(Digestive System in Hindi) पाचन तंत्र

भोजन में उपस्थित जटिल पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेड, वसा, व प्रोटीन) को तोड़कर शरीर के लिए उपयोगी बनाने की क्रिया पाचन कहलाती है। digestive system in hindi

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आहारनाल

  • मनुष्य की आहारनाल एक लम्बी कुंडलित नलिका होती है जो मुख ले शुरू होकर गुदा में समाप्त होती है।
  • आहारनाल के मुख्य भाग – मुखगुहा, ग्रासनली, आमाशय, आँत

मुखगुहा

  • मुखगुहा आहारनाल का सबसे पहला भाग है।
  • मुखगुहा ऊपरी तथा निचले जबड़े से घिरी रहती है।
  • मुखगुहा को बंद करने के लिए होंठ होते हैं।
  • मुखगुहा में जीभ तथा दाँत होते हैं।

जीभ

  • इसका अगला सिरा स्वतंत्र तथा पिछला सिरा निचले जबड़े की सतह से जुड़ा रहता है।
  • स्वाद के ज्ञान के लिए इसमें स्वाद कलिकाएँ उपस्थित होती हैं।
  • जीभ के अग्रभाग में मीठे का, पश्च भाग में कड़वे का तथा बगल में खट्टे का आभास होता है।
  • जीभ अपनी गति से भोजन को निगलने में मदद करती है।

दाँत

  • मुखगुहा के ऊपरी तथा निचले जबड़ों में दाँतों की एक-एक पंक्ति पाई जाती है।
  • मनुष्य द्विवारदंती होती हैं अर्थात उनके जीवनकाल में दो बार दाँत निकलते हैं।
  • मनुष्य के एक जबड़े में 16 तथा कुल 32 दाँत पाए जाते हैं।
  • जबड़े के प्रत्येक ओर दो कृन्तक, एक रदनक, दो अग्रचवर्णक, तीन चवर्णक दाँत पाए जाते हैं।
  • शैशवास्था में मनुष्य के दाँतों की संख्या 20 होती है। ये अस्थायी होते हैं तथा उम्र के साथ गिर जाते हैं।
  • वयस्क अवस्था में निकलने वाले दाँत स्थायी होते हैं।
कृन्तक सबसे आगे चपटे व धारीदार होते हैं जो भोजन को काटने का कार्य करते हैं।
रदनक नुकीले होते हैं। भोजन को चीरने फाड़ने का कार्य करते हैं।
अग्रचवर्णक भोजन को चबाने का कार्य करते हैं।
चवर्णक भोजन को चबाने का कार्य करते हैं।

दाँतों की बनावट

  • दाँत के तीन भाग होते हैं।
भाग नाम नाम (अंग्रेजी)
ऊपरी भागशिखर Crown
मध्य भाग ग्रीवा Neck
निचला भाग मूल Root
  • प्रत्येक दाँत के अंदर एक गहा होती है जिसे मज्जा गुहा कहते हैं।
  • इसके ऊपर दंतास्थि या डेन्टाइन होती है जो दाँत का अधिकांश भाग तैयार करती है।
  • इसके ऊपर इनेमल की परत पाई जाती है।
  • इनेमल मानव शरीर का सबसे कठोर भाग है जो कैल्शियम फॉस्फेट का बना होता है। यह दाँत के आंतरिक भागों की सुरक्षा करता है।

Digestive System in Hindi

  • मुखगुहा का पिछला भाग ग्रसनी (Pharynx ) कहलाता है।
  • इसमें दो छिद्र होते हैं – निगलद्वार (Gullet) तथा कंठद्वार (Glottis)
  • निगलद्वार ग्रासनली में खुलता है तथा कण्ठद्वार श्वशनली में खुलता है।
  • एपिग्लॉटिस – कण्ठद्वार के आगे एक पत्तीनुमा संरचना होती है। भोजन ग्रहण के समय यह कण्ठद्वार को ढक लेती है जिससे भोजन श्वासनली में नहीं जा पाता।

ग्रासनली

  • मुखगुहा से लार से सना हुआ भोजन निगल द्वार द्वारा ग्रासनली में पहुँचता है।
  • ग्रासनली एक लम्बी नली होती है जो आमाशय में खुलती है।
  • इसकी दीवार पेशीय तथा संकुचनशील होती है जिसमें क्रमाकुंचन पाया जाता है।
  • ग्रासनली में किसी भी प्रकार की पाचन क्रिया नहीं होती है।

आमाशय

  • आमाशय उदरगुहा में बायीं ओर स्थित होता है।
  • इसकी आकृति अंग्रेजी के J अक्षर के समान होती है।
  • इसकी लम्बाई लगभग 30 सेमी होती है।
  • आमाशय का अग्रभाग कार्डियक (Cardiac), पिछला भाग पायलोरिक (Pyloric), तथा बीच वाला भाग फुन्डिक (Fundic) कहलाता है।
  • आमाशय की भीतरी दीवारों पर स्तम्भाकार एपिथीलियम कोशिकाओं का स्तर होता है।
  • आमाशय में जठर ग्रंथियाँ पाई जाती हैं जो जठर रस का स्रावण करती हैं।
  • जठर कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं। (a) श्लेष्मा कोशिकाएँ (b) भित्तीय या अम्लजन कोशिकाएँ (c) मुख्य तथा जाइमोजन कोशिकाएँ।
  • इन तीनों तीनों प्रकार की कोशिकाओं का स्राव जठर रस कहलाता है।
  • जठर रस में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, श्लेष्मा या म्यूकस तथा निष्क्रीय पेप्सिनोजन होता है।
  • HCl निष्क्रिय पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन एंजाइम में परिवर्तित कर देता है।
  • HCl जीवाणुनाशक की तरह भी कार्य करता है।
  • म्यूकस का का स्राव म्यूकस कोशिकाओं से होता है यह आमाशय की आंतरिक दीवारों को HCl से सुरक्षित रखता है।
  • काइम आमाशय के पाइलोरिक छिद्र के द्वारा छोटी आंत के पक्वाशय में पहुँचता है।

आँत

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छोटी आँत

  • इसका प्रारंभिक भाग जो अंग्रेजी के अक्षर U की आकृति का होता है को ग्रहणी, पक्वाशय (Duodenum) कहलाता है।
  • छोटी आँत आमाशय का सबसे लम्बा भाग होती है जिसकी लम्बाई 6 मीटर व चौड़ाई 2.5 सेमी होती है।
  • ग्रहणी से अगले भाग को जेजुनम कहा जाता है। जेजुनम से अगला भाग इलियम कहलाता है।
  • इलियम की दीवार की भीतरी सतह पर अँगुलियों समान संरचनाएँ पाई जाती हैं जिन्हें आंत्र रसांकुर कहते हैं। ये रसांकुर आंत की दीवार की अवशोषण सतह को बढ़ाते हैं।
  • पित्त वाहिनी तथा आमाशय वाहिनी मिलकर सामान्य वाहिनी बनाती हैं जो पक्वाशय में खुलती हैं।
  • छोटी आंत में भोजन से पोषक पदार्थों का अवशोषण होता है।

बड़ी आंत

  • छोटी आंत बड़ी आंत में खुलती है।
  • बड़ी आंत को तीन भागों : सीकम, कोलोन तथा रैक्टम में विभाजित किया जाता है।
  • छोटी आंत व बड़ी आंत के जोड़ पर नलीनुमा संरचना पाई जाती है जिसे सीकम कहा जाता है।
  • सीकम के शीर्ष पर एक अँगुली जैसी संरचना होती है। यह एपेंडिक्स कहलाती है।
  • एपेंडिक्स एक अवशेषी अंग है। इसका कोई कार्य नहीं होता।
  • कोलोन तीन भागों में विभाजित होता है। ऊपरगामी, अनुप्रस्थ तथा अधोगामी।
  • अधोगामी कोलोन मलाशय से जुड़ा होता है।
  • मलाशय मलद्वार द्वारा बाहर खुलता है।
  • इलियम एवं कोलन के जोड़ पर एक वॉल्व पाया जाता है जो भोजन को वापस छोटी आंत में जाने से रोकता है इसे इलियोसीकल वॉल्व कहते हैं।
  • बड़ी आंत मुख्यतः जल का अवशोषण करती है।

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पाचक ग्रंथियाँ

(1.) आंतरिक पाचक ग्रंथियाँ – वे पाचक ग्रंथियाँ जो आहारनाल की दीवार में उपस्थित होती हैं, आंतरिक पाचक ग्रंथियाँ कहलाती हैं।

उदाहरण : श्लेष्मा ग्रंथियाँ, आमाशय की दीवार, जठर ग्रंथियाँ एवं आंत की दीवार की बरूनर्स ग्रंथियाँ।

(2.) बाह्य पाचक ग्रंथियाँ – आहारनाल के अतिरिक्त शरीर के अन्य भागों में पाई जाने वाली ग्रंथियाँ बाह्य पाचन ग्रंथियाँ कहलाती हैं।

उदाहरण : लार ग्रंथियाँ, यकृत, अग्न्याशय

लार ग्रंथियाँ

  • मनुष्य में तीन जोड़ी लार ग्रंथियाँ पाई जाती हैं।
  • मनुष्य में 99% जल तथा 1% एंजाइम होते हैं।
  • लार में मुख्यतः दो एंजाइम पाए जाते हैं – टायलिन एवं लाइसोजाइम

यकृत

  • यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है।
  • इसका लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम की बीच होता है।
  • यह गहरे गर्त द्वारा दो खण्डों विभाजित होती है।
  • इसके निचले भाग में नाशपाती के आकार की एक थैली होती है जिसे पित्ताशय कहते हैं।
  • यकृत द्वारा स्रावित ऱस पित्ताशय में संचित होता है।
  • पित्त आँत में उपस्थिति एंजाइमों की क्रिया को तीव्र कर देता है।

यकृत के कार्य

  • यकृत कार्बोहाइड्रेड के उपापचय के अंतर्गत ग्लाइकोजन का निर्माण करता है।
  • भोजन में वसा की कमी होने पर यकृत कार्बोहाइड्रेड के कुछ भाग को वसा में परिवर्तित कर देता है।
  • यकृत प्रोटीन के उपापचय में सक्रिय रूप से भाग लेता है।
  • प्रोटीन के विघटन से जल, कॉर्बनडाईऑक्साइड, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल आदि उत्पन्न होते हैं।
  • अमोनिया एक विषैला पदार्थ है जिसे यकृत यूरिया में परिवर्तित कर देता है।

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