अफीम की खेती

अफीम (पेपवर सोमनिफेरम एल.) एक महत्वपूर्ण व्यापारिक औषधीय फसल है। भारत में इसकी खेती अफीम एवं बीजों के लिए की जाती है। अफीम पोस्त के डोडों से प्राप्त की जाती है। यह एक औषधीय पौधा है। अफीम सफेद रंग के सूक्ष्म गोल, मधुर और स्निग्ध दाने बीज के रूप में

होते हैं जिसे हम आमतौर पर खसखस के नाम से ___ जानते हैं। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र गंध होती

है, जो स्वाद में तीखी होती है।

उन्नत किस्में: अब तक किसान की स्थानीय प्रजातियाँ जैसे काली डाण्डी, सफेद डाण्डी. सय पंखी, रणजटक, तेलिया, धोलिया इत्यादि का प्रयोग करते आ रहे हैं जिनकी उत्पादन क्षमता कम है व रोगों के प्रतिरोधक क्षमता भी कम पायी जाती है। भारत में कृषि अनुसंधानों से नवीनतम किस्मों का विकास किया गया है जिनका विवरण इस प्रकार है। तेलिया, रनजटक, धोला चोटा गोटिया, एम.ओ.पी.-3, एम.ओ.पी.-16 (जवाहर अफीम-16), शामा, श्वेता, कीर्तिमान (एन.ओ.पी.-4), चेतक (यू. ओ.-285), तृष्णा (आई.सी.-42) एवं जवाहर अफीम-540 (जे.ओ.पी.-540) बीज दर: एक हेक्टर क्षेत्र में 5-6 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिड़काव विधि के लिये बीजों को इसकी बीज दर से आठ से दस गुना बारीक छनी हुई मिट्टी की आवश्यकता होती है।

उपयोगिता एवं महत्वः यह एक औषधीय पौधा है अफीम का प्रयोग विभिन्न प्रकार की दवाइयों को बनाने में किया जाता है। यह एक मादक पदार्थ है इसका प्रयोग नशे के लिए भी किया जाता है जो काफी हानिकारक है। इसमें चीरा लगाने से एक गाढ़ा दूध निकलता है उसे इक्कठा करके सुखा लिया जाता है। यही व्यावसायिक या औषधि अफीम है। सूखने के बाद अफीम गम का प्रयोग कई प्रकार की दवाईयों में किया जाता है। अफीम का दूध जो कि इसके संपुट (डोडों) से चीरा लगाकर प्राप्त किया जाता है। अफीम के दूध में 40 प्रकार के एल्केलाइड्स पाये जाते हैं। इसलिये इनका उपयोग रोगियों को नींद के लिये,चित्त को स्थाई करने, दर्द को कम करने हेतु तथा कैंसर व सिर में चोट से उत्पन्न दर्द को ठीक करने में प्रयोग किया जाता है। अफीम का दध जो कि इसके संपुट (डोडों) से चीरा लगाकर प्राप्त किया जाता है। अफीम में औषधीय उपयोग हेतु एल्केलाइड्स की मात्रा पायी जाती है इनमें मुख्यतः मॉफिन (7-17 प्रतिशत), कोडिन (2.1-4.4 प्रतिशत) थिबेन (1.0–3.0 प्रतिशत) नारकोटिन (3. 0-10.0 प्रतिशत) व पेपवरिन (0.5-3.0 प्रतिशत) है। इस एल्केलाइड्स का प्रयोग दर्द निवारक व विभिन्न प्रकार की दवाइयों के निर्माण में होता है तथा शेष प्रजातियां बगीचों में सजावटी पौधों के रूप में उगाई जाती है। अफीम के दानों में लगभग 42-52 प्रतिशत तेल पाया जाता है, जिनमें लिनोलिक अम्ल की मात्रा बहुत अधिक 68 प्रतिशत तक होती है। अतः यह मनष्यों के खन में कोलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करता है। विश्व में औषधीय प्रयोग के लिये इसकी खेती भारत, पूर्व सोवियत संघ, मिश्र, युगोस्लाविया. चेकास्लोवाकिया. पोलेण्ड, जर्मनी, नीदरलैण्ड, चीन, जापान, अर्जेन्टीना, स्पेन, बुल्गारिया, हंगरी एवं पुर्तगाल में होती है। अफीम की खेती भारत में राजस्थान के झालावाड़, बारां, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, मध्यप्रदेश के नीमच, मन्दसौर रतलाम क्षेत्र तथा उत्तरप्रदेश के फैजाबाद, बाराबंकी, बरेली, शाहजहाँपुर क्षेत्र में दाने तथा अफीम दूध के उत्पादन के लिये भारत सरकार के अधीन केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो द्वारा जारी पट्टे के आधार पर की जाती है।

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जलवायु: अफीम समशीतोष्ण जलवायु की फसल है परन्तु अर्द्धउष्ण जलवायु क्षेत्रों में शरद ऋतु में उगाई जाने वाली फसल है। हल्की वर्षा एवं कोहरे वाली रातों के मौसम में इसके पौधे की बढ़वार अच्छी होती है। पुष्पावस्था में वर्षा होने की स्थिति में बढ़ोतरी कम होने के साथ ही अफीम का उत्पादन घट जाता है तथा गुणवत्ता में भी कमी हो जाती है। अफीम के पौधों में संपुटों (डोडों) पर चीरा लगाते समय यदि तेज व गर्म हवा चले तो पौधे सूख जाते हैं तथा अफीम का स्त्राव कम हो जाता है। चीरा लगाते समय वर्षा हो जाये तो उत्पादन पर भी विपरीत असर पड़ता है।

भूमिः अफीम की खेती विभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है, जैसे कि मालवा क्षेत्र के कपास वाली काली मिट्टी से लेकर उत्तरी भारत की बलुई मिट्टी तक तथा चिकनी व चिकनी दोमट मिट्टी अफीम की खेती के लिये उपयुक्त है। मृदा की उर्वरा शक्ति व संरचना अच्छी होनी चाहिये। इसके लिये जीवाश्म की मात्रा अति आवश्यक है तथा भूमि गहरी होनी चाहिये, जिससे पौधों की जड़ों का विकास अच्छा हो सके।

बुवाई का समयः अफीम की खेती रबी में अक्टूबर-नवम्बर से फरवरी-मार्च माह के मध्य में की जाती है। अतः अफीम की अधिक पैदावार लेने के लिये बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक होता है। इसकी बुवाई देरी से करने पर पौधों की बढ़वार कम होती है तथा फरवरी के अंत में तापमान में वृद्धि के कारण डोडे छोटे रह जाते है जिससे अफीम का स्त्राव कम होता है एवं उत्पादन __ में भारी कमी आ जाती है। अतः अच्छे अंकुरण के लिये बुवाई के समय तापमान 20 से 25 डीग्री सेन्टीग्रेड के मध्य होना चाहिये।

खेत की तैयारी: ध्यान रहे कि मिट्टी अच्छी तरह से – भूरभरी व ढेला रहित होनी चाहिये। भूमि को

भूरभूरी बनाने के लिये हर जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिये जिससे भूमि में नमी सूरक्षित रहती है। खेत की मिट्टी को अच्छी तरह भूरभूरा होने तक जुताई करते रहना चाहिये।

बीजोपचारः इस फसल को मृदुरोमिल आसित (कोडियाँ) रोग एवं काली मस्सी का प्रकोप पौधों की छोटी अवस्था यानि की फसल उगने से ही शुरू हो जाता है। अतः इससे बचाव के लिये बीजों को फफूंदनाशक दवा एप्रोन 35 एस.डी. 8-10 ग्राम/कि.ग्रा. बीज या मेन्कोजेब 4 ग्राम/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके ही बुवाई करना चाहिये।

बुवाई की विधिः अफीम की बुवाई दो प्रकार से यानिकी छिड़काव विधि से या कतारों में की जाती है। किन्तु कतारों में बुवाई करना ज्यादा उपयुक्त रहता है क्योंकि इस विधि से निराई-गुड़ाई अफीम में चीरा लगाना एवं अफीम लूने व कटाई करने में आसानी रहती है। इसमें बीजों का अंकुरण 8 से 10 दिनों में पूर्ण हो जाता है। कतारों में बुवाई के लिए पंक्ति की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सें.मी. होनी चाहिये। एक हेक्टर क्षेत्र के लिये अफीम में पौधों की संख्या लगभग 3.33 लाख होनी चाहिये। अंकुरण के 30-35 दिन पश्चात फालतू तथा घने पौधों को निकालकर पौधे से पौधे की दरी 10 से.मी. कर देनी चाहिये। छिटकवां विधि में बीज को समतल क्यारियों में समान रूप से हाथ से बिखेर कर रेक द्वारा मिट्टी में मिला देना चाहिये। इसके बीज बहुत छोटे होते हैं, इसलिये बीजों पर अधिक मिट्टी नहीं आनी चाहिये वरना अंकुरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। एक जैसी बुवाई के लिये बीज के साथ आठ से दस गुना सूखी मिट्टी तथा रेत मिला देना चाहिये।

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समन्वित खाद एवं उर्वरक अफीम की फसल के लिये 10 से 15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद तथा 120 किलोग्राम नत्रजन व 40-50 किलोग्राम फॉस्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश तत्व की एक हेक्टर क्षेत्र में आवश्यकता रहती है। जिस भूमि में पोटेशियम तत्व की कमी हो वहां भूमि परीक्षण के आधार पर पोटेशियम उर्वरक का प्रयोग करें। अधिक मात्रा में नत्रजन देने से पौधे का तना फटने लग जाता है तथा अफीम की गुणवत्ता में कमी हो जाती है। गोबर की खाद अंतिम जुताई से पहले खेत में समान रूप से बिखेर दें। नत्रजन की एक चौथाई तथा फॉस्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई से पहले नालियों में एक साथ उर कर देना चाहिये। नत्रजन की शेष मात्रा दो भागों में विभक्त कर क्रमशः आधी मात्रा बुवाई के 40-50 दिन पश्चात् तथा बची हुई एक चौथाई मात्रा फूल की डोडियाँ निकलते समय देनी चाहिये। सिंचाई प्रबन्धनः अफीम की बढ़ोतरी के समय खेत में उचित नमी का होना अतिआवश्यक है। पौधों की बढ़वार एवं पुष्पावस्था पर खेत में नमी की कमी होने पर अफीम उत्पादन एवं मॉर्फिन की मात्रा पर विपरीत असर पड़ता है। अफीम की फसल में भारी मृदाओं में 8-10 एवं हल्की मृदाओं में 10-12 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। प्रथम सिंचाई बुवाई के तुरन्त बाद धीमी गति से करें ताकि बीजों के ऊपर अधिक मिट्टी नहीं ढक पाए अन्यथा बीज गहरा होने पर अंकुरित नहीं होता है। दूसरी सिंचाई पहली सिंचाई के 4-5 दिन बाद हल्की एवं धीमी गति से करनी चाहिये। दसरी सिंचाई के बाद आवश्यकतानसार 10-12 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिये। अंतिम सिंचाई डोडों पर चीरा लगाने से पूर्व करनी चाहिये। अगर जमीन भारी है तो साधारणतया चीरा प्रारम्भ होने के बाद सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। लेकिन हल्की जमीन में आवश्यकतानुसार दो चीरे के बाद एक हल्की सिंचाई करें। चीरा लगाना समाप्त करने के पश्चात् भी एक हल्की सिंचाई करनी चाहिये जिससे बीज उत्पादन में बढ़ोतरी होती है बीज का आकार बड़ा बनता है।

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निराई – गुड़ाई एवं खरपतवार प्रबन्धनः निराई – गुड़ाई के समय पौधों की छंटाई करके कतारों में पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी कर देनी चाहिये। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिये बीजाई के पश्चात् अर्थात् अंकुरण से पूर्व अर्थात बुवाई के तीसरे-चौथे दिन आइसोप्रोट्यूरोन 0.125 किग्रा. सक्रिय तत्व या क्लोरटोलरोन 1.5 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व का 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें एवं छिड़काव के समय मिट्टी में नमी होना आवश्यक है। पाले से बचावः अफीम की फसल को पाले से बहुत नुकसान होता है। अतः पाला पड़ने की संभावना हो तो तुरन्त सिंचाई करें। चीरा लगाना एवं अफीम लूना/इकट्ठा करनाः अफीम के पौधे के संपुट (डोडे) के बाहरी सतह पर चीरा लगाकर अफीम इकट्ठी की जाती है। डोडों में 70 प्रतिशत तक मॉर्फिन व अन्य एल्केलाइड्स पाये जाते है। फूलों की पंखुड़ियों गिरने के 15 दिन बाद पके हुए हरे डोडे पर चीरा लगाया जाता है। चीरा लगाने का कार्य दोपहर बाद (3 बजे बाद) तथा डोडों पर चीरा लगाने के लिये 3-4 नोक नश्तर का प्रयोग किया जाता है। चीरा लगाते समय यह ध्यान रखते हैं कि चीरे की गहराई 0.5 से 1.00 मिमी. रहे। अफीम के प्रत्येक डोडे पर सामान्यतया 3-5 चीरे लगाये जाते है तथा दसरा चीरा एक दिन छोड़कर अर्थात् प्रथम चीरे लगाने का कार्य बंद रखना चाहिये। चीरा लगाने के दूसरे दिन अफीम डोडे से सुबह जल्दी खुरज कर इकट्ठा की जाती है। सुबह जल्दी हवा में अधिक आद्रता एवं कम तापमान में वृद्धि व आर्द्रता कम होने पर अफीम का दूध सूखकर डोडो पर चिपक जाता है जिससे अफीम लूने में कठिनाई रहती है। प्रत्येक डोडे से प्रथम चीरे में अधिक अफीम का स्त्राव होता है। उसके बाद धीरे-धीरे चीरे बढ़ने पर स्त्राव कम होता जाता है। डोडों से अफीम इकट्ठा कर लेने के बाद डोडों को पौधों पर 15-20 दिन तक सूखने दिया जाता है। उपजः अफीम की खेती से औसतन 60-65 किग्रा. अफीम (70 प्रतिशत घनता या गाढापन) प्रति हेक्टर तक प्राप्त की जा सकती है साथ ही 9-12 क्विंटल बीज एवं 9-10 क्विंटल डोडा पोस्त प्रति हेक्टर तक प्राप्त किया जा सकता है।विपणनः अफीम दूध का मूल्य केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो द्वारा मॉर्फिन की मात्रा के आधार पर तय किया जाता है जो कि 1700 से 2900 रू. प्रति किग्रा. तक है। अफीम पोस्त दाना स्थानीय बाजार में 400 से 500 रू. प्रति किग्रा. तक बेचा जाता है। अफीम के डोडों का मूल्य आबकारी विभाग द्वारा जारी लाइसेंस द्वारा लाइसेंस धारी ठेकेदार ही खरीद सकते हैं जो कि पूर्व में 125 रू. प्रति कि.ग्रा. तक थी। लेकिन वर्ष 2016 में अफीम के डोडों का खरीद के लाइसेंस खत्म कर दिये गये तथा केन्द्रीय नारकोटिक्स ब्यरो या आबकारी विभाग द्वारा गठित कमेटी से किसानों के यहां अफीम के डोडों को जला कर नष्ट कर दिया जाता है।

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