RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 36 मानव में गुणसूत्रीय विकृतियाँ

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 36 मानव में गुणसूत्रीय विकृतियाँ

RBSE Class 12 Biology Chapter 36 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

RBSE Class 12 Biology Chapter 36 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य में अलिंग गुणसूत्र की संख्या होती है।
(अ) 42
(ब) 44
(स) 46
(द) 48.
उत्तर:
(ब) 44

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सी बीमारी अलिंग गुणसूत्र की संख्या में परिवर्तन आने से होती है?
(अ) टर्नर-सिंड्रोम
(ब) क्लाइनफेल्टर-सिंड्रोम
(स) ट्रिपल फीमेल
(द) डाउन-सिंड्रोम
उत्तर:
(द) डाउन-सिंड्रोम

प्रश्न 3.
सामान्य स्त्री एवं वर्णान्ध पिता की संतान होगी–
(अ) सभी बच्चे सामान्य दृष्टि वाले एवं वाहक कोई नहीं
(ब) लड़के वर्णान्ध किन्तु लड़कियाँ सामान्य
(स) लड़कियाँ वाहक किन्तु लड़के सामान्य
(द) सभी बच्चे वर्णान्ध।
उत्तर:
(स) लड़कियाँ वाहक किन्तु लड़के सामान्य

प्रश्न 4.
टर्नर सिंड्रोम में गुणसूत्रों की संख्या होती है-
(अ) 44
(ब) 45
(स) 46
(द) 47.
उत्तर:
(ब) 45

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन-सा रोग लिंग-सहलग्न होता है?
(अ) हैजा
(ब) एडवर्ड-सिंड्रोम
(स) मंगोलिज्म
(द) हिमोफिलिया।
उत्तर:
(द) हिमोफिलिया।

प्रश्न 6.
हिमोफिलिया से पीड़ित पिता एवं रोग की वाहक माता की संतान होगी-
(अ) आधे लड़के सामान्य किन्तु आधे लड़के हिमोफिलिक
(ब) सभी लड़के हिमोफिलिक
(स) सभी लड़कियाँ हिमोफिलिक
(द) आधी लड़कियाँ सामान्य एवं आधी लड़कियाँ रोगी।
उत्तर:
(अ) आधे लड़के सामान्य किन्तु आधे लड़के हिमोफिलिक

प्रश्न 7.
जब जीनों का एक समूह सहलग्नता दर्शाता है, तब वे-
(अ) स्वतंत्र अपव्यूहन नहीं दर्शाते
(ब) कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
(स) गुणसूत्र नक्शा नहीं दर्शाते
(द) अर्धसूत्री विभाजन के समय रिकॉम्बीनेशन दर्शाता है।
उत्तर:
(अ) स्वतंत्र अपव्यूहन नहीं दर्शाते

प्रश्न 8.
जीन विनिमय जिसके परिणामस्वरूप उच्च जीवों में आनुवंशिक पुनः संयोजन होता है, निम्न में से किसके मध्य पाया जाता है।
(अ) किसी बाइवैलेन्ट की सिस्टर क्रोमेटिड के मध्य
(ब) किसी बाइवैलेन्ट की नॉन-सिस्टर क्रोमेटिड के मध्य
(स) दो पुत्री केन्द्रकों में
(द) दो विभिन्न बाइवैलेन्ट में।
उत्तर:
(ब) किसी बाइवैलेन्ट की नॉन-सिस्टर क्रोमेटिड के मध्य

प्रश्न 9.
फिनाइल कीटोन्यूरिया रोग में किस एंजाइम का संश्लेषण नहीं हो पाता है।
(अ) फिनाइल ऐलेनिन हाइड्रोक्सीलेज
(ब) फिनाइल ऐलेनिन डीहाइड्रोजिनेज
(स) फिनाइल ओक्सीजीनेज
(द) फिनाइल हाइड्रोक्सीलेज।
उत्तर:
(अ) फिनाइल ऐलेनिन हाइड्रोक्सीलेज

प्रश्न 10.
सिकल सेल एनीमिया होता है-
(अ) ऑटोसोमी जीन में उत्परिवर्तन के कारण
(ब) लिंग गुणसूत्र में अधिकता के कारण
(स) लिंग गुणसूत्र में न्यूनता के कारण
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) ऑटोसोमी जीन में उत्परिवर्तन के कारण

RBSE Class 12 Biology Chapter 36 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डाउन सिंड्रोम क्या होता है?
उत्तर:
डाउन सिण्ड्रोम रोग का कारण 21 वें क्रोमोसोम की त्रिसूत्रता या ट्राइसोमी (Trisonmy) है। इस रोग से पीड़ित बच्चे में अल्प विकसित वृद्धि तथा कपाल, गर्दन, हाथ, मुँह में असामान्यता पाई जाती है।

प्रश्न 2.
फिनाइल ऐलेनीन हाइड्रोक्सीलेज का क्या कार्य है?
उत्तर:
फिनाइल ऐलेनीन हाइड्रोक्सीलेज का कार्य फिनाइल एलेनीन को टाइरोसीन में अपचयित करना है।

प्रश्न 3.
सिकल सेल एनीमिया में हीमोग्लोबिन में किस प्रकार का उत्परिवर्तन होता है?
उत्तर:
सिकल सेल एनीमिया में हीमोग्लोबिन में एक ऑटोसोमी जीन में उत्परिवर्तन होता है। इसमें हीमोग्लोबिन की बीटा श्रृंखला में छठा एमिनो अम्ल ग्लूटामिक अम्ल का स्थान वेलीन ले लेता है।

प्रश्न 4.
क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम में कितने गुणसूत्र हो सकते हैं?
उत्तर:
यह बीमारी पुरुषों में होती है, इनकी कोशिकाओं में 46 की अपेक्षा 47, 48 या 49 क्रोमोसोम्स हो सकते हैं, यह अतिरिक्त संख्या X या Y क्रोमोसोम की होती है।

प्रश्न 5.
जीन विनिमय किस विभाजन में कब होता है?
उत्तर:
जीन विनिमय क्रॉसिंग ओवर युग्मक निर्माण के समय अर्धसूत्री विभाजन प्रथम की पूर्वावस्था प्रथम की स्थूल सूत्रावस्था में घटित होता है।

प्रश्न 6.
सहलग्न समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
एक ही गुणसूत्र पर मौजूद जीनों के जिस समूह में एक साथ वंशागत होने की प्रवृत्ति होती है उसे सहलग्न समूह कहते हैं।

प्रश्न 7.
हीमोफिलिया क्या होता है?
उत्तर:
इस रोग से पीड़ित मनुष्यों में रक्त का स्कंदन (Cloting) बनाने वाले कारक का अभाव होता है, फलस्वरूप ऐसे मनुष्य को चोट लगने से उससे लगातार रुधिर बहता है। खून का बहाव 5-7 मिनट से अधिक देरी तक बन्द न हो तब उसे हीमोफीलिया रोग कहते हैं।

प्रश्न 8.
स्त्री और पुरुष में गुणसूत्र की संख्या लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य में 23 जोड़े गुणसूत्र अर्थात 46 गुणसूत्र पाए जाते हैं। इन 46 गुणसूत्र में से 44 गुणसूत्र पुरुष एवं स्त्री में समान प्रकार के होते हैं। पुरुष में XY तथा एक गुणसूत्र छोटा तथा दूसरा बड़ा होता है। जबकि स्त्री में दोनों गुणसूत्र (XX) समान होते हैं। पुरुष में 44+XY = 46 तथा महिला में 44 +XX = 46 क्रोमोसोम्स होते हैं।

RBSE Class 12 Biology Chapter 36 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्णान्धता किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह एक सहलग्न रोग है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति हरे एवं लाल रंगों में अन्तर नहीं कर पाता है। ऐसे व्यक्ति को वर्णान्ध कहते हैं। अलग-अलग लोगों में अलग-अलग प्रकार की वर्णान्धता पायी जाती है। किन्तु लाल-हरे रंग की वर्णान्धता के रोगी अधिक मिलते हैं अर्थात् जो लाल एवं हरे रंग में कोई विभेद नहीं कर पाते हैं।

मनुष्य के X क्रोमोसोम पर रंगा कोशिकाएँ (Cover) बनाने के जीन पाये जाते हैं। ये जीन रेटिना में रंग विभेद करने वाली कोशिकाओं के बनने पर नियन्त्रण रखते हैं। इस जीन के स्थान पर इसका अप्रभावी विकल्पी आ जाता है तो रंग विभेद करने वाली कोशिकाओं का निर्माण नहीं होता है। इससे व्यक्ति में वर्णान्धता का रोग हो जाता है। यह रोग पुरुषों में अधिक होता है क्योंकि पुरुषों में केवल एक X गुणसूत्र होता है। जबकि स्त्री में दो X क्रोमोसोम पाये जाते हैं, जिससे स्त्री स्वयं इस रोग से
पीड़ित नहीं होती है बल्कि वह वाहक की भूमिका निभाती है।

प्रश्न 2.
वर्णान्धता की वाहक माता एवं सामान्य पिता की संतान 1 में रोग की आनुवंशिकता को बताइये।
उत्तर:
सामान्य पुरुष का X गुणसूत्र सामान्य होगा (X)। वर्णान्ध स्त्री के दोनों X गुणसूत्रों पर वर्णान्धता का अप्रभावी जीन (XC) उपस्थित होगा। वर्णान्ध स्त्री अपने सभी पुत्रों को वर्णान्धता की जीन वाला XC गुणसूत्र प्रदान करती है। अत: एक वर्णान्ध स्त्री के सभी पुत्र वर्णान्ध तथा पुत्रियाँ वाहक होंगी।
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प्रश्न 3.
टर्नर सिंड्रोम क्या होता है?
उत्तर:
टर्नर सिण्ड्रोम (Turner’s Syndrome)—यह सिण्ड्रोम लिंग गुणसूत्र की मोनोसोमी (Monosomy) के कारण उत्पन्न होता है। टर्नर सिण्ड्रोम में दैहिक गुणसूत्रों की संख्या तो सामान्य होती है, किन्तु लिंग गुणसूत्रों में केवल एक ही X गुणसूत्र पाया जाता है। गुणसूत्रों का विन्यास 44 + X होता है। गुणसूत्रों की कुल संख्या 45 होती है। टर्नर सिण्ड्रोम का निर्माण अण्डजनन या शुक्राणुजनन, किसी भी अवस्था में अवियोजन (नॉन-डिस्जंक्शन) होने के कारण हो सकता है। इस सिण्ड्रोम के कारण व्यक्ति का शरीर अल्पविकसित, स्त्री के समान और बन्ध्य (Sterile) होता है। यह लगभग 5000 : 1 के अनुपात में पाया जाता है। टर्नर सिण्ड्रोम यह हमेशा एक महिला होती है। इन स्त्रियों की लम्बाई कम होती है तथा इनका लैंगिक विकास भी देरी से होता है। ये स्त्रियाँ बाँझ होती हैं। प्रति 3000 जन्म पर एक टर्नर सिण्ड्रोम वाली लड़की पैदा होती है। इसके निम्न लक्षण हैं-मन्द बुद्धि, गर्दन पर जालनुमा (Weblike) त्वचा, अपूर्ण विकसित स्तन आदि।

प्रश्न 4.
बेटसन एवं पुन्नेट के प्रयोग को समझाइए।
उत्तर:
बेटसन एवं पुन्नेट (Bateson and punnet ने 1906 में मीठी लेथाइरस ओडोरेटस (Lathyrus odoratus) पर कार्य करते समय सहलग्न जीनों के बारे में बताया, उन्होंने नीले पुष्प (B) व लम्बे परागकण (L) वाले पौधों का संकरण लाल पुष्प (b) व गोल परागकण (l) वाले पौधों के साथ संकरण कराया। F1 संतति में नीले पुष्प व लम्बे परागकण (BbLl) वाले पौधे प्राप्त हुए। इसके बाद इन नीले पुष्प व लम्बे परागकण (BbLl) वाले पौधों का लाल पुष्प व गोल परागकण वाले पौधे (bbll) के साथ परीक्षार्थ संकरण (Test cross) करवाया। इनसे F2 संतति में 1 : 1 : 1 : 1 का अनुपात मिलना चाहिए, किन्तु इसके स्थान पर 7 : 1 : 1 : 7 का अनुपात प्राप्त हुआ। इससे ज्ञात हुआ कि लक्षणों के नये संयोजनों अर्थात पुनर्योगजों (Recombinants) की अपेक्षा जनकीय स्वरूपों की संख्या अधिक थी।
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प्रश्न 5.
सहलग्नता के विभिन्न प्रकारों को समझाइए।
उत्तर:
सहलग्नता मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है-
(1) पूर्ण सहलग्नता (Complete Linkage)
(2) अपूर्ण सहलग्नता (Incomplete Linkage)
(1) पूर्ण सहलग्नता (Complete Linkage)-यह वह सहलग्नता है जिसमें दो या दो से अधिक गुण, दो या दो से अधिक वंशों (Generations) तक लगातार वंशागत (Inherited) होते चले जाते हैं। यह जीवों में प्राकृतिक रूप से बहुत कम पायी जाती है। इस सहलग्नता की वंशागति किसी भी गुणसूत्र पर स्थित जीन्स युग्मों (Genes combinations) के बिना टूटे ही होते हैं अर्थात् इसमें दो युग्म (Gene) नहीं टूट पाते। इस सहलग्नता के मुख्य उदाहरण ड्रोसोफिला व कुछ अन्य
कीट हैं।

(2) अपूर्ण संहलग्नता (Incomplete Linkage)—यह सहलग्नता जन्तु व पौधों दोनों में पायी जाती है। इसमें गुणसूत्र एक बिन्दु से टूट जाता है और इसी बिन्दु पर विनिमय (Crossing over) हो जाता है। मक्का (Maize) इस सहलग्नता का अच्छा उदाहरण है। इसमें सहलग्नता जीन (Linked gene) एक-दूसरे के पास-पास स्थित होते हैं। अपने बिन्दु पथों (Loci) पर लगे हुए ही ये जीन एक वंश से दूसरे वंश में पहुँचते हैं, लेकिन ये जीन जो सहलग्न (Linked) नहीं हैं, एक-दूसरे से काफी दूर स्थित रहते हैं।

प्रश्न 6.
लिंग-सहलग्न लक्षण किसे कहते हैं एवं उनकी वंशागति समझाइए।
उत्तर:
लिंग सहलग्न लक्षण के द्वारा केवल लिंग गुणसूत्र से लिंग निर्धारण का कार्य करते हैं। बाद में अनेकों शोधों के आधार पर बताया कि लिंग गुणसूत्र पर भी अनेकों जीन पाए जाते हैं। विभिन्न शारीरिक लक्षणों के.विशेषक निम्न हैं ऐसे लक्षण जिनके जीन लिंग गुणसूत्रों पर पाये जाते हैं तथा उन्हीं के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुगत होते हैं तो उन्हें लिंग सहलग्न लक्षण एवं इनकी वंशागति को लिंग सहलग्न वंशागति कहते हैं।

X-गुणसूत्र पर पाए जाने वाले जीन पुरुष तथा स्त्री दोनों में अभिव्यक्त हो सकते हैं। अतः इन जीनों की अभिव्यक्ति को आढ़ी-तिरछी या क्रिस क्रोस आनुवंशिकी कहते हैं। इस प्रकार की वंशागति में जनक पीढ़ी का लक्षण पुत्री के माध्यम से अगली पीढ़ी में हस्तान्तरित होता है। मनुष्य के X-गुणसूत्र में लगभग 20 लक्षणों के जीन पाए जाते हैं जो कि लिंग सहलग्न लक्षण होते हैं।

RBSE Class 12 Biology Chapter 36 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लिंग-सहलग्न वंशागति से आप क्या समझते हैं? वर्णान्धता एवं हीमोफिलिया रोग के सन्दर्भ में इसे समझाइए।
उत्तर:
लिंग-सहलग्न गुण तथा इनकी वंशागति (Sex-linked Characters and their Inheritance)
एकलिंगी प्राणियों में दो प्रकार के गुणसूत्र पाए जाते हैं-
(i) समजात या दैहिक गुणसूत्र-(Somatic chromosomes or autosomes)
(ii) लैंगिक गुणसूत्र (Sex chromosomes or allosomes)

लैंगिक गुणसूत्रों पर कुछ दैहिक लक्षणों के जीन भी विद्यमान होते हैं। ऐसे लक्षणों को लिंग-सहलग्न लक्षण कहते हैं तथा इनकी वंशागति लिंग-सहलग्न वंशागति (Sex-linked inheritance) कहलाती है। मनुष्य में 120 लिंग-सहलग्न लक्षणों की खोज हो चुकी है।

सामान्य लिंग-सहलग्न लक्षण तथा इनकी वंशागति (Common Sex-linked Characters and their Inheritance)
सामान्यतया X-सहलग्न अप्रभावी लक्षण ही सामान्य लिंग-सहलग्न लक्षण होते हैं; जैसे-वर्णान्धता तथा हीमोफीलिया Y-लिंग गुणसूत्र पर इसका दूसरा (प्रभावी) युग्मविकल्पी ऐलील (Allele) उपस्थित नहीं होता। अतः ये लक्षण सामान्यतया पुरुषों में ही प्रदर्शित होते हैं।

स्त्री में जब तक दोनों लिंग गुणसूत्रों पर लिंग-सहलग्न लक्षण के अप्रभावी जीन उपस्थित नहीं होते, लक्षण प्रकट नहीं होते। एक Xगुणसूत्र पर यह जीन होने पर स्त्री केवल उसकी वाहक (Carrier) ही होगी।

वर्णान्धता की वंशागति (Inheritance of Colour blindness)
यह मनुष्य में पाया जाने वाला लिंग-सहलग्न रोग है। एक अप्रभावी जीन की उपस्थिति के कारण व्यक्ति लाल वे हरे रंग में विभेद करने में असमर्थ रहता है। लाल रंग की वर्णान्धता प्रोटेनोपिया (Protanopia) तथा हरे रंग की वर्णान्धता ड्यूटेरानोपिया (Deuteranopia) कहलाती है।

वर्णान्धता (Colour blindness)
वर्णान्धता एक लिंग सहलग्न (Sex linked) अप्रभावी विकार (recessive disorder) है। यह लाल अथवा हरे रंग संवेदी शंकु (Colour sensitive cone) के त्रुटिपूर्ण हो जाने के कारण होता है। वर्णान्धता X क्रोमोसोम पर स्थित कुछ जीनों के उत्परिवर्तन (Mutation) के कारण उत्पन्न होती है।

चूँकि अन्य लिंग सहलग्न रोगों के समान इसका जीन भी X लिंग क्रोमोसोम पर स्थित होता है। अत: वर्णान्धता मुख्यतः पुरुषों को ही अधिक प्रभावित करती है। पुरुषों में केवल एक X क्रोमोसोम होता है। अत: वह अप्रभावी होने पर भी अभिव्यक्त हो जाता है। महिलाओं में चूँकि दो X क्रोमोसोम होते हैं। अत: रोग के लिए विषमयुग्मजी (Heterozygous) अवस्था में रोग के लक्षण उत्पन्न नहीं होते क्योंकि सामान्य अलील प्रभावी होता है। इसी कारण लगभग 8 प्रतिशत पुरुषों एवं 0.4% स्त्रियों में यह विकार पाया जाता है। एक वर्णान्ध पुरुष अपने नर शिशु (लड़के) में रोग का संचरण नहीं कर सकता। पुत्रों में यह रोग वाहक (carrier) अथवा रोगी स्त्री द्वारा ही आता है। किसी वाहक स्त्री के सामान्य पुरुष से विवाह होने पर उसके कुल पुत्रों में से वर्णान्ध पुत्र होने की सम्भावना 50% है।

पुत्रियाँ प्रायः वर्णान्ध नहीं होतीं जब तक कि माँ-वाहक व पिता वर्णान्ध न हो।
वंशागति निम्न प्रकार होती है-
कुल पुत्रों में से आधे 50% वर्णान्ध
स्त्री के वर्णान्ध होने की स्थिति
50% पुत्र वर्णान्ध 50% सामान्य,
पुत्रियाँ 50% वाहक व 50% वर्णान्ध
वर्णान्धता दादा से वाहक पुत्रियों के माध्यम से नाती (Grandson) में पहुँचती है।

हीमोफीलिया की वंशागति–हीमोफीलिया एक रक्त विकार है। जिसमें रक्त में एक महत्त्वपूर्ण स्कन्दनकर्ता कारक (Clotting factor) की कमी होती है। अतः रक्त का स्कन्दन बहुत ही देर में अथवा होता ही नहीं है रोगी के शरीर में हुआ एक छोटा-सा घाव जानलेवा साबित हो सकता है।

यह एक लिंग सहलग्न अप्रभावी (Sex linked recessive) रोग है। जो नर शिशु में अप्रभावित वाहक (Unaffected carrier) महिलाओं से आता है। वाहक महिलाएँ हीमोफीलिया के लिए विषमयुग्मकी (Heterozyogus) होती हैं तथा इनमें सामान्य अलील की उपस्थिति में हीमोफीलिया की स्थिति नहीं बनती। स्त्रियों के हीमोफीलिया से ग्रस्त होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है, क्योंकि इस स्थिति के लिए उसकी माँ का वाहक होना तथा पिता का हीमोफीलिया से ग्रस्त होना आवश्यक होगा। हीमोफीलिया ग्रस्त स्त्रियों की आयु अधिक नहीं होती। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के अनेक वंशज हीमोफीलिया से ग्रस्त थे तथा वह स्वयं इस रोग की वाहक थीं। हीमोफीलिया पर व्यापक अध्ययन हुआ है।

चूँकि वाहक पुत्री में एक सामान्य अलील है। अत: वह रोग से बची रहेगी। पुत्र में Y क्रोमोसोम X के समजात नहीं है। अतः वह केवल X की उपस्थिति से ही रोगी होगा।

प्रश्न 2.
सहलग्नता एवं जीन विनिमय के अन्तर को स्पष्ट करते हुए समझाइये।
उत्तर:
सहलग्नता एवं जीन विनिमय में अन्तर-
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प्रश्न 3.
मनुष्य में विभिन्न गुणसूत्रीय असामान्यताओं के बारे में विस्तार से समझाइये।
उत्तर:
भ्रूणीय विकास में मनुष्य के गुणसूत्र की संख्या में किन्हीं कारणों से अन्तर आने पर असामान्य बच्चे पैदा होते हैं। असामान्य स्थिति ऑटोसोम या सेक्स क्रोमोसोम, दोनों ही प्रकार के क्रोमोसोम की संख्या में परिवर्तन आने पर आ सकती है। क्रोमोसोम की सामान्य संख्या व संरचना में किसी प्रकार के परिवर्तन से अपसामान्यताएँ उत्पन्न होती हैं। मनुष्य में आनुवंशिक विकारों के निम्न उदाहरण हैं-
(अ) ऑटोसोमल असामान्यताएँ (Autosomal abnormalities)
1. डाउन्स सिण्ड्रोम या मंगोलिज्म (Down’s syndrome or Mongolism)-यह सबसे पुराना ज्ञात व भली-भाँति अध्ययन किया गया सिण्ड्रोम है। लैंगडेन डाउन (Langden Down, 1866) ने इस सिण्ड्रोम का अध्ययन किया था। यह सिण्ड्रोम 21वें गुणसूत्र की ट्राइसोमी (Trisomy) के कारण होता है। गुणसूत्रों की कुल संख्या 47 होती है। यह लक्षण स्त्री व पुरुष किसी में भी पाया जा सकता है। इस सिण्ड्रोम में चेहरा मंगोलों के समान होता है। इनकी जीभ मोटी, आँखें तिरछी, मस्तिष्क अल्पविकसित तथा कद छोटा होता है। इनकी आयु सामान्यतया 12 से 14 वर्ष होती है। प्रत्येक 700 बच्चों में से एक में डाउन सिण्ड्रोम होता है।

2. एडवर्डस सिण्ड्रोम (Edvard’s syndrome)-यह सिण्ड्रोम 18वे गुणसूत्र की ट्राइसोमी के कारण होता है। गुणसूत्रों की कुल संख्या 47 होती है। इसका अध्ययन जे. एच. एडवर्ड्स. (J.H. Edwards, 1960) ने किया था। इनका मस्तिष्क अल्पविकसित तथा शरीर के अंगों व तन्त्रों में विकार होते हैं। ये बच्चे 6 माह तक ही जीवित रहते हैं। प्रत्येक 8000 नवजात शिशुओं में एक एडवर्ड्स सिण्ड्रोम से ग्रस्त होता है।

3. विविध संरचनात्मक असामान्यताएँ-इस प्रकार की असामान्यता गुणसूत्र के अंश विशेष के विलोपन से उत्पन्न होती हैं। उदाहरण- 5वीं जोड़ी गुणसूत्र की छोटी भुजा का विलोपन हो जाता है। इसे क्राई-डू-चैट सिन्ड्रोम कहते हैं।

(ब) लिंग-गुणसूत्र सम्बन्धी असामान्यताएँ दैहिक गुणसूत्र में संख्यात्मक परिवर्तन की तुलना में लिंग-गुणसूत्र में संख्यात्मक परिवर्तन और अधिक पाए जाते हैं, जिससे पैदा होने वाले बच्चों में अनेक असामान्यताएँ एवं विकृतियाँ पाई जाती हैं, जो निम्नलिखित हैं

(1) टर्नर-सिण्ड्रोम-यह व्यक्ति हमेशा एक महिला होती है। इस महिला में दो की अपेक्षा केवल एक X क्रोमोसोम होता है। इनकी क्रोमोसोम संख्या 45 होती है (44 + XO) इसे टर्नर सिण्ड्रोम कहते हैं। इन स्त्रियों की लम्बाई कम होती है तथा इनका लैंगिक विकास भी देरी से होता है। ये स्त्रियाँ बाँझ होती हैं। प्रति 3000 जन्म पर एक टर्नर सिन्ड्रोम वाली लड़की पैदा होती है। इसके निम्न लक्षण हैं-
मंदबुद्धि, गर्दन पर जालनुमा त्वचा (Weblike), अपूर्ण विकसित स्तन आदि।

(2) क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम (Klinefelter’s Syndrome)
यह बीमारी पुरुषों में होती है। इनकी कोशिकाओं में 46 की अपेक्षा 47, 48, या 49 क्रोमोसोम्स हो सकते हैं। यह अतिरिक्त संख्या X या Y क्रोमोसोम की होती है। क्लाइनफेल्टर पुरुषों में क्रोमोसोम निम्न प्रकार होते हैं-
1.44 + XXY (एक अतिरिक्त X क्रोमोसोम) = 47
2. 44 + XXXY (दो अतिरिक्त X क्रोमोसोम) = 48
3.44 + XXXXY (तीन अतिरिक्त X क्रोमोसोम) = 49
4. 44 + XXYY (एक X व एक Yअतिरिक्त) = 48
5.44 + XXXYY (दो X व एक Y एक अतिरिक्त) = 49

इन असामान्य क्रोमोसोम संख्या वाले पुरुषों में स्त्रियों के लक्षण दिखाई देते हैं। इनके निम्न लक्षण हैं-
लम्बा अल्पबुद्धि पुरुष, हाथ-पाँव अधिक लम्बे, बंध्य (Sterile) और पुरुष में मादा की तरह विकसित स्तन पुंस्तन वृद्धि (गाइनेकौमेस्टिया gynacomastia-gynae = स्त्री + massere स्तन पु = पुरुष + स्तन)।

(3) स्त्रियों में अतिरिक्त X क्रोमोसोम की स्थिति इसमें 47 से 49 तक क्रोमोसोम की संख्या हो सकती है किन्तु वृद्धि X अलिखित क्रोमोसोम के कारण होती है अर्थात 44 + XXX, 44 + XXXX, 44 + XXXXX। ऐसी स्थिति वाली महिलाओं में लैंगिक लक्षण देरी से विकसित होते हैं तथा वे अल्प बुद्धि वाली होती हैं।

4. पुरुषों में अतिरिक्त क्रोमोसोम–इन पुरुषों में कुल 47 क्रोमोसोम (44+XYY) होते हैं। इन पुरुषों में जननांगों का विकास भी असामान्य होता है। ये असामान्य लम्बे, अल्पवृद्धि वाले तथा अपराधी वृत्ति वाले होते

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