RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 42 जैव चिकित्सा तकनीकें

Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 42 जैव चिकित्सा तकनीकें

RBSE Class 12 Biology Chapter 42 पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

RBSE Class 12 Biology Chapter 42 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन का मापन किससे किया जाता है-
(अ) हीमोसाइटोमीटर
(ब) हीमोग्लोबिनोमीटर
(स) वेस्टरग्रेन विधि
(द) विन्ट्रोब विधि
उत्तर:
(ब) हीमोग्लोबिनोमीटर

प्रश्न 2.
किस रोग में श्वेताओं की संख्या बढ़ जाती है-
(अ) तपैदिक
(ब) टायफॉइड
(स) खसरा
(द) रक्त कैंसर
उत्तर:
(द) रक्त कैंसर

प्रश्न 3.
हृदय सम्बन्धी रोगों का निदान किसके द्वारा किया जाता है-
(अ) ई. ई. जी.
(ब) ई. सी. जी
(स) आर. आई. ए.
(द) सी. ए. टी. स्कैन
उत्तर:
(ब) ई. सी. जी

प्रश्न 4.
सी. टी. स्कैन में किन विकिरणों का प्रयोग होता है-
(अ) α – किरणों का
(ब) β – किरणों का
(स) γ – किरणों का
(द) x – किरणों का
उत्तर:
(द) x – किरणों का

प्रश्न 5.
एम. आर. आई. का पूरा नाम है-
(अ) मल्टीपल रेजोनेंस इमेजिंग
(ब) मैग्नेटिक रेडियो इमेजिंग
(स) मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग
(द) मल्टीपल रेडियो इमेजिंग
उत्तर:
(स) मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग

RBSE Class 12 Biology Chapter 42 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कुल श्वेताणु गणना (T. L. C.) किसके द्वारा की जाती है ?
उत्तर:
श्वेताणुओं की गणना के लिए न्यूबॉर के हीमोसाइटोमीटर का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
ल्यूकोसाइटोसिस क्या है ?
उत्तर:
श्वेत रक्ताणुओं का सामान्य से अधिक होना Leucocytosis या श्वेताणु बहुलता कहलाता है।

प्रश्न 3.
ई.एस.आर. का मान किन रोगों में बढ़ जाता है?
उत्तर:
रक्त के रक्ताणुओं के अवसादन (Settle) होने की दर को रक्ताणु अवसादन दर (ESR) कहते हैं। तपेदिक, प्रदाह रोग, यूमेटॉइड, आथ्राईटिस, मल्टीपल माइलोमा, लसीकाभ तथा अर्बुद में ई.एस.आर. का मान बढ़ जाता है।

प्रश्न 4.
हृदय स्पंदन को रिकॉर्ड करने वाले यंत्र का नाम लिखिए।
उत्तर:
इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राफी (ECG) हृदय स्पंदन रिकॉर्ड करने वाला यंत्र है।

प्रश्न 5.
ई. ई. जी. शरीर के किस अंग के निदान से सम्बन्धित है?
उत्तर:
EEG द्वारा मस्तिष्क के विभिन्न भागों की विद्युतीय क्रिया का मापन कर रिकॉर्ड किया जाता है जो मस्तिष्क सम्बन्धी असामान्यताओं के निदान में सहायक है।

प्रश्न 6.
एम. आर. आई. में X-किरणों के स्थान पर किसका प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर:
MRI तकनीक नाभिकीय मैग्नेटिक रेजोनेन्स के सिद्धान्त पर कार्य करती है। इसमें प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र तथा रेडियो तरंगों के वातावरण में उत्पन्न H परमाणुओं के केन्द्रकों के विद्युत आवेश व लघु चुम्बकीय गुणों को उपयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 7.
सोनोग्राफी में किसके क्रिस्टल प्रयुक्त होते हैं?
उत्तर:
इसमें ट्रान्सड्यूसर नामक एक युक्ति में उपस्थित लैड जिर्कोनेट (Lead Zirconate) नामक पदार्थ के क्रिस्टल रखे जाते हैं।

प्रश्न 8.
आर. आई. ए. में सूचक का कार्य कौन करता है?
उत्तर:
इस विधि में रेडियो आइसोटोप पदार्थ का उपयोग सूचक के रूप में कार्य करता है।

RBSE Class 12 Biology Chapter 42 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ई. एस. आर. ज्ञात करने की वेस्टरग्रेन विधि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ESR ज्ञात करने की वेस्टरग्रेन नलिका को अनस्कन्दित रक्त के नमूने से शून्य के चिह्न तक भरते हैं तथा उसे ऊर्ध्वाधर (Vertical) रूप में उचित तरीके से ESR स्टैण्ड में लगा देते हैं।

एक घण्टे के बाद रक्ताणुओं के ऊपरी स्तर को पाठ्यांक ले लेते हैं। यह रक्ताणु अवसादन दर का मान होता है।
स्वस्थ व्यक्ति के रक्त का ESR का मान निम्न होता है-
पुरुष = 0 – 16 मि.मी. प्रति घण्टा
स्त्री = 0. -20 मि.मी. प्रति घण्टा
यदि ESR का मान सामान्य से अधिक होता है तो यह शरीर में किसी असामान्यता अर्थात् रोग का संकेत देता है।

प्रश्न 2.
विभेदक श्वेताणु गणना (D. L. C.) का चिकित्सकीय महत्व क्या है ?
उत्तर:
रक्त की इस जाँच में भिन्न-भिन्न प्रकार के श्वेताणुओं को प्रतिशत ज्ञात किया जाता है। यह रक्त परीक्षण कुल श्वेताणू गणना से भी अधिक उपयोगी है, क्योंकि विभिन्न रोगों में कुछ विशिष्ट प्रकार की श्वेताणुओं की संख्या बढ़ती तथा कम होती है। अत: यह रोग निदान में महत्वपूर्ण है।
विभेदक श्वेताणुओं की गणना का चिकित्सकीय महत्व निम्न है-

  • न्यूट्रोफिल की संख्या में वृद्धि होने पर प्रदाह तथा सामान्य मवाद उत्पन्न करने वाले रोग की जानकारी होती है।
  • अति संवेदनशीलता या एलर्जी रोग या परजीवी संक्रमण में ईओसिनोफिल्स की संख्या बढ़ जाती है।
  • चिकनपोक्स रोग में वेसोफिल्स की संख्या बढ़ जाती है।
  • काली खाँसी में लिम्फोसाइट्स की संख्या बढ़ जाती है।
  • मोनोसाइट्स की संख्या बढ़ने पर तपेदिक रोग का संकेत मिलता
  • T4 लिम्फोसाइट्स में अत्यधिक कमी होना एड्स रोग का संकेत है।

प्रश्न 3.
E.C.G के उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ई.सी.जी. में हृदय के विभिन्न कक्षों या भागों के संकुचन तथा शिथिलन के समय होने वाली विद्युतीय गतिविधियों के संकेत एक निश्चित पैटर्न की तरंगों के रूप में प्राप्त होते हैं। इन तरंगों को P.Q.R.S. एवं T तरंगें कहते हैं। प्रत्येक वर्ण (Letter) हृदय पेशियों में घटित एक विशिष्ट अवस्था का द्योतक है। इनके अध्ययन के द्वारा हृदय की असामान्यताओं के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ई.सी.जी. से हृदय धमनी सम्बन्धी रोग (Coronary Artery diseases) हृदयघनाग्रता (Coronary thrombosis) हृदयावस्थाशूल (पेरी कार्बाइटिस), हृदयपेशी रुग्णता, मध्य हृदयपेशी शूल (मायोकार्बाइटिस) इत्यादि रोगों का निदान किया जाता है।

प्रश्न 4.
सोनोग्राफी तकनीक का महत्व लिखिए।
उत्तर:
जब पराध्वनि को मनुष्य के शरीर के ऊतकों एवं अंगों पर डाला जाता है तो वे उनसे टकराकर वापस आ जाती हैं व प्रतिध्वनियों की एक श्रृंखला की तरह ट्रान्सड्यूसर द्वारा भी ग्रहण कर ली जाती हैं। यह ट्रान्सड्यूसर इनको विद्युत संकेतों में बदल देता है, जिनको एक मॉनीटर द्वारा पर्दे पर प्रदर्शित किया जाता है। यह एक द्विविमीय चित्रों के रूप में दिखाई देते हैं। इसे सोनोग्राफी तकनीकी कहते हैं। इससे किसी अंग, ऊतक की स्थिति, आकृति, आकार तथा गठन (Texture) का पता लगाया जा सकता है। इसके अनेक उपयोग हैं-

इससे गर्भस्थ शिशु की वृद्धि, असामान्यताओं, गुर्दे तथा पित्ताशय की पथरी, आंत्रीय अवरोध, गर्भाशय फैलोपिन नलिकाओं आदि की असामान्यताओं को पता लगाया जाता है। इसका उपयोग प्रमुख रूप से प्रसव एवं प्रसूति निदान किया जाता है।

प्रश्न 5.
ई.एस.आर. का रोग निदान में महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ESR का मान सामान्य से अधिक होता है तो यह शरीर में किसी असामान्यता अर्थात् रोग का संकेत देता है। कई प्रकार के जीर्ण रोग अवस्थाओं जैसे तपेदिक तथा प्रदाह क्रिया रोगों जैसे ट्यूमेटॉइड, आइटिस, मल्टीपल माइलोमा, अर्बुद, लसीकाभ अर्बुद आदि में ESR का मान बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त ESR का मान गर्भकाल, रक्ताल्पता तथा आयु बढ़ने के साथ भी बढ़ता है।

आजकल ऑटोमेटेड मिनी ESR विधि द्वारा जाँच की जाती है। जो शरीर के विभिन्न अंगों के कार्य तथा जैव रासायनिक व कार्यिकी अवस्था के बारे में निदान हेतु उपयोगी है।

प्रश्न 6.
एम.आर.आई. तकनीक सी.टी.स्कैन से अधिक श्रेष्ठ व निरापद क्यों है?
उत्तर:
चिकित्सा विज्ञान में इसका उपयोग रेमण्ड दैमेडियन द्वारा प्रारम्भ किया गया। यह C.T. Scan से भी अधिक श्रेष्ठ तथा निरापद परीक्षण तकनीक है जिसमें मरीज को किसी भी तरह की आयनकारी विकिरणों जैसे X-किरणों से उद्भासित नहीं किया जाता है। इस विधि से अंगों या ऊतकों के अत्यधिक स्पष्ट त्रिविमीय चित्र प्राप्त होते हैं। MRI तकनीक नाभिकीय मैग्नेटिक रेजोनेन्स के सिद्धान्त पर कार्य करती है। इसमें अत्यधिक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र तथा रेडियो तरंगों के वातावरण में उत्पन्न H परमाणुओं के केन्द्रकों के विद्युत आवेश व लघु चुम्बकीय गुणों को उपयोग में लाया जाता है।

शरीर में प्रोटोन्स के स्रोत के रूप में हाइड्रोजन परमाणुओं का उपयोग होता है जो कि जल के अणुओं में पाये जाते हैं। MRI परीक्षण में मरीज को लगभग दो मीटर चौड़े कक्ष में लिटा दिया जाता है। यद्यपि MRI एक महँगी परीक्षण तकनीक है किन्तु यह मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु की जाँच व अध्ययन के लिए अति उपयोगी है।

RBSE Class 12 Biology Chapter 42 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रक्त में हीमोग्लोबिन मापन का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन का मापन हीमोग्लोबिनोमेट्री कहलाता है। यह रक्ताणुओं (RBCs) में पाया जाने वाला एक श्वसन वर्णक है। रासायनिक रूप से यह एक क्रोमोप्रोटीन है जो ऑक्सीजन व CO2 के परिवहन में उपयोगी है। इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु हीमोग्लोबिन की समुचित मात्रा का होना आवश्यक है। यदि किसी कारणवश रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम हो जाये तो व्यक्ति की कार्य-क्षमता विपरीत रूप में प्रभावित होती है। सामान्य से कम हीमोग्लोबिन की मात्रा रक्ताल्पता रोग (Anaemia) का द्योतक है।

Haemoglobin का मापन Haemoglobino meter से किया जाता है। पारम्परिक विधि में साहली के हीमोग्लोबिनोमीटर का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उन्नत विधि में Photohaemoglobino meter या ऑटोऐनालाइजर (Autoanalyzer) का उपयोग किया जाता है।

साहली के हीमोग्लोबिनो मीटर में एक मापक नलिका (Graduated tube) होती है तथा एक स्टैण्ड में दो मानक मैचिंग नली लगी होती हैं। दोनों मानक नलियों के बीच में एक स्थान में मापक नलिका रखी जाती है। मापक नलिका में शून्य (2gm%) के चिह्न तक N/10 HCl भर लिया जाता है अब Haemoglobin पिपेट में 20 ml (0.02 ml) रक्त लेकर इसे मापक नलिका में रखे HCl में डाल दिया जाता है। रक्त को HCl के साथ अच्छी तरह मिलाने पर Haemoglobin गहरे भूरे रंग के हीमैटिन (Haematin) में बदल जाता है।

मापक नलिका को अब मैचिंग नलिकाओं (Comparison tubes) के बीच के स्थान में रखते हैं व उसमें बूंद-बूंद आसुत जल मिलाते हुए हिलाते हैं। जब आसुत जल के मिलाने पर मापक नलिका का रंग मानक रंग से मिल जाता है तब मापक नलिका का पाठ्यांक लेकर Haemoglobine की मात्रा ज्ञात कर लेते हैं। शरीर में रक्ताल्पता होने के कई कारण हो सकते हैं जिनमें दुर्घटना में अधिक रक्तस्राव होना, कुपोषण, फॉलिक अम्ल व विटामिन तथा लौह तत्व की कमी एवं आनुवंशिक रोग प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
ई. ई. जी. को सचित्र स्पष्ट करते हुए इसके उपयोग दीजिए।
उत्तर:
इलेक्ट्रोएनसिफेलोग्राफी तकनीक में मस्तिष्क के विभिन्न भागों की विद्युतीय क्रिया (Electrical Activity) का मापन कर उनको आवर्धित रूप में रिकॉर्ड किया जाता है। सैटन (Satton) ने 1875 में सर्वप्रथम उद्भासित मस्तिष्क में विद्युत सक्रियता की खोज की। सन् 1929 में हैंस बर्जर ने मस्तिष्क की यथास्थिति में भी सर्वप्रथम ऐसी विद्युतीय सक्रियता का रिकॉर्ड ट्रेस करने में सफलता प्राप्त की। मस्तिष्क की विद्युतीय सक्रियता में माइक्रोबोल्ट के स्तर की क्षणजीवी तरंगें प्राप्त होती हैं जिनको अधिक स्पष्ट व सुग्राही बनाने हेतु रिकॉर्ड करने से पूर्व उन्हें आवर्धित किया जाता है। इस प्रकार जो रिकॉर्ड प्राप्त होता है उसे इलेक्ट्रोएनसिफेलोग्राम कहते हैं।

इलेक्ट्रोएनसिफेलोग्राफी तकनीक दर्दरहित तथा किसी प्रकार के अवांछित पार्श्व प्रभावों से मुक्त है। इसमें 16-30 छोटे-छोटे इलेक्ट्रोडों को शिरोवल्क (Scalp) के विभिन्न भागों पर लगाया जाता है। ये सभी इलेक्ट्रोड मुख्य यंत्र से जुड़े होते हैं। इलेक्ट्रोड मस्तिष्क के विभिन्न भागों के विद्युतीय संकेतों को मुख्य यंत्र तक पहुँचाते हैं, जहाँ उनको रिकॉर्ड किया जाता है। इस कार्य में लगभग 45 मिनट का समय लगता है। आजकल विकसित तकनीक के यंत्रों द्वारा मस्तिष्क के क्षीण चुम्बकीय क्षेत्रों का भी अध्ययन सम्भव है। इस युक्ति को सुपर कन्डक्टिंग क्वान्टम इन्टरफेरेंस डिवाइस कहा जाता है।
RBSE Solutions for Class 12 Biology Chapter 42 जैव चिकित्सा तकनीकें 1
मस्तिष्क के साथ-साथ मेरुरज्जु से सम्बन्धित असामान्यताओं का निदान मैग्नेटोएनसिफेलीग्राफी द्वारा किया जा सकता है। EEG का प्रारूप मरीज के मस्तिष्क की स्थिति व चेतना का परिचित्रण करता है तथा मस्तिष्क सम्बन्धी कई असामान्यताओं के निदान में सहायक है। इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं-
उपयोग-

  • EEG मस्तिष्क की संरचनात्मक असामान्यता से सम्बन्धित रोगों जैसे-मस्तिष्क के अर्बुद, मिर्गी रोग, एनसिफेलाइटिस आदि के निदान में सहायक है।
  • इसके द्वारा मस्तिष्क में संक्रमण, चयापचयी पदार्थों तथा औषधियों का मस्तिष्क पर प्रभाव, निद्रा सम्बन्धी गड़बड़ियों आदि के निदान में सहायता मिलती है।
  • EEG मस्तिष्क मृत्यु (Brain death) के निर्धारण में उपयोगी है।

प्रश्न 3.
एम.आर.आई पर निबंधात्मक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
Magnetic Resonance Imaging (MRI) तकनीक की खोज का श्रेय फेलिक्स ब्लॉक एवं एडवर्ड एम. परसेल को जाता है, जिन्हें इसके लिए 1952 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

चिकित्सा विज्ञान में इसका उपयोग रेमण्ड दैमेडियन द्वारा प्रारम्भ किया गया। यह C.T. Scan से भी अधिक श्रेष्ठ तथा निरापद परीक्षण तकनीक है, जिसमें मरीज को किसी भी तरह के आयनकारी विकिरणों जैसे Xकिरणों से उद्भासित नहीं किया जाता है। इस विधि से अंगों या ऊतकों के अत्यधिक स्पष्ट त्रिविमीय चित्र प्राप्त होते हैं। MRI तकनीक नाभिकीय मैग्नेटिक रेजोनेन्स के सिद्धान्त पर कार्य करती है। इसमें अत्यधिक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र तथा रेडियो तरंगों के वातावरण में उत्पन्न हाइड्रोजन परमाणुओं के केन्द्रकों के विद्युत आवेश व लघु चुम्बकीय गुणों को उपयोग में लाया जाती है। शरीर में प्रोटीन्स के स्रोत के रूप में H परमाणु का उपयोग होता है जो कि जल के अणुओं में पाये जाते हैं।

एम.आर.आई. परीक्षण में मरीज को लगभग दो मीटर चौड़े कक्ष में लिटा दिया जाता है। यह कक्ष एक विशाल एवं बेलनाकार विद्युत चुम्बकों से घिरा रहता है जो कि अल्प समयावधि में शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र तथा तरंगें उत्पन्न करता है। इस चुम्बकीय प्रभाव के कारण मरीज के ऊतकों के H केन्द्रक (प्रोटीन्स) सक्रिय होकर रेडियो संकेत उत्पन्न करते हैं। इन संकेतों को Computer द्वारा ग्रहण कर विश्लेषित किया जाता है व इनसे मरीज के शरीर की एक पतली काट के समान चित्र प्राप्त किये जाते हैं। MRI से प्राप्त चित्र C.T. Scan की तुलना में अधिक उत्कृष्ट तथा स्पष्ट विभेदन (Contrast) दर्शाने वाले होते हैं। इससे किसी भी तल में चित्र प्राप्त किये जाने संभव हैं। यद्यपि M.R.I. एक महँगी परीक्षण तकनीक है किन्तु यह मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु की जाँच व अध्ययन के लिए अति उपयोगी है।

इससे श्वेत द्रव्य तथा धूसर द्रव्य में भी स्पष्ट विभेदन किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
आर.आई.ए. क्या है? इसकी कार्यप्रणाली व उपयोगों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रेडियो प्रतिरक्षी आमापन (Radio Immuno Assay RIA)-RIA एक विश्लेषणात्मक विधि है, जिसका प्रयोग बहुत पहले से किया जाता रहा है। इस विधि में विश्लेषित किये जाने वाले पदार्थ के कुछ अंशों को रेडियोधर्मी पदार्थ से चिह्नित कर दिया जाता है तथा सामान्य एवं चिन्हित ऐन्टीजन अणुओं की ऐन्टीबॉडीज (प्रतिरक्षियों) के साथ क्रिया का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इस विधि में रेडियो आइसोटोप पदार्थ का उपयोग सूचक के रूप में होता है, उसे RIA कहते हैं।

रोसेलिन व येलो (Rosalyn and yalow) द्वारा खोजी गई यह विधि चिकित्सा विज्ञान में एक महत्वपूर्ण निदानात्मक तकनीक है। यह विशेषकर ऐसे जैव रासायनिक घटकों के विश्लेषण में उपयोगी है जो शरीर में अति सूक्ष्म मात्रा में विद्यमान होते हैं व उनका विश्लेषण पारम्परिक भारमितीय एवं आयतनी विधियों द्वारा संभव नहीं है। रेडियो इम्यूनी ऐसे में प्रयुक्त रेडियो आइसोटोप उच्च विशिष्टता युक्त पदार्थ होते हैं। जिसके फलस्वरूप यह तकनीक उच्च सुग्राहिता (Sensitivity) प्रदर्शित करती है

RIA की कार्य-प्रणाली-इस विधि में विश्लेषण किये जाने वाले पदार्थ के सामान्य अणुओं की भिन्न-भिन्न सान्द्रताओं के मानक विलयनों को समान सान्द्रताओं वाले चिह्नित पदार्थ युक्त विलयनों के साथ प्रयोग करते हैं तथा प्रतिरक्षियों के साथ क्रिया कराते हैं। साम्यावस्था प्राप्त होने पर प्रतिजन प्रतिरक्षी सम्मिश्र (Antigen antibody complex) को उपयुक्त अभिकर्मकों द्वारा अवशोषित कर लेते हैं। अवक्षेपित तथा प्लावी भागों को पृथक कर उनकी रेडियोधर्मिता के मापन के द्वारा पदार्थ की सभी मात्रा को ज्ञात कर लिया जाता है।

रेडियो प्रतिरक्षी विश्लेषण की एक प्रमुख विशेषता यह है कि मरीज को किसी प्रकार के हानिकारक प्रभाव की आशंका नहीं होती तथा मरीज को रेडियोआइसोटोप पदार्थ से उपचारित करने की भी आवश्यकता नहीं होती क्योंकि समस्त क्रिया शरीर के बाहर सम्पन्न होती है।

RIA की उपयोगिता-RIA के निम्न उपयोग हैं-

1. इस विधि के द्वारा महत्वपूर्ण जैविक घटकों जैसे विटामिन (B12 फोलिक ऐसिड), हॉर्मोन्स (थायरोक्सिन, ट्राइआसोडोथाइरोनिल T3, कॉर्टिसोल, टेस्टोस्टेरोन, ऐस्ट्रोजन्स, ट्रॉपिक हॉर्मोन्स आदि) औषधियाँ (डिजॉक्सिन, डिजीटोक्सिन आदि) तथा ऐन्टीजन पदार्थ जैसे ऑस्ट्रेलिया ऐन्टीजन की मात्रा ज्ञात कर सकते हैं।

2. अन्त: स्रावी तंत्र के विकारों के निदान में रेडियो इम्यूनो अत्यन्त महत्वपूर्ण तकनीक सिद्ध हुई है। उदाहरणार्थ, किसी विशिष्ट हॉर्मोन की रक्त में अधिकता उसको स्रावित करने वाली अन्त:स्रावी ग्रन्थि की अति सक्रियता का परिणाम है अथवा यह ट्रॉपिक हॉर्मोन के प्रभाव के कारण है। ऐसी समस्याओं का समाधान इस तकनीक द्वारा संभव है।

3. इस विधि द्वारा इन्सुलिनोमा, लैंगिक हॉर्मोन, सुग्राही अर्बुद इत्यादि का निदान संभव है, जिससे उनके उचित इलाज में सहायता मिलती है।

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