800 मिली.

RBSE Class 12 Biology Chapter 23 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
बाह्य श्वसन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जीवधारी की कोशिकाओं द्वारा पर्यावरण से ऑक्सीजन (O2) अन्दर ग्रहण करने तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) बाहर निकालने से सम्बन्धित प्रक्रियाएँ बाह्य श्वसन (External Respiration) कहलाती हैं।

प्रश्न 2.
श्वसन सतह किसे कहते हैं?
उत्तर:
फेफड़ों में स्थित वायु कूपिकाएँ श्वसन सतह (Respiratory surface) कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
तनुपट कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
मनुष्य में तनुपट वक्ष गुहा तथा उदर गुहा के मध्य पाया जाता है।

प्रश्न 4.
निःश्वसन पेशियों के नाम लिखो।
उत्तर:
अंतरापक पेशियाँ (Intercostal muscles)

प्रश्न 5.
धूम्रपान से होने वाले दो रोगों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. अस्थमा
  2. फेफड़ों का कैंसर

प्रश्न 6.
उच्छ्वसन आरक्षित आयतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक उच्छ्वासित कर सकता है उच्छ्वसन आरक्षित आयतन (Expiratory reserve volume, ERV) कहलाता है। यह 1000 ml से 1100 ml होता है।

प्रश्न 7.
निःश्वसन आरक्षित आयतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक निश्वासित कर सकता है निश्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory reserve volume, IRV) कहलाता है। यह औसतन 2500 ml से 3000 ml होता है।

प्रश्न 8.
अवशिष्ट आयतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायु का वह आयतन जो बलपूर्वक उच्छ्वसित होने के बाद भी फेफड़ों में शेष रह जाता है अवशिष्ट आयतन (Residual volume, RV) कहलाता है।

प्रश्न 9.
निःश्वसन क्षमता किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक निश्वसन में ग्रहण की जा सकती है निश्वसन क्षमता (Inspiratory capacity, IC) कहलाती हैं।

प्रश्न 10.
कार्यात्मक अवशिष्ट क्षमता किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामान्य उच्छ्वसन के बाद वायु की मात्रा जो फेफड़ों में बचती है, कार्यात्मक अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity, FRC) कहलाती है।

प्रश्न 11.
कृत्रिम श्वसन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
यदि किसी व्यक्ति की किसी दुर्घटना में श्वास रुक जाये तब कृत्रिम श्वसन देकर मानव जीवन को बचाया जा सकता है।

RBSE Class 12 Biology Chapter 23 लघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
निश्वसन की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद श्वसन की क्रियाविधि (Mechanism of Respiration):
मानव श्वसन की क्रियाविधि दो चरणों में पूर्ण होती है–

  1. नि:श्वसन (Inspiration)
  2. उच्छवसन (Expiration)

1. निश्वसन या अन्तः श्वसन (Inspiration)– वायु (O2) का शरीर में प्रवेश करना निश्वसन या अन्तः श्वसन (Inspiration) कहलाता है। इसे इन्हेलेशन (Inhalation) भी कहते हैं। निश्वसन सक्रिय प्रावस्था है जो तनुपट (Diaphragm) एवं बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ (Intercostal muscles) के संकुचन से प्रारम्भ होती है। जब तनुपट संकुचित होता है। तब वह चपटा हो जाता है। तनुपट संकुचन के समय उदर की ओर नीचे जाता है जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है। इसके साथ बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ भी संकुचित होती हैं। इनके संकुचन से पसलियाँ बाहर एवं ऊपर की ओर खींची जाती हैं। दोनों क्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता हैं। इसके परिणामस्वरूप वक्ष गुहा एवं फेंफड़ों में वायु का दाब वायुमण्डलीय दाब से कम हो जाता है। वायु दाब के इस अन्तर के कारण वायुमण्डल से वायु श्वसन मार्ग से होती हुई वायु कूपिकाओं में तेजी से तब तक भरती रहती है जब तक कि कूपिकाओं का दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर न हो जाय।

वायु का मार्ग इस प्रकार होता हैं। नासाद्वार → नासागुहा → आंतरिक नासा छिद्र → ग्रसनी → घांटी → श्वासनली → श्वसनियाँ : श्वसनिकाएँ → वायुकूपिका वाहिनी – वायु कूपिका कोश → वायु कूपिकाएँ। इस प्रकार फेफड़ों में वायु का प्रवेश करना ही नि:श्वसन (Inspiration) कहलाता है।

2. उच्छवसन (Expiration)– फेफड़ों से वायु (CO2) को शरीर से बाहर निकालना उच्छवसन कहलाता है। इसे ऐक्हेलेशन (Exhalation) भी कहते हैं।

विश्राम अवस्था में यह निष्क्रिय प्रावस्था है। नि:श्वसन के पश्चात् उच्छवसन होता है। जब बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ एवं तनुपट की पेशियाँ शिथिलित होती हैं, तब पसलियाँ स्वयं के भार के कारण नीचे आ जाती हैं तथा तनुपट वक्ष गुहा में ऊपर उठ जाता है। इस कारण वक्ष गुहा का आयतन कम होने से इसका वायुदाब वायुमण्डलीय दाब से अधिक हो जाता है। फेफड़े संपीडित हो जाते हैं एवं उनमें भी दाब बढ़ जाता है। वायु कूपिकाओं से वायु श्वसन मार्ग से होकर बाहर वायुमण्डल में चली जाती है।

व्यायाम तथा शारीरिक श्रम की स्थिति में उच्छ्वसन की प्रक्रिया तीव हो जाती है। आंतरिक अतंरापर्युक पेशियाँ (Internal intercosta l muscles) तेजी से संकुचित होती हैं तथा पसलियों को तेजी से नीचे ओर खचती हैं जिसके परिणामस्वरूप वक्षगुहा का आयतन कम हो जाता है। उदरीय पेशियाँ भी तेजी से संकुचित होती हैं तथा उदरगुहा पर दबाव वापस बढ़ाती हैं। इस दबाव के कारण तनुपट वक्षगुहा में ऊपर की ओर अधिक सक्रिय रूप से गति करता है। इन दोनों पेशियों के संकुचन से फेंफड़े तीव्रता से संपीडित होते हैं तथा वायु बलपूर्वक बाहर निकाल दी जाती है। वयस्क मानव में विश्राम अवस्था में श्वसन दर (संवातन) 16-20 प्रतिमिनट होती है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 23 मानव का श्वसन-तंत्र 1
श्वसन सम्बन्धी आयतन (Volumes related to Respiration):

1. ज्वारीय आयतन (Tidal volume, TV) सामान्य श्वसन के समय एक नि:श्वसन में फेफड़ों में भरी गई वायु का आयतन या एक उच्छ्वसन में निकाली गयी वायु का आयतन ज्वारीय आयतन (Tidal volume) कहलाता है। प्रति श्वास ज्वारीय नि:श्वसन या ज्वारीय उच्छवसन का माप 500 ml होता है। स्वस्थ व्यक्ति लगभग 6000 से 8000 ml वायु प्रतिमिनट की दर से नि:श्वसन तथा उच्छ्व सन कर सकता है।

2. नि:श्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume, IRV)- वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक नि:श्वासित कर सकता है। नि:श्वसन आरक्षित आयतन (IRV) कहलाता है। यह औसतन 2500 ml से 3000 ml होती है।

3. उच्छवसन आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume, ERV)- वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक उच्छ्वसित कर सकता है उच्छवसन आरक्षित आयतन (ERV) कहलाता हैं। औसतन यह 1000 ml से 1100 ml होती है।

4. अवशिष्ट आयतन (Residual Volume, RV)-वायु का वह आयतन जो बलपूर्वक उच्छ्वसित के बाद भी फेंफड़ों में शेष रह जाता है, उसे अवशिष्ट आयतन कहते हैं। औसतन यह 1100 ml से 1200 ml होता है।

श्वसन सम्बन्धी क्षमताएँ (Capacities Related to Respiration):

1. नि:श्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity, IC)—वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक नि:श्वसन में ग्रहण की जा सकती हैं निश्वसन क्षमता (IC) कहलाती है। इसमें ज्वारीय आयतन तथा नि:श्वसन आरक्षित आयतन सम्मिलित हैं। इसका माप 3500 ml होता हैं।
2. उच्छवसित क्षमता (Expiratory Capacity, EC)—वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक उच्छवसित में बाहर निकाली जाती है।
उच्छ्वसित क्षमता (EC) कहलाती है। इसमें ज्वारीय आयतन और उच्छवसित आरक्षित आयतन सम्मिलित (TV + ERV) है।
3. क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity, FRC)—सामान्य उच्छ्वसन के बाद जो वायु की मात्रा फेफड़ों में बचती हैं क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (FRC) कहलाती है। इसमें उच्छवसन आरक्षित आयतन और अवशिष्ट आयतन सम्मिलित होते हैं। (ERV+ RV) । इसका मान 2300 ml होता है।
4. जैव क्षमता (Vital Capacity)–यह फेफड़ों में अधिकतम भरी गयी तथा अधिकतम निकाली गयी वायु होती है। इसका मान VC = [IRV + TV] + ERV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 4600 ml होता है।
5. पेंफड़ों की कुल क्षमता (Total Lung Capacity, TLC)– अधिकतम प्रयास के बाद फेफड़ों में भरी जा सकने वाली अधिकतम वायु की मात्रा को कुल फेफड़ों की क्षमता कहते हैं। इसका मान TLC = VC + RV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 5800 ml होता है। का अध्ययन करें।

प्रश्न 2.
उच्छ्वसन की क्रियाविधि को समझाइए।
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद श्वसन की क्रियाविधि (Mechanism of Respiration):
मानव श्वसन की क्रियाविधि दो चरणों में पूर्ण होती है।

  1. नि:श्वसन (Inspiration)
  2. उच्छवसन (Expiration)

1. निश्वसन या अन्तः श्वसन (Inspiration)–वायु (O2) का शरीर में प्रवेश करना निश्वसन या अन्तः श्वसन (Inspiration) कहलाता है। इसे इन्हेलेशन (Inhalation) भी कहते हैं। निश्वसन सक्रिय प्रावस्था है जो तनुपट (Diaphragm) एवं बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ (Intercostal muscles) के संकुचन से प्रारम्भ होती है। जब तनुपट संकुचित होता है। तब वह चपटा हो जाता है। तनुपट संकुचन के समय उदर की ओर नीचे जाता है जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है। इसके साथ बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ भी संकुचित होती हैं। इनके संकुचन से पसलियाँ बाहर एवं ऊपर की ओर खींची जाती हैं। दोनों क्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता हैं। इसके परिणामस्वरूप वक्ष गुहा एवं फेंफड़ों में वायु का दाब वायुमण्डलीय दाब से कम हो जाता है। वायु दाब के इस अन्तर के कारण वायुमण्डल से वायु श्वसन मार्ग से होती हुई वायु कूपिकाओं में तेजी से तब तक भरती रहती है जब तक कि कूपिकाओं का दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर न हो जाय।
वायु का मार्ग इस प्रकार होता हैं।

नासाद्वार → नासागुहा → आंतरिक नासा छिद्र → ग्रसनी → घांटी → श्वासनली → श्वसनियाँ : श्वसनिकाएँ → वायुकूपिका वाहिनी – वायु कूपिका कोश → वायु कूपिकाएँ। इस प्रकार फेफड़ों में वायु का प्रवेश करना ही नि:श्वसन । (Inspiration) कहलाता है।
2. उच्छवसन (Expiration)– फेफड़ों से वायु (CO2) को शरीर से बाहर निकालना उच्छवसन कहलाता है। इसे ऐक्हेलेशन (Exhalation) भी कहते हैं।
विश्राम अवस्था में यह निष्क्रिय प्रावस्था है। नि:श्वसन के पश्चात् उच्छवसन होता है। जब बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ एवं तनुपट की पेशियाँ शिथिलित होती हैं, तब पसलियाँ स्वयं के भार के कारण नीचे आ जाती हैं तथा तनुपट वक्ष गुहा में ऊपर उठ जाता है। इस कारण वक्ष गुहा का आयतन कम होने से इसका वायुदाब वायुमण्डलीय दाब से अधिक हो जाता है। फेफड़े संपीडित हो जाते हैं एवं उनमें भी दाब बढ़ जाता है। वायु कूपिकाओं से वायु श्वसन मार्ग से होकर बाहर वायुमण्डल में चली जाती
व्यायाम तथा शारीरिक श्रम की स्थिति में उच्छ्वसन की प्रक्रिया तीव हो जाती है। आंतरिक अतंरापर्युक पेशियाँ (Internal intercostal muscles) तेजी से संकुचित होती हैं तथा पसलियों को तेजी से नीचे ओर खचती हैं जिसके परिणामस्वरूप वक्षगुहा का आयतन कम हो जाता है। उदरीय पेशियाँ भी तेजी से संकुचित होती हैं तथा उदरगुहा पर दबाव बढ़ाती हैं। इस दबाव के कारण तनुपट वक्षगुहा में ऊपर की ओर अधिक सक्रिय रूप से गति करता है। इन दोनों पेशियों के संकुचन से फेंफड़े तीव्रता से संपीडित होते हैं तथा वायु बलपूर्वक बाहर निकाल दी जाती है। वयस्क मानव में विश्राम अवस्था में श्वसन दर (संवातन) 16-20 प्रतिमिनट होती है।

RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 23 मानव का श्वसन-तंत्र 1
श्वसन सम्बन्धी आयतन (Volumes related to Respiration):

1. ज्वारीय आयतन (Tidal volume, TV) सामान्य श्वसन के समय एक नि:श्वसन में फेफड़ों में भरी गई वायु का आयतन या एक उच्छ्वसन में निकाली गयी वायु का आयतन ज्वारीय आयतन (Tidal volume) कहलाता है। प्रति श्वास ज्वारीय नि:श्वसन या ज्वारीय उच्छवसन का माप 500 ml होता है। स्वस्थ व्यक्ति लगभग 6000 से 8000 ml वायु प्रतिमिनट की दर से नि:श्वसन तथा उच्छ्व सन कर सकता है।
2. नि:श्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume, IRV)–वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक नि:श्वासित कर सकता है। नि:श्वसन आरक्षित आयतन (IRV) कहलाता है। यह औसतन 2500 ml से 3000 ml होती है।
3. उच्छवसन आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume, ERV)-वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक उच्छ्वसित कर सकता है उच्छवसन आरक्षित आयतन (ERV) कहलाता हैं। औसतन यह 1000 ml से 1100 ml होती है।
4. अवशिष्ट आयतन (Residual Volume, RV)-वायु का वह आयतन जो बलपूर्वक उच्छ्वसित के बाद भी फेंफड़ों में शेष रह जाता है, उसे अवशिष्ट आयतन कहते हैं। औसतन यह 1100 ml से 1200 ml होता है।

श्वसन सम्बन्धी क्षमताएँ (Capacities Related to Respiration):

1. नि:श्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity, IC)—वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक नि:श्वसन में ग्रहण की जा सकती हैं निश्वसन क्षमता (IC) कहलाती है। इसमें ज्वारीय आयतन तथा नि:श्वसन आरक्षित आयतन सम्मिलित हैं। इसका माप 3500 ml होता हैं।
2. उच्छवसित क्षमता (Expiratory Capacity, EC)—वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक उच्छवसित में बाहर निकाली जाती है।
उच्छ्वसित क्षमता (EC) कहलाती है। इसमें ज्वारीय आयतन और उच्छवसित आरक्षित आयतन सम्मिलित (TV + ERV) है।
3. क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity, FRC)—सामान्य उच्छ्वसन के बाद जो वायु की मात्रा फेफड़ों में बचती हैं क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (FRC) कहलाती है। इसमें उच्छवसन आरक्षित आयतन और अवशिष्ट आयतन सम्मिलित होते हैं। (ERV+ RV) इसका मान 2300 ml होता है।
4. जैव क्षमता (Vital Capacity)–यह फेफड़ों में अधिकतम भरी गयी तथा अधिकतम निकाली गयी वायु होती है। इसका मान VC = [IRV + TV] + ERV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 4600 ml होता है।
5. पेंफड़ों की कुल क्षमता (Total Lung Capacity, TLC)– अधिकतम प्रयास के बाद फेफड़ों में भरी जा सकने वाली अधिकतम वायु की मात्रा को कुल फेफड़ों की क्षमता कहते हैं। इसका मान TLC = VC + RV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 5800 ml होता है का अध्ययन करें।

प्रश्न 3.
कृत्रिम श्वसन की विधि समझाइए।
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद कृत्रिम श्वसन (Artificial Respiration):

यदि किसी व्यक्ति का किसी दुर्घटना जैसे-डूबना, कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) या अन्य किसी विषाक्तता (Toxicity), वैद्युत प्रघात या अन्य परिस्थितियों में श्वांस रुक जाए पर यदि हृदय स्पंदन (Heart Beating) जारी रहे तब कृत्रिम श्वसन देकर मानव जीवन को बचाया जा सकता है।
सामान्यत: कृत्रिम श्वसन की प्रक्रिया से श्वसन केन्द्रों को पुनः सक्रिय करके सामान्य श्वसन की सामान्य स्थिति को पुनः प्राप्त कराया जाता है।
कृत्रिम श्वसन की अनेक विधियाँ ज्ञात हैं, लेकिन वर्तमान में मुख से मुख श्वसन विधि सर्वाधिक कारगर है। इस विधि द्वारा कृत्रिम श्वसन देने के प्रमुख बिन्दु निम्नवत हैं

  1. रोगी को सीधा लिटाकर, अपना एक हाथ उसके माथे पर तथा दूसरा हाथ उसकी गर्दन पर नीचे लगाकर गर्दन को इस प्रकार ऊँचा करते हैं कि गर्दन खिंच जाये तथा जीभ पिछले भाग से अलग हो जाये। इस क्रिया से बन्द श्वसन मार्ग खुल जाता है।
  2. माथे पर रखे हाथ से रोगी की नाक बंद करते हुए कृत्रिम श्वसन देने वाला व्यक्ति अपना मुख रोगी के मुख पर इस प्रकार रखें कि वायु अवकाश न रहे यानि वायुरोधी स्थिति रहे। गर्दन के नीचे हाथ यथास्थिति में ही रहना चाहिये ताकि गर्दन खिंची रहे।
  3. रोगी के मुख में एक मिनट में लगभग 12 ज्वारीय आयतन से दुगुनी हवा भरें।
  4. रोगी के मुख एवं नाक को खुला छोड़ते हुए रोगी के उच्छवसन की जाँच करें इस प्रकार कृत्रिम श्वसन द्वारा रोगी को पुनर्जीवन मिल सकता है। आजकल कृत्रिम श्वसन के लिये कई प्रकार के यांत्रिक उपकरण भी उपलब्ध हैं। को अध्ययन करें।

प्रश्न 4.
वात स्फीति रोग क्या है? इसका किस प्रकार उपचार किया जा जाता है?
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद श्वसन सम्बन्धी रोग (Respiratory Disorders):

1. अस्थमा या दमा (Asthma)–अस्थमा या दमा रोग परागकण, धूलकण, खाद्य पदार्थों, धुआँ, ठंड, धूम्रपान आदि से होने वाली एलर्जी के कारण होता है। इसके रोगी को खांसी आती है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है। अस्थमा का दौरा पड़ने पर उच्छ्व सन के समय पर सीटी बजने की आवाज आती है। इस रोग में श्वसनियों में अधिक श्लेष्मा का निर्माण होता हैं, सूजन आ जाती है तथा स्वसनियों के सँकरा हो जाने के कारण साँस लेने में कठिनाई पैदा होती है। इस रोग से बचने का सर्वोत्तम उपाय एलर्जी कारकों से दूर रहना एवं उनसे बचना चाहिए।
इस रोग के उपचार हेतु व्रोंको डाइलेटर तथा प्रतिजैविक (Antbiotic) तथा एण्टीएलीजेक (Antiallergic) दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।
2. श्वसनी शोथ (Bronchitis) — श्वसनी की आन्तरिक सतह पर सूजन आ जाने के कारण लगातार खाँसी, अत्यधिक श्लेष्मा, हरा-पीला कफ आना तथा साँस लेने में कठिनाई होना इस रोग के लक्षण हैं। यह रोग धूमपान के कारण होता है। सिगरेट के धुएँ में उपस्थित रसायनों के कारण अधिक मात्रा में श्लेष्मा का निर्माण होता है तथा श्वसनी में सूजन आ जाती है तथा सीलिया (cilia) नष्ट हो जाते हैं। धूम्रपान से दूर रहकर इस रोग से बचा जा सकता है।
3. वात स्फीति (Emphysema)—यह रोग भी अत्यधिक धूम्रपान से होता है। धूम्रपान से फेफड़ों में लगातार उत्तेजना होती रहती है जिससे कूपिका भित्तियाँ धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं। फेफड़ों में वायु के स्थान फैलकर बड़े हो जाते हैं तथा श्वसन सतह का क्षेत्रफल घट जाता है। संयोजी ऊतक की मात्रा बढ़ जाने के कारण फेफड़ों की प्रत्यास्थता भी कम हो जाती है जिसके फलस्वरूप उच्छ्वसन की क्रिया अत्यधिक कठिन हो जाती है। उच्छ्वसन के बाद भी फेफड़ों में वायु भरी रहती है। सूजन, अत्यधिक कफ एवं श्वसनिकाओं के सँकरी हो जाने के कारण साँस लेने में कठिनाई होती हैं। धूम्रपान से दूर रहकर साँस लेने में कठिनाई होती है। धूम्रपान से दूर रहकर , एण्टीबायोटिक दवायें लेकर व्रोंको डाइलेटर औषधियाँ लेकर इस रोग से बचा जा सकता हैं।
4. न्यूमोनिया (Pneumonia)—यह रोग स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी (Streptococus pneumoni) जीवाणुओं के संक्रमण से उत्पन्न रोग है। इस संक्रमण से कूपिकाएँ मृतकोशिकाओं (श्वेताणुओं) तथा तरल से भर जाती हैं जिससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है। रोगी को साँस लेने में कठिनाई होती है। यह रोग अधिकतर वृद्धों एवं बच्चों में होता है। इस रोग के उपचार के लिए एण्टीबायोटिक, ब्रोंकोडाइलेटर औषधियाँ लेनी चाहिए।
5. फेफड़ों का कैंसर (Cancer of Lungs)—इसका प्रमुख कारण धूम्रपान ही है। सिगरेट के धुएँ में उपस्थित रसायन कैंसर जनक होते हैं। धुएँ से श्वसनकला में उत्तेजना से अनियंत्रित कोशिका विभाजन आरम्भ हो जाता है जिससे पूरे फेफड़े में कैंसर फैल जाता हैं।
6. सिलिकोसिस तथा एसबेस्टोसिस (Silicosis and asbestosis)— यह रोग वायु प्रदूषण (Air pollution) द्वारा उत्पन्न होता है।ऐसे श्रमिक जो सिलिका एवं एसवेस्टॉस की खानों या कारखानों में कार्य करते हैं उनमें इन रोगों के होने की संभावना रहती है। साँस के साथ इन पदार्थों के कण फेफड़ों में चले जाते हैं तथा फेफड़ों के ऊपरी भाग में फाइब्रोसिस (तन्तुमय ऊतक में वृद्धि) तथा सूजन उत्पन्न करते हैं। ये दोनों रोग असाध्य है। अत: इसके उत्पन्न होने के कारणों से बचना चाहिए का अध्ययन करें ।

प्रश्न 5.
श्वसन किसे कहते हैं? बाह्य तथा आन्तरिक श्वसन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद परिचय (Introduction):
जीवधारियों के शरीर में होने वाली समस्त जैविक क्रियाओं (vital activities) के संचालन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा उन्हें खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण (oxidation) से प्राप्त होती है। अतः श्वसन एक जैव रासायनिक (Bio chemical) क्रिया है जिसमें जीवित कोशिकाओं में उपस्थित भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण के फलस्परूप ऊर्जा, कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) तथा जल (H2O) प्राप्त होते हैं तथा इस क्रिया के परिणामस्वरूप प्राप्त ऊर्जा (रासायनिक ऊर्जा) ATP के रूप में संचित कर ली जाती है तथा कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर से बाहर त्याग दी जाती है।

तथा श्वसन के प्रकार (Types of Respiration):

श्वसन की क्रिया दो प्रकार से होती है
1. बाह्य श्वसन (External Respiration)
2. आन्तरिक या कोशिकीय श्वसन (Internal or cellular Respiration)

1. बाह्य श्वसन (External Respirations)-जीवधारी की कोशिकाओं द्वारा पर्यावरण से ऑक्सीजन (O2) अन्दर ग्रहण करने तथा कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) बाहर निकालने से सम्बन्धित प्रतिक्रियाएँ बाह्य श्वसन (External respiration) कहलाती हैं। इसमें पर्यावरण तथा कोशिकाओं के मध्य O2 तथा CO2 का विनिमय (exchange) होता है। इसे साँस लेना (Breathing) या संवातन (Ventlation) भी कहते हैं। यह एक भौतिक क्रिया (Physical process) है।
2. आन्तरिक या कोशिकीय श्वसन (Internal or cellular respiration)—प्राणी द्वारा ऑक्सीजन (O2) के उपयोग तथा कार्बन डाई
ऑक्साइड (CO2) एवं ATP के उत्पादन से सम्बन्धित प्रतिक्रियाएँ आन्तरिक या कोशिकीय श्वसन (Internal or cellular respiration) कहलती हैं। आन्तरिक या कोशिकीय श्वसन दो प्रकार का होता है।

  1. ऑक्सीश्वसन (Aerobic Respiration)-जब कोशिकीय श्वसन की क्रिया ऑक्सीजन की स्थिति में होती है तब इसे ऑक्सी श्वसन (Aerobic respiration) कहते हैं।
  2. अनॉक्सी श्वसन (Anaerobic respiration)-जब कोशिकीय श्वसन की क्रिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिष्ट में होती है तब इसे अनॉक्सी श्वसन (Anaerobic respiration) कहते हैं। का अध्ययन करें।

RBSE Class 12 Biology Chapter 23 निबन्धात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
मानव में श्वसन तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद मानव श्वसन अंग तथा श्वसन तंत्र (Respiratory organs and Respiratory system of Human):

मनुष्य में गैसीय विनिमय (Gaseous exchange) के लिए सुविकसित श्वसन अंग (Respiratory organs) तथा श्वसन तंत्र (Respiratory system) पाया जाता है। बाह्य नासा छिद्र या नासा द्वारा (Nostrils) नासा गुहा (Nasal cavity) नासा ग्रसनी गुहा (Nasopharyngial cavity) कंठ (Larynx), श्वससनली (Trachea), श्वसनी (Bronchus) तथा फेफड़ों (lungs) द्वारा मिलकर श्वसन तंत्र का निर्माण करते हैं। मानव में फेफड़े प्रमुख श्वसन अंग हैं। शेष संरचनाएँ श्वसन मार्ग बनाती हैं। फेफड़ों में उपस्थित वायु कूपिकाएँ (Alveoli) श्वसन सतह का कार्य करती हैं।

मानव श्वसन तंत्र में एक जोड़ी नासा द्वारा (Nostrils) श्वसन तंत्र के बाह्य छिद्र होते हैं। नासा द्वारा वायु नासा गुहा (Nasal cavity) में जाती है। नासा द्वारों में स्थित रोम तथा श्लेष्मा झिल्ली द्वारा बँकी सर्पिलाकार अस्थियों के द्वारा भीतर जाने वाली वायु को छाना जाता है। नासा गुहा में वायु गर्म तथा नम होती है। वायु में उपस्थित सूक्ष्म कण श्लेष्मा द्वारा रोक दिए जाते हैं। नासा मार्ग नेजल, प्रीमैक्सिला, मैक्सिला । तथा एथेमॉयड अस्थियों का बना होता है। नासा गुहा आन्तरिक नासा छिद्रों द्वारा नासा ग्रसनी (Nasopharynx) में खुलती है। यहाँ आने वाली वायु पीछे की ओर कंठ ग्रसनी (Laryngopharynx) में प्रवेश करती है। कंठ ग्रसनी कंठ (Larynx) के माध्यम से श्वास नली से जुड़ती है। कंठ एक त्रिभुजाकार संरचना होती है। कंठ की भित्ती को उपस्थियाँ (cartilages) सहारा प्रदान करती हैं।
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इसमें प्रमुख उपास्थियाँ अवटु (Thyroid), मुद्रिका (Cricoid), दर्विकाभ (Arytenoids) तथा एपिग्लोटिस (Epiglottis) होती हैं। कंठ में स्वर रज्जु (Vocal chords) पाए जाते हैं जो कि ध्वनि उत्पादन (sound Production) का कार्य करते हैं। कंठ के छिद्र को घांटी (Glottis) कहते हैं। यह छिद्र श्वास नली में खुलता है।

श्वासनली लगभग 12 सेमी लम्बी नली होती हैं। यह कंठ से वक्ष गुहा (Thoracic cavity) तक फैली रहती है तथा यहाँ पर यह दो। श्वसनियों में बँट जाती है। श्वास नली एवं श्वसनियों की भित्ति को ‘C’ आकार की उपास्थियाँ आलम्बन (सहारा) प्रदान करती हैं। श्वसन मार्ग की भित्ति पर श्लेष्मा कोशिकाएँ (mucus cells) तथा पक्ष्माभी कोशिकाएँ। (ciliated cells) पायी जाती हैं। श्लेष्मा में फंसे हुए जीवाणुओं तथा सूक्ष्म कणों को पक्ष्माभों (cilia) द्वारा ग्रसनी में लाया जाता है तथा श्लेष्मा को निगल लिया जाता है।

मानव की वक्षगुहा में हृदय के पास दो फेफड़े (lungs) उपस्थित होते हैं। दायाँ फेफड़ा तीन बायाँ फेफड़ा दो पालियों (lobes) से निर्मित होता है। फेफड़ा दो फुफुस्सावरण (pleura) द्वारा घिरा रहता है। फुफ्फुसावरणों के मध्य फुफुस्सावरणी तरल (pleural fluid) भरा रहता है। फुफ्फुस्सावरणों के मध्य कोटर (pleural cavity) में कोई वायु उपस्थित नहीं होती है। ये कोटर फेफड़ों को पिचकने से बचाती है। दोनों फेफड़ों के कोटर पृथक-पृथक होते हैं। दुर्घटनावश जब कोटरों में वायु प्रवेश कर जाती है तब फेंफड़े पिचक जाते हैं। पशुका पिंजर फेफड़ों को घेरे रखता है तथा उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। गुम्बदनुमा पेशीय तनुपट (Diaphram) वक्षगुहा को उदर गुहा से पृथक रखता है।
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चित्र 23.2 : मनुष्य के फेफड़ों में श्वसनीय वृक्ष का चित्र

मनुष्य के प्रत्येक फेंफड़े में एक श्वसनी (Bronchus) प्रवेश करती है तथा फेंफड़े के अन्दर लगातार उपविभाजित होकर द्वितीयक तथा तृतीयक श्वसनी (Bronchi), श्वसनिकाएँ (Bronchioles), अन्तस्थ श्वसकिाएँ (Terminal Bronchioles) तथा श्वसन-श्वसनिकाएँ (Respiratory bronchioles) बनाती हैं। श्वसन-श्वसनिकाएँ वायु कूपिका वाहिनी (Alveolar ducts) में उपविभाजित होती है जो वायु कुपिका कोश (Atrium) में खुलती हैं। प्रत्येक कोश या एट्रियम से छोटी वायु कूपिकाओं का एक समूह जुड़ा रहता है। दोनों फेफड़ों में लगभग 60 करोड़ वायु कूपिकाएँ पायी जाती हैं। श्वसन – श्वनिकाएँ, वायु कूपिका वाहिनी, एट्रीयम एवं वायु कूपिकाएँ एक श्वसन इकाई बनाती हैं। वायुकूपिकाएँ गैसीय विमिमय (Gaseous exchange) की प्रमुख सतह हैं। | प्रत्येक वायु कूपिका अत्यन्त सूक्ष्म प्याले सदृश्य संरचना होती हैं। जिसका व्यास लगभग 0.2 mm होता हैं। इसकी अत्यन्त पतली भित्ति में रुधिर कोशिकाओं (Blood capallaries) का जाल पाया जाता है। जिससे रुधिर एक सतत परत रूप में प्रवाहित होता है। वायु कूपिका द्वारा गैसीय विनिमय के लिए बनी झिल्ली या सतह अत्यन्त महीन या लगभग 0.2μm मोटी होती है। श्वसन झिल्ली का निर्माण कूपिका की उपकला, कोशिका की अन्तः कला के मध्य उपस्थित आधारीय कला (Basement membran)
द्वारा होता है। वायु कूपिका की भित्ति शल्की उपकला (squamous epithelium) से निर्मित होती हैं। श्वसनी एवं श्वसनिकाएँ पक्ष्माभी उपकला, (ciliated epithelium) द्वारा आस्तरित होती हैं। का अध्ययन करें।

प्रश्न 2.
मानव में श्वसन की क्रियाविधि व श्वसन के महत्व को समझाइए।
उत्तर:
कृपया अनुच्छेद श्वसन की क्रियाविधि (Mechanism of Respiration):
मानव श्वसन की क्रियाविधि दो चरणों में पूर्ण होती है।

  1. नि:श्वसन (Inspiration)
  2. उच्छवसन (Expiration)

1. निश्वसन या अन्तः श्वसन (Inspiration)– वायु (O2) का शरीर में प्रवेश करना निश्वसन या अन्तः श्वसन (Inspiration) कहलाता है। इसे इन्हेलेशन (Inhalation) भी कहते हैं। निश्वसन सक्रिय प्रावस्था है जो तनुपट (Diaphragm) एवं बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ (Intercostal muscles) के संकुचन से प्रारम्भ होती है। जब तनुपट संकुचित होता है। तब वह चपटा हो जाता है। तनुपट संकुचन के समय उदर की ओर नीचे जाता है जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है। इसके साथ बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ भी संकुचित होती हैं। इनके संकुचन से पसलियाँ बाहर एवं ऊपर की ओर खींची जाती हैं। दोनों क्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता हैं। इसके परिणामस्वरूप वक्ष गुहा एवं फेंफड़ों में वायु का दाब वायुमण्डलीय दाब से कम हो जाता है। वायु दाब के इस अन्तर के कारण वायुमण्डल से वायु श्वसन मार्ग से होती हुई वायु कूपिकाओं में तेजी से तब तक भरती रहती है जब तक कि कूपिकाओं का दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर न हो जाय।
वायु का मार्ग इस प्रकार होता हैं। नासाद्वार → नासागुहा → आंतरिक नासा छिद्र → ग्रसनी → घांटी → श्वासनली → श्वसनियाँ : श्वसनिकाएँ → वायुकूपिका वाहिनी – वायु कूपिका कोश → वायु कूपिकाएँ। इस प्रकार फेफड़ों में वायु का प्रवेश करना ही नि:श्वसन (Inspiration) कहलाता है।
2. उच्छवसन (Expiration)– फेफड़ों से वायु (CO2) को शरीर से बाहर निकालना उच्छवसन कहलाता है। इसे ऐक्हेलेशन (Exhalation) भी कहते हैं।
विश्राम अवस्था में यह निष्क्रिय प्रावस्था है। नि:श्वसन के पश्चात् उच्छवसन होता है। जब बाह्य अंतरापर्युक पेशियाँ एवं तनुपट की पेशियाँ शिथिलित होती हैं, तब पसलियाँ स्वयं के भार के कारण नीचे आ जाती । हैं तथा तनुपट वक्ष गुहा में ऊपर उठ जाता है। इस कारण वक्ष गुहा का आयतन कम होने से इसका वायुदाब वायुमण्डलीय दाब से अधिक हो जाता है। फेफड़े संपीडित हो जाते हैं एवं उनमें भी दाब बढ़ जाता है। वायु कूपिकाओं से वायु श्वसन मार्ग से होकर बाहर वायुमण्डल में चली जाती है।

व्यायाम तथा शारीरिक श्रम की स्थिति में उच्छ्वसन की प्रक्रिया तीव हो जाती है। आंतरिक अतंरापर्युक पेशियाँ (Internal intercostal muscles) तेजी से संकुचित होती हैं तथा पसलियों को तेजी से नीचे ओर खचती हैं जिसके परिणामस्वरूप वक्षगुहा का आयतन कम हो जाता है। उदरीय पेशियाँ भी तेजी से संकुचित होती हैं तथा उदरगुहा पर दबाव बढ़ाती हैं। इस दबाव के कारण तनुपट वक्षगुहा में ऊपर की ओर अधिक सक्रिय रूप से गति करता है। इन दोनों पेशियों के संकुचन से फेंफड़े तीव्रता से संपीडित होते हैं तथा वायु बलपूर्वक बाहर निकाल दी जाती है। वयस्क मानव में विश्राम अवस्था में श्वसन दर (संवातन) 16–20 प्रतिमिनट होती है।
RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 23 मानव का श्वसन-तंत्र 1
श्वसन सम्बन्धी आयतन (Volumes related to Respiration):

1. ज्वारीय आयतन (Tidal volume, TV) सामान्य श्वसन के समय एक नि:श्वसन में फेफड़ों में भरी गई वायु का आयतन या एक उच्छ्वसन में निकाली गयी वायु का आयतन ज्वारीय आयतन (Tidal volume) कहलाता है। प्रति श्वास ज्वारीय नि:श्वसन या ज्वारीय उच्छवसन का माप 500 ml होता है। स्वस्थ व्यक्ति लगभग 6000 से 8000 ml वायु प्रतिमिनट की दर से नि:श्वसन तथा उच्छ्व सन कर सकता है।
2. नि:श्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume, IRV)– वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक नि:श्वासित कर सकता है। नि:श्वसन आरक्षित आयतन (IRV) कहलाता है। यह औसतन 2500 ml से 3000 ml होती है।
3. उच्छवसन आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume, ERV)- वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक उच्छ्वसित कर सकता है उच्छवसन आरक्षित आयतन (ERV) कहलाता हैं। औसतन यह 1000 ml से 1100 ml होती है।
4. अवशिष्ट आयतन (Residual Volume, RV)- वायु का वह आयतन जो बलपूर्वक उच्छ्वसित के बाद भी फेंफड़ों में शेष रह जाता है, उसे अवशिष्ट आयतन कहते हैं। औसतन यह 1100 ml से 1200 ml होता है।

श्वसन सम्बन्धी क्षमताएँ (Capacities Related to Respiration):

1. नि:श्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity, IC)—वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक नि:श्वसन में ग्रहण की जा सकती हैं निश्वसन क्षमता (IC) कहलाती है। इसमें ज्वारीय आयतन तथा नि:श्वसन आरक्षित आयतन सम्मिलित हैं। इसका माप 3500 ml होता हैं।
2. उच्छवसित क्षमता (Expiratory Capacity, EC)—वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक उच्छवसित में बाहर निकाली जाती है।
उच्छ्वसित क्षमता (EC) कहलाती है। इसमें ज्वारीय आयतन और उच्छवसित आरक्षित आयतन सम्मिलित (TV + ERV) है।
3. क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity, FRC)—सामान्य उच्छ्वसन के बाद जो वायु की मात्रा फेफड़ों में बचती हैं क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (FRC) कहलाती है। इसमें उच्छवसन आरक्षित आयतन और अवशिष्ट आयतन सम्मिलित होते हैं। (ERV+ RV) । इसका मान 2300 ml होता है।
4. जैव क्षमता (Vital Capacity)–यह फेफड़ों में अधिकतम भरी गयी तथा अधिकतम निकाली गयी वायु होती है। इसका मान VC = [IRV + TV] + ERV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 4600 ml होता है।
5. पेंफड़ों की कुल क्षमता (Total Lung Capacity, TLC)– अधिकतम प्रयास के बाद फेफड़ों में भरी जा सकने वाली अधिकतम वायु की मात्रा को कुल फेफड़ों की क्षमता कहते हैं। इसका मान TLC = VC + RV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 5800 ml होता है। का अध्ययन करें।

श्वसन का महत्व (Importance of Respiration)–श्वसन क्रिया | द्वारा जीवधारी के शरीर में गैसीय विनिमय (gaseous exchange) की क्रिया पूर्ण होती है। भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक
ऑक्सीजन फेफड़ों से रक्त में पहुँचती है तथा फेफड़ों द्वारा कोशिकाओं में निर्मित कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2) को शरीर से बाहर निकाला जाता है।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए
(अ) कृत्रिम श्वसन
(ब) श्वसन सम्बन्धी रोग
(स) श्वसन सम्बन्धी आयतन
उत्तर:
(अ) कृत्रिम श्वसन (Artificial Respiration)– कृपया अनुच्छेद यदि किसी व्यक्ति का किसी दुर्घटना जैसे-डूबना, कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) या अन्य किसी विषाक्तता (Toxicity), वैद्युत प्रघात या अन्य परिस्थितियों में श्वांस रुक जाए पर यदि हृदय स्पंदन (Heart Beating) जारी रहे तब कृत्रिम श्वसन देकर मानव जीवन को बचाया जा सकता है।
सामान्यत: कृत्रिम श्वसन की प्रक्रिया से श्वसन केन्द्रों को पुनः सक्रिय करके सामान्य श्वसन की सामान्य स्थिति को पुनः प्राप्त कराया जाता है।
कृत्रिम श्वसन की अनेक विधियाँ ज्ञात हैं, लेकिन वर्तमान में मुख से मुख श्वसन विधि सर्वाधिक कारगर है। इस विधि द्वारा कृत्रिम श्वसन देने के प्रमुख बिन्दु निम्नवत हैं

  1. रोगी को सीधा लिटाकर, अपना एक हाथ उसके माथे पर तथा दूसरा हाथ उसकी गर्दन पर नीचे लगाकर गर्दन को इस प्रकार ऊँचा करते हैं कि गर्दन खिंच जाये तथा जीभ पिछले भाग से अलग हो जाये। इस क्रिया से बन्द श्वसन मार्ग खुल जाता है।
  2. माथे पर रखे हाथ से रोगी की नाक बंद करते हुए कृत्रिम श्वसन देने वाला व्यक्ति अपना मुख रोगी के मुख पर इस प्रकार रखें कि वायु अवकाश न रहे यानि वायुरोधी स्थिति रहे। गर्दन के नीचे हाथ यथास्थिति में ही रहना चाहिये ताकि गर्दन खिंची रहे।
  3. रोगी के मुख में एक मिनट में लगभग 12 ज्वारीय आयतन से दुगुनी हवा भरें।
  4. रोगी के मुख एवं नाक को खुला छोड़ते हुए रोगी के उच्छवसन की जाँच करें। | इस प्रकार कृत्रिम श्वसन द्वारा रोगी को पुनर्जीवन मिल सकता है। आजकल कृत्रिम श्वसन के लिये कई प्रकार के यांत्रिक उपकरण भी उपलब्ध हैं। का अध्ययन करें।

(ब) श्वसन सम्बन्धी रोग (Respiratory disorders)– कृपया अनुच्छेद:
1. अस्थमा या दमा (Asthma)–अस्थमा या दमा रोग परागकण, धूलकण, खाद्य पदार्थों, धुआँ, ठंड, धूम्रपान आदि से होने वाली एलर्जी के कारण होता है। इसके रोगी को खांसी आती है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है। अस्थमा का दौरा पड़ने पर उच्छ्व सन के समय पर सीटी बजने की आवाज आती है। इस रोग में श्वसनियों में अधिक श्लेष्मा का निर्माण होता हैं, सूजन आ जाती है तथा स्वसनियों के सँकरा हो जाने के कारण साँस लेने में कठिनाई पैदा होती है। इस रोग से बचने का सर्वोत्तम उपाय एलर्जी कारकों से दूर रहना एवं उनसे बचना चाहिए।
इस रोग के उपचार हेतु व्रोंको डाइलेटर तथा प्रतिजैविक (Antbiotic) तथा एण्टीएलीजेक (Antiallergic) दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।
2. श्वसनी शोथ (Bronchitis)_श्वसनी की आन्तरिक सतह पर सूजन आ जाने के कारण लगातार खाँसी, अत्यधिक श्लेष्मा, हरा-पीला कफ आना तथा साँस लेने में कठिनाई होना इस रोग के लक्षण हैं। यह रोग धूमपान के कारण होता है। सिगरेट के धुएँ में उपस्थित रसायनों के कारण अधिक मात्रा में श्लेष्मा का निर्माण होता है तथा श्वसनी में सूजन
आ जाती है तथा सीलिया (cilia) नष्ट हो जाते हैं। धूम्रपान से दूर रहकर इस रोग से बचा जा सकता है।
3. वात स्फीति (Emphysema)—यह रोग भी अत्यधिक धूम्रपान से होता है। धूम्रपान से फेफड़ों में लगातार उत्तेजना होती रहती है जिससे कूपिका भित्तियाँ धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं। फेफड़ों में वायु के स्थान फैलकर बड़े हो जाते हैं तथा श्वसन सतह का क्षेत्रफल घट जाता है। संयोजी ऊतक की मात्रा बढ़ जाने के कारण फेफड़ों की प्रत्यास्थता भी कम हो जाती है जिसके फलस्वरूप उच्छ्वसन की क्रिया अत्यधिक कठिन हो जाती है। उच्छ्वसन के बाद भी फेफड़ों में वायु भरी रहती है। सूजन, अत्यधिक कफ एवं श्वसनिकाओं के सँकरी हो जाने के कारण साँस लेने में कठिनाई होती हैं। धूम्रपान से दूर रहकर साँस लेने में कठिनाई होती है। धूम्रपान से दूर रहकर , एण्टीबायोटिक दवायें लेकर व्रोंको डाइलेटर औषधियाँ लेकर इस रोग से बचा जा सकता हैं।
4. न्यूमोनिया (Pneumonia)—यह रोग स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी (Streptococus pneumoni) जीवाणुओं के संक्रमण से उत्पन्न रोग है। इस संक्रमण से कूपिकाएँ मृतकोशिकाओं (श्वेताणुओं) तथा तरल से भर जाती हैं जिससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है। रोगी को साँस लेने में कठिनाई होती है। यह रोग अधिकतर वृद्धों एवं बच्चों में होता है। इस रोग के उपचार के लिए एण्टीबायोटिक, ब्रोंकोडाइलेटर औषधियाँ लेनी चाहिए।
5. फेफड़ों का कैंसर (Cancer of Lungs)—इसका प्रमुख कारण धूम्रपान ही है। सिगरेट के धुएँ में उपस्थित रसायन कैंसर जनक होते हैं। धुएँ से श्वसनकला में उत्तेजना से अनियंत्रित कोशिका विभाजन आरम्भ हो जाता है जिससे पूरे फेफड़े में कैंसर फैल जाता हैं।
6. सिलिकोसिस तथा एसबेस्टोसिस (Silicosis and asbestosis)—यह रोग वायु प्रदूषण (Air pollution) द्वारा उत्पन्न होता है।ऐसे श्रमिक जो सिलिका एवं एसवेस्टॉस की खानों या कारखानों में
कार्य करते हैं उनमें इन रोगों के होने की संभावना रहती है। साँस के साथ इन पदार्थों के कण फेफड़ों में चले जाते हैं तथा फेफड़ों के ऊपरी भाग में फाइब्रोसिस (तन्तुमय ऊतक में वृद्धि) तथा सूजन उत्पन्न करते हैं। ये दोनों रोग असाध्य है। अत: इसके उत्पन्न होने के कारणों से बचना चाहिए का अध्ययन करें।

(स) श्वसन सम्बन्धी आयतन (Volumes related to .. respiration)– कृपया अनुच्छेद:

1. ज्वारीय आयतन (Tidal volume, TV) सामान्य श्वसन के समय एक नि:श्वसन में फेफड़ों में भरी गई वायु का आयतन या एक उच्छ्वसन में निकाली गयी वायु का आयतन ज्वारीय आयतन (Tidal volume) कहलाता है। प्रति श्वास ज्वारीय नि:श्वसन या ज्वारीय उच्छवसन का माप 500 ml होता है। स्वस्थ व्यक्ति लगभग 6000 से 8000 ml वायु प्रतिमिनट की दर से नि:श्वसन तथा उच्छ्व सन कर सकता है।
2. नि:श्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume, IRV)–वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक नि:श्वासित कर सकता है। नि:श्वसन आरक्षित आयतन (IRV) कहलाता है। यह औसतन 2500 ml से 3000 ml होती है।
3. उच्छवसन आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume, ERV)-वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक उच्छ्वसित कर सकता है उच्छवसन आरक्षित आयतन (ERV) कहलाता हैं। औसतन यह 1000 ml से 1100 ml होती है।
4. अवशिष्ट आयतन (Residual Volume, RV)-वायु का वह आयतन जो बलपूर्वक उच्छ्वसित के बाद भी फेंफड़ों में शेष रह जाता है, उसे अवशिष्ट आयतन कहते हैं। औसतन यह 1100 ml से 1200 ml होता हैं।

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