श्रीनिवास रामानुजन् जीवनी – Biography of Srinivasa Ramanujan in Hindi Jivani

श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर एक महान भारतीय गणितज्ञ थे. उन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है. उन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी उन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिये. उन्होंने गणित के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे जो आज भी उपयोग किये जाते है. उनके प्रयोगों को उस समय जल्द ही भारतीय गणितज्ञो ने मान्यता दे दी थी. जब उनका हुनर ज्यादातर गणितज्ञो के समुदाय को दिखाई देने लगा, तब उन्होंने इंग्लिश गणितज्ञ जी.एच्. हार्डी से भागीदारी कर ली. उन्होंने पुराने प्रचलित थ्योरम की पुनः खोज की ताकि उसमे कुछ बदलाव करके नया थ्योरम बना सके.

आरम्भिक जीवन :

        11 वर्ष की आयु से ही श्रीनिवास रामानुजन अपने ही घर पर किराये से रह रहे दो विद्यार्थियो से गणित का अभ्यास करना शुरू कीया था. बाद में उन्होंने एस.एल. लोनी द्वारा लिखित एडवांस ट्रिग्नोमेट्री का अभ्यास कीया. 13 साल की अल्पायु में ही वे उस किताब के मास्टर बन चुके थे और उन्होंने खुद कई सारे थ्योरम की खोज की. 14 वर्ष की आयु में उन्हें अपने योगदान के लिये मेरिट सर्टिफिकेट भी दिया गया और साथ ही अपनी स्कूल शिक्षा पुरी करने के लिए कई सारे अकादमिक पुरस्कार भी दिए गए और सांभर तंत्र की स्कूल में उन्हें 1200 विद्यार्थी और 35 शिक्षको के साथ प्रवेश दिया गया.

        ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

        एक बार जब वह तीसरी कक्षा के विद्यार्थी थे तब उसके अध्यापक उसे बता रहे थे कि किसी भी नम्बर को उसी नम्बर से भाग दिया जाए तो एक मिलेगा। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया, कि यदि तीन आम को तीन लोगों में बाँटा जाए तो प्रत्येक को एक आम मिलेगा। इस पर रामानुजन ने उससे पूछा, ‘क्या शून्य को शून्य से भाग देने पर भी एक मिलेगा? यदि शून्य आम, शून्य लोगों को बांटे जांय तो क्या प्रत्येक को एक आम मिलेगा?’

        सच तो यह है कि वह प्रति भूत निर्धारित (Indeterminate) के बारे में बात कर रहे थे जो कि इण्टर की कक्षा में पढ़ाया जाने वाला विषय था। रामानुजन उच्च शिक्षा से वंचित रह गये थे। इसलिए उन्होंने बहुत से गणित के प्रमेय स्वयं सिद्ध किये जो कि बहुत पहले सिद्ध किये जा चुके थे।

        कुछ व्यक्तिगत कारणों और धन की कमी के कारण रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के कैंब्रिज के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। प्रोफेसर हार्डी को इससे निराशा हुई लेकिन उन्होनें किसी भी तरह से रामानुजन को वहां बुलाने का निश्चय किया। इसी समय रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय में शोध वृत्ति मिल गई थी जिससे उनका जीवन कुछ सरल हो गया और उनको शोधकार्य के लिए पूरा समय भी मिलने लगा था।

        इसी बीच एक लंबे पत्रव्यवहार के बाद धीरे-धीरे प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए सहमत कर लिया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। रामानुजन ने इंग्लैण्ड जाने के पहले गणित के करीब 3000 से भी अधिक नये सूत्रों को अपनी नोटबुक में लिखा था।

        बचपन में उनके जीवन की एक घटना है जिससे पता चलता है कि उन्होंने गणित में बचपन से ही रूचि दिखाना शुरू कर दिया था | एक दिन जब वो तीसरी कक्षा में थे तब कक्षा में शिक्षक ने ब्लेकबोर्ड पर तीन आम के चित्र अंकित किये और सभी छात्रों से प्रश्न किया कि यदि हमारे पास तीन आम हो और तीन छात्र हो ,तो प्रत्येक छात्र के हिस्से में कितने आम आयेंगे ? आगे की पंक्तियों में बैठे छात्रों ने उसी समय उत्तर दिया कि प्रत्येक छात्र को एक एक आम मिलेगा | इसके बाद शिक्षक के भाग सिखाने पर जोर दिया तभी बालक श्रीनिवास रामानुजन ने प्रश्न किया कि “सर यदि कोई भी आम किसी को ना बांटा जाए तो क्या तब भी प्रत्येक छात्र को एक आम मिल सकेगा ?”

संघर्षमय जीवन :

        जब रामानुजन का पढाई से पूरी तरह नाता टूट जाने के बाद आने वाले पाच साल इनके जीवन के लिए बहुत ही संघर्षमय था इस समय हमारा देश भारत अंग्रेजो के अधीनता में था चारो तरफ परतंत्रता की बेडियो में जकड़े भारत में कही भी न रोजगार के अवसर थे और न ही लोगो के जीवन जीने के लिए कोई उद्देश्य था हर कोई बस अपने देश भारत को आजाद देखना चाहता था ऐसे में रामानुजन के पास भी न कोई नौकरी थी और न ही नौकरी पाने के लिए कोई बड़ी डिग्री जिसकी चिंता से रामानुजन का स्वास्थ्य दिन पर दिन बिगड़ता जा रहा था जिसके चलते डाक्टरों ने इन्हें घर जाकर आराम करने का सलाह दिए ऐसे में रामानुजन का गणित के प्रति प्रेम ही उन्हें अपने जीवन में आगे बढने की प्रेरणा दिया।

        इसके बाद नौकरी की तलाश में कही जाते अपने साथ अपने गणित के सारे किये हुए कार्य जो की रजिस्टर में होते थे दिखाते थे और फिर नौकरी की तलाश में इनकी मुलाकात डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर से हुआ जो की वे भी गणित के बहुत ही बड़े विद्वान् थे जो की रामानुजन की प्रतिभा को पहचान गये और फिर रामास्वामी अय्यर ने रामानुजन के लिए 25 रूपये की मासिक तनख्वाह के रूप में इन्हें छात्रवृत्ति की व्यवस्था किया जहा पर रामानुजन ने अपने प्रथम शोधपत्र  “बरनौली संख्याओं के कुछ गुण”  शोध पत्र जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ था और फिर सौभाग्य से एक साल पूरा होते ही रामानुजन को मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में इन्हें लेखाबही के हिसाब रखने के लिए क्लर्क की नौकरी मिल गयी और फिर से रामानुजन अपने गणित के प्रति प्रेम के लिए समय मिलने लगा और फिर इस प्रकार रामानुजन ने अनेक नये नये गणित के सूत्रों को लिखना प्रारम्भ शुरू किया

प्रोफेसर हार्डी के साथ पत्रव्यावहार और विदेश गमन :

        रामानुजन का शोध धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था पर अब स्थिति ऐसी थी कि बिना किसी अंग्रेज गणितज्ञ की सहायता के शोध कार्य को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। रामानुजन ने कुछ शुभचिंतकों और मित्रों की सहायता से अपने कार्यों को लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञों के पास भेजा पर इससे कुछ विशेष सहायता नहीं मिली। इसके बाद जब रामानुजन ने अपने संख्या सिद्धांत के कुछ सूत्र प्रोफेसर शेषू अय्यर को दिखाए तो उन्होंने उनको समय के प्रसिद्ध गणितग्य प्रोफेसर हार्डी के पास भेजने का सुझाव दिया।

        सन् 1913 में रामानुजन ने हार्डी को पत्र लिखा और स्वयं के द्वारा खोजी प्रमेयों की एक लम्बी सूची भी भेजी। पहले प्रो हार्डी को भी पूरा समझ में नहीं आया फिर उन्होंने अपने शिष्यों और कुछ गणितज्ञों से सलाह ली तो वे इस नतीजे पर पहुंचे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में एक दुर्लभ व्यक्तित्व है। एक दिन उनके कार्यालय के अधिकारी ने उन्हें देख लिया. पूछताछ करने पर पता चला की रामानुजन गणित के कुछ सूत्र लिख रहे है. उनकी मेज की दराज खोलने पर ऐसे तमाम पन्ने मिले जो गणित के सूत्रों से भरे पड़े थे।

        अधिकारी ने उन सूत्रों को पढ़कर स्वयं को धिक्कारा ” क्या यह प्रतिभाशाली युवक क्लर्क की कुर्सी पर बैठने लायक है” ? उसने रामानुजन के उन पन्नो को इंग्लैंड के महान गणितज्ञ प्रोफ़ेसर जी. एच. हार्डी के पास भेज दिया. प्रो. हार्डी उन पन्नो को देखकर अत्यंत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे की रामानुजन जैसी प्रतिभा को अँधेरे से बाहर निकालना ही चाहिए. उन्होंने प्रयास करके रामानुजन को इंग्लैंड बुलाया और बड़े-बड़े गणितज्ञो से उनका परिचय कराया।

मृत्यु :

        रामानुजन की गणितीय प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन के लगभग 90 वर्ष व्यतीत होने जाने के बाद भी उनकी बहुत सी प्रमेय अनसुलझी बनी हुई हैं। उनकी इस विलक्षण प्रतिभा के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए भारत सरकार ने उनकी 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में वर्ष 2012 को ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ के रूप में मनाने का निष्चय किया। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष उनका जन्म दिवस (22 दिसम्बर) ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में भी मनाया जाएगा।

        एक तो रामानुजन का दुबला-पतला शरीर, दूसरे London का बेहद ठण्डा मौसम, उस पर खानपान की उचित व्यवस्था का अभाव। ऐसे में रामानुजन को T.B. ने घेर लिया। उस समय तक T.B. का कारगर इलाज उपलब्ध नहीं था। सिर्फ आराम और समुचित डॉक्टरी देखरेख ही उन्हें बचा सकती थी। लेकिन रामानुजन की गणित की दीवानगी ने उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया।

        भारत लौटने पर भी इनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ और उनकी हालत गंभीर होती जा रही थी। धीरे-धीरे डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। उनका अंतिम समय नजदीक आ गया था। अपनी बीमारी से लड़ते-लड़ते अंततः 26 अप्रैल 1920 को उन्होने प्राण त्याग दिए। मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 33 वर्ष थी। इस महान गणितग्य का निधन गणित जगत के लिए अपूरणीय क्षति था।

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